जनचेतना उन्नायक गोस्वामी तुलसीदास
जो राम राज्य गाया तुमने, छाया है जिसका यश-वितान,
थे राव रंक सब सुखी जहाँ, थे ज्ञान-कर्म से मुखर प्राण,
युग-युग की दृढ़ शृंखला तोड़, हो शुभ्र स्वराज्य का फिर विहान,
इस राष्ट्र जागरण के इस युग में, कवि उठो पुन: तुम बन महान।
- श्री सोहनलाल द्विवेदी कृत 'तुलसीदास' कविता से
श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी (22 अगस्त) को एक और यथार्थ जनचेतना उन्नायक की जयन्ती गुज़र गयी; लेकिन भारत उदय के खोखले प्रचार और सत्तधारी पक्ष के एक तथाकथित महान स्वर्गवासी नेता की जयन्ती पर जितना हो-हल्ला होता है, उसका चतुर्थांश भी देखने को नहीं मिला।
वस्तुत: गोस्वामी तुलसीदास एक तत्वदर्शी कवि और क्रान्तिकारी मनीषी थे। उन्होने भारत की तत्कालीन स्थित को समझ कर राष्ट्र की जर्जर चेतना में नवप्राण का संचार करने के लिये रामचरित की रचना की थी। उन्होने अपनी लेखनी से स्वयं को हतभाग्य समझने वाले पराधीन राष्ट्र में आत्मविश्वास का तेज उत्पन्न करने का कार्य किया। यद्यपि यह सब उन्होने सीधे न कहकर रामकथा के माध्यम से व्यक्त किया। क्योंकि वे राष्ट्रीय स्वर के आरोह-अवरोह की लय को पहचानते थे और यह जानते थे कि भारत में राष्ट्रीय चेतना का जागरण भी केवल आध्यात्मिक उन्नति से ही सम्भव है।
तुलसी साहित्य, विश्व साहित्य के प्रमुख रत्नों में विशिष्ट स्थान रखता है। काव्य के रूप में यह अद्वितीय है ही, किन्तु साथ ही यह वैचारिक क्षितिज पर अपने पाठक के सम्मुख नये आयामों को उद्घटित करता है। इसके बारे में कहा जा सकता है कि जो जितना गहरा उतरता है, वो उतने ही भव्य रत्न पाता है। अत: तुलसी साहित्य का अनुशीलन प्रत्येक भारतीय के लिये आवश्यक ही नहीं, अपितु अपरिहार्य है।
थे राव रंक सब सुखी जहाँ, थे ज्ञान-कर्म से मुखर प्राण,
युग-युग की दृढ़ शृंखला तोड़, हो शुभ्र स्वराज्य का फिर विहान,
इस राष्ट्र जागरण के इस युग में, कवि उठो पुन: तुम बन महान।
- श्री सोहनलाल द्विवेदी कृत 'तुलसीदास' कविता से
श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी (22 अगस्त) को एक और यथार्थ जनचेतना उन्नायक की जयन्ती गुज़र गयी; लेकिन भारत उदय के खोखले प्रचार और सत्तधारी पक्ष के एक तथाकथित महान स्वर्गवासी नेता की जयन्ती पर जितना हो-हल्ला होता है, उसका चतुर्थांश भी देखने को नहीं मिला।
वस्तुत: गोस्वामी तुलसीदास एक तत्वदर्शी कवि और क्रान्तिकारी मनीषी थे। उन्होने भारत की तत्कालीन स्थित को समझ कर राष्ट्र की जर्जर चेतना में नवप्राण का संचार करने के लिये रामचरित की रचना की थी। उन्होने अपनी लेखनी से स्वयं को हतभाग्य समझने वाले पराधीन राष्ट्र में आत्मविश्वास का तेज उत्पन्न करने का कार्य किया। यद्यपि यह सब उन्होने सीधे न कहकर रामकथा के माध्यम से व्यक्त किया। क्योंकि वे राष्ट्रीय स्वर के आरोह-अवरोह की लय को पहचानते थे और यह जानते थे कि भारत में राष्ट्रीय चेतना का जागरण भी केवल आध्यात्मिक उन्नति से ही सम्भव है।
तुलसी साहित्य, विश्व साहित्य के प्रमुख रत्नों में विशिष्ट स्थान रखता है। काव्य के रूप में यह अद्वितीय है ही, किन्तु साथ ही यह वैचारिक क्षितिज पर अपने पाठक के सम्मुख नये आयामों को उद्घटित करता है। इसके बारे में कहा जा सकता है कि जो जितना गहरा उतरता है, वो उतने ही भव्य रत्न पाता है। अत: तुलसी साहित्य का अनुशीलन प्रत्येक भारतीय के लिये आवश्यक ही नहीं, अपितु अपरिहार्य है।
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2 Comments:
Pratik,
The text on your blog comes all jumbled up when viewed using FireFox. I had a similar problem and in my case it was just a minor change in blogger template. Would be nice if it viewed the same for non-IE users.
Thanks.
By
Munish, at 6:53 PM
तुलसी दास बहुत बड़ा बेवकूफ आदमी था जिसे तेजाब में डूबा दिया जाना चाहिये था.
By
Anonymous, at 4:27 PM
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