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Hindi Blog on Movies, Songs n Music

Friday, May 11, 2007

कहानी टीवी धारावाहिकों की

आजकल के हिन्दी धारावाहिक बड़े ही अद्भुत हैं। इन्हें देखकर मैं आश्चर्यचकित रह जाता हूँ। पहली बात तो यह कि इनका नाम ही देखने लायक होता है। मैंने देखने लायक कहा, न कि पढ़ने लायक; क्योंकि इनके नामों की वर्तनी ही इतनी निराली होती है कि उसे पढ़ना अपने आप में काफ़ी मुश्किल काम है। e की जगह a का, a की जगह e का और जगह-जगह पर ii (दो बार आई) का इस्तेमाल तो एक आम-सी बात है। फिर इन धारावाहिकों के नाम के पहले अक्षर में 'क' की वही अहमियत है; जो वेदों में ओंकार की, नाज़ियों में स्वस्तिक की और मर्सिडीज़ कार में आगे लगे सितारे की होती है।

ख़ैर ये तो कुछ भी नहीं है जनाब ! इनकी कहानी तो देखने वालों का भेजा घुमा देती है। आपकी सारी पूर्वनिर्धारित धारणाएँ ध्वस्त हो जाती हैं। जैसे कि इन धारावाहिकों में दिखाए जाने वाले विभिन्न किरदारों को बार-बार 'संस्कारी' कहा जाता है। लीजिए, खा गए न गच्चा। अरे ये वो संस्कारी नहीं हैं, जो आप समझ रहे हैं। इनकी परिभाषा ज़रा हट कर है। अब आप पूछेंगे भला कैसे हटकर है? इनके अनुसार संस्कारी होने से मतलब उस इंसान से है; जिसके विवाहेतर सम्बन्ध हों, जो दूसरों की बातें बाहर से दरवाज़े पर कान लगाकर सुनने का चिर अभ्यासी हो, जो दूसरे को नीचा दिखाने का कोई भी मौक़ा न गंवाता हो और षड्यन्त्र करने में माहिर हो।

इन धारावाहिकों के सम्वाद बड़े ही उबाऊ होते हैं, लेकिन दर्शक फिर भी पूरी तल्लीनता से कान लगाकर इन्हें सुनते हैं। हालाँकि शुरु में सम्वाद-लेखक का नाम भी लिखा आता है, लेकिन मैं नहीं मानता कि ये सम्वाद किसी इंसान ने लिखे हैं। मुझे पूरा यक़ीन है कि ये सम्वाद कम्प्यूटरीकृत होते हैं। मेरे हिसाब से सम्वाद लिखने का काम कोई सॉफ़्टवेयर करता है, जो अपने सीमित डेटाबेस के 'संस्कार', 'सिंदूर', 'आदर्श', 'परम्परा', 'परिवार' और 'आदर' वगैरह शब्दों को randomly लगाकर नए-नए वाक्यों को गढ़ता रहता है। जैसे कि 'बुज़ुर्गों का आदर करना हमारे परिवार की परम्परा है' वगैरह वगैरह।

ये सभी 'क' अक्षर से शुरू धारावाहिक वक़्त बर्बाद करने के लिए बेहतरीन ज़रिया हैं। यदि आप खाली बैठे हैं और समय काटे नहीं कट रहा (भगवान करे ऐसा आपके साथ कभी न हो, क्योंकि ऐसा तो सिर्फ़ नौकरी छूटने के बाद ही होता है), तो अपना टीवी खोलें और ऐसा ही कोई धारावाहिक ज़रूर देखें। फिर मुझे बताएँ कि इन धारावाहिकों के बारे में मेरे विचार कितने सही हैं।

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9 Comments:

  • हालाँकि शुरु में सम्वाद-लेखक का नाम भी लिखा आता है, लेकिन मैं नहीं मानता कि ये सम्वाद किसी इंसान ने लिखे हैं।

    हा हा हा हा.

    By Blogger v9y, at 9:03 PM  

  • बहुत ठीक कह रहे हैं आप । फिल्म वाले तो पहले ही हमें मूर्ख समझते थे किन्तु टी वी वाले तो हमें महा मूर्ख समझते हैं ।
    घुघूती बासूती

    By Blogger Mired Mirage, at 10:00 PM  

  • क्या खूब फ़र्माई प्रतीक! परनानी के परपोते भले ही एक दूसरे पर पिस्तौल तानें, गाड़ियों के मॉडल तो वहीं होते हैं जो परनानी की सासू माँ चलाती थी!! फिर भी हमारी गृहिणियां ऐसी हैं जो इस फ़र्ज़ी दुनिया में रमने से नहीं चूकती... पांच साल तक कहानी रेंगती है, हर किरदार के सर पर सालाना एक की दर से एक सफ़ेद लट चढती है... काश असली दुनिया के अच्छे लोग यूं उम्रदराज़ होते!!!

    By Blogger Yogesh Damle, at 10:58 PM  

  • ये सभी 'क' अक्षर से शुरू धारावाहिक वक़्त बर्बाद करने के लिए बेहतरीन ज़रिया हैं। बिल्कुल सही फरमा रहे है।

    By Blogger mamta, at 11:09 PM  

  • फिर भी वक्त बर्बाद किये जा रहे हैं....हा हा...क्या करें कुछ समझ नहिं आता. :)

    By Blogger Udan Tashtari, at 7:30 AM  

  • जाने भी दो यारो.

    By Blogger dhurvirodhi, at 7:43 AM  

  • सच लिखा!

    By Blogger अनूप शुक्ला, at 9:20 AM  

  • इन धारावाहिको को एक पल भी बर्दास्त करना मुश्किल है. खिज होती है. अब तो इन पर लिखना भी अच्छा नहीं लगता. यह चलते कैसे है?

    By Anonymous संजय बेंगाणी, at 10:17 AM  

  • "बहुत हो गया अब और नहीं झेल सकता" बारबार इस तरह कहने वाले हमारे साथी सीरियल के वक्त फिर टीवी के आगे बैठ जाते हैं।

    यहाँ पर एकमात्र मैं एक ऐसा व्यक्ति हूँ जो इन बकवास धारावाहिकों को कतई नहीं देखता।

    By Blogger Shrish, at 3:52 PM  

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