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Monday, January 29, 2007

कवि ‘अवसाद’

आप लोग हमारे दोस्त बनवारी को तो जानते ही होंगे। नहीं जानते तो यह पढिए। ख़ैर, मुद्दे की बात यह है कि आजकल खरपतवार की तरह उग रहे कवियों में बनवारी भी शुमार करता है। अभी ताज़ा-ताज़ा ही कवि बना है। जैसा कि हर नौसीखिया कवि करता है, वह भी सबको घेर-घेर कर कविताएँ झिलाता है। हम तो आजकल उसे देखते ही सर पर पाँव धर कर भाग खड़े होते हैं। लेकिन आज उसने हमें पकड़ ही लिया और बोला कि हमारी कविताएँ सुनो। हमने कहा कि सुनाओ, क्योंकि हमारे मना करने पर भी वह भला कहाँ मानने वाला था।

बनवारी बोला – ‘कविता सुनने से पहले यह जानना बहुत ज़रूरी है कि कविता कवि ने किस परिस्थिति और भाव में लिखी है, तभी कविता अन्दर तक घुस सकती है।’ यह सुनकर हम थोड़े घबराए, लेकिन उसने पूरी तरह घबराने का मौक़ा भी नहीं दिया और आगे बतलाने लगा – ‘यह कविता हमने बड़ी विषम परिस्थितियों में अपनी प्रेमिका के लिए लिखी थी। इम्तिहान में फ़ेल होने के बाद नक़ल करने के लिए मारी गई कापी पर हमने यह कविता लिखी थी, फ़ेल होने से उपजी बेहद पीड़ा के बीच दिल में प्रेम का फुव्वारा फूट पड़ा था और इसीलिए यह कविता ख़ास है।’ फिर वह कविता सुनाने लगा :

प्रिये, तुम्हारे हाथ जैसे
बरगद के पेड़ की लताएँ
तुम्हारे सुस्मित हास्य से
जीवन में पतझड़ आ जाए

सुनाते-सुनाते वह रुक गया, उसने पूछा – ‘समझे?’
‘हाँ, समझ गए’
‘क्या समझे?’
‘यही कि बरगद और पतझड़ वगैरह से प्रेमिका की तुलना है’
‘अरे नहीं, तुम गहराई तक नहीं पहुँचे’
‘इसमें क्या गहराई वाली बात है?’
‘है, ये पंक्तियाँ छायावादी हैं। इसमें तुम्हें जयशंकर प्रसाद की झलक नज़र आ रही होगी। बरगद माने जटिल जीवन और पतझड़ है फ़ेल होने की व्यथा का बिम्ब।’ यह सुनकर अब हमें चक्कर आने लगा था, शायद जयशंकर प्रसाद को भी स्वर्ग में चक्कर आ रहे होंगे। हमने बनवारी को टरकाने की असफल कोशिश की – ‘हमें अचानक बहुत ज़रूरी काम याद आ गया है, हमें जाना है।’ लेकिन जिस तरह तुणीर से निकला तीर बीच रास्ते से कभी वापिस नहीं आ सकता, उसी तरह कवि अपनी पूरी कविता झिलाए बिना बीच में रूक नहीं सकता। उसने हमारी एक न सुनी और कविता सुनाना जारी रखा।

हम बल्ब थे, तुम्हें देखते ही जल गए फटाफट
तू ट्यूबलाइट थी, लुप-लाइ-लुप बहुत देर लगायी
चीनी माल की तरह आराम से तैयार थीं कई
पर इस कच्चे पापड़ जैसे दिल को तू ही भायी

‘बेहद वाहियात’, हमारे मुँह से अनायास ही निकल पड़ा। बनवारी ने बिना किसी ग़ुस्से के शान्ति से हमारी तरफ़ देखा और बोला – ‘होता है... ऐसा होता है... तुम जैसे लोगों को कविता की नैक सी समझ तो होती नहीं है। हम कवियों को ही तुम्हारी समझ विकसित करनी पड़ती है। ये प्रयोगवादी पंक्तियाँ हैं। जैसा इन पंक्तियों से पता लग ही रहा होगा, हम प्रयोगवादी कविता को उससे आगे ले गए हैं जहाँ अज्ञेय और नागार्जुन ने छोड़ा था। अब आगे सुनो...’

हिज्र-ओ-विसाल सोच कर तड़पते रहे
हम फ़ेल हुए, तेरे प्यार में जाना
जैसे तड़पता है भूख से ग़रीब
न उसने रोटी जानी, न तूने मेरा इश्क़ जाना

अब तो हम भी तड़पने लगे थे और संन्यास लेकर इस संसार से दूर, कवियों से दूर भाग जाना चाहते थे। हमारे चेहरे पर उड़ती हवाइयों को देखकर बनवारी बोला – ‘हम तुम्हारी सीमित बुद्धि की व्यथा समझ रहे हैं। लेकिन घबराने से काम नहीं चलेगा, हिम्मत रखो और समझने की कोशिश करो। इसमें हमने उर्दू ग़ज़ल और हिन्दी कविता को मिलाने का अनुपम प्रयोग किया है। इसके अलावा अनूठे ढंग से ग़रीबों की समस्याओं को उठाकर प्रगतिवाद को नया आयाम दिया है।’ अब तो हमारी मुट्ठी भिंच गई, पास में पड़ी सरिया हमने उठा ली और सोचा कि भले बनवारी हमारा दोस्त है, लेकिन जनकल्याण के लिए, दुनिया को बचाने के लिए इसकी खोपड़ी फोड़ना ज़रूरी है। लेकिन नुक्कड़ पर खड़े हवलदार को देख कर हम रुक गए और अपना इरादा बदल दिया।

हम पर बेहोशी छाने लगी थी, इतने में हवा के ठण्डे झोंके की तरह ख़ुशी एकाएक आयी। बनवारी बोला कि ‘यह कविता अभी इतनी ही लिखी है। इसकी आगे की स्वच्छन्दतावादी पंक्तियाँ कल सुनाऊँगा। घर पर मिलना, कल इसी वक़्त मैं तुम्हारे घर आऊँगा।’ लेकिन हमारे अन्दर भी कीड़ा है, सो हम उसे समझाने लगे कि कविता-वविता लिखना तुम्हारे बस का काम नहीं है। तुम जहाँ भी कविता भेजते हो, संपादक वापस लौटा देते हैं। इसपर बनवारी बोला, ‘निराला की कविताएँ भी संपादक लौटा दिया करते थे। यह हमने फ़ुरसतिया जी के ब्लॉग पर पढ़ा था। कवियों के जीवन की फिल्म में संपादक का काम ही विलन की तरह होता है। इससे साबित होता है कि हम निराला के स्तर के कवि हैं।’

यह सब सुनकर हम अवसादग्रस्त हो चुके थे और बनवारी से बचने के लिए आत्महत्या करने का विचार भी हमारे मन में आने लगा था। हमने खुद को बचाने और बात बदलने की कोशिश में बनवारी से पूछा कि आजकल हमारे बाक़ी लंगोटिया यार पुत्तन और भीखू नज़र नहीं आते हैं... हम उन्हें हिन्दी में ब्लॉगिंग करना सिखाने वाले थे, कहीं बाहर गए हुए हैं क्या? बनवारी ने बताया – ‘जिस दिन सुबह हम उन दोनों को कविता सुनाकर आए थे, उसी दिन शाम को पता लगा कि दोनों मनोचिकित्सक के पास गए हैं। सुनने में आया है कि आजकल दोनों डिप्रेशन का शिकार हैं और घर से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं। लेकिन तुम चिन्ता मत करो, कल हम उन्हें देखने जाएंगे और अपनी नई कविता सुनाएंगे... शायद हमारी कविता की शक्ति से उनका अवसाद ख़त्म हो जाए। जब तक वो लोग नहीं सही होते, तब तक हमें ही ब्लॉगिंग सिखलाओ। हमने सुना है कि वहाँ कई कवि हैं। लेकिन एक दिक़्क़त है....’
‘क्या?’
‘हर कवि का उपनाम होता है, लेकिन अभी तक हमारा कोई उपनाम नहीं है। कुछ आइडिया दो।’
हमने कहा – इसमें इत्ता सोचने की क्या बात है। तुम्हारा नाम होना चाहिए बनवारी ‘अवसाद’। कहो, कैसा लग रहा है नाम... बनवारी ‘अवसाद’। है न नाम में वज़न!!!

नाम की उलझन हल होने से बनवारी खुश हो गया और इस ख़ुशी में एक और कविता सुनाने लगा। इस बीच हमने अपने एक दोस्त को फ़ोन करके एक रस्सी और कुछ चूहे मारने की गोलियाँ भी मंगा लीं। अगर हमारी अगली पोस्ट इस ब्लॉग पर नज़र आए तो समझिएगा कि हमने गोलियाँ अपने दोस्त कवि बनवारी ‘अवसाद’ को खिला कर पंखे से टांग दिया, और अगर अगली पोस्ट न आए तो समझिएगा कि वो गोलियाँ खा कर हम खुद पंखे से लटक चुके हैं।

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14 Comments:

  • कवि कैसे किसी जीव के ल्किये जान देना ठीक नहीं।
    अगली पोस्ट जल्ग लिखें :)

    By Anonymous जगदीश भाटिया, at 10:48 PM  

  • कवि कैसे किसी जीव के लिये जान देना ठीक नहीं।
    अगली पोस्ट जल्द लिखें :)

    By Anonymous जगदीश भाटिया, at 10:49 PM  

  • बनवारी ही गया इस दुनिया से, ऐसा जान पड़ता है. नई ब्लाग की कोई सूचना तो दिख नहीं रही. :)

    अब आपसे मिलने के पहले हवलदार को साथ लायेंगे, ऐसा तय पाया गया है. :)

    By Blogger Udan Tashtari, at 11:57 PM  

  • इस दौर के सदके क्या कहिये
    खोटा भी खरा हो जाता है
    जिस ठूँठ को तुम छू देते हो
    वो ठूँठ हरा हो जाता है

    By Blogger राकेश खंडेलवाल, at 1:47 AM  

  • बहुत उम्दा लिख रहे हो बंधु....अगर कुछ न बन सके तो पत्रकार बनना तय है तुम्हारा...

    लगे रहो.....

    पीयूष

    By Anonymous Anonymous, at 7:33 AM  

  • achachha hai :)

    By Anonymous प्रमेन्‍द्र प्रताप सिंह, at 7:34 AM  

  • टाईम पास करने वाली फोटुवें देख देख के बनवारी में लगता है कविता करने का भूत सवार हुआ है। जो भी है पढकर आनंद की प्राप्ति हुई अहा आनंदम आनंदम, तुस्सी छा गये

    By Anonymous Tarun, at 9:09 AM  

  • आपका कविमित्र सही कह रहा है, आपको कविता की समझ ही नहीं है. बनवारी को कोई ना-समझ प्रकाशक छापेगा नहीं. उसका ब्लोग बनवा दो, फिर देखो सारी दुनिया से कैसे समझदार लोगो की वाह वाह करती टिप्पणीयाँ मिलती है.

    By Anonymous संजय बेंगाणी, at 9:46 AM  

  • बहुत ही अच्छा लिखा है आपने .... :)

    By Blogger ranju, at 11:09 AM  

  • मजा आ गया पढ़कर। और हाँ वो रस्सी वाला काम मत करना वरना हमें छुन्दल-छुन्दल फोटुएं कौन दिखाएगा।

    संजय जी से सहमत हूँ। प्रतिटिप्पणी के लालच में हम भी कविता झेलते रहते हैं। :)

    By Blogger Shrish, at 5:05 PM  

  • भगवान तुमको कवि से भले न बचाये लेकिन कवि अवसाद से बचाये!

    By Blogger अनूप शुक्ला, at 7:45 PM  

  • Bahut accha likha hai. accha hasya hai.
    Mujhe bahut prerna mili ... visham se visham paristhiti mein bhi apni kavitayein sunane ki ;-)

    By Blogger Sigma, at 11:34 PM  

  • maza aaya padh ke ! bahut achche

    By Blogger Manish, at 4:40 PM  

  • @जगदीश जी, मैंने अगली पोस्ट कर दी है। इसलिए मेरी जान की फिक्र न करें, बल्कि किसी और की जान की फिक्र कीजिए। :-)

    @समीर जी, आपका दिमाग़ तो वाक़ई कम्प्यूटर से भी तेज़ चलता है। लगता है आप चाचा चौधरी के रिश्तेदार हैं। ख़ैर, आपकी कविताएँ तो बढिया होती हैं। इसलिए हवलदार को साथ लाने की ज़रूरत नहीं है। :-)

    @राकेश जी, आपकी ये पंक्तियाँ पढ़ कर कह सकता हूँ कि आप बनवारी से बहुत बेहतर हैं। इसलिए चिन्ता न करें। :-)

    @पीयूष जी, क्यों पत्रकार बनने की बददुआ दे रहे हैं? :-)

    @प्रमेन्द्र भाई, लगता है आप कवि हैं इसलिए इतना मुस्कुरा रहे हैं :-)

    @तरुण भाई, बनवारी टाइमपास वाली तस्वीरें देखकर कवि बना हो या न बना हो... लेकिन हिन्दी ब्लॉग मण्डल के दूसरे कवियों की देखा-देखी ज़रूर कवि बन गया होगा। :-)

    @संजय भाई, लगता है आप भी 'समझदारों' से परेशान हैं :-)

    @रंजू जी, इतना लम्बा लेख(?) पढ़ने का शुक्रिया। साथ ही इस झूठी तारीफ़ का भी :-)

    @श्रीश जी, देखिए न... इन मुई टिप्पणियों का लालच हम ब्लॉगर्स से क्या-क्या नहीं करवाता है :-)

    @अनूप जी, काश आपकी बात सच हो। आमीन।

    @सिग्मा जी, आपकी टिप्पणी पढ़कर कवियों के लिए मुझे एक शेर याद आ रहा है -
    अब कवियों के इरादों पर त्रस्त श्रोताओं को हैरत है
    एक कविता ख़तम होती है सौ कविताएँ शुरू होती हैं :-)

    @मनीष भाई, चलिए... कम-से-कम किसी को तो मज़ा आया पढ़ कर, वरना पढ़ने वाले ज़्यादातर कवि थे :-)

    "कवियों, बुरा न मानो होली (आने वाली) है" :-)

    By Blogger Pratik, at 5:22 PM  

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