आदर्शवादिता का दौरा
कुछ समय पहले मैंने काफ़ी जद्दोजहद के बाद ‘लर्निंग लाइसेंस’ बनवा लिया था, लेकिन अब उसकी छ: महीने की मियाद भी ख़त्म होने को आ गयी थी। मरता क्या न करता, इसलिए ‘पर्मानेंट ड्राइविंग लाइसेंस’ बनवाने के लिए मैं एक बार फिर आरटीओ दफ़्तर पहुँचा। हालांकि यह बात मुझे अच्छी तरह मालूम थी, कि बिना ‘चाय-पानी’ मेरा काम होना मुश्किल ही नहीं बल्कि नामुमकिन है; लेकिन फिर भी मैंने सोचा कि कोशिश करने में क्या हर्ज़ है। सो पहले एक लम्बा-चौड़ा फ़ॉर्म लेकर उसे भरा, अपनी ढ़ेर सारी तस्वीरें उस पर जगह-जगह चिपकाईं, साथ में ‘बर्थ प्रूफ़’ वगैरह कम-से-कम आधा किलो काग़ज़-पत्तर साथ में लगाए और इस पुलिन्दे को लेकर ‘बाबू’ के पास पहुँच गया। अच्छा, इन सरकारी बाबुओं से भयंकर प्राणी आपको पूरी दुनिया में और कहीं नहीं मिलेंगे। अगर इन्सान को बाबू और डायनोसोर के बीच में खड़ा कर दिया जाए और कहा जाए कि इनमें से एक की तरफ़ जाना है, तो अक़्लमंदी इसी में है कि डायनोसोर की ओर जाया जाए। लेकिन इस बाबत तजुर्बे की कमी थी, इसलिए मैं बाबू के पास चला गया।
पुराना-सा सफ़ारी सूट, एक-आध किलो तैल लगा कर चपटे-चपटे कंग़ी किए हुए बाल, होठों के एक किनारे से पान की टपकती हुई पीक, सामने मेज़ पर रखा चमड़े का चौकोर झोला – ‘देखने में तो क़तई ख़तरनाक नहीं है, उल्टे बेचारा-सा और लग रहा है। लोग नाहक ही बदनाम करते हैं।’, मैंने मन-ही-मन सोचा और अपने काग़ज़ मेज़ पर आगे सरका दिए। उसने मुझे घूर कर ऐसे देखा मानो मैंने उसके रंग में भंग डाल दिया हो और वो मुझे हड्डियों समेत कच्चा चबा जाएगा, हालांकि वह खाली बैठा हुआ केवल चाय की चुस्कियाँ ले रहा था। फिर उसने बड़े ही अनमने ढंग से फ़ॉर्म उलट-पलट के देखा।
‘‘तुम्हाए कागज पूरे नहीं हैं।’’
‘‘क्यों, क्या कमी है?’’
‘‘ऐडारेस वेरिफिकसन कहाँ है?’’
‘‘ये क्या होता है?’’
‘‘अरे, घर-वर कहाँ है, कौन जाने? कछु तो चइए।’’
‘‘पहले लगा चुका हूँ ‘लर्निंग’ के वक़्त।’’
‘‘पहले खाना खाया था, आगे से फिर कभी नहीं खावेगा?’’
‘‘अच्छा, अभी लाता हूँ।’’
‘‘जे फारम उठा ले जाओ मेज पै से।’’
‘‘ठीक है।’’
अब मुझे मालूम पड़ा कि लोग नाहक ही नहीं कहते, ‘बाबू’ है ही कोई ख़तरनाक प्रजाति। फिर मैं जेठ की भरी दोपहर में १०-१२ किमी वापस अपने घर गया और ज़रूरी काग़ज़ ले कर आया। रास्ते में मैं सोच रहा था – चलो, ये तो आगरा है और सब पास-पास है। महानगरों में बाबुओं के चंगुल में फँसने पर क्या होता होगा?
कहते हैं न कि ‘जब किस्मत महरबान, तो गधा पहलवान’, लेकिन इसका उल्टा भी उतना ही सच है। यानि कि जब किस्मत ख़राब हो तो पहलवान भी गधा बन जाता है। और मेरी हालत भी कुछ वैसी ही होने वाली थी। मैं जब ज़रूरी काग़ज़ात लेकर वहाँ फिर से पहुँचा, तो ‘बाबू’ अपनी क़ुर्सी के अन्तर्ध्यान हो चुके थे। ‘अब काम कल होगा’, चपरासी ने बताया। लेकिन तभी वहाँ खड़े किसी सज्जन ने बताया कि ‘छिपी टोले’ में एक कैम्प लगा है, जहाँ लाइसेंस बनाए जा रहे हैं। मैं भी ढूंढता-ढांढता छिपी टोले पहुँच गया नि:शुल्क कैम्प में। अन्तर्ध्यान हुए ‘बाबू’ एक बार फिर दिखाई दिए, यहाँ वे ही लाइसेंस बना रहे थे।
आवेदकों की क़तार को देख कर मेरे पसीने छूट गए, कम-से-कम एक-आध किलोमीटर लम्बी तो रही ही होगी। या फिर यूँ कह लीजिए कि यह तो दिख रहा था कि शुरू कहाँ से हो रही है; लेकिन ख़त्म कहाँ हो रही है, कुछ कहा नहीं जा सकता था। लेकिन भारत में समझदार हर काम जुगाड़ से करते हैं, ‘चाय-पानी’ देकर लाइसेंस तुरन्त पाया जा सकता था। काफ़ी लोग अपनी समझदारी का परिचय भी दे रहे थे। एक बार को मैंने भी सोचा कि ४०० रु. दे कर पिण्ड छुड़ाया जाए, लेकिन अचानक मुझे ‘आदर्शवादिता का दौरा’ पड़ा। यह दौरा दमे और मिर्गी के दौरे से भी ज़्यादा ख़तरनाक होता है और अगर जल्दी ही इसका इलाज न कराया जाए, तो आगे चल कर प्राणघातक भी सिद्ध हो सकता है। आदर्शवादिता के दौरे के चलते मैं शाम तक क़तार में खड़ा रहा, लेकिन लगता है कि आज ही मेरे ऊपर साढ़े साती शुरू हुई थी। जैसे ही मेरी बारी आने को थी, बाबू ने अपना ताम-झाम समेटते हुए घोषणा की कि कैम्प ख़त्म हो गया है और कल बेलन गंज में कैम्प लगेगा।
चिलचिलाती धूप में खड़े-खड़े मेरी हालत खस्ता हो चुकी थी और चित्र-विचित्र प्रकार की वे सारी गालियाँ जो मैंने अपनी ज़िन्दगी में कभी भी, कहीं भी सुनी थीं; न चाहते हुए भी मेरे मन में आ रही थीं। मन-ही-मन बुदबुदाता हुआ मैं अपने घर की ओर चला; इस उम्मीद के साथ कि कल चाहे जो कुछ हो जाए, मैं ड्राइविंग लाइसेंसे बनवा के रहूंगा। अब, देखते हैं कि कल क्या होता है? भगवान से प्रार्थना है कि कल ‘आदर्शवादिता के दौरे’ से वो मेरी रक्षा करे।
पुराना-सा सफ़ारी सूट, एक-आध किलो तैल लगा कर चपटे-चपटे कंग़ी किए हुए बाल, होठों के एक किनारे से पान की टपकती हुई पीक, सामने मेज़ पर रखा चमड़े का चौकोर झोला – ‘देखने में तो क़तई ख़तरनाक नहीं है, उल्टे बेचारा-सा और लग रहा है। लोग नाहक ही बदनाम करते हैं।’, मैंने मन-ही-मन सोचा और अपने काग़ज़ मेज़ पर आगे सरका दिए। उसने मुझे घूर कर ऐसे देखा मानो मैंने उसके रंग में भंग डाल दिया हो और वो मुझे हड्डियों समेत कच्चा चबा जाएगा, हालांकि वह खाली बैठा हुआ केवल चाय की चुस्कियाँ ले रहा था। फिर उसने बड़े ही अनमने ढंग से फ़ॉर्म उलट-पलट के देखा।
‘‘तुम्हाए कागज पूरे नहीं हैं।’’
‘‘क्यों, क्या कमी है?’’
‘‘ऐडारेस वेरिफिकसन कहाँ है?’’
‘‘ये क्या होता है?’’
‘‘अरे, घर-वर कहाँ है, कौन जाने? कछु तो चइए।’’
‘‘पहले लगा चुका हूँ ‘लर्निंग’ के वक़्त।’’
‘‘पहले खाना खाया था, आगे से फिर कभी नहीं खावेगा?’’
‘‘अच्छा, अभी लाता हूँ।’’
‘‘जे फारम उठा ले जाओ मेज पै से।’’
‘‘ठीक है।’’
अब मुझे मालूम पड़ा कि लोग नाहक ही नहीं कहते, ‘बाबू’ है ही कोई ख़तरनाक प्रजाति। फिर मैं जेठ की भरी दोपहर में १०-१२ किमी वापस अपने घर गया और ज़रूरी काग़ज़ ले कर आया। रास्ते में मैं सोच रहा था – चलो, ये तो आगरा है और सब पास-पास है। महानगरों में बाबुओं के चंगुल में फँसने पर क्या होता होगा?
कहते हैं न कि ‘जब किस्मत महरबान, तो गधा पहलवान’, लेकिन इसका उल्टा भी उतना ही सच है। यानि कि जब किस्मत ख़राब हो तो पहलवान भी गधा बन जाता है। और मेरी हालत भी कुछ वैसी ही होने वाली थी। मैं जब ज़रूरी काग़ज़ात लेकर वहाँ फिर से पहुँचा, तो ‘बाबू’ अपनी क़ुर्सी के अन्तर्ध्यान हो चुके थे। ‘अब काम कल होगा’, चपरासी ने बताया। लेकिन तभी वहाँ खड़े किसी सज्जन ने बताया कि ‘छिपी टोले’ में एक कैम्प लगा है, जहाँ लाइसेंस बनाए जा रहे हैं। मैं भी ढूंढता-ढांढता छिपी टोले पहुँच गया नि:शुल्क कैम्प में। अन्तर्ध्यान हुए ‘बाबू’ एक बार फिर दिखाई दिए, यहाँ वे ही लाइसेंस बना रहे थे।
आवेदकों की क़तार को देख कर मेरे पसीने छूट गए, कम-से-कम एक-आध किलोमीटर लम्बी तो रही ही होगी। या फिर यूँ कह लीजिए कि यह तो दिख रहा था कि शुरू कहाँ से हो रही है; लेकिन ख़त्म कहाँ हो रही है, कुछ कहा नहीं जा सकता था। लेकिन भारत में समझदार हर काम जुगाड़ से करते हैं, ‘चाय-पानी’ देकर लाइसेंस तुरन्त पाया जा सकता था। काफ़ी लोग अपनी समझदारी का परिचय भी दे रहे थे। एक बार को मैंने भी सोचा कि ४०० रु. दे कर पिण्ड छुड़ाया जाए, लेकिन अचानक मुझे ‘आदर्शवादिता का दौरा’ पड़ा। यह दौरा दमे और मिर्गी के दौरे से भी ज़्यादा ख़तरनाक होता है और अगर जल्दी ही इसका इलाज न कराया जाए, तो आगे चल कर प्राणघातक भी सिद्ध हो सकता है। आदर्शवादिता के दौरे के चलते मैं शाम तक क़तार में खड़ा रहा, लेकिन लगता है कि आज ही मेरे ऊपर साढ़े साती शुरू हुई थी। जैसे ही मेरी बारी आने को थी, बाबू ने अपना ताम-झाम समेटते हुए घोषणा की कि कैम्प ख़त्म हो गया है और कल बेलन गंज में कैम्प लगेगा।
चिलचिलाती धूप में खड़े-खड़े मेरी हालत खस्ता हो चुकी थी और चित्र-विचित्र प्रकार की वे सारी गालियाँ जो मैंने अपनी ज़िन्दगी में कभी भी, कहीं भी सुनी थीं; न चाहते हुए भी मेरे मन में आ रही थीं। मन-ही-मन बुदबुदाता हुआ मैं अपने घर की ओर चला; इस उम्मीद के साथ कि कल चाहे जो कुछ हो जाए, मैं ड्राइविंग लाइसेंसे बनवा के रहूंगा। अब, देखते हैं कि कल क्या होता है? भगवान से प्रार्थना है कि कल ‘आदर्शवादिता के दौरे’ से वो मेरी रक्षा करे।
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9 Comments:
best of luck.
By
ratna, at 11:54 PM
‘आदर्शवादिता का दौरा’ है तो बहुत खतरनाक मगर किसी ना किसी को तो बीडा उठाना ही पडेगा. आपने उठाया, बधाई स्विकारें.
समीर लाल
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Udan Tashtari, at 11:56 PM
wow after all i can see the popularity of hindi its really awesome prode to be indian
http://www.funmirchi.com
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Anonymous, at 11:12 PM
हिम्म्ते मर्दा, मदते खुदा
हे वीर निकल पढ मैदान मे, पतह होगी तेरी
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आशीष, at 9:58 AM
यार घूस मत देना उसे
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रजनीश मंगला, at 4:21 PM
बहुत अच्छे प्रतीक, तुम विजयी होवो, ऐसी हमारी तमन्ना रहेगी।
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ई-छाया, at 2:08 AM
सफल हुये या नहीं ?
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Pratyaksha, at 2:51 PM
मेरा हौसला बढ़ाने के लिए सभी का शुक्रिया। अन्तत: मेरा लाइसेन्स बन ही गया और वो भी बिना रिश्वत दिए, लगता है आप लोगों की दुआओं का परिणाम है।
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Pratik, at 11:13 PM
kanha hai aadarsh..man ki kandrayon me kaid, Jhopdon ki fus se dhanki ya phir dimak lagi kitabon me jo apni rah tak rahen hain library se bahar ki ki koi to hoga jo unhe talasta aayega aur kabhi sawanrata, sambhalta le jar aapnayega
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PRAN RANJAN, at 11:13 PM
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