खुश्बू के बाद अब सानिया के बयान पर बवालहिन्दुस्तान एक ऐसा देश है, जहाँ पर आपको फालतू लोग बहुतायत में मिल जाएंगे। दुनिया में कई मुल्कों की इतनी आबादी नहीं है, जितनी की भारत में फालतू लोगों की तादाद है। किसी नुक्कड़ पर चाहे कोई मदारी बन्दर और भालू का खेल दिखा रहा हो या फिर सड़क के किनारे कोई चमत्कारी दन्त-मंजन बेच रहा हो, चारों ओर खड़ी भारी भीड़ इस तथ्य की पुष्टि के लिये काफ़ी है। ऐसे ही बेहद फालतू लोगों में से कुछ हैं, जो खामोखां ही दूसरों के छोटे-मोटे बयानों पर भारतीय संस्कृति की दुहाई दे कर मुकदमा ठोंक देते हैं। ताज़ातरीन उदाहरण है सानिया मिर्ज़ा का। हालही में जयपुर के किसी सरफिरे सज्जन ने सानिया पर खुश्बू का पक्ष लेने के कारण मुकदमा कर दिया। खुश्बू को तो खैर छोड़ ही दीजिए, उन पर तो पहले से ही दर्जनों की संख्या में मुकदमे हैं।
भारतीय संस्कृति भी अपने आप में एक कमाल की चीज़ है। सौरव गांगुली की तरह न जाने क्यों हर वक़्त खतरे में ही बनी रहती है। वैसे, मेरी समझ में नहीं आता कि जिसके लिये इतने सारे लोग हमेशा लट्ठ भांजते रहते हैं, वो बात-बात में खतरे में कैसे आ जाती है। बल्कि मुझको तो उल्टे ऐसा लगता है कि इस तथाकथित भारतीय संस्कृति के कारण आर्चीज़ गैलरी और मैकडोनल्ड्स जैसी कम्पनियाँ ज़्यादा खतरे में रहती हैं। सोचने वाली बात यह है कि बवालन भारतीय संस्कृति है क्या चीज़। क्या ये वैसी ही है, जैसी इसके स्वघोषित ठेकेदार इसे बताते हैं?

लेकिन जितना मैंने जानने की कोशिश की, भारतीय संस्कृति का कुछ और ही रूप उभर के सामने आया। सानिया मिर्ज़ा के कपड़ो से जिन्हें दिक्कत है, वे ज़रा प्राचीन भारतीय मन्दिर गौर से देखें और उनपर बनी हुए कई सारी मूर्तियों का अवलोकन करें। मेरे हिसाब से तो सिर से पांव तक शरीर को ढ़क कर रखने की परम्परा भारतीय नहीं है। पुराने समय से ही यहाँ पर कम कपड़े पहनने का रिवाज़ था। क्या पुरूष, क्या स्त्रियाँ; सभी सिर्फ कटि मात्र वस्त्र पहनते थे। और मेरा ऐसा अनुमान है कि आज-कल के कॉलेजों की तरह प्राचीन गुरुकुलों में जब-तब कोई ड्रेस-कोड नहीं लागू किया जाता होगा। आज-कल जिसे पश्चिमी सभ्यता कहकर दुत्कारा जाता है, दरअसल उसका मूल पुरातन भारतीय संस्कृति ही है। पूरा शरीर ढ़क कर रखना मूलत: पश्चिमी परम्परा है। यूरोप में बहुत पुराने ज़माने से विक्टोरिया युग तक महिलाएँ सर से पाँव तक कपड़ों से ढकी रहती थीं। पश्चिम में आज-कल पहने जा रहे कपड़ों का चलन तो ख़ासा आधुनिक है।
लेकिन इस बारे में भारतीय संस्कृति का दृष्टिकोण ज़रा अलग था। प्राचीन आर्य अपने कपड़ों को लेकर बिल्कुल सहज थे। इसके पीछे किसी भी तरह का कोई कुत्सित भाव नहीं था। वैचारिक तौर पर भी भारतीय काफ़ी स्वतन्त्र और उदारवादी थे। प्राचीन वैदिक भारत में चार्वाक सम्प्रदाय के लोगों और जैन-बौद्धों ने वैदिक धर्म को जी भर कर लताड़ा, भला-बुरा कहा; लेकिन कभी भी किसी को यहाँ शारीरिक रूप से प्रताडि़त नहीं किया गया। विवाह के बिना सेक्स को भी ज़्यादा बुरा नहीं माना जाता था, जैसा कि आज-कल खुश्बू के बयान से खफ़ा लोग इसे मानते हैं। उदाहरण के तौर पर अज्ञातवास के दौरान अर्जुन ने पूर्वोत्तर की राजकुमारी उलूपी से शारीरिक सम्बन्ध स्थापित किये थे और उसका पुत्र बभ्रूवाहन महाभारत के युद्ध में ससम्मान पाण्डवों की ओर से आमन्त्रि किया गया था। भीम ने भी हिडिम्बा से बर्बरीक नामक पुत्र पाया था, ऐसे उदाहरणों से प्राचीन इतिहास ग्रन्थ भरे पड़े हैं।
भारतीय संस्कृति की सेक्स और अपने शरीर के प्रति इस सहज सोच पर पहला कुठाराघात तब हुआ, जब 9वीं शताब्दी में मुहम्मद बिन कासिम ने पहली दफ़ा भारत पर हमला किया। इसस घटना के बाद सिलसिलेवार विदेशी आक्रमणों से भारत में तलवार के ज़ोर पर इस्लाम की लहर आयी और साथ ही आयी दकियानूसी अरबी संस्कृति (अगर उसे ‘संस्कृति’ का जा सके तो)। मुस्लिम आक्रान्ताओं द्वारा भारतीय महिलाओं के शील-हरण की घटनाएँ आम हो गयीं और इससे बचने के लिये परदा प्रथा जैसी वाहियात प्रथाएँ शुरू हुईं। महिलाओं के शील की रक्षा के लिये भारतीय संस्कृति को कुछ ज़्यादा ही रक्षात्मक होना पड़ा, जिससे सेक्स के प्रति उसका मूल भाव विकृत हो गया और विडम्बना ये है कि यह विकृत भाव ही आज ‘भारतीय संस्कृति’ के नाम से पुकारा जा रहा है।