जिम में हमारे अनुभवआजकल युवाओं में जिम जाने का बड़ा क्रेज़ है। हमारे पिताजी बताते हैं कि पहले अखाड़े हुआ करते थे, जहाँ बड़े-बड़े पहलवान कुश्ती लड़ते थे। हांलाकि आजकल ये अखाड़े पूरी तरह लुप्त हो चुके हैं और खोजने पर भी नहीं मिलते।
खैर, मुहल्ले के दूसरे लड़कों और दोस्तों को जिम जाते देखकर हमें भी बॉडी बिल्डिंग का शौक चर्राया, सो अपने कमरे में अर्नोल्ड श्वार्ज़ेनेगर का पोस्टर चिपकाया और हम भी चल दिये जिम की ओर पहलवानी करने। जिम का नज़ारा अद्भुत होता है। आपको हर तरह के लोग जिम में देखने को मिल जाएंगे। बहुत से गोल-मटोल लोग सलमान खान बनने का सपना साकार करने की कोशिश में लगे दिखाई देते हैं। कई सारे सीकड़ी पहलवान इस आस में कसरत करते दिखाई दिये कि जल्द ही वे अर्नोल्ड श्वार्ज़ेनेगर बन जाएंगे। इनकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि ज़रा सी तारीफ की नहीं कि फूल के कुप्पा हो जाते हैं – अरे, चोर बॉडी है ब्रूसली की नांई। देखने में ज़रूर दुबले-पतले हैं, लेकिन ताकत ऐसी कि ज़मीन में लात मार दें तो पानी का फुव्वारा फूट पड़े। - बस इतना कहने की देर है और लो, अपने मुंह मियाँ मिट्ठू हो गये चालू - अरे नहीं, अब तो बॉडी डाउन हो गयी है। तीन महीने पहले देखते, मुहल्ले के लौंडे देखकर थर-थर काँपते थे, ऐसी बॉडी थी। कॉलेज में अपना टेरर था। ............ और फिर कसरत बन्द और आत्मप्रशंसा का अनलिमिटेड स्टॉक खुल गया समझो। हांलाकि इन्हें देखकर आपको ऐसा लग सकता है कि कहीं हवा तेज़ चल रही हो तो गिर न जाए बेचारा। जिम से निकलने के बाद आगरा की तंग गलियों में ये सीना चौड़ाकर इस तरह चलते हैं कि आने-जाने वाले दूसरे लोग इनके निकलने का इन्तज़ार गली के बाहर खड़े रह कर ही करना पसन्द करते हैं।
फिर हमें एक बात यह देखने को मिली की वहां हर कोई विशेषज्ञ था, भले ही उसने आपसे बस दो दिन पहले ही कसरत करना शुरू की हो। जैसे पहले कहावत थी कि वही मुनि है, जिसका मत (दर्शन) भिन्न हो; वैसे ही यहां आकर पता चला कि वही सच्चा पहलवान है, जिसके कसरत करने का ‘इश्टाइल’ ज़रा हट कर हो। सींकड़ी पहलवान बिना पूछे ही आपको आकर समझाएगा – अर्र... ये क्या कर रहे हो। ये तरीका गलत है, इससे बाइसेप्स पर पूरा प्रेशर नहीं आता। डम्बल को आधा ऊपर लाओ, तीन गिनने तक रोको और फिर नीचे ले जाओ। रुस्तम-ए-हिन्द आपको आकर समझाएंगे – वो तो #$%@^& है। पहले डम्फल (ये पहलवान जी ऐसा ही बोलते हैं) को छाती तक ऊपर लाओ और बिना रुके तुरन्त नीचे ले जाओ। ‘जितने मुंह उतनी बातें’ इस कहावत का क्या मतलब है, यहां आकर हमें पता लगा।
फिर जिम में घुसते ही तरह-तरह की हुंकार सुनाई पड़ती हैं, हांलाकि बाद में हमें इसकी आदत हो गयी। वैसे ये शोध का विषय हो सकता है कि कौन कब कैसी आवाज़ पैदा करता है। बेंच प्रेस के वक्त – हुआ....., कर्लिंग के वक्त – इया......, पैकडैक के समय – उह....... वगैरह वगैरह। अखाड़े बन्द होने की वजह से आस-पास के गाँव के कई लोग भी जिम में आते हैं; ये लोग कसरत करते समय जै बजरंगबली की, जै काली मैया की जैसे निनाद भी करते हैं। वैसे कतई ज़रूरी नहीं है कि कसरत करते वक्त किसी तरह की आवाज़ की ही जाए, लेकिन हमारी जिम की परम्परा को कायम रखने के लिये हमने भी इस कोलाहल में इज़ाफा करना शुरू कर दिया।
हांलाकि हमसे एक बड़ी भारी भूल हो गयी, वो यह कि हमने कसरत के साथ स्ट्रेचिंग नहीं की (इससे पहले जो कुछ लिखा है, सब छोटी सी भूमिका है और यह उपसंहार है)। जिसका परिणाम यह हुआ कि हमारी मांसपेशियां छ:-आठ महीन में ही ज़रूरत से ज़्यादा सख्त हो गयीं और डॉक्टर ने कम से कम दो हफ्ते तक जिम जाने को मना कर दिया। अब दोनों हाथों और कन्धे पर पट्टियां बंधी हुई हैं और हम ये पोस्ट टाइप करने के अलावा और कोई कायदे का काम नहीं कर सकते। हाँ, इस बारे में लोगों को हम ये बताते हैं कि, ‘‘कॉलेज में ज़रा मार-पीट हो गयी थी; सो ये पट्टियां बन्ध गयी हैं। देखो, केवल हाथों में ही बन्धी हैं चेहरे पर एक भी निशान नहीं है; क्योंकि हमने केवल दूसरों की मार लगाई, पिटे ज़रा भी नहीं। कॉलेज में अब हमारा भी टेरर है।’’