एक अजीब ख़्याल
क्या हो अगर सूरज धरती के चारों ओर चक्कर लगाए, दो पिण्ड आपस में एक-दूसरे को आकर्षित करने की बजाय दूर धकेलें, प्रकाश की रफ़्तार कुछ ज़्यादा या कम हो जाए, परमाणु के नाभिक में इलेक्ट्रॉन भी शामिल हो वगैरह वगैरह? आपको भले ये सब ऊलजलूल कल्पना मालूम हो, लेकिन हाल में यह विचार मुझे आंइस्टीन द्वारा प्रतिपादित सापेक्षिकता के सिद्धांत (Theory of Relativity by Elbert Einstein) को पढ़ते वक़्त आया। हुआ ऐसा कि इसे पढ़ने के बाद ख़्याल आया कि सूरज के सापेक्ष पृथ्वी उसके चारों ओर घूमती है, वहीं पृथ्वी के सापेक्ष तो सूरज ही पृथ्वी के चारों ओर घूमता है।फिर यह विचार कौंधा कि गुरुत्वाकर्षण आदि विज्ञान के जितने भी नियम हैं, वो बार-बार घटित होने वाली घटनाओं पर ही आधारित हैं। यानी कि पेड़ से टूटकर सेब हर बार धरती पर ही गिरा – इसे हमने गुरुत्वाकर्षण का नियम बना दिया। इसके पीछे कोई तर्क, कोई लॉजिक नहीं है कि ऐसा होना-ही-होना है। विज्ञान इस बारे में कुछ नहीं कहता कि क्यों दो पिण्ड एक-दूसरे को खींचते हैं, क्यों असमान चार्ज आकर्षित होते हैं, क्यों प्रकाश की चाल उतनी ही है जितनी कि है। ऐसे में यह ज़रूरी नहीं है कि इतने बड़े ब्रह्माण्ड में हर जगह ऐसा ही होता हो। हो सकता है सुदूर ब्रह्माण्ड में कहीं पर प्रकाश धीमा चलता हो, हो सकता है कि वहाँ गुरुत्वाकर्षण की बजाय गुरुत्व-प्रतिकर्षण हो यानी पेड़ से टूटकर सेब ऊपर चला जाता हो, परमाणु के आख़िरी कोश में दस इलेक्ट्रॉन होते हों आदि आदि। तो वहाँ कुछ और ही विज्ञान होगा और कुछ और ही उसके नियम होंगे। आपको क्या लगता है? क्या ऐसा हो सकता है? साथ में मुझे कबीर का ऐसा ही विचित्र छन्द याद आता है जो विज्ञान के उलट बात करता है, न जाने क्या सोचकर कबीर ने लिखा होगा -
अम्बर बरसे धरती भीजे, ये जाने सब कोय।
धरती बरसे अम्बर भीजे, बूझे बिरला कोय॥
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10 Comments:
भाई प्रतीक, आपकी सोच से मैं सहमत हूं. हमने प्रकृति में होने वाली जो भी घटनाएं देखीं उनकी व्याख्या के लिये कुछ तरीके सोचे, और ऐसी सोच जो बहुत सी घटनाओं की समान रूप से बिना किसी विसंगति के व्याख्या बन सके, सो बन गई एक सिद्धान्त. पर बहुधा ऐसा भी हुआ कि बाद में एक ऐसी घटना का प्रेक्षण किया गया जिसने उस सिद्धान्त में विसंगति सिद्ध कर दी!
जिसे हम विज्ञान कहते हैं वास्तव में सीमित मानव बुद्धि के कयास हैं! अब आपने कही इलेक्ट्रान के कक्षा में घूमने की बात, तो वह भी एक कल्पना ही है जिसके आधार पर बहुत सी व्याख्याएं करना सरल व संभव हो पाता है.
कौन जाने सृष्टिकर्ता ने हमें किस खेल में उलझा रखा है!
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अमित, at 12:45 AM
कभी कभी मेरे दिल मे ख्याल आता है कि हम कुछ और बन्ध बनाने की कोशिश कर रहे होते हैं, जब बनने के बाद उसको समझना चाहते हैं कि क्या यही बना है ? और जब खुद को नही समझा पाते कि यही बना है, तो पता लगाने की कोशिश करते हैं कि वो नही, ये क्यो बन गया है। तब लगता है कि ये तो एक और अजीब ख्याल है :)।
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RC Mishra, at 1:39 AM
डीयर प्रतीक एक अजीब सा ख्याल मुझे यह आ रहा है कि बेकार की चीजें पढ़कर तुम्हारी तबीयत खऱाब हो रही है। और अजीब से ख्याल आ रहे हैं। सिर्फ मेरे लेख पढ़ा करो। मस्ती के ख्याल आयेंगे।
आलोक पुराणिक
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ALOK PURANIK, at 5:48 AM
इसे भी अजीब ही मानना कि आलोक पुराणिक जी ने समीर लाल के लेखन के बदले इसी तरह की उलझन में उलझे अपना नाम ले दिया. बाद में उन्होंने अपनी गल्ती का एहसास कर पाश्च्याताप के दस्तुरानुसार दो दिन का मौन रखा है, इसलिये स्पष्टिकरण नहीं दे पा रहे हैं, वैसे उन्हें खेद है. आप तो सब समझते हैं इस तरह की अजीब बातों को. :) :)
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Udan Tashtari, at 7:03 AM
ये पुराणिक जी के बहकावे में मत आना बिटवा.. ऐसेने गूढ़ गूढ़ मसलो पर चिन्तियाते रहो.. हम बड़े परसन्न रहते हैं आजकल तुम्हारे चिट्ठे पर जो कुछ तुम लिख रहे हो पढ़ कर.. बहुत आसीरबाद लिये रहो हमार..
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अभय तिवारी, at 7:04 AM
सापेक्षता के हिसाब से तो आपकी बात सही है, ख्याल मजेदार है।
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Shrish, at 9:01 AM
सही मुद्दा उठाए हो प्रतिक . सही बात है. आज हम जिन मान्यताओ को मानते हैं. भविष्य मे वो बुमरेंग साबित हो सकती है. :)
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Pankaj Bengani, at 9:53 AM
यही उम्र है ऐसा सोचने की, सोचना बन्द न करें.
हम भी सोचा करते की अनंत ब्रह्माण्ड का अंत कहाँ होता होगा, जहाँ अंत होता होगा उसके बाहर क्या होगा? आखिर इतनी विशाल जगह जिसमें ब्रह्माण्ड समाया है आयी कहाँ से, बनी कैसे?
ब्रह्माण्ड इतना विशाल है की हमारी कल्पनाओं की हर वस्तुएं यहाँ मिल जाएगे. हमारी कल्पना सिमित है, ब्रह्माण्ड नहीं.
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संजय बेंगाणी, at 10:05 AM
आज जो सिद्धांत हैं वे भविष्य में बदल सकते हैं। सेब के गिरने पर न्यूटन ने सोचा। अब आप सोच रहे हैं, जारी रखिते कुछ न कुछ निष्कर्ष अवश्य निकलेगा।
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अतुल शर्मा, at 11:52 AM
अब वैज्ञानिकों का मानना है कि यह धरती, यह सूर्य/तारे, यह आकाशगंगा, सब "matter" की बनी है, हम भी। तो इसी प्रकार इस अनंत ब्रह्मांड में कहीं न कहीं "anti matter" भी होगा जिसका मेल यदि "matter" से हो जाए तो दोनों एक दूसरे को नष्ट कर देंगे। तो हो सकता है कि वहीं उस "anti matter" की दुनिया में यहाँ "matter" वाली दुनिया के विपरीत नियम हों, आग ठंडी हो, विपरीत चार्ज आकर्षित न होते हों। :)
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Amit, at 6:01 PM
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