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Sunday, December 10, 2006

आओ मूर्तियाँ तोड़ें

यूँ तो हम, बनवारी, भीखू और पुत्तन लंगोटिया यार हैं। लेकिन जैसा कि अक़्सर लंगोटिया यारों में होता है, कभी-कभी हममें भी जूतम पैजार की नौबत आ जाती है। सो एक दिन भिखू भड़क गया कि तुम लोग हमको ख़्वामख़्वाह ही ताने मारते रहते हो और हम आसाराम बापू के प्रवचन में बैठी जनता की नाईं बिना चूँ-चपड़ किए तुम्हारी बक़वास सुनते रहते हैं। हम भी ब्रजवासी हैं, कन्हैया हज़ार के उपर शिशुपाल की गाली नहीं सुन सके तो हम तुम्हारे ताने काहे सुनें? अब तो तुम लोगों को भुगतना ही पड़ेगा।

सो वह डंडा उठाए के हमारे मुहल्ले में पहुँचा और बनवारी के घर के सामने लगी उसके के दादाजी की मूर्ति पर पिल पड़ा – दादाजी रईस ज़मींदार थे, सो मूर्ति-उर्ति लगवाने का पैसा रहा होगा। वैसे तो हमें भीखू की अक़्ल पर हमेशा से शक था, लेकिन यह बात तो बिल्कुल ही समझ में नहीं आ रही थी कि भीखू के भेजे में मूर्ति तोड़ने का इतना सॉलिड आइडिया कैसे आया। पता किया तो मालूम पड़ा कि मंथरा के आधुनिक संस्करण ख़बरिया चैनलों को देखने से उसे अम्बेडकर-मूर्ति प्रकरण वाली बात पता चली थी, वहीं से ये आइडिया उड़ाया था।

ख़ैर, बनवारी भी भीखू की इस हरक़त से भड़क गया। उसके मुहल्ले में गया लेकिन भीखू के दादाजी की मूर्ति कहीं ढूंढे नहीं मिली, काहे से कि उसके दादाजी तो ग़रीब किसान थे – खाने को ढंग से नहीं मिला जिन्दगी भर, ससुरी मूर्ति कहाँ से लगवाते। सो उसने भीखू के घर में टंगी उसके दादाजी की फूलचढ़ी इकलौती तस्वीर पर ही अपने हाथ आज़माए – अब पाँच-सात लौंडे-लपाड़े इकट्ठे करके ले गया था, कुछ-न-कुछ तो आखिर तोड़ के आना ही था। लेकिन जब यह बात भीखू की बिरादरी वालों का मालूम पड़ी, तो बड़ा बवेला मच गया। सभा हुई, सभा में शिरकत कर भीखू को एक नई ही बात मालुम पड़ी – भीखू के दादा की तस्वीर तोड़ना दरअसल भीखू से नि‍जी रंजिश की वजह से नहीं है, बल्कि ये सवर्णों का दलितों पर अत्याचार है जो पिछले हज़ारों सालों से चल रहा है।

भीखू भी मन-ही-मन ख़ुश हो गया, सोचा – अभी तक तो मैं नाहक ही परेशान था कि मेरी तोड़फोड़, गुण्डागर्दी की वजह से ये सब हुआ; लेकिन ये तो सवर्णों के हज़ारों सालों के अत्याचारों का फल है... मेरी भला क्या ग़लती इसमें! सो बदला लेने जाते अपने ‘समाज’ वालों के साथ हो लिया। सबके साथ मिलकर भीखू ने अबकी तथाकथित सवर्णों की खूब मूर्तियाँ तोड़ीं, थोड़ा-बहुत बस-कार वगैरह जलाने को भी ऐन्जॉय किया। अब भला सवर्ण कैसे पीछे रहते, बैठक हुई – इन लोगों की ये हिम्मत... इनकी जात ही ऐसी है, हमने ज़्यादा ही छूट दे दी है लेकिन अब औकाद याद दिलानी होगी। सुन कर बनवारी को भी तसल्ली हुई, सोचा कि ख़्वामख़्वाह आत्मग्लानि पाल रहा था कि मेरी वजह से ये सब हो रहा है। सो बनवारी भी नाश्ता करने से पहले लोगों के साथ जा कर एक-आध ट्रेन जला आया, दूसरी जाति वालों की कई सारी मूर्तियाँ तोड़ आया।

लगभग एक हफ़्ते बाद भीखू और बनवारी, दोनों का ही ग़ुस्सा ठण्डा पड़ गया था। सो हम चारों दोस्त हलवाई के यहाँ भल्ले खाते-खाते गप्पें मार रहे थे। इतने में पुत्तन बोला – "तुम लोगों को कोई काम ढंग से नहीं करना आता। अभी तक मेरे मुहल्ले में एक मूर्ति सही-सलामत खड़ी है। जब बाक़ी की 19 तोड़ीं, तो वो एक क्यों छोड़ दी।" अपना केमिस्ट्री ज्ञान झाड़ता हुआ आगे बोला – "इसीलिए तुम दोनों तो ChuSO4 हो, यानि कि चूतियम सल्फ़ेट।" अब पुत्तन को ऐसी ही केमिस्ट्री आएगी, हम आपको उसके नक़लचीपने के बारे में पहले ही बतला चुके हैं। पढ़ेगा नहीं तो यही होगा न। हालाँकि भीखू और बनवारी ने अपनी ग़लती स्वीकार की और वादा किया कि कल जाकर उस मूर्ति को भी तोड़ आएंगे।

अगले दिन मूर्ति तोड़ने के बाद दोनों जब अपने-अपने घर पहुँचे, तो उनके नाम एक ख़त आया हुआ था। ख़त ‘तालीबान लड़ाका भर्ती परिषद’ से आया था। ख़त में लिखा था – "जितने बुत आप लोगों ने तोड़े, उतने तो हम तालिबान वाले यहाँ अफ़ग़ानिस्तान में भी नहीं तोड़ सके। आप लोगों ने अपने पूरे-के-पूरे शहर को हमारे सपनों के अफ़ग़ानिस्तान के मुक़ाबले का बना दिया है – जहाँ देखो टूटे बुत, जलती गाडियाँ, शोर-शराबा, ख़ून-खराबा... वाह !! वाह!! आप जैसे क़ाबिल और होनहार लोगों की हमें सख़्त ज़रूरत है। आप लोगों को आपकी ख़्वाहिश के मुताबिक़ तन्ख़्वाह दी जाएगी, साथ में कई पर्क्स भी मिलेंगे। कृपया जितनी जल्दी हो सकें, हमें ज्वाइन करें।" नीचे मुल्ला उमर के दस्तख़त थे। पहले दोनों को नौकरी के लाले थे, अब तो उनकी डिमाण्ड है। तालीबान के अलावा कई राजनैतिक दल वाले भी ऑफ़र दे रहे हैं। आजकल बेचारे दोनों उधेड़-बुन में लगे हैं, किसे ज्वाइन करें - जाएँ तो जाएँ कहाँ?

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4 Comments:

Blogger भुवनेश शर्मा said...

तो प्रतीक भैया काहे उन बेचारों की उधेड़-बुन दूर नहीं कर देते
आपके तो लँगोटिया हैं न बन जाईये नेता, आपके लिए तो सब करने को तैयार हो जायेंगे वे
वैसे भी चुनाव आने ही वाले हैं
क्या पता आप कुछ विधायक या मंत्री ही बन जाएँ

8:42 PM  
Anonymous नीरज दीवान said...

भीखू, बनवारी ने तो जो किया वो उनकी बातें.. पुत्तन भी लगी-लाग मे कम नही है. बची-खुची बेचारी इकलौती मूर्ति भी तुड़वा ली. अच्छा तड़काया है आपने उपद्रवियों को.. एक पुण्यात्मा के कथित अपमान की क़ीमत पांच-छह करोड़ा का नुकसान और चार जानें गवां दी.. बस? हद है. सौदा ज़्यादा महंगा नहीं है.

9:03 PM  
Anonymous संजय बेंगाणी said...

मीडिया को मंथरा की उपमा देने का मौलिक विचार प्रसंशनिय है.
अच्छा व्यंग्य.

9:46 AM  
Blogger अनुराग श्रीवास्तव said...

आज की ताज़ा ख़बर;

तोड़े जाने के लिये भविष्य में मूर्तियों की संख्या में कमी ना हो, इस लिये योरप की एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी ने भारत में मूर्तियाँ बनाने का कारखाना लगाने का प्रस्ताव रखा है.

11:41 AM  

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