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Monday, November 06, 2006

Gandhigiri in Historical Context

ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में गांधीगिरी

‘लगे रहो मुन्ना भाई’ वाक़ई कमाल की फ़िल्म है। मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूँ, क्योंकि सिद्धान्त को जब तक व्यावहारिक स्तर पर इस्तेमाल न किया जा सके, तब तक सिद्धान्त व्यर्थ हैं। इस फ़िल्म ने सैद्धान्तिक गांधीवाद को व्याव‍हारिक गांधीगिरी बना कर एक नया आयाम दिया है। यह फिल्म आम जनता में गांधी के सिद्धान्तों के प्रति कौतुहल जगाने में क़ामयाब रही है।

सार संक्षेप (जो पूरा पढ़ना चाहते हैं, वे इसे छोड़ दें)

‘लगे रहो मुन्ना भाई’ वाक़ई कमाल की फ़िल्म है। इसलिए, क्योंकि सिद्धान्त को जब तक व्यावहारिक स्तर पर इस्तेमाल न किया जा सके, तब तक सिद्धान्त व्यर्थ हैं। इस फ़िल्म ने सैद्धान्तिक गांधीवाद को व्याव‍हारिक गांधीगिरी बना कर एक नया आयाम दिया है। गांधीगिरी या गांधीवाद या इसे चाहे जो भी नाम दें – गांधी की खोज नहीं है। पिछले दो हज़ार सालों से यह हमारी जीवन-शैली का अंग है। इनका मूल हैं बौद्ध और जैन सुधार, जो बाद में गांधीवाद के रूप में परिणत हुए हैं।

लेकिन ग़ौर करने लायक बात यह भी है कि जबसे हमने इन सिद्धान्तों को पकड़ा है, हमारा पतन हुआ है। कईयों ने हमें ग़ुलाम बनाया – नादिरशाह, तैमूर, चंगेज़ ख़ान, मुग़ल, अंग्रेज़ – यह सूची बुहत लम्बी है।

लोग प्राय: कहते हैं और इस पर गौरव करते हैं कि दूसरे देश तो ख़त्म हो गए, लेकिन हमारा देश कभी मरा नहीं। लेकिन स्वाभिमानी इंसान ग़ुलामी और मृत्यु के बीच हमेशा मृत्यु का वरण करता है। जो बात व्यक्तियों पर लागू होती है, वही बात राष्ट्रों पर भी लागू होती है। हम आज भी खड़े हैं अपनी ऐतिहासिक मूर्खताओं के जीवन्त उदाहरण के तौर पर, और विडम्बना यह है कि हमें इस बात पर गर्व है।

अहिंसा निश्चय ही श्रेष्ठ है, लेकिन विकृत अहिंसा को ही हम आजतक अहिंसा समझते रहे हैं। अहिंसा हर दिशा में होती है, बाहर भी और भीतर भी। हमने बाहर अहिंसा की चेष्टा की और अपने ऊपर ही हिंसा की। दूसरे के अन्याय सहना और प्रतिकार न करना अपने ऊपर हिंसा करना है। इसीलिए हमें गांधीगिरी बहुत पसंद आती है, क्योंकि यह दो हज़ार वर्षों के अकर्मण्य राष्ट्रीय जीवन के अनुकूल है।

हर मुल्क में क्रान्तिकारियों ने राजशाही के तख़्ते पलटे हैं, क्योंकि इन मुल्कों में क्रान्ति जनसाधारण में फैल चुकी थी। लेकिन यहाँ क्रान्ति कभी फैल ही न सकी, आम जनता का क्रान्ति से कोई सरोकार नहीं था। जनता में था तो बस प्रमाद और आज भी इसमें ख़ास कमी नहीं आई है। भारत उस काल में सोने की चिड़िया कहलाता था जब हममें संघर्ष की, लड़ने की शक्ति थी। गांधीगिरी का दुष्परिणाम यही है कि यह सिद्धान्त उन पुराने सड़े-गले मूल्यों को पुन: प्रतिष्ठित कर रहा है, जो हमारी ग़ुलामी के कारण स्वरूप हैं।


लेकिन सोचने लायक बात यह है कि क्या गांधीगिरी देश को सही दिशा में ले जाने का काम कर सकती है? क्या गांधीगिरी आज के युग में भी सार्थक है? क्या समाज गांधीगिरी को आत्मसात करने में सक्षम है और क्या ऐसा करने से समाज का कुछ भला होगा? इन बातों को समझने के लिए गांधीगिरी को व्यापक तौर पर देखने की आवश्यकता है, ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में इसका विश्लेषण किए जाने की ज़रूरत है। क्योंकि गांधीगिरी का सवाल केवल एक फ़िल्म से ही नहीं जुड़ा है, न ही गांधी नामक किसी व्यक्ति-विशेष से – यह जुड़ा है हमारे इतिहास से, हमारे वर्तमान हालात की वजहों से।

गांधीगिरी या गांधीवाद या इसे चाहे जो भी नाम दें – गांधी की खोज नहीं है। पिछले दो हज़ार सालों से यह हमारी जीवन-धारा है, हमारी जीवन-शैली का अंग है। हालाँकि गांधी जी को यह श्रेय जाता है कि उन्होंने इसे कारगर ढंग से अंग्रेज़ों के खिलाफ़ इस्तेमाल किया। गांधीवाद का मतलब सत्य, अहिंसा और सत्याग्रह आदि सिद्धान्तों की गांधी जी की व्याख्या से है। और यह सैद्धांतिक व्याख्या पिछले दो हज़ार सालों में विकसित हुए हैं, और हमारे अन्त:करण का एक अंग बन गए हैं। इनका मूल हैं बौद्ध और जैन सुधार, जो बाद में गांधीवाद के रूप में परिणत हुए हैं।

लेकिन ग़ौर करने लायक बात यह भी है कि जबसे हमने इन सिद्धान्तों को पकड़ा है, हमारा पतन हुआ है, हम गिरते चले गए हैं और अपनी हालत उस कीड़े की तरह बना ली है, जिसे चाहे जो भी पैरों तले कुचल सकता है। हर ऐरा-ग़ैरा, जो भी यहाँ से गुज़रा उसने हमें पीटा और हम दो सहस्राब्दियों से लगातार यूं ही पिटते चले आ रहे हैं। नादिरशाह, तैमूर, चंगेज़ ख़ान, मुग़ल, अंग्रेज़ – यह सूची बुहत लम्बी है। दुनिया में हमारे अलावा और कोई भी दूसरी जाति नहीं है, जो हज़ार साल ग़ुलाम रही हो। हमारी कई पुश्तें ग़ुलामी में ही बीत गईं हैं। ऐसा लगता है कि हमारे राष्ट्रीय जीवन का उद्देश्य ग़ुलाम होना ही रहा हो।

लोग प्राय: कहते हैं और इस पर गौरव करते हैं कि हमारा देश कभी मरा नहीं, हम अमर हैं – यूनान, रोमां, मिस्र सब मिट गए जहाँ से, कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी। लेकिन यह गौरव की नहीं, सबसे बड़ी शर्म की बात है। हमारे देश में यह बेहूदगी बहुत प्रचलित है – जिस बात पर हमें शर्मिन्दा होना चाहिए, उसे लेकर हम गौरवान्वित हैं। लेकिन हम हैं कि हमें लज्जा नहीं आती, हमने उसे तिरोहित कर दिया है। आप सबने चन्द्रशेखर आज़ाद के बारे में सुना होगा। जब अंग्रेज़ों से उस वीर क्रान्तिकारी को चारों ओर से घेर लिया और उसके निकलने का कोई उपाय नहीं शेष रहा, तो उसने अपनी कनपटी पर पिस्तौल रख कर स्वयं को गोली मार ली – वह शहीद हो गया, अमर हो गया। इसे कहते हैं अमर होना। स्वाभिमानी इंसान ग़ुलामी और मृत्यु के बीच हमेशा मृत्यु का वरण करता है। इसकी तुलना एक जेब कतरे से करो, पुलिस उसे पकड़ लेती है, गाली देती है, डंडे मारती है, जेल में ठूंस देती है – वह जीवित रहता है, क्योंकि उसमें कोई स्वाभिमान नहीं। उसमें स्वाभिमान नहीं हो सकता है, क्योंकि उसने जो काम किया है, उससे कभी स्वाभिमान नहीं पैदा हुआ करता है। जो बात व्यक्तियों पर लागू होती है, वही बात राष्ट्रों पर भी लागू होती है। जो राष्ट्र स्वाभिमानी थे वे सब मिट गए और अपनी गौरव गाथाएँ छोड़ गए; यूनान, रोम, मिस्र – सब स्वाभिमानी थे। हम आज भी खड़े हैं अपनी ऐतिहासिक मूर्खताओं के जीवन्त उदाहरण के तौर पर, और हमें इस पर गर्व है। हमारी हालत उस जेब कतरे से कुछ बेहतर नहीं है।

लेकिन इसकी वजह क्या है? अहिंसा निश्चय ही श्रेष्ठ है, लेकिन विकृत अहिंसा को ही हम आजतक अहिंसा समझते रहे हैं। जैन और बौद्ध सुधार 500 सालों के भीतर ही विकृत हो गए, सारी जाति अकर्मण्य और आलसी बन गई, मठप्रेमी बन गई, संन्यासप्रेमी बन गई, भगोड़ी बन गई। और आजतक हममें कोई ख़ास सुधार नहीं आया है। अहिंसा हर दिशा में होती है, बाहर भी और भीतर भी। हमने बाहर अहिंसा की चेष्टा की और अपने ऊपर ही हिंसा की। दूसरे के अन्याय सहना और प्रतिकार न करना कोई बहुत श्रेष्ठ बात नहीं है, यह अपने ऊपर हिंसा करना है। इसमें दूसरे का कोई दोष नहीं है। जो धर्म कहता है कि अत्याचार करने वाला दोषी है, वह ग़लत है। हिंसा अत्याचार करना नहीं बल्कि अत्याचार सहना है। हाँ, दूसरे पर अत्याचार भी हिंसा है, लेकिन बाहरी हिंसा है, छोटी हिंसा है। लेकिन खुद अत्याचार सहना भीतरी हिंसा है, अपने ऊपर हिंसा है, बड़ी हिंसा है। इसीलिए हमें गांधीगिरी बहुत पसंद आती है, क्योंकि यह हमारे पिछले दो हज़ार वर्षों के राष्ट्रीय जीवन के अनुकूल है। हमारे अकर्मण्य स्वभाव के अनुकूल है, हमारे आलस्य के अनुकूल है, हमारी ग़ुलाम मानसिकता के अनुकूल है।

एक बात पर और ध्यान दो, हर मुल्क में क्रान्तिकारियों ने राजशाही के तख़्ते पलटे – फ्रांस में, इंग्लैंड में, अमरीका में, हर जगह। ऐसा क्यों कर हो सका? क्योंकि इन मुल्कों में मुट्ठीभर क्रान्तिकारी न थे, क्रान्ति जनसाधारण में फैल चुकी थी, हर देशवासी क्रान्तिकारी था। लेकिन यहाँ क्रान्ति कभी फैल ही न सकी, दो-एक भगत सिंह हुए, दो-एक चन्द्रशेखर आज़ाद हुए, लेकिन आम जनता का उनसे कभी कोई सरोकार नहीं था। क्योंकि यहाँ जनता में संघर्ष की क्षमता नहीं थी, संघर्ष के लिए आवश्यक रजोगुण नहीं था। हमारी जनता में था तो बस प्रमाद, तमोगुण की पराकाष्ठा, हताशा – और आज भी इसमें कुछ ख़ास कमी नहीं आई है। इसलिए गांधी जी को इस देश में बहुत अनुयायी मिले, सारा देश गांधी जी का अनुयायी हो गया। लेकिन गांधी अगर अमेरिका में पैदा होते तो कोई बड़े राजनेता न होते, उनका कोई अनुयायी न होता। क्योंकि वहाँ की जनता का ख़ून सूखा नहीं है, मस्तिष्क दुर्बल नहीं है, उनमें संघर्ष करने की क्षमता है।

अपने देश के इतिहास को देखो तब भी यही पाओगे; जब तक हम विकृत अहिंसा, तथाकथित वैराग्य, संसार की असत्यता जैसे मूढ़ सिद्धान्तों से दूर थे तभी तक हमने प्रगति की। भारत उस काल में सोने की चिड़िया कहलाता था जब हममें संघर्ष की, लड़ने की शक्ति थी। वैदिक संहिताओं को उठाकर देखो, प्राचीन आर्य एक संघर्षप्रिय जाति थे। गांधीगिरी का दुष्परिणाम यही है कि यह सिद्धान्त उन पुराने सड़े-गले मूल्यों को पुन: प्रतिष्ठित कर रहा है, जो हमारी ग़ुलामी के कारण स्वरूप हैं। भारत एक बार फिर अपने पैरों पर खड़ा होने लगा है, लड़ने को तैयार है, संघर्ष के लिए सचेष्ट है। ऐसे में गांधीगिरी अगर प्रभावी होती है तो हम फिर उसी कूँए में गिर जाएंगे, जिसमें पिछले हज़ार वर्षों से पड़े हुए थे।

यह विषय बहुत लम्बा है। इस पर और चिन्तन किए जाने की ज़रूरत है। इसलिए आज की बात को अगली में पोस्ट में आगे बढ़ाऊँगा। आशा है आप केवल प्रतिक्रियात्मक टिप्पणी न देकर क्रियात्मक टिप्पणी देंगे।

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11 Comments:

  • तुम्हारी बात सही है प्रतिक.

    1. समरथ को नहीं दोष गुसाईँ. अमेरीका की क्यों चलती है, क्योंकि वो समर्थवान है. हमें भी समर्थ होना होगा. सिर्फ दुनिया को महानता दिखाने से महान नहीं बन सकते, ऐसे कर्म करने पडेंगे। आज ग्लोबलाइजेशन की वजह से भारतीय बाजार और मौके खुल गए हैं, तो दुनिया झुक रही है। ब्रिटिश ऐयरवेज वाले हाथ जोडे विज्ञापन बनाते हैं। क्यों ऐसा होता है, क्योंकि भारत की अर्थव्यवस्था समर्थ है।

    2. आज बडे बडे राष्ट्र भी अमेरीका के आगे नाचते हैं क्योंकि उनके मन में कही ना कहीं डर है। और यहाँ बांग्लादेश भी आंख दिखाता है। क्यों..? क्योंकि अपनी मानसिकता गुलामी की है।

    3. किसी गोरे पर्यटक को देखते ही कैसे बांछे खिल जाती क्यों नज़रें नही हटती.. क्यों सर सर मेडम मेडम कहते हैं.. क्योंकि मानसिकता गुलामी की है, है तो वे भी इंसान पर भगवान हम बनाते हैं।

    4. अहिंसा में हमारा अटुट विश्वास है। भारत ने कभी किसी पर आक्रमण नही किया, करेगा भी नही। पर प्रतिरक्षा तो ढंग से करो। यहाँ गान्धी का सिद्धांत नही चलता। यहाँ तो सरदार पटेल और भगत सिंह बनना पडेगा।

    5. गान्धीजी महात्मा थे, पर परमात्मा नहीं थे.

    By Blogger Pankaj Bengani, at 3:06 PM  

  • बात मार्के की कही. शायद यही वजह रही हो कि मुझे यह फिल्म पसन्द नहीं आई थी.
    बात अहिंसा की करें तो ध्यान से देखने पर लगता है, अहिंसावादी अंहिसा के चक्कर में ज्यादा हिंसा करते है.

    By Blogger संजय बेंगाणी, at 3:13 PM  

  • This post has been removed by a blog administrator.

    By Blogger Raag, at 8:54 PM  

  • फिल्म में एक बात जो मुझे बहुत अच्छी लगी वो तब थी जब मुन्नाभाई बोलता है, कि बापू ने कहा था कि कोई एक थप्पड़ मारे तो दूसरा गाल आगे कर दो, लेकिन ये नहीं बताया था कि दूसरे गाल पर भी पड़े तो क्या करो। ये डॉयलाग मुन्नाभाई गार्ड को मारने के बाद बोलता है।

    इसका मतलब है कि अहिंसा करो तो भी एक हद तक।

    प्रतीक भाई हिंदू तो वैसे भी एक कायर जाती ही रही है हमेशा। आशा है आपका लेख पढ़ कर कुछ अक्ल आए लोगों को और हम अपना चरित्र विश्लेषण कर सकें।

    By Blogger Raag, at 8:57 PM  

  • सौ साल बाद लोग भरोसा नहीं करेंगे कि गांधी जैसा हाड़ मांस का पुतला हमारे बीच था- ऐसा किसी विद्वान का कहना था. व्यवहारिक तौर पर चीज़ें सही करने के फेर मे सैद्धांतिक तौर पर ग़लत हो जाना आम व्यकति की तात्कालिक आवश्यकता हो सकती है. लेकिन गांधी सैद्धांतिक तौर पर इतने सही तो थे कि वे अपने समकालीन सभी अग्रणी पुरूषो में भी आगे ठहरते थे. तभी महापुरूष या महात्मा कहलाए. विषय पर लेख पूरा करेंगे तो आगे अपन भी विचार करेंगे.

    By Anonymous नीरज दीवान, at 10:42 PM  

  • अंहिसा का पालन करना और कायरतावश चुप रह जाना, इन दोनों के बीच एक बहुत बारिक रेखा है और शायद अक्सर हम गांधीगिरी की आड़ में इसी का प्रदर्शन होते देखते हैं.

    By Blogger Udan Tashtari, at 11:52 PM  

  • सत्य,अहिंसा और सत्याग्रह की खोज को वाकई गाँधीजी की मौलिक सोच नहीं माना जा सकता इसकी जड़ें हमारी संस्कृति से ही निकली हैं।
    परंतु हम हजारों साल गुलाम रहे उसके लिए इन सिद्धांतों को दोष नहीं दिया जा सकता। हमारी गुलामी का कारण है हमारी उदासीनता जो हजारों वर्षों से अनवरत चली आ रही है। हम जो हो रहा है उसी को अपनी नियति मान बैठे हैं। वर्तमान को बदलने की प्रव्रत्ति ना हमारे अंदर तब थी ना अब है। हमने हमेशा परिस्थितियों के समक्ष एक मूकदर्शक की भूमिका निभाई है।
    पर इस प्रकार की कायरतावादी मानसिकता से गाँधीवाद या इस प्रकार के सिद्धांत बहुत भिन्न हैं। जो इन सिद्धांतो में विश्वास करता है उसके सामने उदासीनता या अकर्मण्यता जैसी स्थिति नहीं आती। ये बात अलग है कि उसके ये सिद्धांत कितने कारगर होते हैं। पर दुर्भाग्य से लोग यह मानते हैं कि हमारे पूर्वजों की मानसिकता इन्हीं सिद्धांतों से ओत-प्रोत रही और इसीलिए हमारी ये स्थिति हुई। मुख्य कारण इसके मूल में था कि हम कुछ करना ही नहीं चाहते थे ना कि हम इस प्रकार के सिद्धांतों का पालन करते हुए चुप बैठे रहे।
    गाँधीगिरी आज कितनी प्रासंगिक है इस पर तो इतना ही कहना चाहूंगा कि ये पूरी तरह प्रासंगिक भले ना हो(आज की अंतर्रष्ट्रीय राजनीति के संबंध में) पर कुछ मायनों में प्रासंगिक है मसलन देश के राजनीतिज्ञों और लोकतंत्र के लिए।
    साथ ही गाँधीवाद को केवल अहिंसा या दूसरा गाल भी आगे करनी जैसे मुहावरों से आगे जाकर देखने की जरूरत है क्योंकि इसमें अहिंसा के अलावा अन्य तत्व भी सम्मिलित हैं।

    By Blogger भुवनेश शर्मा, at 2:29 AM  

  • विषय आपने बढ़िया चुना है आशा है आगे भी ये चर्चा जारी रहेगी।

    By Blogger भुवनेश शर्मा, at 10:36 AM  

  • प्रतीक तुम्हारा ये लेख आइसीसी के फाइनल के तमाशे के बाद पढ‌ा और ये लेख पढ‌ते हुए पंवार का खींसे निपोरता हुआ चेहरा ही घुम रहा था, लेख पर यही कहूँगा कि हम अहिंसा के नाम पर शायद अपनी कायरता छुपाने की कोशिश करते हैं।

    रगों में दौड‌ते रहने के हम नही कायल, जो आंख से ना टपका तो वो लहू क्या है।

    By Anonymous Tarun, at 7:56 AM  

  • मित्रों, निश्चित तौर पर यह एक सुरूचिपूर्ण लेख है. खासकर भाषाई दृष्टिकोण से. मैंने ‘मुन्‍ना भाई...’ पर और कई समीक्षाएं पढी लेकिन यह एक नया नजरिया लगा. क्‍या इस ब्‍लॉग में हिस्‍सेदारी की जा सकती है? हमारा एक वेबसाइट भी है. आप आमंत्रित हैं. अवलोकन करें- http://newswing.com और हां, अपनी राय वहां अवश्‍य दर्ज करायें. धन्‍यवाद।

    By Anonymous Kislaya ( किसलय ), at 8:15 PM  

  • प्रतीक भाई ...
    नमस्कार ...आपके ब्लाग का चक्कर लगाया.काफी अच्छा लगा.लगे हाथ शुक्रिया कि मुझे आपने हिन्दी ब्लागस मे शामिल किया.
    गिरीन्द्र नाथ झा

    By Blogger Girindra Nath Jha, at 1:53 PM  

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