सागर भाई को हँसाना है
ख़ैर, जिस तरह पाकिस्तान अपने मिसाइल कार्यक्रम के लिए हमेशा चीन की सूरत ताकता है, ठीक उसी तरह हम इस काम को पूरा करने के लिए दूसरे चिट्ठाकारों की मदद लेने की कोशिश करने लगे। हमने सोचा कि पहले महाचिट्ठाकार जीतू भाई को पकड़ा जाए। उन्हें तो झक मार कर मदद करनी ही पड़ेगी, क्योंकि उन पर हमारे सौ रूपए जो उधार हैं। सो सबसे पहले उन्हें पकड़ा, लेकिन जीतू भाई का मूड ज़रा ऑफ़ था। हम तुरन्त समझ गए, हो-न-हो जीतू-नामधारी छद्म ब्लॉगर की कहीं ताज़ी टिप्पणी हो चुकी है। तो हमने सहानुभूति के दो शब्द कहे, जीतू भाई से राम-राम की और निकल लिए। वैसे हम बता दें, अगर किसी भी पोस्ट पर ‘जीतू’ नाम से दो टिप्पणियाँ नज़र आएँ, तो समझो कि नीचे वाली टिप्पणी में लिखा होगा – यह ऊपर वाली टिप्पणी हमने नहीं की है।
फिर हमने सोचा कि केवल आलोक जी ही हमारी मदद कर सकते हैं, क्योंकि आदि काल से वो लोगों की कम्प्यूटर पर हिन्दी लिखने में मदद करते आ रहे हैं। स्वभाव से ही मदद-प्रिय हैं, तो हमारा काम ज़रूर बनवा देंगे। पहले हमने उनकी थोड़ी मक्खनबाज़ी की, तारीफ़ की – आप तो हिन्दी ब्लॉग जगत् के पितामह हैं वगैरह, वगैरह। सुनकर आलोक जी गदगद हो गए और हमें लगा कि हमारा काम बन गया। वे बोले – “वत्स, हम खुश हुए। लाओ तुम्हारी यह पोस्ट हम लिख देते हैं। जाओ, अब कल आना।” हमारी ख़ुशी का तो कोई ठिकाना ही न रहा। हम अगले दिन पहुँचे और पोस्ट मांगी। उन्होंने विजिटिंग कार्ड के आकार का काग़ज़ एक टुकड़ा हमारी तरफ़ सरका दिया, उस पर लिखा था – “सागर भाई को हँसाना है... हा हा हा।” हमें लगा कि आलोक जी से ज़रूर कौन्हूँ भूल हो गई है और हम बोले – आपसे समझने में कुछ ग़ल्ती हो गई है, हमें सागर जी को तार नहीं भेजना है। हमें तो पूरी ब्लॉग पोस्ट लिखनी है। सुनकर आलोक भाई हँसे और हमें सदमा देने के लिए बोले – “बच्चा, ये पूरी पोस्ट ही है।” इत्ते में पीछे बैकग्राउण्ड सांग बजने लगा – मैं रोऊँ या हँसू, करूँ मैं क्या करूँ। हमने उन्हें प्रणाम किया और निकल लिए उस ‘वेद मंत्र’ वाली पर्ची को हाथ में लेकर।
“जो हुआ सो हुआ, फ़ुरसतिया जी सदा सहाय” – मन में ये शब्द न जाने कहाँ से गूंजे और दिल को बहुत तसल्ली दे गए। फ़ुरसतिया जी ने भी सहायता का वचन दिया और अगले दिन आने को कहा। हम दिल में हर्ष और भय मिश्रित भाव लेकर लौट आए। हर्ष इसलिए कि महान व्यंग्यकार हमारी मदद करेंगे तो सागर भाई का हँसना पक्का है, लेकिन भय इसलिए कि आलोक भाई ने भी इसी तरह अगले दिन बुला कर खर्रा पकड़ा दिया था। जैसे सुख का विलोम दु:ख होता है, आसमान का पाताल होता है, वैसे ही ‘आलोक’ का विलोम ‘अनूप’ होता है – ये बात हमें नई-नई पता लगी। अगले दिन पहुँचे तो अनूप जी ने हज़ार पन्नों की एक पांडुलिपी निकाल कर दे दी, बोले – “तुम्हारे लिए कल ये लिख दी थी, बस टाइप कर लेना।” हमें फिर लगा कि हो-न-हो, अनूप जी हमारी बात समझ नहीं पाए हैं। हमने कहा – “शायद आपको कुछ ग़लतफ़हमी हो गई है। हमने उपन्यास के लिए नहीं कहा था। हमें तो एक छोटी-सी ब्लॉग पोस्ट लिखनी है।” वे बोले – “ये तुम्हारे ब्लॉग के लिए ही है। अब नाटक मत करो और इसे चुपचाप ले जाओ। हमारे ब्लॉग के हिसाब से यह बहुत छोटी पोस्ट बनेगी।” बात तो ठीक ही लगी, फ़ुरसतिया जी की ब्लॉग पोस्ट का आकार तो इससे बहुत बड़ा होता है। सो हम पांडुलिपी ले तो आए, लेकिन टाइप करने की हिम्मत नहीं जुटा सके।
थक-हार कर हम आखिरकार समीर लाल जी के पास पहुँचे। कहा कि ‘अब तो बस आप ही उबारिए, कोई कुण्डलिया रच संकट से हमें तारिए’। किसी नौसीखिए कवि की तरह की गई हमारी इस ऊट-पटांग तुकबंदी से समीर जी प्रसन्न हो गए और हमें संकट से उबारने का वचन दे बाद में फिर बुलाया। बाद में पहुँचने पर यह रचना हमारे हाथ में थमा दी -
सागर भाई को हँसाना है, काम नहीं है आसान
विफल हुए ये करते-करते, बहुत से लोग महान
बहुत से लोग महान, हार समाए काल के गाल
उनमें जीत सका बस एक, नाम है समीर लाल
कहे ‘समीर’ तुममें नैक सी भी अक़ल हो अगर
छोड़ो ये सब काम, क्या कभी हँसा भी है सागर?
हमने कहा कि आपकी कविता तो बढ़िया है, लेकिन ये तो आपके ही नाम से है। हमारा इसमें क्या है, लिखना था तो हमारे नाम से लिखते न। इस पर समीर जी ने अफ़सोस जताया – “अपने नाम से पचास कुण्डलिया प्रतिदिन की दर से लिखते-लिखते आदत पड़ गई है बीच में नाम घुसाने की। अब यही ले जाओ।” तो हम वही लेते आए उनके पास से।
इसके बाद तो हमसे एक बहुत बड़ी ग़लती हो गई कि हम अमित भाई के पास पहुँच गए। अमित भाई से मदद के लिए कहा तो न जाने किस बात पर नाराज़ हो गए। उनका रंग लाल हो गया, सर पर दो सींग निकल आए, नाक और कान से धूआँ निकलने लगा और वे ज़ोर-ज़ारे से उछलने लगे। ग़ुस्से में बोले – “मुझे सब ख़बर है कि तुम कई ब्लॉगरों को परेशान करके आ रहे हो। अब मैं तुम्हें और ब्लॉगर्स को परेशान नहीं करने दूंगा। वैसे भी तुम हमेशा ग़लत कैटेगरी में थ्रेड चालू करते हो। तुम्हारा यह बेहूदा थ्रेड यहीं बन्द किया जाता है।” हम वहाँ से उल्टे पांव दौड़ आए और अपनी जान बचाई।
हम जाना तो और भी बहुत-से दूसरे चिट्ठाकारों के पास चाहते थे, लेकिन अब हमारा थ्रेड ही अमित भाई ने बंद कर दिया है तो क्या करें। सो अब हमें ही कुछ करना पड़ेगा। जहाँ तक हमें याद पड़ता है, हमें ब्लॉग पर इंटरनेट से चुराए हुए सुन्दरियों के फोटुओं को चिपकाने के अलावा बाक़ी कुछ नहीं आता है। सो फ़ोटू चिपकाए देते हैं, देखकर सागर भाई को हँसी आए, रोना आए या दिल में कुछ और ही ख़्याल आए... ये खुद उनकी ज़िम्मेदारी है। यहाँ पर देख लीजिए।
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14 Comments:
बहुत अच्छे प्रतीक जी :-)
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Pramendra Pratap Singh, at 9:44 PM
हा हा ही ही हू हू हे हे हो हो...
सागर भाई हँसे या नहीं, मैं तो हँस रहा हूँ...
हा हा ही ही हू हू हे हे हो हो...
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Raviratlami, at 10:02 PM
:-) :-)
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उन्मुक्त, at 10:19 PM
काहे इतनी लंबी पोस्ट लिख मारी सरकार सागर भाई का फ़ोटो ही चिपका देते
बहुत हो तो हमारा भी साथ में,
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भुवनेश शर्मा, at 11:51 PM
ये फोटो किसलिये लगाये हो: सागर भाई को हँसाने के लिये या रुलाने के लिये?
लो, एक मुण्ड़्ली धर लो और कविराज को भी भेज कर रिटर्न फाइल करवा दो :)
गली गली मे डोलते, आये भाई प्रतीक
चाकू चमका कह रहे, चीख सके तो चीख
चीख सके तो चीख वरना लिख कुछ ऐसा
हंस दे सागर भाई, लगे न एक भी पैसा
कहे समीर कि काम तो फोकट मंत्र करेगा
मनोरंजन का टेक्स, क्या गिरिराज भरेगा.
-- लिखे बेहतरीन हो:)
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Udan Tashtari, at 3:07 AM
बहुत अच्छे प्रतीक जी, खूब हंसाया। :)
वैसे एक अनुगूंज करवा दे विषय होगा "सागर भाई को हंसाना है"
बचपन में एक कहानी पढ़ी थी न राजकुमारी को हंसाने वाली?
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जगदीश भाटिया, at 10:36 AM
हमारी तारीफ़ खूब किये,(दुर्)गुण विकसित कर
लो लिखवा दिए आपसे भी ख़तरनाक टॉर्चर कर
एक तीर से देखिए किये हैं कितने शिकार
बड़े-बड़े ये गुणीजन भी मान गये है हार
भाटियाजी तो कह रहे अनुगूंज करवा डालो
मतलब साफ है कि सागर को मरवा डालो
सबसे अंत में लेता हूँ अब गुरूदेव का नाम
कुछ भी कहने से पहले मैं करता हूँ प्रणाम
करता हूँ प्रणाम के कहीं वो बुरा न मान जाए
वही तो है दरिया जहाँ से कलम स्याही पाए
मनोरंजन टेक्स मांगा या फिर मांगी रिस्वत
लगता है इस प्रोग्राम में करना चाहे शिरकत
हँसा-हँसाकर लोट-पोट किया तुमने प्रतिक भाई
लिखा आपने इतना सुन्दर, स्वीकार करें बधाई
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गिरिराज जोशी, at 11:58 AM
सागर खुश हुआ। :)
प्रतीक भाई बहुत बहुत शुक्रिया, आप मुझे हसाँने के लिये अमरीका से लेकर कुवैत तथा दिल्ली से कानपुर तक पुरी दुनिया के चक्कर लगा लिये। अच्छा अब में हँस (मुस्कुरा )रहा हूँ देखिये
ही ही ही ही
{वैसे फ़ोटो में तो मैं हँसता दिख ही रहा हूँ।}
@भुवनेश जी:
सायद आप पहचाने नहीं यह हमारी ही तस्वीर है।
@जगदीश जी भाटिया:
यह सारी बातें आप तक कैसे पहुँच जाती है, कल ही बात चल रही थी कि अनूगूंज रख ली जाये और आपको पता चल गया, राज क्या है?
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सागर चन्द नाहर, at 2:07 PM
बढिया लेखन, हँसते-हँसते पढा| बहुत मजेदार रचना|
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दीपक, at 4:10 PM
बहुत अच्छे प्रतीक जी :-)
http://www.w3village.com
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anton, at 4:55 PM
मजाक मजाक में सागर भाई हँसे ना हँसे हम तो बहुते हँसे.
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Kalicharan, at 5:38 PM
प्रतीक क्या सही लिखा है एक एक ब्लोगर के लिये, सागर भाई हंसे की नही।।।।
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Tarun, at 9:29 AM
दूसरी बार पढ़ा इसे। बढ़िया लगा। इसी बहाने दूसरी बार फोटो भी देख लिया आरती छाबरिया का। यह हमारे लिये सूचना है कि आलोक का विलोम अनूप होता है! आलोक का मतलब तोब होता है प्रकाशा जब कि अनूप का माने होता है अनोखा, जिसकी उपमा न दी जा सके! ई कैसी बात है भाई!
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अनूप शुक्ला, at 6:27 AM
बहुत अच्छे प्रतीक जी.....
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ranju, at 12:33 PM
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