Remove Ad

Hindi Blog

Movie Blogs | Cricket Blogs | Jyotish Blogs | Investment Blogs | Hindi Blogs | Filmy2 Timepass | Hindi Songs | Bollywood Gossips

Friday, May 05, 2006

मिस पप्पी

आजकल विज्ञापन-जगत् में जितनी मौलिकता और सृजनात्मकता देखने को मिल रही है, उतनी शायद ही और कहीं देखने को मिलती है। ऐसा जान पड़ता है कि हिन्दी सिनेमा तो हॉलीवुड की नक़ल करके ही चल रहा है, मौलिक काम का तो अकाल पड़ा हुआ है। हाँलाकि ‘इक़बाल’ और ‘पेज-थ्री’ सरीख़ी कुछ फ़िल्में हैं, लेकिन ये देश के ज़्यादातर शहरों में लगती ही नहीं हैं। महानगरों के कुछ मल्टीप्लेक्स ही इन्हें दिखाते हैं।

लेकिन इस मामले में विज्ञापन की दुनिया काफ़ी प्रगति कर रही है। ख़ास तौर पर जिन विज्ञापनों में भारतीय परिवेश और संगीत का इस्तेमाल किया गया है, वे बहुत ही जीवन्त बन पड़े हैं; जैसे फ़ेवीकॉल, मिण्टॉल फ़्रेश और क्लोरोमिण्ट आदि के विज्ञापन। अब क्लोरोमिंट का नया विज्ञापन ही लीजिए। पिछले विज्ञापन के ‘पान वाले’ से लेकर नये विज्ञापन की ‘मिस पप्पी’ तक सब समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि यह मत पूछो – लोग क्लोरोमिण्ट क्यों खाते हैं? बस खाए जाओ, पर यह जानने की कोशिश मत करो कि क्लोरोमिंट आख़िर क्यों खाएँ? साथ ही नये विज्ञापन में ठुमरी का प्रयोग इसमें जान फूँक देता है। देखें नया विज्ञापन –



पप्पी दर्पण के सामने खड़ी होकर खुद को निहारते हुए गाती है – ‘रूप की धनी हूँ मैं।’ पप्पी के‍ पिताजी ....





जो ईमारत के नीचे उसका इन्तज़ार कर रहे हैं, आवाज़ देते हैं – ‘पप्पी बेटा!’ उन्हें अनसुना करके पप्पी आगे गाती है – ‘प्रेम कली बनी हूँ मैं।’





नीचे खड़े उसकी माँ और दादी उसे पुकारते हैं। पप्पी कहती है – ‘इन्हें क्या पता, मेरे तो घर-घर पोस्टर लगेंगे।’





लिफ़्ट में अन्दर जाकर फिर गाना शुरू करती है – ‘सैंया मोरे गप्पी, देते नाहीं पप्पी...’, इतने में नीचे पड़ा क्लोरोमिण्ट का रैपर देख पप्पी कहती है....





‘लोग क्लोरोमिण्ट क्यों खाते हैं’ उसी पल लिफ़्ट में सब अजीबो-ग़रीब होने लगता है। लिफ़्ट की दोनों तरफ़ की दीवारें तेज़ी से पास आने लगती हैं और पप्पी उनके बीच दब जाती है। और जब लिफ़्ट का दरवाज़ा खुलता है...



तो वह एक पतले पोस्टर की तरह बन कर बाहर निकलती है। पप्पी की हालत देख कर पिताजी कहते हैं – ‘नाक कटवा दी’ और पप्पी का पोस्टर दीवार पर चिपका कर वहाँ से निकल लेते हैं। आख़िरकार विज्ञापन ख़त्म होता है इस पंक्ति के साथ – ‘दुबारा मत पूछना।’

If you're new here, you may want to subscribe to my RSS feed, or to check similar posts on Hindi Songs and Bollywood Gossips.

4 Comments:

  • कुछ वर्षों पहले किसी टू व्हीलर का एक विज्ञापन आया करता था जिसमे कुछ स्कूली छात्रायें चंदा मांगने के लिये एक डिब्बा लेकर खड़ी होती हैं और हर आने जाने वाले को एक पर्चा देती है तो सब लोग उस पर्चे को पढ़ते नहीं और उस पर्चे को मोड़कर और मसल कर फ़ेंक देते है,और चन्दा भी नहीं देते तो छात्रायें बहुत मायुस हो जाती है और तभी वहीं टू व्हीलर चला रहे आर माधवन ( विज्ञापन के हीरो) यह सब छात्राओं को बुलाकर उनसे एक पर्चा लेकर मसल कर उनको देते है, और इशारों से समझाते हें कि यह अब किसी को दो। छात्रा जब वह मुड़ा तुड़ा पर्चा एक आदमी को देती हे, तो वह आदमी रुक कर उस मुड़े तुड़े पर्चे को खोल कर पढ़ता है और मुस्कुराकर छात्रा के डिब्बे में पैसा डाल देता है। इस विज्ञापन में बिना एक शब्द बोले विज्ञापन बनाने वाले ने अपनी बात कही वह वाकई लाजवाब हे.

    By Blogger Sagar Chand Nahar, at 2:54 PM  

  • प्रतीक जी आपने बह्त मेहनत की इस विज्ञापन को हम सब तक पहुन्चाने में,इसके लिये मेरी ओर से आपको बहुत धन्यवाद।

    By Blogger RC Mishra, at 9:06 PM  

  • कई साल पहले ड्रीम मर्चेंट्स सीरियल आया करता था, विज्ञापण दुनिया पर। बहुत अच्छा धारावाहिक था।

    By Blogger रजनीश मंगला, at 10:54 PM  

  • मज़ा आ गया, धन्यवाद।

    By Blogger ई-छाया, at 6:19 AM  

Post a Comment

<< Home