शर्म से पिघले भोले बाबा
आजकल यह ख़बर सुर्ख़ियों में है कि इस बार अमरनाथ का शिवलिंग असली नहीं हैं, बल्कि उसे बाहर से बर्फ़ लाकर बनाया गया है। देर से हुए हिमपात की वजह से शिव लिंग नहीं बन सका और मौसम में हो रहे बदलाव को देख कर ऐसा लगता है कि आगे के वर्षों में यह समस्या और बढ़ेगी। तीर्थ-यात्रियों में भी इस कारण काफ़ी आक्रोश है और अधिकारियों ने लीपापोती की कोशिशें शुरू कर दी हैं।
आख़िरकार भगवान भोलेनाथ भी शर्म से पिघल गए। भोल बाबा की बनाई इस ख़ूबसूरत दुनिया को बर्बाद करने में कोई कसर इन्सानों ने नहीं छोड़ी। अन्धाधुंध पेड़ काटे और जंगलों को धरती से साफ़ कर दिया। हर तरह का प्रदूषण फैला कर पृथ्वी के तापमान में भी भारी वृद्धि की। क्लोरोफ़्लोरो वर्ग के कार्बन का अत्यधिक इस्तेमाल कर ओज़ोन में छेद कर दिया और ग्लोबल वॉर्मिंग का मार्ग प्रशस्त किया। अपनी बनाई सर्वश्रेष्ठ कृति मानव के इन कारनामों से अन्तत: भगवान शिव को इतनी ग्लानि का अनुभव हुआ कि वे शर्मसार हो कर पिघल गए (हालाँकि कुछ लोग कहते हैं कि जमे ही नहीं)। लोग ‘हर-हर बम-बम’ चिल्लाते हुए अमरनाथ की गुफा तक साल-दर-साल जाते रहते हैं, लेकिन पर्यावरण-सन्तुलन और प्रकृति के बारे में कभी नहीं सोचते। कैसी विडम्बना है?
आख़िरकार भगवान भोलेनाथ भी शर्म से पिघल गए। भोल बाबा की बनाई इस ख़ूबसूरत दुनिया को बर्बाद करने में कोई कसर इन्सानों ने नहीं छोड़ी। अन्धाधुंध पेड़ काटे और जंगलों को धरती से साफ़ कर दिया। हर तरह का प्रदूषण फैला कर पृथ्वी के तापमान में भी भारी वृद्धि की। क्लोरोफ़्लोरो वर्ग के कार्बन का अत्यधिक इस्तेमाल कर ओज़ोन में छेद कर दिया और ग्लोबल वॉर्मिंग का मार्ग प्रशस्त किया। अपनी बनाई सर्वश्रेष्ठ कृति मानव के इन कारनामों से अन्तत: भगवान शिव को इतनी ग्लानि का अनुभव हुआ कि वे शर्मसार हो कर पिघल गए (हालाँकि कुछ लोग कहते हैं कि जमे ही नहीं)। लोग ‘हर-हर बम-बम’ चिल्लाते हुए अमरनाथ की गुफा तक साल-दर-साल जाते रहते हैं, लेकिन पर्यावरण-सन्तुलन और प्रकृति के बारे में कभी नहीं सोचते। कैसी विडम्बना है?
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6 Comments:
पर्यावरणीय असंतुलन पर चिंता का किसे वक़्त है. कम से कम इस घटना से कुछ चेत जाएं हम. इसी ख़बर से जुड़ा एक वीडियो और लेख मेरे चिट्ठे पर भी है. ज़रा नज़र डालें.
इंसानो के लिय बहुत शर्म की बात है। जिस प्रकार से हम प्राकृति का दोहन कर रहे हैं, आने वाली नस्लें प्राकृति की अमूल्य सौगात से वंचित हो जाएंगी।
गुफा में जमने वाली बर्फ को हम शीव का नाम दे देते हैं... हद है.
बिलकुल सही बात पकड़ी आपने। बर्फ पिघलने वाली बात पर सब हो हल्ला करेंगे लेकिन असली मुद्दा फिर भुला दिया जाएगा, पर्यावरण असंतुलन का।
कुछ इसी विषय पर मैंने लिखा था।
http://hindi-mishranurag.blogspot.com/2006/05/blog-post.html
बेंगाणी साहब की टिप्पणी भी अच्छी लगी।
कमाल है, ये सब बातें मुझे आज मालूम हुईं
gajab ka likhte ho yar . mere computer me hindi font nahi hai isliye aj english me hi likh raha hoon
apka poora chiththa maine aik bar me padh dala kyuki ye sab shiwani ki tarah dukhanta nahi hai na hi pepsi ki tarah pet ke keede marne wale drinks hai . lekin janab aik taraf ap nakalchi lago ko hatotsahit kar rahe ho wahi internet se gane chori karna sikha rahe ho / ye achchi baaaaat nahi hai
ok
is bar itna hi
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