“दस दिनों में बनें परफ़ेक्ट दंगाई”

अभी कुछ दिनों पहले आगरा में दंगा-फ़साद हुआ। सम्वाददाता ने पूरे दंगे को ग़ौर से देखा और अब आपके सामने पेश है दंगे का आँखों देखा हाल –
इस दंगे में हमेशा की तरह कुछ लोग मारे भी गए। मारे गए लोग काफ़ी नौसीखिए थे और उन्हें दंगों का कोई ख़ास अनुभव नहीं था; तभी दंगे की इस पावन वेला में, जो हर कुछ सालों में एक बार आती है, औरों को टपकाने की बजाय ख़ुद ही टपक गए। हिन्दुस्तान में इत्ते दंगे होते हैं कि कई लोगों ने तो अब इसे अपना फ़ुल-टाइम धन्धा ही बना लिया है। गली-मुहल्ले में दंगे करने के क्रैश कोर्स चलने लगे हैं, जगह-जगह बोर्ड लगे हैं – “एक सप्ताह में दंगा करना सीखें”, “दस दिनों में बनें परफ़ेक्ट दंगाई”, “क्या आपके दोस्त पक्के दंगाई हैं और आप आगज़नी, पथराव, नारेबाज़ी में हिचकिचाते हैं। डरिए मत... अब आ गया है ‘दस दिनों में बनें दंगाई’ क्रैश कोर्स” वगैरह वगैरह। मैंने, यानी संवाददाता ने एक इंस्टीट्यूट के मालिक का इंटरव्यू भी किया। पूछा कि आपका लक्ष्य क्या है? वह बोला – “हम घर-घर दंगाई तैयार करना चाहते हैं... छोटा दंगाई, मोटा दंगाई, बूढ़ा दंगाई, बच्चा दंगाई... सपना फ़सादी भारत का।”“लगे रहो मुन्ना भाई” ने हिन्दुस्तानी मानस पर कितना गहरा प्रभाव डाला है, यह दंगों के दौरान पता लगा। जितने भी दंगाई मिले, सब-के-सब गांधीवादी। गांधीजी की तरह हर चीज़, हर मौक़े का पूरा इस्तेमाल करने में यक़ीन रखते हैं। जैसे गांधीजी आए हुए शोक-पत्र को भी फाड़ कर नहीं फेंकते थे, दूसरी कोरी तरफ़ ख़त लिखकर पोस्टकार्ड की तरह उसका प्रयोग करते थे... यह आदर्श हम लोगों के दिलो-दिमाग़ में समा गया है। इसलिए लोगों ने ट्रकों, बसों, कारों, दुकानों, कारख़ानों और गोदामों में आग लगा दी और शब-ए-बारात की रात को लगे हाथ दीवाली मनाने का सुख भी लूट लिया। इसे कहते हैं एक तीर से दो शिकार।
इस गड़बड़झाले में सम्वाददाता ने सोचा कि अल्लाह की ख़बर रखने का प्रेरोगेटिव केवल शुएब भाई को तो है नहीं, सो उसने भी इस मामले में अल्लाह की राय जाननी चाही और उसका साक्षात्कार लिया। पूछा, आपकी क्या राय है? अल्लाह ने जवाब दिया, “शब-ए-बारात की रात को, जब मैं सातवें आसमान से उतरकर पहले आसमान पर आया, तो कम दूरी से देखने पर बिल्कुल साफ़-साफ़ दिखाई दिया कि मेरे ये सो-कॉल्ड बन्दे कितने बेवकूफ़ हैं। इन लोगों की वजह से कई लोगों ने भी मुझपर आरोप लगाया कि मैं नीचे उतरकर आया, इसी वजह से यह सारा फ़साद हुआ। आइ एम वेरी सेड।” अल्लाह को ज़्यादा सेंटी होते देख सम्वाददाता सहानुभूति जताकर निकल लिया।
ख़ैर, जैसा कि पड़ोसन में बिन्दु के पिताजी ने कहा है – “जब-जब जो-जो होना है, तब-तब सो-सो होता है।” तो जो होना था, सो हो गया। लेकिन रिपोर्टर ने निष्कर्ष निकाल लिया है कि ग़लती किसकी है। दंगाई तो बेचारे भोले-भाले लोग हैं, वो तो ये सब करने के लिए मजबूर थे। उन्हें क्या दोष देना! साथ ही प्रशासन की भी कोई ग़लती नहीं है। जो गड़बड़ होने से पहले काम शुरू करे, वह प्रशासन कैसा? प्रशासन का काम ही होता है दंगे के बाद उसे काबू करने की कोशिश करना। भले ख़ुदा खुद को कितना ही निर्दोष बताए, दरअसल सारी-की-सारी ग़लती उसी की है। क्या ज़रूरत है सातवें आसमान नीचे उतरकर आने की? अल्लाह के बाद बाक़ी ज़िम्मेदारी है ट्रकों की, बसों की, कारों की, दुकानों की, पर्यटक वाहनों की और कारख़ानों की; ये चीज़ें थी तभी दंगाई बेचारे आगज़नी को मजबूर हुए।
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14 Comments:
बड़े मजबूर हो गये हैं बेचारे!!
जल्दी ज्वाईन करो क्रेश कोर्स..कहीं पिछड़ ही न जायें.
हा हा!!
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Udan Tashtari, at 8:26 PM
क्या बढ़िया लिखा है. अगड़म बगड़म आलोक जी तो मारे ईर्ष्या के लाल हो जाने चाहियें!
यह लेखन बतौर रेगुलरहा करो तो मजा आ जाये!
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Gyandutt Pandey, at 9:36 PM
व्यंग विधा में काफी अच्छा विश्लेषण !!
-- शास्त्री जे सी फिलिप
आज का विचार: जिस देश में नायको के लिये उपयुक्त आदर खलनायकों को दिया जाता है,
अंत में उस देश का राज एवं नियंत्रण भी खलनायक ही करेंगे !!
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Shastri JC Philip, at 10:08 PM
Shastri ji,
vo to kar hi rahe hain.
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Anonymous, at 10:35 PM
बहुत बढिया व्यन्ग कसा आपने, पढकर अच्छा लगा । आप अपने लिखने की फ़्रीक्वेंसी और बढायें तो मजा आयेगा ।
शुभकामनाओं सहित,
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Neeraj Rohilla, at 11:32 PM
सही है जी जल्दी शुरु करो.चुनाव आ रहे है अच्छी कमाई होगी..बडी पारटियो से बात करो जी..:)
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अरुण, at 9:14 AM
ये हुई न बात, अब आपकी गाड़ी फ़ार्म में आई. लगता है फ़ुरसतियाजी और आलोकजी की छुट्टी होने वाली है :)
मदर टेरेसा और जेबीएस वाली पोस्ट कमाल लगीं.
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BHUVNESH SHARMA, at 12:24 PM
I could not stop posting this comment. Very well written
I don't have Hindi Font. So pls forgive me to write in English.
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Rohit, at 4:28 PM
बहुत ख़ूब.
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इष्ट देव सांकृत्यायन, at 8:37 AM
apka vichar sahi hai. udan tashtari ji bhi ekdum sahi kah rahe hain ki jaldi karo varna late ho jayenge. vaise ye gambhirta se sochna aur koi kadam uthana hoga.
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Anil, at 8:16 PM
देखिये आप उस संवाददाता को फ़िर से ढूढिये और उसे बतलाइये कि स्थानीय दंगों और उनके सस्ते कामचलाऊ दंगई इंस्टिट्यूटॊं की कवरेज से क्या होगा यदि कैरियर बनाना हो तो एड़्वांस डिप्लोमा और हाईटैर्क दंगाईयों के इंटरव्यू कवर करने का साहस जागाए !
चलिए मसाला आपका , घी पाठकों का, ब्लागधारक के लिए अगली पोस्ट का मतला तैयार. यानी मुन्नाभाई सीरीज़ की तरह ब्लागियत में ..."सर्टिफ़ाईड़ रिकोग्नाईज़ दंगाई .."
आपकी नेक्स्ट पोस्ट प्लीज़.
-रेणू
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renu ahuja, at 9:00 PM
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