Movie Review : Apaharan

फ़िल्म समीक्षा : अपहरण
गंगाजल के बाद निर्देशक प्रकाश झा एक बार फिर दर्शकों की उम्मीदों पर खरे उतरे हैं। झा का कसा हुआ निर्देशन और अजय देवगन, नाना पाटेकर का मंझा हुआ अभिनय इस फ़िल्म की जान हैं। हाँलाकि फ़िल्म अन्तिम क्षणों में कुछ नाटकीय मोड़ ले लेती है, लेकिन फिर भी यह फ़िल्म आपको पूरे ढाई घण्टे तक बान्धे रखती है।
कहानी केन्द्रित है बिहार में व्यापक रूप से फल-फूल रहे ‘अपहरण उद्योग’ पर। राजनीति में पूरी तरह हो चुके अपराधीकरण को दर्शाने में भी यह फ़िल्म सफल रही है। ‘अपहरण उद्योग’ में इस्तेमाल की जानी वाली शब्दावली शुरूआत में दर्शकों में हास्य भी पैदा करती है। जैसे – ‘माल में कोई डिफेक्ट नहीं होना चाहिए’ का मतलब है अपहृत व्यक्ति के शरीर पर चोट का कोई निशान नहीं होना चाहिए वगैरह। साथ ही यह भी दिखाया गया है कि किसी संगठित उद्योग की ही तरह अपहरण के इस धन्धे में भी किस तरह ‘माल के ट्रांसपोर्ट’ से लेकर खाने-पीने तक हर एक छोटी चीज़ का भी हिसाब-किताब रखा जाता है।
कथानक बुना गया है अजय शास्त्री (अजय देवगन) और विधायक तबरेज़ आलम (नाना पाटेकर) के आस-पास। अजय शास्त्री एक साधारण छात्र है, जो पुलिस में भर्ती होने के लिये जी तोड़ मेहनत करता है, लेकिन फिर भी घूसखोरी और आरक्षण के चलते अपने इस प्रयास में विफल रहता है। रिश्वत मांगे जाने पर कहीं से जैसे-तैसे ५ लाख रू. लाकर देता है, लेकिन अपने आदर्शवादी पिता के चलते नौकरी पाने से वंचित रह जाता है, पैसे जाते हैं सो अलग। और उन पैसों को चुकाने के लिये विवश हो कर उसे भी अपहरण की इस घिनौने कीचड़ में उतरना पड़ता है। फिर वह इस दलदल में फँसता ही चला जाता है और विधायक तबरेज़ आलम उसका इस्तेमाल आपराधिक कामों और अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिये करता है। फिल्म बिहार के बदहाल हालात, भ्रष्ट प्राशासनिक तन्त्र और राजनितिज्ञ-अपराधी गठजोड़ को उजागर करती है। कुल मिलाकर यह फिल्म देखने लायक बन पड़ी है।
अरे... दो ख़ास चीज़ों के बारे में तो बताना भूल ही गया, जो आपको इस फिल्म में मिलेंगी। बिपाशा बसु, वो भी पूरे कपड़ों में और आज-कल की हिन्दी पिक्चरों के लिये ज़रूरी एक खामखां का आइटम नम्बर।
इसे पढ़ने के बाद अगर थोड़ा और वक्त बर्बाद करना चाहते हैं, तो फिल्म की वेब साइट और ब्लॉग भी देख सकते हैं।
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3 Comments:
yeah, apaharan is really a good film.
By
Anonymous, at 4:13 PM
I could not read the text :(
:) Chaand
By
Anonymous, at 3:51 PM
प्रकाश झा का कार्य अत्यंत सराहनीय है। आपका विचार अच्छा लगा। आप हिन्दी मे लिखना नहीं छोड़ियेगा। धन्यवाद ।
जालस्थल
अभिव्यक्ति
By
Abhishek, at 11:15 PM
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