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Sunday, January 21, 2007

Are We a Violent Society?

क्या हमारा समाज हिंसक है?

हम हिन्दुस्तानियों को बड़ा गर्व है कि दुनिया में केवल हम ही अहिंसक आन्दोलन के ज़रिए आज़ाद हुए हैं। इसी देश की माटी ने बुद्ध, महावीर और गांधी को जन्म दिया था और हम एक अहिंसक और आध्यात्मिक समाज हैं। लेकिन आज के हालात देख कर तो लगता है कि भारत से ज़्यादा हिंसक समाज शायद ही इस संसार में कोई दूसरा होगा।

कल बेंगलौर में सद्दाम हुसैन की फाँसी के विरोध में हिंसा भड़की और लोग मारे गए। इससे पहले भी सद्दाम की फाँसी का विरोध करने के लिए समाजवादी पार्टी ने विरोध प्रदर्शन किया था और सपा कार्यकर्ताओं द्वारा आगरा में बेगुनाह पर्यटकों को निशाना बनाया गया। उनकी गाड़ी पर पथराव किया गया, जिससे बहुतों को गम्भीर चोटें आईं। आख़िर सद्दाम हुसैन से हमारा क्या लेना-देना है? क्या सद्दाम को फाँसी बसों, कारों, भारत के आम आदमियों और पर्यटकों की वजह से दी गई?

कई लोगों का कहना है कि यह सब काम मुसलमानों के हैं, न कि हिन्दुओं के। हिन्दू तो स्वभाव से ही शान्तिप्रिय होते हैं। लेकिन क्या यह सच है? क्या हिन्दू वाक़ई शान्तिप्रिय हैं? कल ही यह ख़बर भी देखी कि विश्व हिन्दू परिषद के कार्यकर्ताओं ने कानपुर के एक सभास्थल पर पहुँच कर भारी तोड़-फोड़ करी। बजरंगदल, विहिप और दुर्गावाहिनी जैसे तथाकथित हिन्दूवादी संगठनों के कृत्यों से कौन वाकिफ़ नहीं है? इन शान्तिप्रिय लोगों की शान्तिप्रियता का मुज़ायरा आने वाली चौदह फ़रवरी को भी देखा जा सकता है।

आज के दौर में ऐसा जान पड़ता है कि समाज का हर तबका बेहद हिंसक है। महाराष्ट्र में बिहारियों के साथ मार-पीट होती है, असम में हिन्दीभाषियों को बेरहमी से क़त्ल किया जाता है, सवर्ण दलितों के ख़िलाफ़ प्रदर्शन करते हैं, दलित सवर्णों का उग्र विरोध करते हैं, बात-बात में बसों और रेल गाड़ियों को आग में फूँक दिया जाता है। हम लोगों की अहिंसा उस कहानी की तरह है जिसमें अपनी अहिंसा दर्शाने के लिए खुद कष्ट उठाकर एक वैष्णव चीटियों को शक्कर खिलाता था, लेकिन उन इंसानों को पीट-पीट कर लहूलुहान कर देता था जो ग़लती से शक्कर पर पैर रख देते थे।

दरअसल हम लोग छद्म-अहिंसक हैं। यानि कि बातें तो अहिंसा की करते हैं, लेकिन कोई काम बिना जूते-लात नहीं करते। सोचने वाली बात यह है कि बुद्ध और महावीर की जन्मभूमि हिंसक कैसे हो गई और इस हिंसा से निकलने का क्या उपाय है? इस बारे में आप लोगों की क्या राय है?

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13 Comments:

  • Hi Pratik,
    अरे आध्यात्म बचेगा तब न इस पर लोग सोचेगें…जब हमारी नियति ही बदल गई है तो हिंसा होना हीं है,यहाँ के लोगो को तो सूत्र मिलना चाहिये…और कोई काम तो लोग करना नहीं चाहते,रचनात्मक कार्यों का योग बापु के साथ हीं दफ़्न हो गया,बिल्कुल सही मुद्दा उठाया है।

    By Blogger Divine India, at 11:58 PM  

  • सच में,

    यह नेता लोग किसी भी हद तक जाते हैं ध्यान आकर्षित करने के लिये.

    उन नेता लोगों को तो यह भी ठीक से नहीं मालूम होगा की सद्दाम को फांसी आखिर दी क्यों गयी थी ?

    भैया, सद्दाम भी कोई सीदा सादा आदमी नहीं था.उसने अपने जिन्दगी में पता नहीं कितने लोगों को मौत के घाट उतारा होगा.

    मुझे तो यह आह्चर्य होता है की लोग किसी हत्यारे के लिये इतना बवाल कैसे मचा सकते हैं ....

    By Anonymous Anonymous, at 3:28 AM  

  • हम लोग छद्म-अहिंसक हैं।

    --बहुत सही कह रहे हो, प्रतीक.

    By Blogger Udan Tashtari, at 7:08 AM  

  • कथनी और करनी का फर्क इसी को कहते हैं, खत्म करने की तो नही कह सकता लेकिन जब तक वोट की राजनीति धर्म और जाति के नाम पर होती रहेगी इस तरह की घटनायें भारत में घटती रहेंगी।

    By Anonymous Tarun, at 8:54 AM  

  • इसका जवाब तो उन्हे ही देना है, जो भारतीयों को शांतिप्रिय व अहिंसक मानते है. यह सब देख कर रोष से भर जाता हूँ. एक देश के रूप में कभी परिपक्व होगें भी या नहीं.
    मरा सद्दाम वहाँ, मातम मनाया जा रह है यहाँ!

    मिशनरीयों का गलत तरीके से किया गया विरोध उनके गलत कामो को सही साबित कर देगा. विश्व हिन्दू परिषद व बजरंग दल दंगागियों की भीड़ लगते है. उत्पाती रचनात्मक काम नहीं कर सकते.

    By Anonymous संजय बेंगाणी, at 9:30 AM  

  • बिलकुल सही कह रहे हो ! हमें आत्ममंथन की आवश्यकता है कि किस तरह समाज में बढ़ रही ऐसी प्रवृतियों को रोकें ।

    By Blogger Manish, at 10:28 PM  

  • बिल्कुल सही बात कह रहे है आप, लेकिन इन बातों को हम जैसे ब्लॉगर ही समझते है, ये अहिंसा फैलाने वाले लोग नहीं.

    By Anonymous Nitin hindustani, at 12:28 PM  

  • सच में यह सोचने की बात है, अहिंसा के देश में हिंसा ही दिखाई दे रही है। आपका लेख सोचने पर मजबूऱ करता है।

    By Anonymous GIITAA, at 6:41 PM  

  • Bahut sahi kaha h tumne Pratik.. sachmuch jaroorat h ham hindustaaniyon ko ek baar apne girebaan me jhaank kar dekne ki.. apne jhoote adhyaatam aur ahinsaawad se baahar nikal kar sahi maayyano me ahinsaa ka arth samajhne ki.. Tabhi ye Mahavir aur GaandhiJi ke ahinsawaad ka Hindustaan ban paayega..

    By Blogger manya, at 6:42 PM  

  • Kuch hi dino.n apne blog par maine likha tha ki kya hamare hindi-bhashi desh mein log hindi likhna to kya, padhna bhi shayad bhool chuke hain. Hindi mein aapka blog padhkar mujhe bahut prasannata huii.
    Lekin main hindi fonts se adhik avgat nahin hoon (maine adhiktar shusha font upyog kiya hai), isliye mujhe yeh jaanne mein ruchi hai ki aap kaun se fonts upyog kar rahe hain, aur ismein blog aur comments kaise likhte hain.
    Yaddhapi yeh fonts padhna thoda kathin hai, kyunki yeh bilkul waise nahin dikhta jaisa ki vastav mein likhein to dikhna chahiye.

    By Anonymous sigma, at 12:00 AM  

  • aapko aisa kyon lagta hai ki bhartiya apne aap ko ahinsak samajhte hain. ham na to ahinsak hain na hi apne aap ko ahinsak samjhte hain.

    aapko gyat ho ki bharat main gandhi, buddha aur mahavir ko manne wale bahut kam log hain. sheeghra hi yeh vichar dharayen bharat se khatm ho jayengi aisa mujhe lagta hai aur mera manna hai ki yeh zarrori bhi hai.

    By Anonymous Anonymous, at 10:16 AM  

  • Hi Pratik,

    Sorry to bother you, but I am learning hindi and wanted to know what software , program, font you use for this blog. also do you have a hindi or english keyboard. How to get a hindi blog going? Any assistance will be much appreciated.
    --jan

    By Blogger 94533, at 4:58 PM  

  • hi,Pratik
    Yaar ye baat sach hai ki kuch hindu wadi dal shanti priy nahi hai.....par fir bhi aaj bhi sbse jyada shanti priy hindu hi hai.Or fir apni sanskrti bacahana kha ki ahinsa hai????

    By Blogger ankur, at 12:11 AM  

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