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Monday, August 13, 2007

दो ग़रीब चिट्ठाकारों की भेंटवार्ता

मीट करने के इस बेहतरीन मौसम में, जबकि हर किसी के मीट करने का मीटर बढ़ता जा रहा है, हमारा ज़ीरो पर अटका हुआ था। सो मुरैना के ब्लॉगर श्री भुवनेश शर्मा से कल मुलाक़ात करने का मौक़ा हाथ लगा, तो उसे हमने झट से दबोच लिया। तो टेलीफ़ून पर भुवनेश भाई से पहले ही मीटियाने का वक़्त मुकर्रर किया और उन्हें आगरा में अपने ग़रीबख़ाने पर आमंत्रित कर लिया। हमें पूरी उम्मीद थी कि भुवनेश भाई डिजिटल कैमरा लेकर मीटियाने आएंगे, ताकि बाद में भेंटवार्ता का ज़ोरदार सचित्र विवरण अपने ब्लॉग पर चिपकाया जा सके। लेकिन वे भी हमारी तरह निकले, यानी कि ग़रीब टाइप। अब आप पूछेंगे कि ग़रीब कैसे? हम दोनों के पास तो कम्प्यूटर वगैरह है। लेकिन चिट्ठाकारों की जमात में जिसके पास डिजिटल कैमरा नहीं, हमारे हिसाब से वह ग़रीब है। जिस तरह कार वालों की जमात में मारुति ८०० वाला ग़रीब समझा जाता है। वैसे भी जब तक भेंटवार्ता के विवरण के साथ बढ़िया-सा फ़ोटू न चमचमाए, तब तक भेंटवार्ता करने का न कोई फ़ायदा है और न ही कोई सबूत।

ख़ैर, दोनों ग़रीब ब्लॉगर्स ने निहायत ही दुःखी मन से बातचीत शुरू की। जैसा कि होना लाज़मी था, हिन्दी ब्लॉग जगत के मुख़्तलिफ़ पहलुओं पर हम दोनों काफ़ी देर तक बतियाते रहे। बहुतेरे ब्लॉगर्स का भी ज़िक्र आता-जाता रहा, लेकिन दुर्भाग्यवश निन्दा-सुख से हमें पूरी तरह वंचित रहना पड़ा। ज़रूरत से ज़्यादा भले टाइप के लोगों से बातचीत करने का यही नुक़सान है। बात आगे बढ़ती रही और साथ में खाने-पीने का काम भी चलता रहा। न... न... “पीने” से कुछ और मतलब मत निकालिए, महज़ तुक के लिए जोड़ दिया है। काफ़ी देत यूँ ही चर्चा चलती रही, फिर उसका रुख़ बदलकर देश-समाज वगैरह-वगैरह की समस्याओं की तरफ़ चला गया। इस तरह की बात करके लगता है कि अपन की अक़ल में भी बुद्धि है... तो अपन ने अपनी अक़ल का पूरा इस्तेमाल करते हुए बातचीत का कंवर्सेशन जारी रखा।

लेकिन जैसे ही दुनिया की सारी समस्याएँ सुलझने की कगार पर पहुँच गई थीं, तभी भुवनेश भाई को याद आया कि उनकी ट्रेन का वक़्त भी होने वाल है। निकलना ज़रूरी था, इसलिए उन समस्याओं को अधसुलझा छोड़कर उन्हें लेकर मैं रेलवे स्टेशन की ओर चल दिया। कमाल की बात यह कि टिकिट-विकिट भी जल्दी मिल गई और कमाल-पर-कमाल यह कि सात मिनट बाद ट्रेन भी बिल्कुल ठीक समय पर आ गई। भारतीय रेल के इस कारनामे से हम दोनों को शॉक तो काफ़ी लगा, लेकिन किसी तरह अपने को सम्हालते हुए मैंने भुवनेश भाई को विदा किया। और इस तरह दो ग़रीब चिट्ठाकारों की भेंटवार्ता बिना फ़ोटू लिए ही “इति सम्पन्नम्” हो गई।

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16 Comments:

  • "और कमाल-पर-कमाल यह कि सात मिनट बाद ट्रेन भी बिल्कुल ठीक समय पर आ गई। "

    कौन सी गाड़ी थी? जरा नम्बर बतायें. इसकी टाइमटेबलिंग ठीक करनी पड़ेगी. लगता है बहुत स्लैक है इसके रनिंग टाइम में :)

    By Blogger Gyandutt Pandey, at 10:56 AM  

  • प्रतीक पहले तो बधाई स्वीकारें ब्लौगर मीट की। फोटो नही है तो क्या हुआ थोडा और विस्तार से विवरण देते तो और अच्छा लगता।

    By Blogger mamta, at 12:41 PM  

  • प्रतीक भाई हम भी आपके अपने आगरा से हैं हमसे तो आप कभी नहीं मिले जबकि हम आपके बारे में पंकज विशेष जी से काफ़ी कुछ सुनते आये हैं
    आपका अपना ब्लॉगर साथी
    कमलेश मदान
    09358263850
    http://sunobhai.blogspot.com

    By Blogger kamlesh madaan, at 1:33 PM  

  • फोटो नही का बहाना तो चलेगा..पर इतनी कंजूसी से लिखोगे तो कैसे चलेगा???

    By Anonymous नितिन बागला, at 3:57 PM  

  • kya kar rahe ho ?? ye test mail hai, hindi mein likhne ki koshish kar rahe hain .

    By Anonymous Anonymous, at 3:57 PM  

  • मोबाईल में भी तो कैमरा आ रहा है भाई. इतने गरीब आप हो नहीं जितना आप समझते हो अपने आपको .
    आपका
    बसंत आर्य

    By Anonymous Basant Arya, at 4:21 PM  

  • भैया फोटू वोटू से ज्यादा खास बात है मीट वो तो आपने कर ली ना!! बस फ़िर मायने मिलना रखता है !! बधाई

    By Blogger Sanjeet Tripathi, at 4:36 PM  

  • हमारी तरफ से भी बधाई स्वीकार करें।

    और हाँ हमें भी उसी गरीब बिरादरी का समझें जिसके पास कैमरा और मोबाईल नहीं है।:)

    By Blogger Sagar Chand Nahar, at 5:13 PM  

  • ठीक है प्रतीक आपको 'दूसरा मौका' दिया जाएगा...प्रतीक्षा करो :)

    By Blogger masijeevi, at 5:22 PM  

  • भाई बहुत बढिया रपट लिखी..

    By Blogger अभय तिवारी, at 7:35 PM  

  • अच्‍छा लगा,

    बसंत भाई की बात सही है। जो आप दिखते हो वो हो नही, बिल्‍कुल लालू प्रसाद यादव की तरह।

    देर से टिप्‍पणी के लिये खेद है।

    By Blogger mahashakti, at 8:20 PM  

  • बढिया तो है. फोटो शॉप में ही दोनों गले भेट कर चित्र पेश कर देते वैसे तो बढ़िया रिपोर्ट है.

    By Blogger Udan Tashtari, at 8:32 PM  

  • बधाई हो,
    यहाँ तो हम ४-५ से मिल चुके हैं, पर सब के सब इतने व्यस्त हैं कि लिखने का मौका ही नही किसी के पास।

    By Blogger RC Mishra, at 1:01 PM  

  • शुक्रिया इस रपट के लिए। पर आपने क्या बात हुई , इसके बारे में ज्यादा नहीं लिखा ।

    By Blogger Manish, at 9:48 PM  

  • "लेकिन जैसे ही दुनिया की सारी समस्याएँ सुलझने की कगार पर पहुँच गई थीं, तभी भुवनेश भाई को याद आया कि उनकी ट्रेन का वक़्त भी होने वाल है। "

    क्या गजब कर दिया यार, अगली ट्रेन से चले जाते भुवनेश भाई, दुनिया की सब समस्याएँ तो सुलझ जाती।

    वैसे आप इत्मीनान रखें, आप अकेले नहीं, हम गरीब ही नहीं बल्कि महागरीब हैं, न कैमरा है न मोबाइल। अगर कभी हम आपसे मिले तो गरीब ब्लॉगर मीट ही होगी। :)

    बाकी ट्रेन कहीं पिछले दिन के टाइम वाली तो लेट नहीं थी?

    By Blogger Shrish, at 6:45 PM  

  • what to do... most of the bloggers who write hindi blog r poor :P

    By Anonymous Anonymous, at 2:58 PM  

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