Yoga & Tantra in World of Consumerism
उपभोक्तावाद के दौर में योग और तंत्र
उपभोक्तावाद की गति अजीब है। यह हर उस चीज़ को, जिसमें बिकने की सम्भावना है, उपभोक्ता के मुताबिक़ ढाल कर पेश करता है। और अगर किसी चीज़ में बिकने की सम्भावना नहीं है तो उसे तोड़-मरोड़ कर इस तरह बना दिया जाता है, ताकि लोगों को ललचाकर उसे बेचा जा सके।
योग और तन्त्र के साथ भी यही विडम्बना है कि दोनों ही उपभोक्तावाद में जकड़ गए हैं। यानि कि मूलत: जहाँ दोनों आत्मज्ञान की विधियाँ हैं और इसलिए इन्हें बेचना मुमकिन नहीं है, क्योंकि आत्मज्ञान की कोई उपयोगितावादी क़ीमत नहीं है, इन्हें बाज़ार के हिसाब से पुनर्परिभाषित कर दिया गया है। जहाँ योग को स्वस्थ रहने के एक साधन के तौर पर पेश किया जाता है, वहीं तन्त्र ‘सेक्रेड सेक्स’ मतलब कि ‘पवित्र संभोग’ का पर्याय बन कर रह गया है।
जिस तरह उपभोक्तावादी बाज़ार पर अमेरिका का कब्ज़ा है, उसी तरह इंटरनेट पर भी अमेरिका ही छाया हुआ है। यह हम हिन्दुस्तानियों के लिए निहायत शर्म की बात है कि योग और तन्त्र पर बनी ज़्यादातर वेबसाइट्स भी अमरीकी हैं। इंटरनेट पर ‘योग’ खोजने पर आसनों के अलावा कुछ क़ायदे की जानकारी मुश्किल से मिलती है, मानो आसन ही योग हों। हाँ, स्वामी रामदेव के उदय के साथ प्राणायाम को भी इसमें जोड़ा जा सकता है। वहीं तन्त्र की हालत और भी ख़राब है। वामाचार तन्त्र का बहुत ही छोटा भाग है और उस पर भी वामाचार की हज़ारों व्याख्याएँ हैं। लेकिन तन्त्र के नाम पर सिर्फ़ sacred sex ही देखने को मिलता है। तिस पर भी दु:ख की बात यह है कि हम भारतीय भी योग और तन्त्र की इस नई व्याख्या को आँख मूंद कर स्वीकार कर चुके हैं। तो हम कह सकते हैं कि न योग में और न ही तंत्र में कोई शक्ति है, शक्ति का केन्द्र तो उपभोक्तावाद ही है।
टैग: Yoga, Tantra, Consumerism, Hindi, हिन्दी
उपभोक्तावाद की गति अजीब है। यह हर उस चीज़ को, जिसमें बिकने की सम्भावना है, उपभोक्ता के मुताबिक़ ढाल कर पेश करता है। और अगर किसी चीज़ में बिकने की सम्भावना नहीं है तो उसे तोड़-मरोड़ कर इस तरह बना दिया जाता है, ताकि लोगों को ललचाकर उसे बेचा जा सके।
योग और तन्त्र के साथ भी यही विडम्बना है कि दोनों ही उपभोक्तावाद में जकड़ गए हैं। यानि कि मूलत: जहाँ दोनों आत्मज्ञान की विधियाँ हैं और इसलिए इन्हें बेचना मुमकिन नहीं है, क्योंकि आत्मज्ञान की कोई उपयोगितावादी क़ीमत नहीं है, इन्हें बाज़ार के हिसाब से पुनर्परिभाषित कर दिया गया है। जहाँ योग को स्वस्थ रहने के एक साधन के तौर पर पेश किया जाता है, वहीं तन्त्र ‘सेक्रेड सेक्स’ मतलब कि ‘पवित्र संभोग’ का पर्याय बन कर रह गया है।
जिस तरह उपभोक्तावादी बाज़ार पर अमेरिका का कब्ज़ा है, उसी तरह इंटरनेट पर भी अमेरिका ही छाया हुआ है। यह हम हिन्दुस्तानियों के लिए निहायत शर्म की बात है कि योग और तन्त्र पर बनी ज़्यादातर वेबसाइट्स भी अमरीकी हैं। इंटरनेट पर ‘योग’ खोजने पर आसनों के अलावा कुछ क़ायदे की जानकारी मुश्किल से मिलती है, मानो आसन ही योग हों। हाँ, स्वामी रामदेव के उदय के साथ प्राणायाम को भी इसमें जोड़ा जा सकता है। वहीं तन्त्र की हालत और भी ख़राब है। वामाचार तन्त्र का बहुत ही छोटा भाग है और उस पर भी वामाचार की हज़ारों व्याख्याएँ हैं। लेकिन तन्त्र के नाम पर सिर्फ़ sacred sex ही देखने को मिलता है। तिस पर भी दु:ख की बात यह है कि हम भारतीय भी योग और तन्त्र की इस नई व्याख्या को आँख मूंद कर स्वीकार कर चुके हैं। तो हम कह सकते हैं कि न योग में और न ही तंत्र में कोई शक्ति है, शक्ति का केन्द्र तो उपभोक्तावाद ही है।
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2 Comments:
मार्केटिंग का जमाना है. आज तो प्राकृतिक आपदाओं की विभिषिका का आंकलन भी उस आपदा की मार्केटिंग पर निर्भर हो गया है, तो योग और तंत्र का क्या कहना.
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Udan Tashtari, at 2:50 AM
well said
By
Philosophy of a poor IITian, at 6:11 PM
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