सावरकर पर विवाद की काली छाया
स्वातन्त्र्य वीर सावरकर पर एक बार फिर विवाद का काला साया छा गया और इसके चलते संसद में दो दिनों तक गतिरोध कायम रहा। यह अत्यन्त विक्षोभ की बात है कि ऐसे व्यक्ति के बारे में, जिसने अपना सम्पूर्ण जीवन राष्ट्र के प्रति समर्पित कर दिया, सरकार ऐसा नकारात्मक रुख रखती है। सत्ताधारी दल की एकमात्र हास्यास्पद दलील यह है कि सावरकर ने अंग्रेजों से क्षमा याचना कर कारागार से मुक्ति की प्रार्थना की थी, अत: वे स्वतन्त्रता सेनानी कहलाने के हकदार नहीं है; यद्यपि इसका कोई भी प्रमाण सत्ताधारी दल के पास नहीं है।

कांग्रेस ने पहले भी वीर सावरकर के तैलचित्र को संसद भवन में स्थापित करने का विरोध किया था। परन्तु शायद उन्हें यह स्मरण नहीं है कि श्रीमती इन्दिरा गाँधी ने स्वयं सावरकर जयन्ती को उत्साह पूर्वक मनाये जाने की इच्छा व्यक्त की थी। सावरकर रचित '1857 का स्वातंत्र्य समर' नामक पुस्तक ने सभी क्रान्तिकारियों के लिये सतत प्रेरणा स्रोत का कार्य किया, ऐसे ही क्रान्तिकारियों की सूची में चन्द्रशेखर आज़ाद और भगत सिंह भी सम्मिलित हैं।
वीर सावरकर के प्रति सत्ताधारी पक्ष के इस नकारात्मक रवैये का एकमात्र कारण है उनकी हिन्दुत्वनिष्ठा। किन्तु वोटों के लालच में राजनीतिक दल प्राय: यह भूल जाते हैं कि देशभक्त क्रांतिकारियों को क्षुद्र राजनीतिक स्वार्थ की ऐनक से नहीं देखना चाहिये, अपितु उनकी मान-प्रतिष्ठा करके राष्ट्र के समक्ष एक आदर्श प्रस्तुत करना चाहिये। चाहे वे किसी भी विचारधारा से क्यों न जुडे हुए हों।
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