Gandhi Gita Golvalkar : My Reply
गांधी गीता गोलवलकर : मेरा उत्तर
आज अफ़लातून जी का यह लेख पढ़ा। उत्तर के रूप में पहले तो अफ़लातून जी से मैं यह कहना चाहूँगा कि मैंने कहीं भी महात्मा गांधी की हत्या को सही नहीं ठहराया है। न ही मैं संघ की हिन्दुत्व की अवधारणा से सहमत हूँ। मैंने अपने इन दो लेखों – “ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में गांधीगिरी” और “हिन्दू दृष्टिकोण से गांधीगिरी” में केवल गांधीवाद की समालोचना करने का यत्न किया है।
हाँ, तो मैं कह रहा था कि मैं किसी भी बात को आँख मूंद कर स्वीकार नहीं करता... चाहे वो गांधी हों या फिर गोलवलकर। जहाँ तक गांधी जी की गीता की व्याख्या का सवाल है, स्पष्ट ही वह पक्षपातपूर्ण है। यानि कि उनके पसंद के सिद्धान्तों के पक्ष में झुकी हुई है। गीता के बारे में गांधी जी जो कहते हैं, उसे मानने से बेहतर क्या यह नहीं है कि खुद ही गीता पढ़ ली जाए? क्या आप यह नकार सकते हैं कि गीता में अर्जुन युद्ध से इन्कार कर रहा था और श्रीकृष्ण ने शत-शत युक्तियों द्वारा समझाकर उसे युद्ध के लिए प्रेरित किया। अब खुद समझ में न आए तो किसी बच्चे से भी पूछा जा सकता है, कि युद्ध करना अहिंसा कहलाएगा या हिंसा। यहाँ गोलवलकर या गांधी की बात मानने की ज़रूरत नहीं है, ज़रूरत है अपनी अक़्ल का इस्तेमाल करने की।
जो इंसान जिस सिद्धान्त के प्रति दुराग्रही है, उसे गीता में वही सिद्धान्त नज़र आएगा। क्योंकि गीता पूर्ण है, उसमें अहिंसा के साथ हिंसा की भी स्वीकृति है। गीता में निषेध के लिए जगह नहीं है। मैंने कहीं सुना है कि एक बार जाड़े की सुबह थी और चारों तरफ़ घना कोहरा छाया हुआ था। एक सुनसान जगह पर एक ठूंठ लगा हुआ था। उस रोज़ सुबह-सुबह वहाँ से एक वियोगी प्रेमी गुज़रा, ठूंठ में उसे अपनी प्रेयसी नज़र आई। कुछ वक़्त बाद वहीं से एक चोर गुज़रा, उसे ठूंठ में कोतवाल नज़र आया। फिर थोड़ी देर बाद एक भक्त गुज़रा, उसे ठूंठ में भगवान की प्रतिमा दिखाई दी। उस ठूंठ में तो जबकि कुछ भी नहीं था – न प्रेयसी, न कोतवाल और न ही कोई प्रतिमा; लेकिन जिसके मन में जो था, उसने वही देखा। गीता में तो सभी कुछ स्वीकृत है – हिंसा, अहिंसा, सत्य, असत्य सभी। उसमें तो अपनी इच्छित चीज़ देखना बहुत ही सरल काम है। गांधी जी ने भी वही किया। उनका दुराग्रह अहिंसा के प्रति था, इसलिए गीता में उन्हें अहिंसा ही नज़र आई – इसमें कुछ ख़ास आश्चर्य नहीं है। गीता ठीक-ठीक वही समझ सकता है, जो किसी भी तरह के दुराग्रह से मुक्त हो।
दूसरी बात अफ़लातून जी ने कही कि गांधी जी के अनुसार हमें क़ानून हाथ में नहीं लेना चाहिए। ठीक है, लेकिन अंग्रेज़ों के समय में भी क़ानून था जिसे खुद गांधी जी ने कई बार तोड़ा। इसका एक अच्छा उदाहरण है नमक क़ानून। जिसे गांधी जी ने पूरे प्रचार और हो-हल्ले के साथ तोड़ा। उन्होंने अपने इस काम को सत्याग्रह कहा, लेकिन जब भगत सिंह और अन्य क्रान्तिकारियों ने भी देश की आज़ादी के लिए क़ानून की अवज्ञा की तो उसे गांधी जी ने ग़लत ठहराया और उसका पूरी शक्ति से तिरस्कार किया। वे चाहते तो कुछ क्रान्तिकारियों की फाँसी रुकवाने की कोशिश कर सकते थे, लेकिन गांधी और उनका गांधीवाद तो अहिंसावादी है... उन हिंसा करने वालों को क्यों बचाया जाए। हिंसा करने वालों (आप और हम आजकल जिन्हें क्रान्तिकारी कहते हैं) को फाँसी पर लटकने देना ही गांधीवादी अहिंसा है? यानि कि जो गांधी जी की इच्छा हो, वही सही है और बाक़ी ग़लत। और अब गांधीजी के अंधभक्त भी वही करते हैं, तो इसमें कुछ नया नहीं है।
एक और बात अफ़लातून जी कहते हैं – “मारने का प्रश्न खडा होने के पहले हम इस बात का अचूक निर्नय करने की शक्ति अपने में पैदा करें कि आततायी कौन है?” मुझे नहीं लगता कि यह बात गांधीजी ने कही होगी। लेकिन अगर उन्होंने कही है, तो उनसे बड़ा भ्रमित इंसान कौन हो सकता है? क्या स्पष्ट तौर पर अंग्रेज़ आततायी नहीं थे? क्या अपने क्षुद्र स्वार्थों के लिए दूसरों पर अत्याचार करना आततायी होने की निशानी नहीं है? कौरवों ने तो बस पाण्डवों को उनके राज्य से बेदखल किया था। महाभारत में कहीं ऐसा कोई उल्लेख नहीं है कि कौरवों ने आम जनता पर अत्याचार किए हों। लेकिन केवल पाँच लोगों पर अत्याचार करने वाले को भी श्रीकृष्ण ने आततायी कहा और अर्जुन से कहा – “उठ खड़ा हो और युद्ध में इन आततायियों का संहार कर।” फिर अंग्रेज़ तो तीस कोटि जनता पर अत्याचार कर रहे थे, उनके बारे में वे फ़ैसला न कर सके? कैसी विडम्बना है। और जिन्होंने अचूक निर्णय किया – चन्द्रशेखर आज़ाद, भगत सिंह आदि – उन्हें गांधी जी ने ही हिंसक आततायियों की संज्ञा दी। क्या अहिंसा है... वाह रे गांधीवाद!!!
अफ़लातून जी बार-बार संघ को बीच में लेकर आए हैं, लेकिन मालूम नहीं क्यों? हालाँकि मैं संघ की विचारधारा से असहमत हूँ, लेकिन इतना ज़रूर मानता हूँ कि संघ वाले दोगले नहीं है। वे उन तथाकथित गांधीवादियों की तरह नहीं हैं, जिनकी कथनी और करनी में महाभेद है।
सवाल यह है कि कुछ लोग पिछले पचास वर्षों में गांधीवाद की विफलता के बावजूद उससे क्यों चिपके रहना चाहते हैं? वे यह क्यों नहीं समझते हैं कि गांधीवाद बहुत ही संकुचित दायरे में ही प्रयोग किया जा सकता है? लेकिन मेरे ख़्याल से अंधभक्ति और दुराग्रह उन्हें सोचने नहीं देता, निष्पक्ष विचार नहीं करने देता है। इस पर मुझे एक चुटकुला याद आता है - “एक लड़का था जो अभी-अभी १२वीं में उत्तीर्ण होकर कॉलेज में आया था। उसके सभी दोस्त कार से कॉलेज जाते थे, लेकिन वह बेचारा पैदल ही कॉलेज जाता था। उसके दिल में केवल एक ही उम्मीद थी कि पिताजी उसकी बेचारगी को देखें और उसे भी एक कार दिलवा दें। लेकिन उसे अपनी ये आशा धूमिल होती नज़र आयी, पितीजी इस ओर कभी ध्यान ही नहीं देते थे। सो वह एक दिन अपने पिताजी के पास गया और सारा हाल कह सुनाया। पिताजी बोले - अरे ओ नालायक! घर की दीवार से लगा हुआ तो तेरा कॉलेज है वहाँ भी कार से जाना चाहता है, भगवान ने ये दो पैर किस लिए दिए हैं? – आखिर पिताजी भी यूँही करोड़पति नहीं बन गये थे, कंजूसी में पीएचडी की थी और पाई-पाई को निचोड़ना अच्छी तरह से जानते थे, उन्हें उम्मीद थी कि बेटा भी यही गुण सीखेगा लेकिन हो उल्टा रहा था – बेटा बोला, दो पैर किस लिए दिये हैं? आपने बिल्कुल ठीक सवाल पूछा। एक पैर दिया है एक्सिलरेटर पर रखने के लिए और दूसरा पैर दिया है ब्रेक पर रखने के लिए।” हर कोई चीज़ों को अपने-अपने नज़रिए से देखता है। इस देश में समस्याएँ बहुत जटिल हैं, लेकिन गांधीवादी उन्हें अपने चश्मे से देखते हैं और संघ वाले अपने चश्मे से। इन समस्याओं को सुलझाने के लिए अलग-अलग 'वाद' के चश्मे उतार फेंकने होंगे और निष्पक्ष व तटस्थ रूप से देखना पड़ेगा। लेकिन लोगों को इतनी साधारण सी बात समझ में नहीं आती है कि गीता का दर्शन अत्यन्त व्यापक है और उसकी तुलना में गांधीवाद बहुत ही छोटा और सीमित।
आख़िरी बात, अफ़लातून जी को मुझे और पंकज जैसे लोगों को देखकर कनपुरिया अन्दाज़ में कुछ बातें याद आई हैं। मुझे विवेकशून्य गांधीवादियों को देखकर कठोपनिषद का यह मंत्र याद आता है –
अविद्यायामन्तरे वर्तमानाः स्वयं धीराः पण्डितंमन्यमानाः।
जङ्घन्यमानाः परियन्ति मूढा अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः॥
यानि कि “खुद अविद्या में डूबे हुए हैं और बावजूद इसके स्वयं को पण्डित समझते हैं। और अन्धे के द्वारा मार्ग दिखाए जाने वाले अन्धे की तरह ये लोग और इनके अनुयायी, दोनों ही गड्ढे में गिरते हैं।”
सम्बन्धित आलेख :
१. ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में गांधीगिरी
२. हिन्दू दृष्टिकोण से गांधीगिरी
टैग : Gandhigiri, Gandhism, Gita, Hindi, हिन्दी
आज अफ़लातून जी का यह लेख पढ़ा। उत्तर के रूप में पहले तो अफ़लातून जी से मैं यह कहना चाहूँगा कि मैंने कहीं भी महात्मा गांधी की हत्या को सही नहीं ठहराया है। न ही मैं संघ की हिन्दुत्व की अवधारणा से सहमत हूँ। मैंने अपने इन दो लेखों – “ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में गांधीगिरी” और “हिन्दू दृष्टिकोण से गांधीगिरी” में केवल गांधीवाद की समालोचना करने का यत्न किया है।
हाँ, तो मैं कह रहा था कि मैं किसी भी बात को आँख मूंद कर स्वीकार नहीं करता... चाहे वो गांधी हों या फिर गोलवलकर। जहाँ तक गांधी जी की गीता की व्याख्या का सवाल है, स्पष्ट ही वह पक्षपातपूर्ण है। यानि कि उनके पसंद के सिद्धान्तों के पक्ष में झुकी हुई है। गीता के बारे में गांधी जी जो कहते हैं, उसे मानने से बेहतर क्या यह नहीं है कि खुद ही गीता पढ़ ली जाए? क्या आप यह नकार सकते हैं कि गीता में अर्जुन युद्ध से इन्कार कर रहा था और श्रीकृष्ण ने शत-शत युक्तियों द्वारा समझाकर उसे युद्ध के लिए प्रेरित किया। अब खुद समझ में न आए तो किसी बच्चे से भी पूछा जा सकता है, कि युद्ध करना अहिंसा कहलाएगा या हिंसा। यहाँ गोलवलकर या गांधी की बात मानने की ज़रूरत नहीं है, ज़रूरत है अपनी अक़्ल का इस्तेमाल करने की।
जो इंसान जिस सिद्धान्त के प्रति दुराग्रही है, उसे गीता में वही सिद्धान्त नज़र आएगा। क्योंकि गीता पूर्ण है, उसमें अहिंसा के साथ हिंसा की भी स्वीकृति है। गीता में निषेध के लिए जगह नहीं है। मैंने कहीं सुना है कि एक बार जाड़े की सुबह थी और चारों तरफ़ घना कोहरा छाया हुआ था। एक सुनसान जगह पर एक ठूंठ लगा हुआ था। उस रोज़ सुबह-सुबह वहाँ से एक वियोगी प्रेमी गुज़रा, ठूंठ में उसे अपनी प्रेयसी नज़र आई। कुछ वक़्त बाद वहीं से एक चोर गुज़रा, उसे ठूंठ में कोतवाल नज़र आया। फिर थोड़ी देर बाद एक भक्त गुज़रा, उसे ठूंठ में भगवान की प्रतिमा दिखाई दी। उस ठूंठ में तो जबकि कुछ भी नहीं था – न प्रेयसी, न कोतवाल और न ही कोई प्रतिमा; लेकिन जिसके मन में जो था, उसने वही देखा। गीता में तो सभी कुछ स्वीकृत है – हिंसा, अहिंसा, सत्य, असत्य सभी। उसमें तो अपनी इच्छित चीज़ देखना बहुत ही सरल काम है। गांधी जी ने भी वही किया। उनका दुराग्रह अहिंसा के प्रति था, इसलिए गीता में उन्हें अहिंसा ही नज़र आई – इसमें कुछ ख़ास आश्चर्य नहीं है। गीता ठीक-ठीक वही समझ सकता है, जो किसी भी तरह के दुराग्रह से मुक्त हो।
दूसरी बात अफ़लातून जी ने कही कि गांधी जी के अनुसार हमें क़ानून हाथ में नहीं लेना चाहिए। ठीक है, लेकिन अंग्रेज़ों के समय में भी क़ानून था जिसे खुद गांधी जी ने कई बार तोड़ा। इसका एक अच्छा उदाहरण है नमक क़ानून। जिसे गांधी जी ने पूरे प्रचार और हो-हल्ले के साथ तोड़ा। उन्होंने अपने इस काम को सत्याग्रह कहा, लेकिन जब भगत सिंह और अन्य क्रान्तिकारियों ने भी देश की आज़ादी के लिए क़ानून की अवज्ञा की तो उसे गांधी जी ने ग़लत ठहराया और उसका पूरी शक्ति से तिरस्कार किया। वे चाहते तो कुछ क्रान्तिकारियों की फाँसी रुकवाने की कोशिश कर सकते थे, लेकिन गांधी और उनका गांधीवाद तो अहिंसावादी है... उन हिंसा करने वालों को क्यों बचाया जाए। हिंसा करने वालों (आप और हम आजकल जिन्हें क्रान्तिकारी कहते हैं) को फाँसी पर लटकने देना ही गांधीवादी अहिंसा है? यानि कि जो गांधी जी की इच्छा हो, वही सही है और बाक़ी ग़लत। और अब गांधीजी के अंधभक्त भी वही करते हैं, तो इसमें कुछ नया नहीं है।
एक और बात अफ़लातून जी कहते हैं – “मारने का प्रश्न खडा होने के पहले हम इस बात का अचूक निर्नय करने की शक्ति अपने में पैदा करें कि आततायी कौन है?” मुझे नहीं लगता कि यह बात गांधीजी ने कही होगी। लेकिन अगर उन्होंने कही है, तो उनसे बड़ा भ्रमित इंसान कौन हो सकता है? क्या स्पष्ट तौर पर अंग्रेज़ आततायी नहीं थे? क्या अपने क्षुद्र स्वार्थों के लिए दूसरों पर अत्याचार करना आततायी होने की निशानी नहीं है? कौरवों ने तो बस पाण्डवों को उनके राज्य से बेदखल किया था। महाभारत में कहीं ऐसा कोई उल्लेख नहीं है कि कौरवों ने आम जनता पर अत्याचार किए हों। लेकिन केवल पाँच लोगों पर अत्याचार करने वाले को भी श्रीकृष्ण ने आततायी कहा और अर्जुन से कहा – “उठ खड़ा हो और युद्ध में इन आततायियों का संहार कर।” फिर अंग्रेज़ तो तीस कोटि जनता पर अत्याचार कर रहे थे, उनके बारे में वे फ़ैसला न कर सके? कैसी विडम्बना है। और जिन्होंने अचूक निर्णय किया – चन्द्रशेखर आज़ाद, भगत सिंह आदि – उन्हें गांधी जी ने ही हिंसक आततायियों की संज्ञा दी। क्या अहिंसा है... वाह रे गांधीवाद!!!
अफ़लातून जी बार-बार संघ को बीच में लेकर आए हैं, लेकिन मालूम नहीं क्यों? हालाँकि मैं संघ की विचारधारा से असहमत हूँ, लेकिन इतना ज़रूर मानता हूँ कि संघ वाले दोगले नहीं है। वे उन तथाकथित गांधीवादियों की तरह नहीं हैं, जिनकी कथनी और करनी में महाभेद है।
सवाल यह है कि कुछ लोग पिछले पचास वर्षों में गांधीवाद की विफलता के बावजूद उससे क्यों चिपके रहना चाहते हैं? वे यह क्यों नहीं समझते हैं कि गांधीवाद बहुत ही संकुचित दायरे में ही प्रयोग किया जा सकता है? लेकिन मेरे ख़्याल से अंधभक्ति और दुराग्रह उन्हें सोचने नहीं देता, निष्पक्ष विचार नहीं करने देता है। इस पर मुझे एक चुटकुला याद आता है - “एक लड़का था जो अभी-अभी १२वीं में उत्तीर्ण होकर कॉलेज में आया था। उसके सभी दोस्त कार से कॉलेज जाते थे, लेकिन वह बेचारा पैदल ही कॉलेज जाता था। उसके दिल में केवल एक ही उम्मीद थी कि पिताजी उसकी बेचारगी को देखें और उसे भी एक कार दिलवा दें। लेकिन उसे अपनी ये आशा धूमिल होती नज़र आयी, पितीजी इस ओर कभी ध्यान ही नहीं देते थे। सो वह एक दिन अपने पिताजी के पास गया और सारा हाल कह सुनाया। पिताजी बोले - अरे ओ नालायक! घर की दीवार से लगा हुआ तो तेरा कॉलेज है वहाँ भी कार से जाना चाहता है, भगवान ने ये दो पैर किस लिए दिए हैं? – आखिर पिताजी भी यूँही करोड़पति नहीं बन गये थे, कंजूसी में पीएचडी की थी और पाई-पाई को निचोड़ना अच्छी तरह से जानते थे, उन्हें उम्मीद थी कि बेटा भी यही गुण सीखेगा लेकिन हो उल्टा रहा था – बेटा बोला, दो पैर किस लिए दिये हैं? आपने बिल्कुल ठीक सवाल पूछा। एक पैर दिया है एक्सिलरेटर पर रखने के लिए और दूसरा पैर दिया है ब्रेक पर रखने के लिए।” हर कोई चीज़ों को अपने-अपने नज़रिए से देखता है। इस देश में समस्याएँ बहुत जटिल हैं, लेकिन गांधीवादी उन्हें अपने चश्मे से देखते हैं और संघ वाले अपने चश्मे से। इन समस्याओं को सुलझाने के लिए अलग-अलग 'वाद' के चश्मे उतार फेंकने होंगे और निष्पक्ष व तटस्थ रूप से देखना पड़ेगा। लेकिन लोगों को इतनी साधारण सी बात समझ में नहीं आती है कि गीता का दर्शन अत्यन्त व्यापक है और उसकी तुलना में गांधीवाद बहुत ही छोटा और सीमित।
आख़िरी बात, अफ़लातून जी को मुझे और पंकज जैसे लोगों को देखकर कनपुरिया अन्दाज़ में कुछ बातें याद आई हैं। मुझे विवेकशून्य गांधीवादियों को देखकर कठोपनिषद का यह मंत्र याद आता है –
अविद्यायामन्तरे वर्तमानाः स्वयं धीराः पण्डितंमन्यमानाः।
जङ्घन्यमानाः परियन्ति मूढा अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः॥
यानि कि “खुद अविद्या में डूबे हुए हैं और बावजूद इसके स्वयं को पण्डित समझते हैं। और अन्धे के द्वारा मार्ग दिखाए जाने वाले अन्धे की तरह ये लोग और इनके अनुयायी, दोनों ही गड्ढे में गिरते हैं।”
सम्बन्धित आलेख :
१. ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में गांधीगिरी
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11 Comments:
भाई आपकी और अफलातूनजी की बातचीत में कानपुर वाले अंदाज़ की क्या जरूरत पड़ गयी!
अच्छा लिखा. प्रसन्नता हुई.
मित्र देश को स्वतंत्र हुए साठ वर्ष हो गए, कम से कम अब तो सावरकर जैसे लोगो के कार्यो का सही मुल्यांकन हो. उन्हे भी चन्द्रशेखर आजाद आदी को याद करते समय साथ में याद किया जाना चाहिए. उन्होने भी 20 वर्ष कालापानी की सजा देश के लिए ही भोगी थी.
जो लोग देश की आजादी का एक मात्र श्रेय कॉंगेस तथा गांधी को देते हैं वे भी इतिहास के साथ अन्याय कर रहें हैं.
भाई मेरे,
आपने गांधी जी के विचारों को मेरा मानते हुए उद्धृत किया है-आभार .
शहीदे आज़म भगत सिंह के तरीके से असहमती के बावजूद उन्हें फ़ांसी न दिए जाने के लिए अंग्रेज सरकार को लिखा था .
अनूप,
दर-असल बनारस और आगरा के 'बीच' की बतकही में अन्दाज़ तो बीच वाला (चिकाही वाला) ही होगा,न ?
The Gospel of selfless action or The Geeta According to Gandhi,Navajeevan,Ahmedabad,Mahadav Desai. यह किताब गीता प्रेमियों को पढने से गुरेज़ नही करना चाहिए .३३,००० प्रतियां निकल चुकी हैं.विनोबा की 'गीता प्रवचन' भी सरल व्याख्या प्रस्तुत करते हैं .
पूर्वाग्रही न हों तो अध्ययन और बहस से नही भागना चाहिए.
शाबास प्रतीक जी
बिना छुपाये बिना डरे आपने जो लेख लिखा है उसे मेरे हिसाब से इस वर्ष का सर्वश्रेष्ठ चिठ्ठा है।
"वे उन तथाकथित गांधीवादियों की तरह नहीं हैं, जिनकी कथनी और करनी में महाभेद है।
जब भगत सिंह और अन्य क्रान्तिकारियों ने भी देश की आज़ादी के लिए क़ानून की अवज्ञा की तो उसे गांधी जी ने ग़लत ठहराया और उसका पूरी शक्ति से तिरस्कार किया। वे चाहते तो कुछ क्रान्तिकारियों की फाँसी रुकवाने की कोशिश कर सकते थे, लेकिन गांधी और उनका गांधीवाद तो अहिंसावादी है... उन हिंसा करने वालों को क्यों बचाया जाए। हिंसा करने वालों (आप और हम आजकल जिन्हें क्रान्तिकारी कहते हैं) को फाँसी पर लटकने देना ही गांधीवादी अहिंसा है? यानि कि जो गांधी जी की इच्छा हो, वही सही है और बाक़ी ग़लत। और अब गांधीजी के अंधभक्त भी वही करते हैं, तो इसमें कुछ नया नहीं है।"
पंक्तियाँ बहुत ही सही लिखी है, आज देश को व्चलाआ है तो गांधीवाद नहीं सावरकरवाद या चन्द्रशेखर आजाद और सुभाष बाबू का वाद चलाना होगा। श्री अफ़लातून जो को लिखे मेल की प्रति भेज रहा हूँ आपको।
आज देश को व्चलाआ है
आज देश को चलाना है पढ़ें।
अत्युत्तम विश्लेषण। प्रतीक भाई के विचारों के खुलेपन का मैं कायल हूँ। ये वाक्य "यहाँ गोलवलकर या गांधी की बात मानने की ज़रूरत नहीं है, ज़रूरत है अपनी अक़्ल का इस्तेमाल करने की।" हमारी विचारशीलता की कलई खोलता है। हम वास्तव में अपनी अक्ल इस्तेमाल करने में गुरेज़ करते हैं।
कथित गांधीवादियों के प्रति उपजी घृणा को गांधी के मुंह पर उछाल देना अवचेतन से किया कृत्य है जो आज के राजनीतिक माहौल को देखकर बरबस हो जाता है. सरल शब्दों में मेरा मानना है कि गांधी अपने दौर के बुरे लोगों में कम बुरे थे.
अफ़लातून ने सही कहा कि गांधी ने भगत सिंह की फांसी के खिलाफ़ अंग्रेज़ सरकार को लिखा था. जिस पर कुछ दिनों पहले ब्लॉग पर मैंने पत्र का लिंक भी दिया था. वो भगत सिंह था, वो गांधी था. आज के दौर में ऐसे लोग मिलना कठिन है. रास्ता अलग अलग था मंज़िल एक थी.
एक बात बताओ भैये, ये सावरकर के पत्र पढ़े हैं क्या कभी जो उन्होंने अंग्रेज़ सरकार से माफ़ी मांगी थी? लिखे थे अंडमान की सेल्यूलर जेल से.
आप संघ की विचारधारा से वास्ता नहीं रखते ये आपका विवेक है किंतु संघ के दोगलेपन से क्या आप सचमुच अनभिज्ञ हैं? यदि राज़ी हों तो इस पर कुछ फेंका-फेकीं हो जाए. क्योंकि गांधी नहीं गोलवलकर नहीं.. सावरकर भी नहीं. संघ वाले तो हैं.. गांधीवाले तो हैं. गांधीवालों को तो खूब गालियां मिल गई.. क्या अच्छा होगा कि अब चड्डीधारियों पर चर्चा कर लें?
ie pe try karo
गांधी
गांधी तेरे चर्खे पर
खद्दरधारी आज कात रहें हैं सोने के धागे
पहन जन सेवा का मुखौटा
रहते लूट खसोट मे सबसे आगे
राष्ट्र के तीनों स्तम्भ
गाँधी तेरे तीन बन्दरों की नाईं
आंख कान मुंह बन्द कर लाचार
रक्षक नेता कान बन्द कर तक्षक बन गये
करते राष्ट्रसेवा के नाम पर व्याभिचार।
राजघाट पर हर साल मगरमcछी आंसू बहाते
दो अक्टुबार को माला पहनाते
बाकी 363 दिन
तेरा नाम बेच बेच कर अर्थ कमाते
स्विस बैंकों में उसे जमा करा
मेरा भारत महान का नारा लगाते
तेरी गांधी टोपी तो आज ऊछल रही है बीच बाजार ।
परिवार वाद के साये में
पहन तेरे नाम का मुखौटा
भूमन्डलीकरण के नाम पर
रामराज्य के बदले, रोमराज्य का करते प्रचार ।
अधिकारी गण अहं से अन्धे हो गये
आंखें मीच फरमान सुनाते
गणतन्त्र की होली जलाते
मन्त्रियों के तलवे सहलाते
अपनी प्रोन्नति और कुर्सी की जद्दोजहद में
क्यों सुने वे जनता की पुकार।
न्यायपालिका भी मुंह बन्द कर बैठी
अपने Ivory Tower में खुद ही बन्द
संविधान के अनुcछेद, ज्यों बन गये हों कारागार।
आज जब सिर्फ तम है चतुर्दिक
इस तमस से हमें उबारने
हे युगावतार एकबार तुम फिर से आओ
तेरी खादी का द्रौपदी सा
आज हो रहा है चीर हरण
कृष्ण सम परित्राणाम साधुनाम,
एकबार तुम फिर से आओ
भारत को बांटा दो टुकड़ों में अंग्रेजों ने
भारतीयों के सौ टुकड़े कर दिये
इन खद्दरधारी जांतपांत के रंगरेजों ने
तुम्हारे उत्तराधिकारियों
के हांलाकि कुल अनेक हो गये
इन सब खल कुलों के चिन्ह भले ही हों अलग अलग
लेकिन हैं ये सारे दुष्कृताम
इन सब के विनाशाय
एकबार तुम फिर से आओ
गांधी तेरा ईश सत्य था
और सत्याग्रह तेरी थाती
आज सत्य रह गया किताबों में
और ईश दुबके बैठे मन्दिर माही
अनाचार अब धर्म हो गया
अपने सत्य के धर्म संस्थापनार्थ
एक बार तुम फिर से आओ
हे कलियुग के युगावतार
एक बार तुम फिर से आओ।
very informative piece. if you’d like to read more about how the gita inspired gandhi, check out http://www.gitananda.org/about-gita/index.php
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