राज ठाकरे और राजनीति का विकास
- एक -
पहले राजनेता नहीं थे। शुरूआती होमोसेपियंस ने दुनिया में जहाँ चाहा, वहाँ अपना तम्बू गाड़ा और वहीं रहने लगे।
फिर धीरे-धीरे शुरुआती राजनेता आए और देश बने। एक देश से दूसरे देश में जाना दूभर हो गया। किसी गढ़रिए ने बॉर्डर क्रॉस किया तो पुलिस पकड़ने लगी।
फिर आए राज ठाकरे टाइप लोग... एक राज्य से दूसरे राज्य में आना-जाना मुश्किल हो गया। गए तो ठोंक-बजा दिए गए।
अब लगता है कुछ दिनों में शहरों की दिक़्क़त आएगी... आगरा से मथुरा गए तो पिटाई हो जाएगी।
फिर राजनीति और आगे बढ़ेगी... प्रांतवाद के बाद मुहल्लावाद भी आएगा। ये सोचकर कॉलेज के मेरे नॉट-सो-गुड-फ़्रेण्ड्स बहुत ख़ुश हैं। अगर मैं छिपीटोले गया, तो मेरा घण्टा बजाने का मौक़ा मिलेगा। मैं भी ख़ुश हूँ... मुझे भी मौक़ा मिलेगा।
इसके बाद गलीवाद भी आएगा... सामने वाली गली में गए ग़लती से तो भरपूर प्रसाद देकर वापस भेजा जाएगा।
फिर शायद राजनीति और विकसित होगी... चूँकि पड़ोसी मनसे का कार्यकर्ता होगा, तो उसके आंगन में गेंद उठाने जाना ख़तरे से खाली नहीं होगा।
आपको भले ये ख़याली पुलाव लगे, लेकिन मुझे राजनीति और राजनेताओं पर पूरा भरोसा है... भविष्य में घर के एक कमरे से दूसरे कमरे में जाना भी ख़ामख़्वाह का ख़तरा मोल लेना होगा।
इसके आगे समझ नहीं आ रहा कि राजनीति कैसे विकसित होगी... आप भी सोचिए और बतलाइए।
- दो -
राज ठाकरे का मराठियों को भूमिपुत्र कहना ग़लत है। भूमिपुत्र तो यूपी-बिहार वाले भी हुए परिभाषा के हिसाब से, इर्रेस्पेक्टिव ऑफ़ कोई कहीं भी रहे। मेरे ख़्याल से राज्य-पुत्र सरीखा कुछ होना चाहिए।
फिर राजनीति के विकास के साथ –
शहर/क़स्बा/गांव पुत्र
मोहल्ला-पुत्र
गली-पुत्र
मकान-पुत्र
कमरा-पुत्र
आगे आप सोचिए।
पहले राजनेता नहीं थे। शुरूआती होमोसेपियंस ने दुनिया में जहाँ चाहा, वहाँ अपना तम्बू गाड़ा और वहीं रहने लगे।
फिर धीरे-धीरे शुरुआती राजनेता आए और देश बने। एक देश से दूसरे देश में जाना दूभर हो गया। किसी गढ़रिए ने बॉर्डर क्रॉस किया तो पुलिस पकड़ने लगी।
फिर आए राज ठाकरे टाइप लोग... एक राज्य से दूसरे राज्य में आना-जाना मुश्किल हो गया। गए तो ठोंक-बजा दिए गए।
अब लगता है कुछ दिनों में शहरों की दिक़्क़त आएगी... आगरा से मथुरा गए तो पिटाई हो जाएगी।
फिर राजनीति और आगे बढ़ेगी... प्रांतवाद के बाद मुहल्लावाद भी आएगा। ये सोचकर कॉलेज के मेरे नॉट-सो-गुड-फ़्रेण्ड्स बहुत ख़ुश हैं। अगर मैं छिपीटोले गया, तो मेरा घण्टा बजाने का मौक़ा मिलेगा। मैं भी ख़ुश हूँ... मुझे भी मौक़ा मिलेगा।
इसके बाद गलीवाद भी आएगा... सामने वाली गली में गए ग़लती से तो भरपूर प्रसाद देकर वापस भेजा जाएगा।
फिर शायद राजनीति और विकसित होगी... चूँकि पड़ोसी मनसे का कार्यकर्ता होगा, तो उसके आंगन में गेंद उठाने जाना ख़तरे से खाली नहीं होगा।
आपको भले ये ख़याली पुलाव लगे, लेकिन मुझे राजनीति और राजनेताओं पर पूरा भरोसा है... भविष्य में घर के एक कमरे से दूसरे कमरे में जाना भी ख़ामख़्वाह का ख़तरा मोल लेना होगा।
इसके आगे समझ नहीं आ रहा कि राजनीति कैसे विकसित होगी... आप भी सोचिए और बतलाइए।
- दो -
राज ठाकरे का मराठियों को भूमिपुत्र कहना ग़लत है। भूमिपुत्र तो यूपी-बिहार वाले भी हुए परिभाषा के हिसाब से, इर्रेस्पेक्टिव ऑफ़ कोई कहीं भी रहे। मेरे ख़्याल से राज्य-पुत्र सरीखा कुछ होना चाहिए।
फिर राजनीति के विकास के साथ –
शहर/क़स्बा/गांव पुत्र
मोहल्ला-पुत्र
गली-पुत्र
मकान-पुत्र
कमरा-पुत्र
आगे आप सोचिए।



8 Comments:
भइया, हमें अपने ट्रेन के बुकिंग काउण्टर के बगल में ढ़ेरों पासपोर्ट दफ्तर खोलने पड़ेंगे - राज ठाकरे का पासपोर्ट दफ्तर (बाकी भी ढ़ेरों नाम आप जोड़ लें)! और पहले आप पासपोर्ट पर ठप्पा लगवायें फिर टिकट मिलेगा! :-)
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Gyandutt Pandey, at 6:17 AM
ये बात तो आनी ही थी.. बहुत सही..
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अभय तिवारी, at 8:52 AM
वेरी इंटरेस्टिंग. वेरी वेरी भूमिपुत्र एंड गॉड नोज़ व्हाट नॉट इंटरेस्टिंग.
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Pramod Singh, at 10:41 AM
ये खेल खत्म कब होगा?
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vimal verma, at 10:50 AM
सटीक नज़र डाली है!!
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Sanjeet Tripathi, at 3:22 PM
Logon ko pahale ye baat sochni chahiye ki Raj Thakare ko ye baat aakhir kyo karni padi. Ye baat to sach hai ki koi bhi bharat ka nagrik desh me kisi bhi jagah aa-ja sakta hai.
Lekin agar wo apna ghar, gav chodkar dusare rajya me jakar waha hi apana dera jamne lage to ye galat hai.
Agar hamre ghar apne koi ristedar aaye to hume kuch dino tak achha lagega. Par agar wo baad me khud yaha hi rahane ki soche aur upar se apane aur 100 rishtedaro ko saath me leke aaye to kya hum in subko apne ghar me kayam vatyvya ke liye sama sakate hai? kabhi nahi ! Kyonki apne ghar ki utni capacity hi nahi hai? To phir bhai Raj Thakare ne kya galat kaha?
Aur ye sab aag media ki lagai hui hai. Hume ye jaan lena chahiye aur is mamle ko jyada tul nahi deni chahiye.
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Rupesh Sawant, at 9:59 AM
आपने जो कहा है उससे मैं पूरी तरह से सहमत हूँ.......पूंजीवादी लोकतंत्र मे इन्सान समान और स्वतन्त्र नहीं रह सकता.आप अपना ब्लोग जिस वैज्ञानिक दृष्टी से लिक रहे है उससे हमें प्रेरणा मिलती है....चंद्रपाल मुम्बई
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chandrapal, at 2:02 PM
"Bhaiya .. hame bambai jaana hai"
"kyo bhai"
"yaha pe to hamare rajnetaaone hame booka aur nanga aur bheekhmanga bana ke rakha hai ... suna hai marathi logo ne kafi vikas kiya hai maharashtra me .. chalo waha pe jaake malai khaye thodi ... "
"waise to gujraat, tamilnadu bhi to vikasit hai"
"are bhaiyaa ... lekin bambai me to apani lobby hai .. kafi factories lagi hai jisame apane chacha-mama bharti hai .. ye ishtihar dekho .. workers chahiye saste me .. aur hamare raajneta bhi waha pe aake bhasad machate hai ... to hame waha pe koi darr nahi .. aur tamil, gujrat me jaaye to bhasha seekhani padegi ... marathi log to waise seedhe hote hai ... hindi bol lete hai"
"ha .. chalo chalo .. bambai chalo ... apana state to narak banaya hamne ... ab maharashtra ko bhi banate hai"
Guys ... we are good people .. just we cannot tolerate outsiders .. let them be Britishers, Mughals ... You guys be like us and your state will be developed. There is only one difference between you and us .. We love our state and want to live here ... and you don't .. neither you want to stay in UP/Bihar.
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koustubh kulkarni, at 1:08 PM
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