अनुगूंज 9 – ”आशा ही जीवन है”
आशा ही मृत्यु भी है
यह बात बिल्कुल सही है कि आशा ही जीवन है। लेकिन हमें यह बात याद रखनी होगी कि हर सिक्के के दो पहलू होते हैं। दिन के साथ रात, अन्धकार के साथ प्रकाश और जीवन के साथ मृत्यु का चिर-तादात्म्य है। इसे झुठलाया नहीं जा सकता है। अगर आशा को जीवन मानते हो तो तुम्हें यह भी मानना पड़ेगा कि आशा ही मृत्यु भी है। इंसान अमर होना चाहता है – मौत से छुटकारा पाना चाहता है – लेकिन साथ ही जीवन से भी चिपके रहना चाहता है। लेकिन अमर वही है, जो जीवन-मुक्त हो – जो जीवन से भी छूट चुका हो। अगर सत्य के दर्शन की अभीप्सा है तो आशा को त्यागना होगा – जीवन और मरण दोनों श्रंखलाओं से मुक्त होना पड़ेगा।

आशा बन्धन का कारण है। आशा सापेक्षिकता पैदा करती है, दृष्टिकोण की सापेक्षिकता – और फिर वही दिखता है जो तुम देखना चाहते हो। निरपेक्ष सत्य आंखों से ओझल हो जाता है। जो हमारी आशा है, कामना है, तृष्णा है; उसी के अनुरूप हम सारा संसार अपने चारों ओर गढ़ते हैं। और इस तरह आशा द्वन्द्व पैदा करती है, संघर्ष उत्पन्न करती है। एक लड़का था जो अभी-अभी 12वीं में उत्तीर्ण होकर कॉलेज में आया था। उसके सभी दोस्त कार से कॉलेज जाते थे, लेकिन वह बेचारा पैदल ही कॉलेज जाता था। उसके दिल में केवल एक ही उम्मीद थी कि पिताजी उसकी बेचारगी को देखें और उसे भी एक कार दिलवा दें। लेकिन उसे अपनी ये आशा धूमिल होती नज़र आयी, पितीजी इस ओर कभी ध्यान ही नहीं देते थे। सो वह एक िदन अपने िपताजी के पास गया और सारा हाल कह सुनाया। पिताजी बोले - अरे ओ नालायक! घर की दीवार से लगा हुआ तो तेरा कॉलेज है वहां भी कार से जाना चाहता है, भगवान ने ये दो पैर किस लिए दिए हैं? – आखिर पिताजी भी यूंही करोड़पति नहीं बन गये थे, कंजूसी में पीएचडी की थी और पाई-पाई को निचोड़ना अच्छी तरह से जानते थे, उन्हें उम्मीद थी कि बेटा भी यही गुण सीखेगा लेकिन हो उल्टा रहा था – बेटा बोला, दो पैर किस लिए दिये हैं? आपने बिल्कुल ठीक सवाल पूछा। एक पैर दिया है एक्सिलरेटर पर रखने के लिए और दूसरा पैर दिया है ब्रेक पर रखने के लिए। दोनों ही नज़रिए ठीक है अपनी-अपनी जगह पर। पर यह मज़ाक नहीं है, यह वास्तविक द्वन्द्व है जो उम्मीदों के, आशाओं के टकराने से पैदा होता है और इन्सान केवल अपना ही पहलू देख पाता है।
आशा दु:ख की जननी है। जो व्यक्ति कुछ प्राप्त करने की आशा रखता है, प्रतिदान चाहता है; वह हमेशा दु:खी रहेगा। वह कष्ट भोगने के लिए बाध्य है। आदमी अपनी पत्नी से इस आशा में प्यार करता है कि बदले में वह भी प्यार पाएगा, और जब उसे प्यार नहीं मिलता या कहें कि वैसा प्यार नहीं मिलता जैसी उसने आशा की थी, जैसी उसने कल्पना की थी; तो वह कष्ट का अनुभव करता है। कोई इस आशा में उपकार करता है कि उसे प्रत्युपकार भी प्राप्त होगा, लेकिन जब उसे उसके उपकार का फल नहीं मिलता तो वह दु:खी हो जाता है। अगर दु:ख से, कष्ट से, निराशा से छुटकारा पाना है; तो आशा की ज़ंजीरों से भी छुटकारा पाना पड़ेगा। क्योंकि निराशा और आशा दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, एक को पकड़कर दूसरे से छूटना नामुमकिन है।
लेकिन मेरा मतलब यह नहीं है कि तुम प्यार करना ही बन्द कर दो। कांटों के भय से गुलाब को छोड़ना कहां की बुद्धिमानी है? प्रेम करो – पत्नी से, बच्चों से, संसार से – लेकिन आशा-विहीन होकर। द़रअसल जीवन के आनन्द का उपभोग वही कर सकता है, जो आशा-मुक्त हो। बच्चों के साथ वही खेल सकता है, बारिश में वही भीग सकता है, उल्लास से भरकर वही नाच सकता है और दिल खोलकर गाने का आनन्द वही उठा सकता है; जिसने बदले में कुछ न चाहा हो, जिसने प्रतिदान न चाहा हो, जिसने कोई आशा न की हो। दुनिया में जो भी सर्वश्रेष्ठ है, वह आशा-विहीन अवस्था से उत्पन्न होता है। एक बार दरबार में तानसेन के गाने को सुनकर अकबर मुग्ध हो गये और बोले – तुम दुनिया के सर्वोत्तम गायक हो। तुमसे बेहतर गायक तो इस दुनिया में हो ही नहीं सकता। इसपर तानसेन ने कहा – मेरे गुरु स्वामी हरिदास मुझसे भी बेहतर गायक हैं, मैं उनके सामने कुछ भी नहीं हूं। अकबर को यकीन नहीं हुआ तो तानसेन अकबर को लेकर वृंदावन पहुंचे, जहां हरिदास रहते थे। बहुत दिनों के बाद उन्होने राग मल्हार गाया, सभी मंत्रमुग्ध हो गये और ज़ोरों की वर्षा होने लगी। अकबर ने लौटकर तानसेन से पूछा – तुम स्वामी हरिदास के सौंवे अंश जितना अच्छा भी नहीं गा पाते। क्या तुम उनके जितना अच्छा नहीं गा सकते? तानसेन ने उत्तर दिया – मैं कभी भी उनके जैसा श्रेष्ठ गायन नहीं कर सकता, क्योंकि मैं इस आशा से गाता हूं कि आप प्रसन्न हों। लेकिन वे आशा-विहीन हैं, वे केवल स्वान्त:सुखाय गाते हैं।
यही सारा रहस्य है। अगर संसार का असली आनन्द उठाना है, सर्वश्रेष्ठ कार्य करना है ; तो ऐसा मन चाहिये, जो कोरा कागज़ हो, जिसपर आशा की स्याही न लगी हो। जो आशा के बन्धन को छिन्न करने में सक्षम हो जाता है ; वह आनन्द प्राप्त कर लेता है, वह पूर्णता प्राप्त कर लेता है, वह जीवन्मुक्ति की अवस्था को प्राप्त कर लेता है। उसके लिए अन्य कुछ शेष नहीं रहता।
यह बात बिल्कुल सही है कि आशा ही जीवन है। लेकिन हमें यह बात याद रखनी होगी कि हर सिक्के के दो पहलू होते हैं। दिन के साथ रात, अन्धकार के साथ प्रकाश और जीवन के साथ मृत्यु का चिर-तादात्म्य है। इसे झुठलाया नहीं जा सकता है। अगर आशा को जीवन मानते हो तो तुम्हें यह भी मानना पड़ेगा कि आशा ही मृत्यु भी है। इंसान अमर होना चाहता है – मौत से छुटकारा पाना चाहता है – लेकिन साथ ही जीवन से भी चिपके रहना चाहता है। लेकिन अमर वही है, जो जीवन-मुक्त हो – जो जीवन से भी छूट चुका हो। अगर सत्य के दर्शन की अभीप्सा है तो आशा को त्यागना होगा – जीवन और मरण दोनों श्रंखलाओं से मुक्त होना पड़ेगा।

आशा बन्धन का कारण है। आशा सापेक्षिकता पैदा करती है, दृष्टिकोण की सापेक्षिकता – और फिर वही दिखता है जो तुम देखना चाहते हो। निरपेक्ष सत्य आंखों से ओझल हो जाता है। जो हमारी आशा है, कामना है, तृष्णा है; उसी के अनुरूप हम सारा संसार अपने चारों ओर गढ़ते हैं। और इस तरह आशा द्वन्द्व पैदा करती है, संघर्ष उत्पन्न करती है। एक लड़का था जो अभी-अभी 12वीं में उत्तीर्ण होकर कॉलेज में आया था। उसके सभी दोस्त कार से कॉलेज जाते थे, लेकिन वह बेचारा पैदल ही कॉलेज जाता था। उसके दिल में केवल एक ही उम्मीद थी कि पिताजी उसकी बेचारगी को देखें और उसे भी एक कार दिलवा दें। लेकिन उसे अपनी ये आशा धूमिल होती नज़र आयी, पितीजी इस ओर कभी ध्यान ही नहीं देते थे। सो वह एक िदन अपने िपताजी के पास गया और सारा हाल कह सुनाया। पिताजी बोले - अरे ओ नालायक! घर की दीवार से लगा हुआ तो तेरा कॉलेज है वहां भी कार से जाना चाहता है, भगवान ने ये दो पैर किस लिए दिए हैं? – आखिर पिताजी भी यूंही करोड़पति नहीं बन गये थे, कंजूसी में पीएचडी की थी और पाई-पाई को निचोड़ना अच्छी तरह से जानते थे, उन्हें उम्मीद थी कि बेटा भी यही गुण सीखेगा लेकिन हो उल्टा रहा था – बेटा बोला, दो पैर किस लिए दिये हैं? आपने बिल्कुल ठीक सवाल पूछा। एक पैर दिया है एक्सिलरेटर पर रखने के लिए और दूसरा पैर दिया है ब्रेक पर रखने के लिए। दोनों ही नज़रिए ठीक है अपनी-अपनी जगह पर। पर यह मज़ाक नहीं है, यह वास्तविक द्वन्द्व है जो उम्मीदों के, आशाओं के टकराने से पैदा होता है और इन्सान केवल अपना ही पहलू देख पाता है।
आशा दु:ख की जननी है। जो व्यक्ति कुछ प्राप्त करने की आशा रखता है, प्रतिदान चाहता है; वह हमेशा दु:खी रहेगा। वह कष्ट भोगने के लिए बाध्य है। आदमी अपनी पत्नी से इस आशा में प्यार करता है कि बदले में वह भी प्यार पाएगा, और जब उसे प्यार नहीं मिलता या कहें कि वैसा प्यार नहीं मिलता जैसी उसने आशा की थी, जैसी उसने कल्पना की थी; तो वह कष्ट का अनुभव करता है। कोई इस आशा में उपकार करता है कि उसे प्रत्युपकार भी प्राप्त होगा, लेकिन जब उसे उसके उपकार का फल नहीं मिलता तो वह दु:खी हो जाता है। अगर दु:ख से, कष्ट से, निराशा से छुटकारा पाना है; तो आशा की ज़ंजीरों से भी छुटकारा पाना पड़ेगा। क्योंकि निराशा और आशा दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, एक को पकड़कर दूसरे से छूटना नामुमकिन है।
लेकिन मेरा मतलब यह नहीं है कि तुम प्यार करना ही बन्द कर दो। कांटों के भय से गुलाब को छोड़ना कहां की बुद्धिमानी है? प्रेम करो – पत्नी से, बच्चों से, संसार से – लेकिन आशा-विहीन होकर। द़रअसल जीवन के आनन्द का उपभोग वही कर सकता है, जो आशा-मुक्त हो। बच्चों के साथ वही खेल सकता है, बारिश में वही भीग सकता है, उल्लास से भरकर वही नाच सकता है और दिल खोलकर गाने का आनन्द वही उठा सकता है; जिसने बदले में कुछ न चाहा हो, जिसने प्रतिदान न चाहा हो, जिसने कोई आशा न की हो। दुनिया में जो भी सर्वश्रेष्ठ है, वह आशा-विहीन अवस्था से उत्पन्न होता है। एक बार दरबार में तानसेन के गाने को सुनकर अकबर मुग्ध हो गये और बोले – तुम दुनिया के सर्वोत्तम गायक हो। तुमसे बेहतर गायक तो इस दुनिया में हो ही नहीं सकता। इसपर तानसेन ने कहा – मेरे गुरु स्वामी हरिदास मुझसे भी बेहतर गायक हैं, मैं उनके सामने कुछ भी नहीं हूं। अकबर को यकीन नहीं हुआ तो तानसेन अकबर को लेकर वृंदावन पहुंचे, जहां हरिदास रहते थे। बहुत दिनों के बाद उन्होने राग मल्हार गाया, सभी मंत्रमुग्ध हो गये और ज़ोरों की वर्षा होने लगी। अकबर ने लौटकर तानसेन से पूछा – तुम स्वामी हरिदास के सौंवे अंश जितना अच्छा भी नहीं गा पाते। क्या तुम उनके जितना अच्छा नहीं गा सकते? तानसेन ने उत्तर दिया – मैं कभी भी उनके जैसा श्रेष्ठ गायन नहीं कर सकता, क्योंकि मैं इस आशा से गाता हूं कि आप प्रसन्न हों। लेकिन वे आशा-विहीन हैं, वे केवल स्वान्त:सुखाय गाते हैं।
यही सारा रहस्य है। अगर संसार का असली आनन्द उठाना है, सर्वश्रेष्ठ कार्य करना है ; तो ऐसा मन चाहिये, जो कोरा कागज़ हो, जिसपर आशा की स्याही न लगी हो। जो आशा के बन्धन को छिन्न करने में सक्षम हो जाता है ; वह आनन्द प्राप्त कर लेता है, वह पूर्णता प्राप्त कर लेता है, वह जीवन्मुक्ति की अवस्था को प्राप्त कर लेता है। उसके लिए अन्य कुछ शेष नहीं रहता।
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2 Comments:
एसा लग रहा है कि साक्षात ओशो बोल रहे हों। वाह क्या कनफयूजन है - मान गये उस्ताद।
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Punit Pandey, at 12:16 AM
just landed accidently....amazing sense of writing!!!
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Anonymous, at 10:35 PM
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