हमारा रिलायंसी भविष्य
ये बाज़ार भी बड़ी अजीब चीज़ है, हर जगह हर काम में यह होता है। मानो बाज़ार न हुआ ब्रह्म हो गया – बाज़ारवास्यमिदं सर्वं नेह नानास्ति किंचन् – सब कुछ बाज़ार ही है और बाज़ार के अलावा कुछ नहीं है। हाल में रिलायन्स के खुदरा बाज़ार में क़दम रखने से हड़कम्प मच गया, ठेले वालों ने धरने-प्रदर्शन किए, अख़बार-के-अख़बार पट गए। तब हमें इन अख़बारों से पता चला कि खुदरा बाज़ार हज़ारों करोड़ रुपये का है, इसलिए रिलायंस और वालमार्ट जैसी कम्पनियाँ इसमें कूदना चाहती हैं।
यह सब पढ़कर बड़ी समस्या पैदा हो गई है। हम भविष्यदृष्टा टाइप लोग हैं, सो भविष्य को देख रहे हैं – कल को रिलायंस मोची के काम में भी सेंध लगा सकता है। पता चला कि जूते सीना और पॉलिश करना पचास हज़ार करोड़ रुपये का बाज़ार है। रिलायंस ने जूतों के लिए चमचमाते हुए आउटलेट खोल दिए हैं, जो हर गली के नुक्कड़ पर देखे जा सकते हैं। अब मोची विरोध-प्रदर्शन कर रहे हैं। लेकिन कम्पटीशन भी तगड़ा है। वालमार्ट और टाटा भी इस बाज़ार में अपनी हिस्सेदारी चाहते हैं। सो गली के इस कोने पर वालमार्ट का मोची-आउटलेट है, उस कोने पर रिलायंस का और बीच में टाटा का। जूते पॉलिश कराने के बाद कम्प्यूटराइज़ बिल दिया जाता है, जिसका पेमेंट क्रेडिट कार्ड से भी किया जा सकता है।
कम्पनियों की नज़र ताले-चाबी सही करने के पाँच हज़ार करोड़ के बाज़ार पर है। पहले ताले-चाबी वाले टेर लगाते हुए साइकिल पर गली-गली घूमा करते थे। अब उनकी जगह रिलायंस की एक पॉश वैन घूमती है। चाबी खोने पर लोग “tala” <अपना पता> 666 पर एसएमएस करके इस वैन को तुरंत अपने घर बुला सकते हैं। सही होने पर क्रेडिट कार्ड से पेमेण्ट कर सकते हैं। जो छः महीने में सबसे ज़्यादा ताले सही कराएगा, उसे एक रिलायंस इंडिया मोबाइल मुफ़्त में मिलेगा, वो भी लाइफ़ टाइम वाला। हाँ, एक नई दिक़्क़त ज़रूर खड़ी हो गई है। अब चोरों में भी इन ताला-तोड़ गाड़ियों की बहुत मांग है। सो इस बढ़ती डिमांड के लिए रात में चलने वाली ख़ास ताला-तोड़ वैन का इंतज़ाम किया गया है।
सिगरेट-गुटके का बाज़ार “हज़ार करोड़” में नहीं समाता है, यह “लाख करोड़” का है। लोग दिनों-दिन इनका कंसम्पशन बढ़ाते जा रहे हैं। हर चौराहे पर रिलायंस की एटीएम जैसी मशीनें लगी हुई हैं। लोगों के पास कार्ड हैं। कार्ड घुसेड़ा और गुटके-सिगरेट का ब्राण्ड चुना, मशीन से गड़गड़ की आवाज़ के साथ गुटका-सिगरेट बाहर। न... न... यह केवल अभिजात्य पूंजीवादी व्यवस्था नहीं है। ग़रीब और सर्वहारा के लिए भी है। यहाँ से रामआसरे बीड़ी, पान वगैरह भी ले सकता है। जाति-व्यवस्था तोड़ने के लिए ऐसा प्रयोग पहले सिख गुरुओं ने किया था लंगर के रूप में, जहाँ किसी भी जाति का आदमी खाना खा सकता था। और अब ऐसा प्रयोग किया है रिलायंस ने, जहाँ एक ही जगह से हर जाति का आदमी गुटका-सिगरेट पा सकता है।
ख़ैर, अब क्या-क्या बताएँ? रिलायंस का नाई, रिलायंस का धोबी, रिलायंस की महरी – ये भविष्य चमचमाता रिलायंसी है।
यह सब पढ़कर बड़ी समस्या पैदा हो गई है। हम भविष्यदृष्टा टाइप लोग हैं, सो भविष्य को देख रहे हैं – कल को रिलायंस मोची के काम में भी सेंध लगा सकता है। पता चला कि जूते सीना और पॉलिश करना पचास हज़ार करोड़ रुपये का बाज़ार है। रिलायंस ने जूतों के लिए चमचमाते हुए आउटलेट खोल दिए हैं, जो हर गली के नुक्कड़ पर देखे जा सकते हैं। अब मोची विरोध-प्रदर्शन कर रहे हैं। लेकिन कम्पटीशन भी तगड़ा है। वालमार्ट और टाटा भी इस बाज़ार में अपनी हिस्सेदारी चाहते हैं। सो गली के इस कोने पर वालमार्ट का मोची-आउटलेट है, उस कोने पर रिलायंस का और बीच में टाटा का। जूते पॉलिश कराने के बाद कम्प्यूटराइज़ बिल दिया जाता है, जिसका पेमेंट क्रेडिट कार्ड से भी किया जा सकता है।
कम्पनियों की नज़र ताले-चाबी सही करने के पाँच हज़ार करोड़ के बाज़ार पर है। पहले ताले-चाबी वाले टेर लगाते हुए साइकिल पर गली-गली घूमा करते थे। अब उनकी जगह रिलायंस की एक पॉश वैन घूमती है। चाबी खोने पर लोग “tala” <अपना पता> 666 पर एसएमएस करके इस वैन को तुरंत अपने घर बुला सकते हैं। सही होने पर क्रेडिट कार्ड से पेमेण्ट कर सकते हैं। जो छः महीने में सबसे ज़्यादा ताले सही कराएगा, उसे एक रिलायंस इंडिया मोबाइल मुफ़्त में मिलेगा, वो भी लाइफ़ टाइम वाला। हाँ, एक नई दिक़्क़त ज़रूर खड़ी हो गई है। अब चोरों में भी इन ताला-तोड़ गाड़ियों की बहुत मांग है। सो इस बढ़ती डिमांड के लिए रात में चलने वाली ख़ास ताला-तोड़ वैन का इंतज़ाम किया गया है।
सिगरेट-गुटके का बाज़ार “हज़ार करोड़” में नहीं समाता है, यह “लाख करोड़” का है। लोग दिनों-दिन इनका कंसम्पशन बढ़ाते जा रहे हैं। हर चौराहे पर रिलायंस की एटीएम जैसी मशीनें लगी हुई हैं। लोगों के पास कार्ड हैं। कार्ड घुसेड़ा और गुटके-सिगरेट का ब्राण्ड चुना, मशीन से गड़गड़ की आवाज़ के साथ गुटका-सिगरेट बाहर। न... न... यह केवल अभिजात्य पूंजीवादी व्यवस्था नहीं है। ग़रीब और सर्वहारा के लिए भी है। यहाँ से रामआसरे बीड़ी, पान वगैरह भी ले सकता है। जाति-व्यवस्था तोड़ने के लिए ऐसा प्रयोग पहले सिख गुरुओं ने किया था लंगर के रूप में, जहाँ किसी भी जाति का आदमी खाना खा सकता था। और अब ऐसा प्रयोग किया है रिलायंस ने, जहाँ एक ही जगह से हर जाति का आदमी गुटका-सिगरेट पा सकता है।
ख़ैर, अब क्या-क्या बताएँ? रिलायंस का नाई, रिलायंस का धोबी, रिलायंस की महरी – ये भविष्य चमचमाता रिलायंसी है।
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13 Comments:
भविष्य कल्पना मे मज़ेदार है।
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RC Mishra, at 9:32 PM
नयी सोच है। मजेदार!
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अनूप शुक्ला, at 11:00 PM
रिलांयस महादेश में कुछ लोगों का स्वागत है. बाकी कहीं और जगह तलाश लें.
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Sanjay Tiwari, at 12:13 AM
i totally forgot about "ek gadhe ki aatmakatha"...I also rememebred anotehr which is rusian but i read in hindi "papa jab bachche the".
thanks for old poem...
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tejas, at 1:58 AM
आज कल्पना है. कल इसमें से बहुत कुछ साकार होने जा रहा है. पर उसपर न विलाप की आवश्यकता है न प्रसन्न होने की. बाजार के प्रसार के बस दृष्टा बनिये!
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Gyandutt Pandey, at 7:31 AM
बढ़िया, कल ही एक कमेंट आया था-रिलांयस से फ्रेश पापा मिलेंगे और बिरला सन लाइफ वाले धांसू मम्मी देंगे, लाइफ टाइम गारंटी के साथ।
एयर डक्कन वाले अपना सस्ता माडल ह्यूमेन टेक्नालोजी में ला रहे हैं। वह प्रतीक पांडे की फोटू कापी तैयार कर देंगे। जिस वैबसाइट डिजाइन करने के ओरिजनल पांडेजी दस हजार लेते हैं, उनकी फोटूकापी वह वैबसाइट पांच हजार में बनाकर रख देगी। ओरिजनल प्रतीक पांडे लड़ते फिरेंगे अपनी फोटूकापी से। पब्लिक ओरिजनल को ही डांटेगी, क्योंजी सस्ते में काम क्यों नहीं करते
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ALOK PURANIK, at 10:14 AM
हार्दिक शुभकामना । इस डरावनी कल्पना में हकीकत का पुट है इसलिए विश्वसनीय भी है । इतने सारे तबकों के विस्थापित होने पर उनके आपसी तालमेल की उम्मीद भी बढ़ती है। बनारस में पहली बार परचून के दुकानदार ठेलों पर सब्जी बेचने वालों के कन्धों से कन्धा मिलाने की सोच रहे हैं ।
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अफ़लातून, at 11:06 AM
अच्छा लिखा प्रतिक.
लेकिन इस तरह के हमले अगर हों तो स्व बचाव करने के भी तरिके मौजुद रहते हैं. रिलायंस रिटेल में अपने पाँव पसार रहा है तो खुदरा व्यापारी अब एक हो रहे हैं. हिन्दुस्तान युनिलीवर ने एक नई परियोजना शुरू की है सुपर वेल्यु स्टोर की . यह कम्पनी छोटे छोटे किराणा व्यापारीयों की दुकानों को सुपर वेल्यु स्टोर में तब्दील करने मे मदद करेगी और उनकी दुकानें भी इन बडे रिटेल स्टोर का मुकाबला कर पाएंगी .वैसे भी यह बाजार इतना बडा है कि सबके लिए जगह बचेगी जरूर. बस थोडी अक्ल लगाने की जरूरत है.
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Pankaj Bengani, at 12:04 PM
thanks you Pratik, two things...one is that link to send you email is broken second I know only only software to rite in hindi, hindiwriter.org and it closes all the IE windows so I have to write in English mostly to ensure that my IE windows are not closed...antatah....aapne meii kavitaa par tippani nahii kii?
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tejas, at 5:57 AM
प्रतीक जी, यह कल्पना नहीं सच्चाई है। यू एस में ताले की चाबी बनवाने के लिए वॉलमार्ट ही जाना पडता है। और उसके लिए क्रेडिट कार्ड से ही भुगतान होता है।
- पुनीत
PunitPandey.com
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Punit Pandey, at 3:21 AM
great satire!
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purvabhatia, at 11:47 PM
वाह मान गयें।
काफी अच्छी और दूर की सोच है। :)
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mahashakti, at 8:50 AM
बहुत बढ़िया लिखा है .... मज़ा आ गया ।
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Neeraj, at 6:31 PM
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