Remove Ad

Hindi Blog

Movie Blogs | Cricket Blogs | Jyotish Blogs | Investment Blogs | Hindi Blogs | Filmy2 Timepass | Hindi Songs | Bollywood Gossips

Wednesday, October 25, 2006

Movie Review : DON - The Chase Begins Again (2006)

फ़िल्म समीक्षा : डॉन - द चेस बिगिन्स अगेन (२००६)

DON - The Chase Begins Again (2006)इस समीक्षा की शुरूआत एक प्रश्न से करते हैं – फ़रहान अख़्तर को डाइरेक्टर किसने बनाया? वह व्यक्ति जो भी रहा हो, मेरा मानना है‍ कि सारा-का-सारा दोष उसी का है। फिल्म का पहला हाफ़ असली ‘डॉन’ की फ़्रेम-टू-फ़्रेम यानि कि हूबहू नक़ल है और वहीं तक आप इस ‘डॉन’ को भी झेल सकते हैं। लेकिन दूसरे हाफ़ में जहाँ से फ़रहान अख़्तर और उनके सिपहसालारों ने अपनी बुद्धि का प्रयोग करना चालू किया है, फिल्म वहीं से अनझेलेबल हो गयी है।

डॉन में काम करना शाहरुख़ के लिए भी आसान काम नहीं था, क्योंकि ऐसा करने पर अमिताभ बच्चन से तुलना होना लाज़मी था। लेकिन फिर भी शाहरुख़ ख़ान ने इस चुनौती को स्वीकार कर साहस का परिचय तो दिया ही है। और ये भी ज़ाहिर सी बात है फिल्म में अगर शाहरुख़ की तुलना अमिताभ से की जाए, तो वे कहीं टिकते नहीं है। डॉन की भूमिका में अमिताभ बच्चन ने गंभीर चेहरे और बॉडी लेंग्वेज से जो अपने चारों ओर जो ऑरा खड़ा किया था, शाहरुख़ उसे पैदा करने के लिए बहुत जूझते दिखाई दिए हैं। हालाँकि एक हद तक वे इसमें सफल साबित हुए हैं, लेकिन वे वह बात न ला सके जो अमिताभ ने डॉन के व्यक्तित्व में उकेरी थी। हालाँकि शाहरुख़ ख़ान से इससे ज़्यादा उम्मीद भी नहीं थी। उन्होंने अपने सीमित दायरे में रहकर भी ठीक काम किया है। अगर अमिताभ की छवि को दिमाग़ से निकाल कर फ़िल्म को देखा जाए, तो शाहरुख़ ने भी किरदार के साथ न्याय किया है।

लेकिन अगर बात केवल शाहरुख़ ख़ान की ही होती, तो ठीक था। फ़िल्म में फ़रहान अख़्तर ने भी कुछ काम किया है। और ऐसा काम किया है कि फ़िल्म को वाहियात बनाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है। फ़िल्म की कहानी से तो आप सभी वाकिफ़ हैं ही। लेकिन अच्छी ख़ासी पटकथा को किस तरह बकवास बनाया जाए, कोई फ़रहान अख़्तर से इसे बखूबी सीख सकता है। कहानी में जो तथाकथित ट्विस्ट दिया गया है, उसे में यहाँ नहीं बताऊंगा। क्योंकि हो सकता है कि कई लोग वाक़ई यह देखना चाहते हों कि एक अच्छी पिक्चर का कचूमर कैसे निकाला जाता है। लेकिन अगर मेरी मानें, तो सिनेमा हॉल में जाकर पैसे बर्बाद करने से बेहतर होगा कि कुछ और करें।

अन्य फिल्म समीक्षाएँ :
१. खोसला का घोंसला
२. ओंकारा
३. गोलमाल
४. अपहरण

टैग : , , , , ,

If you're new here, you may want to subscribe to my RSS feed, or to check similar posts on Hindi Songs and Bollywood Gossips.

5 Comments:

  • अच्छा किया जो आपने चेता दिया वरना लोगों की भीड़ देख कर हम्रा भी मन होने लगा था देकने के लिये, धन्यवाद पैसे और समय बचाने के लिये।

    By Anonymous सागर चन्द नाहर, at 8:49 PM  

  • वाह भाई, अच्छा बचवा दिये नहीं तो हम तो सच में मन बना चुके थे.

    By Blogger Udan Tashtari, at 9:50 PM  

  • "इस समीक्षा की शुरूआत एक प्रश्न से करते हैं – फ़रहान अख़्तर को डाइरेक्टर किसने बनाया?"
    पहले तो बता दूँ कि आपने दि चाहता है नहीं देखी
    और वैसे भी फ़िल्म इंड्स्ट्री में किसी पे भरोसा नहीं किया जा सकता। जब महेश भट्ट घई जैसे लोग घटिया फ़िल्म बना सकते हैं तो फ़रहान तो अभी बच्चा है।

    By Blogger भुवनेश शर्मा, at 1:16 PM  

  • भाई प्रतीक डॉन मैंने नहीं देखी । पर जिस शख्स की पहली पेशकश दिल चाहता है जैसी फिल्म रही हो उसे इतना कम कर आंकना ठीक नहीं है ।
    जैसा कि तुमने लिखा है जरूर इस फिल्म के उत्तरार्ध में उसने तेल मचाया हो पर वो युवा है तो जरूर अपनी गलतियों से सीखेगा ।

    By Blogger Manish, at 9:52 PM  

  • पैसा और टाइम बचाने के लिए आपका धन्यवाद

    By Anonymous SHUAIB, at 3:29 PM  

Post a Comment

<< Home