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Monday, November 20, 2006

Gandhigiri from Hindu Point of View

हिन्दू दृष्टिकोण से गांधीगिरी

गांधीगिरी पर अपने पिछले लेख में मैंने ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में गांधीगिरी का विश्लेषण करने की कोशिश की थी। साथ ही अन्त में यह भी कहा था कि मैं गांधीगिरी का विश्लेषण विभिन्न आयामों से करने का यत्न करूंगा। हालाँकि व्यस्तता के चलते मैं काफ़ी समय तक इस विषय पर कुछ लिख नहीं सका। अब अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए हिन्दू दृष्टिकोण से गांधीगिरी का विश्लेषण करने की कोशिश करता हूँ।

हिन्दुत्व के दृष्टिकोण से गांधीगिरी का विश्लेषण और भी ज़रूरी हो जाता है, क्योंकि पहली नज़र में गांधीवाद हिन्दु धर्म पर आधारित नज़र आता है। गांधी जी भी दावा करते हैं कि उनके सिद्धान्त गीता पर पूरी तरह आश्रित हैं। निर्विवाद रूप से गीता आध्यात्मिक साहित्य के महानतम रत्नों में से एक है और हिन्दू धर्म का आधार ग्रंथ है। यह हर दृष्टि से पूर्ण है, यानि कि इसमें जहाँ संन्यासियों के लिए मुक्ति का मार्ग निर्देशित किया गया है; तो वहीं दूसरी ओर गृहस्थों के लिए भी अपरोक्षानुभूति पाने का द्वार दिखलाया गया है। इसलिए स्वभावत: जहाँ एक ओर गीता अहिंसा की बात करती है, वहीं दूसरी तरफ़ हिंसा को भी परिस्थिवश ज़रूरी मानती है। लेकिन गांधी जी ने गीता से केवल अहिंसा का सिद्धान्त लेकर बाक़ी सब कुछ नकारने की चेष्टा की है।

गीता की तरफ़ दृष्टिपात करने से साफ़ देखा जा सकता है कि गीता हर हालत में अहिंसा का प्रतिपादन नहीं करती है। अर्जुद तो ख़ुद अहिंसा की बात कर रहा था। वह कह रहा था कि युद्ध व्यर्थ है और हिंसा पाप है। लेकिन भगवान श्रीकृष्ण ने उसे युद्ध करने के लिए प्रेरित किया। जिसने भी गीता पढ़ी है, उसके सामने यह बात स्पष्ट है। लेकिन इस तर्क से बचने के लिए महात्मा गांधी कहते हैं कि महाभारत का युद्ध ऐतिहासिक नहीं, वरन एक आध्यात्मिक घटना है। महाभारत में मनुष्य के भीरत सदवृत्तियों और बुरी वृत्तियों के बीच युद्ध को आलंकारिक तौर पर दर्शाया गया है। यदि ऐसा भी मान लिया जाए, फिर भी यह नहीं कहा जा सकता कि गीता में हिंसा का निषेध किया गया है। जहाँ सत्य और धर्म की रक्षा के लिए अहिंसा कारगर न हो, वहाँ हिंसा जायज़ है।

दरअसल गांधी जी का अहिंसा का सिद्धान्त वह नहीं है, जो हिन्दू धर्म द्वारा प्रतिपादित है। बल्कि यह सिद्धान्त ईसाईयत से उधार लिया गया है। जिन्होंने ‘मेरे सत्य के प्रयोग’ पढ़ी है, वे जानते होंगे कि गांधी जी ईसाईयत से बहुत प्रभावित थे। उन्होंने इंग्लैण्ड में ईसाईयत अपनाने की इच्छा भी ज़ाहिर की थी और बाइबल का विशेष अध्ययन किया था। साथ ही उनका पालन-पोषण जैन रीति-रिवाज़ों में हुआ था। हिन्दू धर्म में अहिंसा का सिद्धान्त लचीला है, यानि कि अपरिहार्य कारणों से हिंसा करना ग़लत नहीं माना गया है। मनु-स्मृति में कहा गया है कि यदि ब्राह्मण भी आपको शारीरिक हानि पहुँचाने की मंशा से आए, तो उसकी हत्या करना पाप नहीं है। अकर्मण्यता इस उधार के अहिंसा-सिद्धान्त का सहज फल है। और इस तरह प्रकारान्त से गांधीवाद अकर्मण्यता को भी बढ़ावा देता है, जिसमें हमारा देश विगत दो सहस्राब्दियों से जकड़ा हुआ है। इस विषय पर स्वामी विवेकानन्द के वचन उद्धृत करना अनुकूल रहेगा:

विधि की विडम्बना देखो। योरोपवासियों के देवता ईसा मसीह ने सिखाया ‘किसी से बैर मत करो, जो तुम्हें गाली दें उन्हें आशीर्वाद दो, यदि कोई तुम्हारे बाएँ गाल पर थप्पड़ मारे तो उसकी ओर दाहिना गाल भी कर दो, सब कामकाजों को त्याग कर परलोक की तैयारी करो क्योंकि संसार का अन्त निकट है।’ इसके विपरीत हमारे भगवान श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं, “सदैव महान उत्साह से कर्म करो, अपने शुत्रुओं का‍ विनाश कर संसार का भोग करो।” लेकिन अन्त में जो कुछ कृष्ण या ईसा मसीह चाहते थे, उसका बिल्कुल उल्टा हो गया।

योरोपवासियों ने ईसा मसीह के शब्दों को गम्भीरतापूर्वक नहीं लिया। सदैव कार्यशील स्वभाव अपनाकर अत्यन्त प्रचण्ड रजोगुण से सम्पन्न होकर वे बड़े उत्साह और युवकोचित उत्सुकता के साथ विश्व के विभिन्न देशों के सुख और विलासों को बटोर रहे हैं और मन भर कर उन्हें भोग रहे हैं। और हम! हम एक कोने में बैठे, अपने सब साज-सामान के साथ, दिन-रात मृत्यु का ही आह्वान कर रहे हैं और गा रहे हैं –
नलिनिदलगतजल‍मतितरलं
तद्वज्जीवनमतियचपलम्।
अर्थात्, “कमलपत्र पर पड़ी हुई जल की बूंदें जितनी चंचल और अस्थिर हैं उतना ही यह मानव-जीवन क्षीण और चलायमान है।” इस सबका परिणाम हुआ है कि मृत्युराज यम के भय से हमारी धमनियों का रक्त ठण्डा पड़ जाता है तथा सम्पूर्ण शरीर काँपने लगता है। और ओफ़! यम ने भी हमारे शब्दों को सच मान लिया है और शायद इसीलिए महामारी आदि संसार भर के रोग हमारे देश में भेज दिए हैं।

अब कहो! गीता का उपदेश किसने सुना? यूरोपियनों ने। और ईसा की इच्छानुसार कौन आचरण कर रहे हैं? भगवान कृष्ण के वंशज। ईसा ने ग्रीस और रोम को चौपट किया। किन्तु कुछ ही समय पश्चात् सौभाग्य से योरोपवासी प्रोटेस्टेंट हो गए। उन्होंने ईसा के उन वचनों का, जिनका प्रतिनिधित्व पोप की सत्ता द्वारा होता है, परित्याग कर दिया और संतोष की सांस ली। लेकिन हम अन्जाने में उन उपदेशों से चिपके हुए हैं।

भारत में एक बार फिर रजोगुण उद्दीप्त हो रहा है और हम लोग पुन: कर्म करने को उद्यत हो रहे हैं। यही कर्माकांक्षा हिन्दू धर्म और गीता का मूल है। ऐसे में गांधीगिरी के ये उपदेश हमें फिर अकर्मण्यता में ढकेल देंगे, जिससे निकलने का हम प्रयत्न कर रहे हैं। हालाँकि गांधीवाद बिल्कुल ही बेकार हो, ऐसा नहीं है। लेकिन उसका दायरा बहुत सीमित है और व्यापक तौर पर उसका प्रयोग करना ठीक उसी तरह मूर्खतापूर्ण होगा, जिस तरह सब्ज़ी काटने के चाकू का इस्तेमाल युद्धक्षेत्र में करना। हिन्दू धर्म के गीता में प्रतिपादित सिद्धान्त हर देश-काल में कार्य रूप में परिणत किए जा सकते हैं और गांधीगिरी की तरह सीमित नहीं है।

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8 Comments:

Blogger भुवनेश शर्मा said...

प्रतीक भाई सही कहा आपने गाँधीगिरी का व्यापक प्रयोग कतई व्यावहारिक नहीं है।
यदि राष्ट्रहित के नजरिए से सोचें तो आज गाँधीगिरी जैसी चीजें कतई कारगर नहीं हो सकतीं पर यदि राजनीति के चरित्र की बात करें तो उस संदर्भ मे वाकई आज गाँधीगिरी पर मनन करने की आवश्यकता है.....

1:19 AM  
Blogger Udan Tashtari said...

गांधीगिरी यूँ भी एक जीवन शैली नहीं, एक विचारधारा है. वह कोई राह नहीं, दिशा प्रदर्शक है, जो दिशा दिखा सकता है मगर रास्ते में आने वाले पत्थर और गड्डों का अगर आप ख्याल न रहें, तो दिशा निर्देशक की क्या गल्ती. और यूँ भी दिशा निर्देशक के होते भी सभी स्वतंत्र हैं अपनी राह लेने को और सफल भी, अगर मंजिल प्राप्त हो जाये. उन्होंने एक दिशा का निर्देशन किया है, मगर वही सबसे बेहतर हो, यह जरुरी नहीं. समय के साथ सब बदलता है तो गांधी जी के सिधांत भी. शायद वो होते, तो समय के साथ साथ उनकी सोच में भी बदलाव आया होता. काफी कुछ लिखा जा सकता इस विषय पर मगर मुझे लगता है कि आवश्यकता नहीं है, क्योंकि हम सभी तो इस बात पर सहमत हैं।

यह मात्र मेरे विचार हैं, आपका सहमत और असहमत होना स्वभाविक है, अतः इसे कोई विवाद न माना जाये किसी भी सोच के साथ.

7:46 AM  
Blogger प्रभाकर पाण्डेय said...

प्रतीक भइया,एकदम यथार्थ लेख है यह । और आपके विचार से मैं पूर्ण सहमत हूँ ।

9:02 AM  
Blogger Raag said...

काफी यथार्थपरक लेख और अच्छा विश्लेषण है। मैं भी आपकी कई बातों से सहमत हूँ।

9:41 AM  
Anonymous संजय बेंगाणी said...

गाँधीगीरी से मात्र इंसानो का हृदय परिवर्तन हो सकता है, हैवानो के लिए उनकी जबान में ही जवाब दिया जाना चाहिए.

10:00 AM  
Blogger Shubham Lahoti शुभम् लाहोटी said...

मुझे पता नहीं था कि मेरे दोहों का इतनी बेसबरी से इंतज़ार होता है.. :P
अब तो कुछ करना ही पढ़ेगा...

10:59 AM  
Anonymous सागर चन्द नाहर said...

बिल्कुल सही है प्रतीक भाई
गाँधीगिरी फ़िल्मों में ही ठीक लगती है, यथार्थ में अगर यह सब करना मूर्खता ही होगी।
अब तो हमें कृष्णनीति, सावरकरनीती या शिवाजीनीती सीखनी चाहिये।

11:52 AM  
Blogger DR PRABHAT TANDON said...

आज के वक्त की जरुरत गांधी नीति नही है, समय के साथ सब कुछ बदल जाता है, हो सकता है कल भी गाधीगिरी की वजह से ही हमारे देश कॊ बेवजह विभाजन का दर्द झेलना पडा और आजादी के बाद गांधी चापलूसों (नेहरु & कं.)को सत्ता मे बैठा कर इस देश की दुर्गति को बढाने मे महत्वपूर्ण योगदान गांधी नीति ने दिया.

6:35 AM  

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