Kahanii TV Serials Kay
कहानी टीवी धारावाहिकों की
आजकल के हिन्दी धारावाहिक बड़े ही अद्भुत हैं। इन्हें देखकर मैं प्राय: ही आश्चर्यचकित हो जाता हूँ। प्रथम तो इनका नाम ही दर्शनीय होता है। मैंने दर्शनीय कहा, न कि पठनीय; क्योंकि इनके नामों की वर्तनी ही इतनी निराली होती है कि उसे पढ़ना अपने आप में दुष्कर कार्य है। e की जगह a का व a की जगह e का और स्थान-स्थान पर ii (दो बार आई) का प्रयोग तो एक सामान्य सी बात है। फिर इन धारावाहिकों के नाम के प्रथम अक्षर में 'क' का वही महत्व है; जो वेदों में ओंकार का, नाजियों में स्वास्तिक का और मर्सिडीज़ कार में आगे लगे सितारे का होता है।
खैर ये तो कुछ भी नहीं है श्रीमान् ! इनकी विषय-वस्तु तो दर्शकों का सिर घुमा देती है। आपकी सारी पूर्वनिर्धारित धारणाएं ध्वस्त हो जाती हैं। उदाहरणार्थ इन धारावाहिकों में दिखाए जाने वाले विभिन्न चरित्रों को बार-बार संस्कारी कहा जाता है। लीजिए, खा गए न गच्चा। अरे ये वो संस्कारी नहीं हैं, जो आप समझ रहे हैं। इनकी परिभाषा ज़रा हट कर है। अब आप पूछेंगे भला कैसे हटकर है? इनके अनुसार संस्कारी होने से अभिप्राय उस व्यक्ति से है; जिसके विवाहेतर सम्बन्ध हों, जो दूसरों की बातें बाहर से दरवाज़े पर कान लगाकर सुनने का चिर अभ्यासी हो, जो दूसरे को नीचा दिखाने का कोई भी अवसर न छोड़ता हो और षड्यन्त्र करने में सिद्धहस्त हो।
इन धारावाहिकों के सम्वाद बड़े ही उबाऊ होते हैं, लेकिन दर्शक फिर भी पूरी तल्लीनता से कान लगाकर इन्हें सुनते हैं। यद्यपि आरम्भ में सम्वाद-लेखक का नाम भी लिखा आता है, किन्तु मैं नहीं मानता कि ये सम्वाद किसी मनुष्य ने लिखे हैं। मुझे पूरा विश्वास है कि ये सम्वाद कम्प्यूटरीकृत होते हैं। मेरे हिसाब से सम्वाद लेखन का कार्य कोई सॉफ्टवेयर करता है, जो अपने सीमित डेटाबेस के संस्कार, सिंदूर, आदर्श, परम्परा, परिवार और आदर इत्यादि शब्दों को randomly लगाकर नए-नए वाक्यों का निर्माण करता है। जैसेकि 'बुजुर्गों का आदर करना हमारे परिवार की परम्परा है' वगैरह वगैरह।
ये सभी 'क' वर्णारम्भ धारावाहिक समय नष्ट करने के लिए सर्वश्रेष्ठ साधन हैं। यदि आप खाली बैठे हैं और समय काटे नहीं कट रहा (भगवान करे ऐसा आपके साथ कभी न हो, क्योंकि ऐसा तो सिर्फ नौकरी छूटने के बाद ही होता है), तो अपना टीवी खोलें और ऐसा ही कोई धारावाहिक ज़रूर देखें। फिर मुझे बताएं कि इन धारावाहिकों के बारे में मेरे विचार कितने सही हैं।
आजकल के हिन्दी धारावाहिक बड़े ही अद्भुत हैं। इन्हें देखकर मैं प्राय: ही आश्चर्यचकित हो जाता हूँ। प्रथम तो इनका नाम ही दर्शनीय होता है। मैंने दर्शनीय कहा, न कि पठनीय; क्योंकि इनके नामों की वर्तनी ही इतनी निराली होती है कि उसे पढ़ना अपने आप में दुष्कर कार्य है। e की जगह a का व a की जगह e का और स्थान-स्थान पर ii (दो बार आई) का प्रयोग तो एक सामान्य सी बात है। फिर इन धारावाहिकों के नाम के प्रथम अक्षर में 'क' का वही महत्व है; जो वेदों में ओंकार का, नाजियों में स्वास्तिक का और मर्सिडीज़ कार में आगे लगे सितारे का होता है।
खैर ये तो कुछ भी नहीं है श्रीमान् ! इनकी विषय-वस्तु तो दर्शकों का सिर घुमा देती है। आपकी सारी पूर्वनिर्धारित धारणाएं ध्वस्त हो जाती हैं। उदाहरणार्थ इन धारावाहिकों में दिखाए जाने वाले विभिन्न चरित्रों को बार-बार संस्कारी कहा जाता है। लीजिए, खा गए न गच्चा। अरे ये वो संस्कारी नहीं हैं, जो आप समझ रहे हैं। इनकी परिभाषा ज़रा हट कर है। अब आप पूछेंगे भला कैसे हटकर है? इनके अनुसार संस्कारी होने से अभिप्राय उस व्यक्ति से है; जिसके विवाहेतर सम्बन्ध हों, जो दूसरों की बातें बाहर से दरवाज़े पर कान लगाकर सुनने का चिर अभ्यासी हो, जो दूसरे को नीचा दिखाने का कोई भी अवसर न छोड़ता हो और षड्यन्त्र करने में सिद्धहस्त हो।
इन धारावाहिकों के सम्वाद बड़े ही उबाऊ होते हैं, लेकिन दर्शक फिर भी पूरी तल्लीनता से कान लगाकर इन्हें सुनते हैं। यद्यपि आरम्भ में सम्वाद-लेखक का नाम भी लिखा आता है, किन्तु मैं नहीं मानता कि ये सम्वाद किसी मनुष्य ने लिखे हैं। मुझे पूरा विश्वास है कि ये सम्वाद कम्प्यूटरीकृत होते हैं। मेरे हिसाब से सम्वाद लेखन का कार्य कोई सॉफ्टवेयर करता है, जो अपने सीमित डेटाबेस के संस्कार, सिंदूर, आदर्श, परम्परा, परिवार और आदर इत्यादि शब्दों को randomly लगाकर नए-नए वाक्यों का निर्माण करता है। जैसेकि 'बुजुर्गों का आदर करना हमारे परिवार की परम्परा है' वगैरह वगैरह।
ये सभी 'क' वर्णारम्भ धारावाहिक समय नष्ट करने के लिए सर्वश्रेष्ठ साधन हैं। यदि आप खाली बैठे हैं और समय काटे नहीं कट रहा (भगवान करे ऐसा आपके साथ कभी न हो, क्योंकि ऐसा तो सिर्फ नौकरी छूटने के बाद ही होता है), तो अपना टीवी खोलें और ऐसा ही कोई धारावाहिक ज़रूर देखें। फिर मुझे बताएं कि इन धारावाहिकों के बारे में मेरे विचार कितने सही हैं।
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2 Comments:
Pratik, I was not knowing that you can write satire too. Keep it up, it is really great.
By
Punit Pandey, at 10:51 AM
Pratik u have said real work aalso it's true in this seriols there many time we can see very trusted atmosphere.
it's only just a garbage.
By
Arun, at 11:40 PM
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