Cricket Proved Jinnah Wrong
क्रिकेट ने साबित किया जिन्ना को ग़लत
जिन्ना का द्विराष्ट्रवाद का सिद्धांत आख़िरकार ग़लत साबित हो ही गया। भारत और पाकिस्तान, दोनों मुल्क भले ही पचास साल पहले अलग हो गए हों, लेकिन विश्वकप में दोनों देशों के ख़राब प्रदर्शन ने दिखला दिया कि दोनों कमोबेश एक जैसे ही हैं। जहाँ पाकिस्तान ने आयरलैंड के हाथों पटखनी खाई, वहीं हिन्दुस्तान ने बांग्लादेश से हार का स्वाद चखा। दोनों का ख़ून वही है, जो कब क्या रंग दिखाए यह पता नहीं चलता है। दोनों शुरुआती दौर में ही फिसड्डी टीमों के हाथों हार गए।
ख़ैर, इससे ज्योतिष की विश्वसनीयता भी साबित होती है। भारत-पाकिस्तान भले ही अपना स्वतंत्रता दिवस अलग-अलग दिन मनाते हों, लेकिन आज़ाद एक ही दिन हुए हैं और इसीलिए दोनों के कुण्डलियाँ भी लगभग एक-सी हैं। लगता है कि दोनों के नक्षत्र ख़राब चल रहे हैं और जन्म-पत्रियों में बच्चे देशों के हाथों पिटना लिखा था। भारत-पाकिस्तान की हालत देखकर तो लगता है मानो गली-मुहल्ले के किसी ढीली चड्ढी पहने अंगूठा चूसते बच्चे ने गामा और सेण्डो पहलवानों को धराशायी कर दिया हो।
ख़ैर, जो हुआ सो हुआ। लेकिन अपना वूल्मर बेचारा बात दिल पर ले गया। यहाँ करोड़ों भारतीय आस लगाए बैठे थे कि शायद सदमा चैपल को लगे और टीम इंडिया की ग्यारह भेड़ों को बेरहमी से ठोंक-ठोंक कर हाँकने वाले गढ़रिये का खेल निपटे, लेकिन जैसा बिन्दु के पिताजी ने कहा है - "जब-जब जो-जो होना है, तब-तब सो-सो होता है" (अरे यार, "पड़ोसन" में भोले की प्रेमिका बिन्दु) यानि जो होना होता है वही होता है और हुआ भी वही जो होना था। गुरू ग्रेग टीम के शर्मनाक प्रदर्शन पर अभी भी मीडिया के सामने खींसें निपोर रहे हैं और वहीं बेचारे बॉब साहब इतने आहत हुए कि इस लोक से ही अपना बोरिया-बिस्तर समेट लिया।
बचपन में पाठशाला में एक 'अचार जी' गणित पढ़ाते थे। उनसे मैं जब भी कोई सवाल पूछता था और वो बतला नहीं पाते थे, और ऐसा अक़्सर होता था, तो वो किसी और बच्चे को खड़ा करते, उससे एक कठिन-सा सवाल पूछते और न बता पाने पर बबूल की संटी से उसकी जमकर धुनाई करते थे और मेरा ग़ुस्सा उसपर उतार देते थे। हमारी टीम इंडिया का हाल भी काफ़ी-कुछ उन अचारजी की ही तरह है। बांग्लादेश ने पछीट-पछीट के धोया तो उसका ग़ुस्सा बेचारी बरमूडा पर उतारा। लेकिन मैं न कभी अचारजी से पिटने वाले उन बच्चों के लिए कुछ कर सका और न ही बरमूडा के लिए कुछ कर सकता हूँ, सिवाय सहानुभूति रखने के।
जिन्ना का द्विराष्ट्रवाद का सिद्धांत आख़िरकार ग़लत साबित हो ही गया। भारत और पाकिस्तान, दोनों मुल्क भले ही पचास साल पहले अलग हो गए हों, लेकिन विश्वकप में दोनों देशों के ख़राब प्रदर्शन ने दिखला दिया कि दोनों कमोबेश एक जैसे ही हैं। जहाँ पाकिस्तान ने आयरलैंड के हाथों पटखनी खाई, वहीं हिन्दुस्तान ने बांग्लादेश से हार का स्वाद चखा। दोनों का ख़ून वही है, जो कब क्या रंग दिखाए यह पता नहीं चलता है। दोनों शुरुआती दौर में ही फिसड्डी टीमों के हाथों हार गए।ख़ैर, इससे ज्योतिष की विश्वसनीयता भी साबित होती है। भारत-पाकिस्तान भले ही अपना स्वतंत्रता दिवस अलग-अलग दिन मनाते हों, लेकिन आज़ाद एक ही दिन हुए हैं और इसीलिए दोनों के कुण्डलियाँ भी लगभग एक-सी हैं। लगता है कि दोनों के नक्षत्र ख़राब चल रहे हैं और जन्म-पत्रियों में बच्चे देशों के हाथों पिटना लिखा था। भारत-पाकिस्तान की हालत देखकर तो लगता है मानो गली-मुहल्ले के किसी ढीली चड्ढी पहने अंगूठा चूसते बच्चे ने गामा और सेण्डो पहलवानों को धराशायी कर दिया हो।
ख़ैर, जो हुआ सो हुआ। लेकिन अपना वूल्मर बेचारा बात दिल पर ले गया। यहाँ करोड़ों भारतीय आस लगाए बैठे थे कि शायद सदमा चैपल को लगे और टीम इंडिया की ग्यारह भेड़ों को बेरहमी से ठोंक-ठोंक कर हाँकने वाले गढ़रिये का खेल निपटे, लेकिन जैसा बिन्दु के पिताजी ने कहा है - "जब-जब जो-जो होना है, तब-तब सो-सो होता है" (अरे यार, "पड़ोसन" में भोले की प्रेमिका बिन्दु) यानि जो होना होता है वही होता है और हुआ भी वही जो होना था। गुरू ग्रेग टीम के शर्मनाक प्रदर्शन पर अभी भी मीडिया के सामने खींसें निपोर रहे हैं और वहीं बेचारे बॉब साहब इतने आहत हुए कि इस लोक से ही अपना बोरिया-बिस्तर समेट लिया।बचपन में पाठशाला में एक 'अचार जी' गणित पढ़ाते थे। उनसे मैं जब भी कोई सवाल पूछता था और वो बतला नहीं पाते थे, और ऐसा अक़्सर होता था, तो वो किसी और बच्चे को खड़ा करते, उससे एक कठिन-सा सवाल पूछते और न बता पाने पर बबूल की संटी से उसकी जमकर धुनाई करते थे और मेरा ग़ुस्सा उसपर उतार देते थे। हमारी टीम इंडिया का हाल भी काफ़ी-कुछ उन अचारजी की ही तरह है। बांग्लादेश ने पछीट-पछीट के धोया तो उसका ग़ुस्सा बेचारी बरमूडा पर उतारा। लेकिन मैं न कभी अचारजी से पिटने वाले उन बच्चों के लिए कुछ कर सका और न ही बरमूडा के लिए कुछ कर सकता हूँ, सिवाय सहानुभूति रखने के।
Labels: cricket
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7 Comments:
बेचारे वुल्मर. मरे या मार दिये गए?
मार खा कर चेतना, भारत का स्वभाव रहा है, इसलिए बांग्लादेश से हारने पर दुख नहीं हुआ था.
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संजय बेंगाणी, at 6:27 PM
अरे भाई क्योँ भारत के पीछे पडे हो
एक ही मैच तो हारे हैँ
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bhuvnesh, at 6:42 PM
लेकिन मैं न कभी अचारजी से पिटने वाले उन बच्चों के लिए कुछ कर सका और न ही बरमूडा के लिए कुछ कर सकता हूँ, सिवाय सहानुभूति रखने के।
---हा हा, हमारी भी सहानुभूति.
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Udan Tashtari, at 8:03 PM
क्यों भुवनेश जी अभी मन नहीं भरा एक हार से?
प्रतीक भाई की यह बात ठीक लगी
बांग्लादेश ने पछीट-पछीट के धोया तो उसका ग़ुस्सा बेचारी बरमूडा पर उतारा।
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Sagar Chand Nahar, at 9:08 PM
बाब वूल्मर बेचारा कनपुरिया पैदाइश मारा गया फालतू में। दुख है उनके असमय ऐसे चले जाने का!
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अनूप शुक्ला, at 11:15 PM
मेरा दृढ विश्वास है कि मामला सीधा नही है. वुल्मर ने आत्महत्या नही की होगी.
और फिर यह देखिए कि बर्मुडा ने टोस जीतकर फिल्डींग कैसे ले ली??
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Pankaj Bengani, at 9:23 AM
My friend, fighters never suicide. This is not the first time Woolmer had seen the defeat. We must keep in mind that he was the coach of unpredictable Pakistani team. Wait and let the secret unfold.
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Anonymous, at 12:44 PM
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