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Wednesday, December 13, 2006

दलितों का सराहनीय क़दम

आज बीबीसी हिन्दी पर यह ख़बर पढ़ी – दलितों ने मांगा पूजा का अधिकार। आज़ादी को मिले साठ वर्ष होने को हैं, लेकिन लोगों की संकीर्ण सोच ख़त्म होने का नाम ही नहीं लेती है। यह आश्चर्यजनक है और साथ में बेहद दु:खद भी, कि आज भी दलितों को मन्दिरों में प्रवेश करने से रोका जाता है। इसे विसंगति ही कहा जाएगा कि समाज में भेद-भाव अभी भी व्याप्त है और हम विकसित राष्ट्र बनने का सपना देख रहे हैं।

लेकिन यह घटना दलितों की सकारात्मक सोच को दर्शाती है। दलितों ने भारी तादाद में जाकर उस मन्दिर में पूजा-अर्चना की और अपनी आत्मशक्ति का परिचय दिया। यह घटना पूरे देश के दलितों के लिए पथ-प्रदर्शन का काम कर सकती है। दलितों के अधिकारों का हनन किए जाने पर मतान्तरण करके भागना उपाय नहीं है, बल्कि डटे रहना और अपना हक़ प्राप्त करना श्रेयस्कर है। क्योंकि विशुद्ध हिन्दूधर्म सभी की समानता की घोषणा करता है। भेद-भाव करने वाले लोग वस्तुत: हिन्दू कहलाने के अधिकारी ही नहीं हैं। दलितों का यह काम समानता की स्थापना का, विशुद्ध हिन्दुत्व की स्थापना का कार्य है। घर गन्दा होने पर उसे छोड़ा नहीं जाता, बल्कि उसकी सफ़ाई की जाती है। डट कर इस वि‍कृति को दूर करने का यत्न कर रहे भीलवाड़ा के दलित निश्चय ही आदर्श स्थापित कर रहे हैं और तारीफ़ के हक़दार हैं।

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12 Comments:

  • प्रतिक भाई, गुस्ताखी माफ़ करें मगर शायद आपने खबर पूरी नहीं पढ़ी. मुख्य मुद्दा पूजा के अधिकार का नहीं बल्कि ज़मीनी विवाद था, जिसे राजनीतिक जामा पहनाने के लिए यह सब स्वांग रचा गया था.


    थोड़ा धैर्य धरें, कुछ दिनों में सब साफ हो जायेगा.

    By Blogger गिरिराज जोशी, at 7:20 PM  

  • बीबीसी हिन्दी ने जितनी ख़बर छापी है, मैंने उसके अनुसार ही अपनी राय ज़ाहिर की है। अगर इस विवाद में कोई और कोण भी हो, तो कह नहीं सकता हूँ। लेकिन विवाद भले ही ज़मीनी क्यों न हो, लेकिन किसी भी इंसान का मंदिर में प्रवेश वर्जित करना हिन्दुत्व के ख़िलाफ़ है।

    By Blogger Pratik, at 7:24 PM  

  • बात तो साँची कह दी प्रतीक भैया ने

    By Blogger भुवनेश शर्मा, at 7:30 PM  

  • प्रतीक भाई
    कई बार तो इस तरह के विवाद जबरन पैदा किये जाते हैं जैसे नाथद्वारा के श्रीनाथजी के मंदिर में पर्षों से दलित और पिछड़े आराम से दर्शन कर रहे थे परन्तु पूर्व मुख्यमंत्री को दलितो का उद्धार करने का शौक चढ़ा और ऐलान करवा दिया कि वे हरिजनों को श्रीनाथजी के मंदिर में प्रवेश करवायेंगे, उन्होने करवाया भी पर जबरन पैदा किये गये इस विवाद में कई दिनों तक नाथद्वारा में तनाव रहा था।

    By Anonymous सागर चन्द नाहर, at 8:28 PM  

  • अच्छी खबर है। इस तरह के कदमों का स्वागत किया जाना चाहिये। दलितों को सम्मान के साथ मन्दिर में प्रवेश दिलाना और उन्हें सामाजिक समरसता का अनुभव कराना प्रत्येक हिन्दू का कर्तव्य है। ऐसे ही कदम हिन्दू धर्म को शक्ति प्रदान करेंगे।

    By Blogger अनुनाद सिंह, at 11:36 PM  

  • विवाद का मूल मुद्दा तो ज्ञात नहीं मगर आपकी सोच और इस प्रकार के सार्थक कदमों का निश्चित ही स्वागत है और सराहनीय भी.

    By Blogger Udan Tashtari, at 2:45 AM  

  • सब को समान अधिकार तो होने ही चाहिये

    By Anonymous Tarun, at 5:47 AM  

  • जातिगत अहंकार ने हिन्दूओं तथा भारत को भारी क्षति पहूँचाई है, समय हैं जातिवाद से ऊपर उठने का.
    ऐसे प्रयास नई आशाएं जगाते है.

    By Anonymous संजय बेंगाणी, at 9:15 AM  

  • 'क्योंकि विशुद्ध हिन्दूधर्म सभी की समानता की घोषणा करता है।' क्या वाकई मे प्रतीक भाई , या तो वेदों में तथ्य बाद मे नये डाले गये या अगर वह समयकालीन थे तब भी समानता नही दिखती।

    By Blogger DR PRABHAT TANDON, at 6:30 PM  

  • कोई भी हो हिन्‍दू हिन्‍दू ही रहता है। उसे किसी प्रकार के अधिकार से वचिंत नही किया जा सकता है। इसी लिये कहा जाता है कि ''हिन्‍दू पतितो: न भवेत्'' ।

    By Blogger mahashakti, at 10:13 AM  

  • daliton ke mandir parvesh se "Joshi" ji vichlit to honge hi.

    By Blogger Vikalp, at 11:11 AM  

  • Jan Vikalp' is committed to the supressed communities of Society. This monthly is againt the difference and inequality caused due to Caste, Sex, Religion and is Committed for public opposition againt the social evils.http://vikalpmonthly.googlepages.com/

    By Blogger Vikalp, at 11:13 AM  

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