Are you one of those people, who want to write in Hindi but the right words don’t strike you any more??? And English words come rushing to your mind instead. In that case, you need the help of a good online dictionary which will enable you to write efficiently in your mother tongue again. Here’s a list of some good free online English Hindi dictionaries. Have a look:
Some of these dictionaries can translate the words both ways i.e. English to Hindi and Hindi to English. If you are fond of using any specific online dictionary yourself, please don’t hesitate to mention that in comment section.
You want to keep yourself updated with what is happening in India through Hindi news channels, but you don’t know where you can get to see them online. I’ve found some free online resources for those who are fond of Hindi samachar. Here are some of the good Hindi news channels streaming online on the internet: IBN 7 Aaj Tak CNBC Awaz Star News DD News
ऑनलाइन हिन्दी समाचार क्या आप हिन्दी ख़बरिया चैनलों के ज़रिए देश के हालात पर नज़र रखना चाहते हैं, लेकिन यह नहीं जानते कि आप इन चैनलों को ऑनलाइन कहाँ देख सकते हैं? मुझे कुछ मुफ़्त ऑनलाइन स्रोत मिले हैं, जहाँ आप हिन्दी ख़बरों का लुत्फ़ ले सकते हैं। ये रही इंटरनेट पर स्ट्रीम हो रही कुछ हिन्दी न्यूज चैनलों की सूची : आईबीएन 7 आजतक सीएनबीसी आवाज़ स्टार न्यूज़ डीडी न्यूज़
पहले राजनेता नहीं थे। शुरूआती होमोसेपियंस ने दुनिया में जहाँ चाहा, वहाँ अपना तम्बू गाड़ा और वहीं रहने लगे। फिर धीरे-धीरे शुरुआती राजनेता आए और देश बने। एक देश से दूसरे देश में जाना दूभर हो गया। किसी गढ़रिए ने बॉर्डर क्रॉस किया तो पुलिस पकड़ने लगी। फिर आए राज ठाकरे टाइप लोग... एक राज्य से दूसरे राज्य में आना-जाना मुश्किल हो गया। गए तो ठोंक-बजा दिए गए। अब लगता है कुछ दिनों में शहरों की दिक़्क़त आएगी... आगरा से मथुरा गए तो पिटाई हो जाएगी। फिर राजनीति और आगे बढ़ेगी... प्रांतवाद के बाद मुहल्लावाद भी आएगा। ये सोचकर कॉलेज के मेरे नॉट-सो-गुड-फ़्रेण्ड्स बहुत ख़ुश हैं। अगर मैं छिपीटोले गया, तो मेरा घण्टा बजाने का मौक़ा मिलेगा। मैं भी ख़ुश हूँ... मुझे भी मौक़ा मिलेगा। इसके बाद गलीवाद भी आएगा... सामने वाली गली में गए ग़लती से तो भरपूर प्रसाद देकर वापस भेजा जाएगा। फिर शायद राजनीति और विकसित होगी... चूँकि पड़ोसी मनसे का कार्यकर्ता होगा, तो उसके आंगन में गेंद उठाने जाना ख़तरे से खाली नहीं होगा। आपको भले ये ख़याली पुलाव लगे, लेकिन मुझे राजनीति और राजनेताओं पर पूरा भरोसा है... भविष्य में घर के एक कमरे से दूसरे कमरे में जाना भी ख़ामख़्वाह का ख़तरा मोल लेना होगा। इसके आगे समझ नहीं आ रहा कि राजनीति कैसे विकसित होगी... आप भी सोचिए और बतलाइए।
- दो -
राज ठाकरे का मराठियों को भूमिपुत्र कहना ग़लत है। भूमिपुत्र तो यूपी-बिहार वाले भी हुए परिभाषा के हिसाब से, इर्रेस्पेक्टिव ऑफ़ कोई कहीं भी रहे। मेरे ख़्याल से राज्य-पुत्र सरीखा कुछ होना चाहिए। फिर राजनीति के विकास के साथ – शहर/क़स्बा/गांव पुत्र मोहल्ला-पुत्र गली-पुत्र मकान-पुत्र कमरा-पुत्र आगे आप सोचिए।
Nowadays we see that Bollywood songs have more emphasis on music and that’s why many a times even beautiful quality lyrics get lost in clamor music. Also clear understanding of the words written by lyricists like Gulzar and Javed Akhtar is essential. And without which one cannot appreciate real soul of the song. So here are few online free resources I found quite good to find lyrics of various Hindi songs:
आजकल देखने में आ रहा है कि बॉलीवुड गीतों में बोल की बजाय संगीत पर ज़्यादा ज़ोर रहता है। यही वजह है कि कई बार गाने के बेहतरीन बोल भी तेज़ संगीत में दबकर रह जाते हैं। साथ ही गुलज़ार और जावेद अख़्तर जैसे उम्दा गीतकारों के लिखे बोलों को पूरी तरह समझे बिना गीत की गहराई में नहीं उतरा जा सकता है। ये कुछ मुफ़्त ऑनलाइन स्रोत हैं, जहाँ आप हिन्दी गानों के बोल पढ़ सकते हैं:
Friends! Here’s good news for all of desi TV lovers. I’ve been to US and can understand that American TV shows are very draggy for those who have Indian taste for entertainment. But now you can enjoy most of Hindi television channels like star plus, star one, sony, zee etc. online. Even you can get to watch almost all the Hindi news channels like aaj tak, star news, zee news, india tv and NDTV etc. too. This is the list of absolutely free resources for you:
दोस्तो! मेरे पास हिन्दी टीवी प्रेमियों के लिए एक ख़ास ख़बर है। मैं अमेरिका जा चुका हूँ और जानता हूँ कि अमरीकी टीवी कार्यक्रम हम हिन्दुस्तानियों के हिसाब से कितने उबाऊ होते हैं। लेकिन अब आप ज़्यादातर हिन्दी टीवी चैनल जैसे कि स्टार प्लस, स्टार वन, सोनी और ज़ी टीवी वगैरह का लुत्फ़ इंटरनेट पर उठा सकते हैं। यहाँ तक कि आप आजतक, स्टार न्यूज़, ज़ी न्यूज़, इंडिया टीवी और एनडीटीवी जैसे अधिकांश हिन्दी ख़बरिया चैनल भी ऑनलाइन देख सकते हैं। तो फिर देर किस बात की, तुरंत देखिए:
Do you want to wish your near & dear one on his/her birthday in true bollywood style. Then here’s the song sung by legendry Mohammad Rafi in 1967 blockbuster Farz that you can play now:
To read the lyric of this popular Hindi birthday song, visit this webpage.
क्या आप अपने किसी प्रिय को ख़ालिस बॉलीवुड शैली में जन्मदिन की मुबारकबाद देना चाहते हैं। तो फिर ऊपर दिया हुआ गाने का वीडियो प्ले करें। इस मशहूर हिन्दी जन्मदिन गाने के बोल पढ़ने के लिए यह वेब-पन्ना देखिए।
Year 2007 proved to be a great experience for viewers. Now let's have a look at upcoming movies of 2008. Ashutosh Govarikar's "Jodha Akbar" is on the top in this list. Hritik Roshan and Aishwarya Rai starer "Jodha Akbar" is being awaited by movie bucks impatiently for quite a long time.
Ajay Devgan is going to hullabaloo on box office through his two movies this year, "Halla Bol" and "Sunday". Also, he'll be seen in entirely different role behind the camera in "You, Me & Hum" as a director. Stars like Akshay Kumar, Saif Ali Khan, Kareena Kapur and Anil Kapur are going to shine under the banner of Yashraj in probably its only film "Tashan" this year. King of Bollywood Shah Rukh Khan will be seen in "Bhootnath" in a guest appearance.
Our Sallu bhai is in mood to take the box office with storm this year. Salman Khan's fans will see him in "God Tussi Great Ho" with hot Priyanka Chopra and superstar of millennium Amitabh Bachchan. He's acting in Subhash Ghai's "Yuvaraj" and Boni Kapoor's "Wanted: Dead or Alive" too. Amir Khan's "Ghajni" will also be shown this year. Starlet Jiya Khan is enacting in this movie with Amir. Abhishek Bachchan's long awaited "Drona", "Sarkar Raj" and "Dilli 6" will buzz box office this year. Yet another big movie of year 2008 is "Singh is King" staring popular pair of Akshay Kumar and Katerina Kaif. Rakesh Roshan's "Crazy 4" and "Heraphir 4" will also be shown this year.
साल 2007 हिन्दी फ़िल्मों के शौक़ीनों के लिए काफ़ी अच्छा रहा है। आइए सरसरी नज़र डालते हैं उन फ़िल्मों पर, जो नए साल यानी कि 2008 में प्रदर्शित होने वाली हैं। इस सूची में सबसे ऊपर नाम आता है आशुतोष गोवारीकर की "जोधा अकबर" का। ऋतिक रोशन और ऐश्वर्या राय जैसे बड़े सितारों से सजी इस फ़िल्म का सभी को बेसब्री से इंतज़ार है।
2008 में अजय देवगन बॉक्स ऑफ़िस पर हल्ला बोलने वाले हैं अपनी दो फ़िल्मों "हल्ला बोल" और "संडे" के ज़रिए। साथ ही नए साल में अजय एक नए किरदार में भी नज़र आएंगे - निर्देशक के रूप में "यू मी और हम" में। सैफ़ अली ख़ान, अक्षय कुमार, करीना कपूर और अनिल कपूर अपना टशन दिखाएंगे यशराज की इस साल आने वाली इकलौती फ़िल्म "टशन" में। हरदिल-अज़ीज़ शाहरुख़ ख़ान बतौर मेहमान कलाकार दिखेंगे "भूतनाथ" में।
सल्लू भाई 2008 में धड़ाधड़ फ़िल्में देने के मूड में हैं। पहले तो सलमान ख़ान को दर्शक "गॉड तुस्सी ग्रेट हो" में अमिताभ बच्चन और प्रियंका चौपड़ा के साथ देखेंगे। उसके बाद वे सुभाष घई की "युवराज" और बोनी कपूर की "वाण्टेड: डेड ऑर अलाइव" में भी अपना जलवा बिखेरते नज़र आएंगे। आमिर ख़ान की फ़िल्म "गजनी" भी 2008 में प्रदर्शित हो सकती है, जिसमें उनके साथ नवोदित तारिका जिया ख़ान होंगी। अभिषेक बच्चन रामू की "सरकार राज" के अलावा "द्रोण" और "दिल्ली 6" में भी दिखाई देंगे। 2008 की एक और बड़ी फ़िल्म "सिंह इज़ किंग" है, जिसमें अक्षय कुमार और केटरीन कैफ़ की जोड़ी फिर दोहराई गई है। इन फ़िल्मों के अतिरिक्त "हेराफेरी 4" और राकेश रोशन की " क्रेज़ी 4" भी बड़े पर्दे पर धमाल मचा सकती हैं।
If you are an ardent fan of bollywood music and hindi songs, you are at the right place. I’m gonna tell you about some excellent free resources, where you can download all your favorite songs from. So get ready to face the torrent of great Hindi music:
There are several website available online for Hindi movie buffs. Most of the people, though, don’t know about these free resources. Many of these sites facilitate the user to download and see Hindi films on their computers. You can watch even most of the bollywood blockbusters online. Here is the great treasure of bollywood hindi movies for you absolutely free:
इंटरनेट पर हिन्दी फ़िल्मों के शौक़ीनों के लिए कई सारी बढ़िया वेबसाइट्स हैं। हालाँकि ज़्यादातर लोगों को ऐसी मुफ़्त की जुगाड़ों के बारे में जानकारी नहीं होती है। इनमें कई वेबसाइट्स से आप पिक्चर डाउनलोड कर सकते हैं। साथ ही कई वेबसाइट्स ऑनलाइन फ़िल्में देखने की सुविधा भी मुहैया कराती हैं। यह लीजिए बॉलीवुड की फ़िल्मों का मनोरंजन से भरपूर ऑनलाइन ख़ज़ाना -
आज सुबह नेशनल जियोग्राफ़िक चैनल पर एक कार्यक्रम आ रहा था – नेकिड साइंस। इसमें मानवीय प्रेम का वैज्ञानिक तौर पर विश्लेषण किया गया था। विश्लेषण से पता चला कि प्रेम कोई हाईफ़ाई फ़ण्डा नहीं है, बल्कि महज़ दिमाग़ में होने वाला केमिकल लोचा है। यानी कि परीक्षणों से पता चला कि जब कोई इंसान प्रेम में होता है, तो उसके दिमाग़ के एक ख़ास हिस्से में कुछ रासायनिक क्रियाएँ होती हैं। ये रासायनिक क्रिया काफ़ी कुछ वैसी ही होती है, जैसी कोकीन खाने से मस्तिष्क में क्रिया होती हैं और दोनों के लक्षण समान होते हैं। लो कल्लो बात! विज्ञान ने तो दो मिनट में प्रेम की ऐसी-तैसी कर दी। कवियों के हज़ारों साल के किए-धरे पर पानी फेर दिया।
लेकिन बस इतना ही होता तो ठीक था। दोपहर में निठल्ली सर्फ़िंग के दौरान एक वेबसाइट देखी। जिनकी यह वेबसाइट है, उन महाशय का कहना है कि समाधि-वमाधि कोई परादैवीय घटना नहीं है। ध्यान करने से दिमाग़ में रासायनिक परिवर्तन होने लगते हैं। जिन लोगों की खोपड़ी में ये रासायनिक परिवर्तन ज़्यादा हो जाते हैं, वे ऐनलाइटेण्ड कहलाते हैं। उन्हें कुछ अजीब तरह की अनुभूति होने लगती है। वैसी अनुभूति टेम्परेरी तौर पर एलएसडी नामक ड्रग लेकर भी पायी जा सकती है। साथ ही उन महाशय का यह भी कहना है कि हिन्दुस्तानी खोपड़ी की संरचना इस कैमिकल लोचे के लिए ज़्यादा अनुकूल है। इसीलिए हिन्दुस्तानी ख़ासे आराम से एनलाइटेंड हो जाते हैं। वहीं पश्चिमी लोग ज़िन्दगी भर भले ध्यान करते रहें, उनकी खोपड़ी की डिज़ाइन उनका साथ नहीं देती है।
अब क्या कहें? रसायन विज्ञान की जय हो। स्कूल में फ़िज़िकल कैमिस्ट्री तो ठीक लगती थी, लेकिन ऑर्गेनिक-इनॉर्गेनिक झिलाय नहीं झिलती थीं। पर हमें तब क्या मालूम था कि ये प्यार-व्यार, समाधि-वमाधि रसायन विज्ञान की एक कला के बराबर भी नहीं है। वरना तभी मन लगाकर पढ़ाई करते और परखनली से अपने सिर में कुछ अच्छे-अच्छे रसायन उढ़ेल लेते।
अभी कुछ दिनों पहले आगरा में दंगा-फ़साद हुआ। सम्वाददाता ने पूरे दंगे को ग़ौर से देखा और अब आपके सामने पेश है दंगे का आँखों देखा हाल –
इस दंगे में हमेशा की तरह कुछ लोग मारे भी गए। मारे गए लोग काफ़ी नौसीखिए थे और उन्हें दंगों का कोई ख़ास अनुभव नहीं था; तभी दंगे की इस पावन वेला में, जो हर कुछ सालों में एक बार आती है, औरों को टपकाने की बजाय ख़ुद ही टपक गए। हिन्दुस्तान में इत्ते दंगे होते हैं कि कई लोगों ने तो अब इसे अपना फ़ुल-टाइम धन्धा ही बना लिया है। गली-मुहल्ले में दंगे करने के क्रैश कोर्स चलने लगे हैं, जगह-जगह बोर्ड लगे हैं – “एक सप्ताह में दंगा करना सीखें”, “दस दिनों में बनें परफ़ेक्ट दंगाई”, “क्या आपके दोस्त पक्के दंगाई हैं और आप आगज़नी, पथराव, नारेबाज़ी में हिचकिचाते हैं। डरिए मत... अब आ गया है ‘दस दिनों में बनें दंगाई’ क्रैश कोर्स” वगैरह वगैरह। मैंने, यानी संवाददाता ने एक इंस्टीट्यूट के मालिक का इंटरव्यू भी किया। पूछा कि आपका लक्ष्य क्या है? वह बोला – “हम घर-घर दंगाई तैयार करना चाहते हैं... छोटा दंगाई, मोटा दंगाई, बूढ़ा दंगाई, बच्चा दंगाई... सपना फ़सादी भारत का।”
“लगे रहो मुन्ना भाई” ने हिन्दुस्तानी मानस पर कितना गहरा प्रभाव डाला है, यह दंगों के दौरान पता लगा। जितने भी दंगाई मिले, सब-के-सब गांधीवादी। गांधीजी की तरह हर चीज़, हर मौक़े का पूरा इस्तेमाल करने में यक़ीन रखते हैं। जैसे गांधीजी आए हुए शोक-पत्र को भी फाड़ कर नहीं फेंकते थे, दूसरी कोरी तरफ़ ख़त लिखकर पोस्टकार्ड की तरह उसका प्रयोग करते थे... यह आदर्श हम लोगों के दिलो-दिमाग़ में समा गया है। इसलिए लोगों ने ट्रकों, बसों, कारों, दुकानों, कारख़ानों और गोदामों में आग लगा दी और शब-ए-बारात की रात को लगे हाथ दीवाली मनाने का सुख भी लूट लिया। इसे कहते हैं एक तीर से दो शिकार।
इस गड़बड़झाले में सम्वाददाता ने सोचा कि अल्लाह की ख़बर रखने का प्रेरोगेटिव केवल शुएब भाई को तो है नहीं, सो उसने भी इस मामले में अल्लाह की राय जाननी चाही और उसका साक्षात्कार लिया। पूछा, आपकी क्या राय है? अल्लाह ने जवाब दिया, “शब-ए-बारात की रात को, जब मैं सातवें आसमान से उतरकर पहले आसमान पर आया, तो कम दूरी से देखने पर बिल्कुल साफ़-साफ़ दिखाई दिया कि मेरे ये सो-कॉल्ड बन्दे कितने बेवकूफ़ हैं। इन लोगों की वजह से कई लोगों ने भी मुझपर आरोप लगाया कि मैं नीचे उतरकर आया, इसी वजह से यह सारा फ़साद हुआ। आइ एम वेरी सेड।” अल्लाह को ज़्यादा सेंटी होते देख सम्वाददाता सहानुभूति जताकर निकल लिया।
ख़ैर, जैसा कि पड़ोसन में बिन्दु के पिताजी ने कहा है – “जब-जब जो-जो होना है, तब-तब सो-सो होता है।” तो जो होना था, सो हो गया। लेकिन रिपोर्टर ने निष्कर्ष निकाल लिया है कि ग़लती किसकी है। दंगाई तो बेचारे भोले-भाले लोग हैं, वो तो ये सब करने के लिए मजबूर थे। उन्हें क्या दोष देना! साथ ही प्रशासन की भी कोई ग़लती नहीं है। जो गड़बड़ होने से पहले काम शुरू करे, वह प्रशासन कैसा? प्रशासन का काम ही होता है दंगे के बाद उसे काबू करने की कोशिश करना। भले ख़ुदा खुद को कितना ही निर्दोष बताए, दरअसल सारी-की-सारी ग़लती उसी की है। क्या ज़रूरत है सातवें आसमान नीचे उतरकर आने की? अल्लाह के बाद बाक़ी ज़िम्मेदारी है ट्रकों की, बसों की, कारों की, दुकानों की, पर्यटक वाहनों की और कारख़ानों की; ये चीज़ें थी तभी दंगाई बेचारे आगज़नी को मजबूर हुए।
“क्रांतिकारियों के लिए सूत्र” जॉर्ज बर्नार्ड शॉ या जीबीएस, जैसा कि आम तौर पर उन्हें कहा जाता है, की सबसे कम चर्चित रचनाओं में से एक है। जीबीएस ने १९०३ में यह संक्षिप्त किताब लिखी थी। इस किताब में विभिन्न विषयों पर छोटे-छोटे सूत्र दिए गए हैं। मुझे इसकी ख़ासियत यह लगी कि इसके गूढ़ सूत्र जगह-जगह व्यांग्यत्मक लहज़े से भी परिपूर्ण हैं। इस किताब के सूत्रों के बारे में यह बात बिल्कुल सही लगती है – “देखन में छोटे लगें, घाव करें गम्भीर”। उदाहरण के लिए सबसे पहले सूत्र पर ही ग़ौर फ़रमाएँ –
एकमात्र स्वर्णिम सूत्र यह है कि कोई भी स्वर्णिम सूत्र नहीं है। (The only golden rule is that there are no golden rules.)
शिक्षा पर जीबीएस कहते हैं –
जो कर सकता है, वह करता है और जो नहीं कर सकता, वह पढ़ाता है। (He who can, does. He who cannot, teaches.)
पढ़ा-लिखा इंसान दरअसल एक फ़ालतू व्यक्ति है, जो पढ़ने में वक़्त बर्बाद करता है। उसके झूठे ज्ञान से सावधान रहो : यह अज्ञान से भी ख़तरनाक है। (A learned man is an idler who kills time with study. Beware of his false knowledge : it is more dangerous than ignorance.)
खुद करके देखना ही ज्ञान अर्जित करने का अकेला मार्ग है। (Activity is the only road to knowledge.)
भाषा पर जीबीएस ने बहुत मार्के की बात कही है, जो भारत के आज के हालात में बहुत सही बैठती है –
कोई भी इंसान जो खुद अपनी भाषा में सक्षम नहीं है, कभी भी दूसरी भाषा पर अधिकार प्राप्त नहीं कर सकता। (No man fully capable of his own language ever masters another.)
नोट : इन सूत्रों का हिन्दी भावानुवाद मैंने किया है। इसलिए हो सकता है कि इनमें ग़लतियाँ रह गई हों। तो आप टिप्पणी करके बताएँ, इससे पहले ही मैं एड्वांस में माफ़ी मांग लेता हूँ। :)
शायद ही कोई हो जो बचपन में चाचा चौधरी, साबू, बिल्लू, पिंकी, नागराज, राम-रहीम जैसे कॉमिक पात्रों का दीवाना न रहा हो। बचपन में चंचल शरीर को केवल ये आकर्षक कॉमिक्स ही कुछ देर के लिए शांत बैठने पर मजबूर कर पाती थीं। तो एक बार फिर बचपन की यादों को ताज़ा कीजिए इन रोचक कॉमिक्स के साथ। राज कॉमिक्स की वेबसाइट पर आप ऑनलाइन पढ़ सकते हैं सुपर कमाण्डो ध्रुव, बांकेलाल और डोगा वगैरह की कई सारी कॉमिक्स बिल्कुल मुफ़्त।इंडियन कॉमिक्स से भी आप बहुतेरी हिन्दी कॉमिक्स डाउनलोड कर सकते हैं। साथ ही विशाल पटेल की वेबसाइट पर चाचा चौधरी की कई सारी कॉमिक्स पढ़ी जा सकती हैं। अगर आपको भी हिन्दुस्तानी कॉमिक्स का कोई ऑनलाइन स्रोत पता हो, तो कृपया ज़रूर बतलाएँ।
यह पोस्ट लिखने के बाद एक कॉमिक मैंने भी पढ़ी... बांकेलाल की। मज़ा आ गया तुम्हारी कसम। किस तरह कनकच्चा ऋषि ने श्राप दिया, किस तरह बांकेलाल ने बजरबट्ट से पीछा छुड़ाकर कनकटा दैत्य को परास्त किया... एक बार फिर, मज़ा आ गया। :)
मदर टेरेसा आज भी दुनिया के लिए एक मिसाल हैं। उन्होंने दिखलाया कि किस तरह अपना सर्वस्व समर्पित कर दीन-हीनों और निराश्रितों की सेवा की जाती है। लेकिन हाल में आई एक किताब “मदर टेरेसा : कम बी माई लाइट” (Mother Teresa : Come Be My Light) ने ईश्वर पर उनकी आस्था को लेकर नए सवाल खड़े किए हैं। किताब में मदर के कई ख़तों को प्रकाशित किया गया है, जिससे यह पता लगता है कि अपनी ज़िन्दगी के आख़िरी वक़्त तक वे ईश्वर के अस्तित्व को लेकर संशय में थीं। इन ख़तों में बार-बार मदर ने कहा कि उन्हें महसूस होता है कि ईश्वर नहीं है, क्योंकि उन्हें न तो कभी उसकी अनुभूति हुई और न ही कभी प्रार्थनाओं का जवाब मिला। क्रिसमस के बाद लिखे गए एक पत्र में मदर टेरेसा ने लिखा, “मेरे लिए सन्नाटा और खालीपन बहुत गहरा है। इतना गहरा कि मैं देखना चाहती हूँ और देख नहीं पाती, सुनना चाहती हूँ और सुनाई नहीं देता।”
ये सभी पत्र ऐसे लोगों को लिखे गए थे, जो उनके बहुत क़रीबी थे। सार्वजनिक तौर पर उन्होंने हमेशा इस तरह दर्शाया मानो उन्हें अपेक्षित अनुभूति हो चुकी है। क्या यह मज़हबों के पाखण्ड को नहीं दिखलाता है? हालाँकि उनका कार्य निश्चय ही महान था, लेकिन अगर वे यह कहतीं कि ईश्वर नहीं है तो क्या चर्च उन्हें मान्यता देता? क्या अपने जीवन के अंत में भी पाखण्ड की पीड़ा के साथ नहीं मरी होंगी? हालाँकि उनका काम महान था, लेकिन क्या यह टीस उससे भी बड़ी नहीं रही होगी? ईश्वर की बहुतेरी अजीबोग़रीब धारणाएँ गढ़ कर और उसे आस्था के जर्जर आधार पर टिकाकर, क्या मज़हबों ने लोगों को छला नहीं है? क्या बेहतर न होता कि ईसा के नाम पर लोगों की सेवा करने की बजाय वे खुद अपने लिए इसे छोड़ सत्य को खोजने का साहस करतीं? शायद ऐसा करने से वे मरते वक़्त ज़्यादा संतुष्ट होतीं। अंत में मदर की एक प्रसिद्ध कविता Anyway की पंक्तियाँ -
People are often unreasonable, illogical and self centered; Forgive them anyway.
If you are kind, people may accuse you of selfish, ulterior motives; Be kind anyway.
If you are successful, you will win some false friends and some true enemies; Succeed anyway.
If you are honest and frank, people may cheat you; Be honest and frank anyway.
What you spend years building, someone could destroy overnight; Build anyway.
If you find serenity and happiness, they may be jealous; Be happy anyway.
The good you do today, people will often forget tomorrow; Do good anyway.
Give the world the best you have, and it may never be enough; Give the world the best you've got anyway.
You see, in the final analysis, it is between you and your God; It was never between you and them anyway.
लेकिन जब खुद मदर और “उनके भगवान” के बीच ही वास्तविक विश्वास का रिश्ता न क़ायम हो सका, तो क्या ये अंतिम पंक्तियाँ खोखलेपन की गूंज नहीं लगती हैं?
अपनी बेवकूफ़ियों के लिए मशहूर बुश ने एक बार फिर ऐसा कारनामा किया, जिससे लोगों में उनकी मूर्खता के लिए बचा-खुचा शक भी ख़त्म हो गया। बुश की ज़ुबान फ़िसलना तब शुरू हुई, जब बुश ने शुक्रवार को ऑस्ट्रेलिया में “एपेक” सम्मेलन से पहले अपने सम्बोधन में कहा, “‘ऑपेक’ सम्मेलन की बेहतरीन तरीक़े से मेज़बानी करने के लिए शुक्रिया।” फिर बुश ने ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री जॉन होवार्ड की ईराक़ यात्रा को भी याद किया, जिसमें वे ईराक़ में “ऑस्ट्रिया” के सैनिकों से मिलने गए थे। यह अलग बात है कि ईराक़ में ऑस्ट्रिया का कोई सैनिक नहीं है। अलबत्ता वहाँ ऑस्ट्रेलिया के १,५०० सैनिक ज़रूर तैनात हैं। इसके बाद बुश शायद यह भी भूल गए कि वे मंच पर कहाँ से चढ़े थे और उतरने के लिए मंच के उस छोर पर पहुँच गए, जहाँ बदकिस्मती से उतरने के लिए सीढ़ियाँ थी ही नहीं।
इसीलिए कहते हैं कि इंसान को ज़रूरत से ज़्यादा तनाव से बचना चाहिए। दिमाग़ में अगर हर समय ईराक़, कोरिया, पाकिस्तान, ओसामा वगैरह ही चलता रहे तो बेचारे इंसान की क्या हालत हो जाती है!!! वैसे, बुश की एकमात्र बड़ी उपलब्धि यह है कि वे सारी संस्कृतियों, देशों की सीमाओं को तोड़ते हुए दुनिया भर में मूर्खता के निर्विवाद प्रतीक बन गए हैं। १ अप्रैल को लोग अब ऐसे कार्ड देने लगे हैं, जिनके ऊपर बुश की तस्वीर छपी होती है। और तो और, आजकल लोग बेवकूफ़, मूर्ख वगैरह के पर्यायवाची के रूप में “बुश” शब्द का भी प्रयोग करने लगे हैं। है न वाक़ई बड़ी उपलब्धि? अगर टाइम हो तो बुश पर एक मज़ेदार चुटकुला भी टाइमपास पर पढ़िए।
गहन शोध के बाद शोधकर्ताओं ने २३७ ऐसे कारण चिह्नित किए हैं, जो लोगों को सेक्स के लिए प्रेरित करते हैं। शोध के मुताबिक़, यह देखा गया है कि युवा अमूमन एक से कारणों के चलते एक-दूसरे के क़रीब आते हैं। कॉलेज जाने वाले ज़्यादातर युवाओं का कहना था कि दूसरों की तरफ़ आकर्षित होने का सबसे बड़ा कारण यह है कि वे “शारीरिक सुख” का अनुभव करना चाहते हैं और यह “अच्छा महसूस होता है”।
प्रेम की अभिव्यक्ति और लगाव ज़ाहिर करना, पुरुषों और स्त्रियों दोनों के लिए शुरुआती १० कारणों में शुमार करता है। लेकिन इनको पीछे ढकेलने वाला नं. १ कारण है – “मैं उसकी तरफ़ आकर्षित हूँ”। २३७ कारणों में से सबसे अजीब है “बदला लेने के लिए सेक्स”।
टैक्सस विश्वविद्यालय ने इस शोध को करने के लिए पाँच साल लगाए और खुद अपने पैसे भी ख़र्च किए। डॉ. इरविन गोल्डस्टेन के अनुसार, “‘मेन आर फ़्रॉम मार्स, वीमन आर फ़्रॉम वीनस’ वाला सिद्धांत इस शोध में ग़लत साबित हो गया है, क्योंकि सेक्स के लिए प्रेरित करने वाले कारण स्त्री-पुरुषों में समान पाए गए हैं।” इस शोध पर विस्तार से ख़बर यहाँ पढ़ी जा सकती है।
पता नहीं इस शोध के परिणाम भारत के परिप्रेक्ष्य में कितने सार्थक हैं, क्योंकि यह शोध अमेरिका में किया गया है। सेक्स को लेकर अमेरिकी मानसिकता भारत से कितनी अलग है, यह तो तभी पता चल सकता है जब भारत में भी इस तरह का कोई शोध व्यापक पैमाने पर किया जाए।
आज ज्ञानदत्तजी ने कहा कि अगर बुद्ध पैदा होना चाहेंगे तो कोई नहीं रोक सकता, बस ज़रूरत है तो सही परिस्थितियों की। भगवान बुद्ध ने वचन दिया था कि वे मैत्रेय के रूप में फिर आएंगे। शायद यही कारण है कि पिछली सदी में दो बार यह घोषित किया जा चुका है कि बुद्ध आ गए हैं। सृजन शिल्पी जी यह पहले ही अपनी पोस्ट ‘जब बुद्ध ढ़ाई हज़ार साल बाद फिर लौटे’ में बतला चुके हैं कि १९८८ में किस तरह ओशो ने यह घोषणा की थी मैत्रेय बुद्ध की आत्मा उनमें प्रविष्ट हो गई है। हालाँकि कुछ ही दिनों बाद ओशो ने कहा कि मैत्रेय उनके शरीर को छोड़ चुके हैं, क्योंकि परिस्थितियाँ अभी अनुकूल नहीं हैं।
इससे पहले भी थोयोसॉफ़िकल सोसायटी द्वारा बड़े पैमाने पर मैत्रेय बुद्ध की आत्मा के आगमन की तैयारी की गई थी। इसके लिए थियोसॉफ़िस्ट्स द्वारा बचपन से ही जे कृष्णमूर्ति को मैत्रेय की आत्मा के वहन के लिए ख़ास तौर पर तैयार किया गया था। मैत्रेय बुद्ध के आगमन के लिए एक संगठन भी खड़ा किया गया – ऑर्डर ऑफ़ द स्टार। जिसका प्रमुख जे कृष्णमूर्ति को घोषित किया गया था। इस संगठन के लगभग सत्तर हज़ार सदस्य थे, जो कृष्णमूर्ति को बुद्ध का अवतार समझते थे। लेकिन जे कृष्णमूर्ति वाक़ई बुद्ध की तरह ही क्रांतिकारी विचारों के निकले और सन् १९२९ में एक प्रसिद्ध व्याख्यान के ज़रिए उन्होंने ‘ऑर्डर ऑफ़ द स्टार’ को भंग कर दिया। कृष्णमूर्ति ने अपने व्याख्यान में कहा –
“सत्य एक मार्गविहीन मंज़िल है और कोई भी सत्य तक किसी भी मज़हब या सम्प्रदाय के माध्यम से नहीं पहुँच सकता है। यह मेरा दृष्टिकोण है और मैं इससे पूर्णतः सहमत हूँ। सत्य; जोकि निःसीम, बिनाशर्त, पथविहीन है, संगठित नहीं किया जा सकता है और न ही ऐसा कोई संगठन खड़ा किया जा सकता है जो लोगों को सत्य की तरफ़ ले जाने का दावा कर सके। ...” पूरा भाषण यहाँ पढ़ा जा सकता है।
जिद्दू कृष्णमूर्ति द्वारा मैत्रेय होने की बात नकारे जाने पर उनसे सब कुछ ले लिया गया, जो भी ‘ऑर्डर ऑफ़ द स्टार’ के सदस्यों और थियोसॉफ़िस्ट्स द्वारा उन्हें दिया गया था। हालाँकि इसके बाद भी कृष्णमूर्ति ने अपनी शिक्षाएँ देना जारी रखा और पूरी दुनिया में, ख़ास तौर पर भारत, अमेरिका और ब्रिटेन में अपने स्वतंत्र विचारों से लोगों को परिचित कराते रहे।
भारतीय विद्वानों ने की न्यूटन से पहले गणित की महत्वपूर्ण खोज
गणित के महत्वपूर्ण सिद्धांत की खोज, जिसका श्रेय सर आइज़ेक न्यूटन को दिया जाता है, दरअसल भारतीय विद्वानों की खोज थी। न्यूटन से क़रीब ढाई सौ साल पहले केरल के गणितज्ञों ने कैलकुलस के मूलभूत सिद्धांतों में से एक ‘अनंत श्रेणी’ (Infinite Series) की खोज की थी। इस तथ्य का खुलासा हाल में लन्दन में किए गए एक शोध से हुआ है। मेनचेस्टर विश्वविद्यालय के डॉ. जॉर्ज जोसेफ़ के मुताबिक़ सन् १३५० ई. के आस-पास गणित के ‘केरल स्कूल’ में पाई शृंखला की भी खोज की थी और पाई का मान १७ अंकों तक सही-सही निकाला था। यह भारतीय खोज केरल की जेसुइट मिशनरियों के ज़रिए इंग्लैंड पहुँची व उन्हीं से इसकी जानकारी न्यूटन को भी हुई। बाद में इसकी खोज का श्रेय न्यूटन को ही दिया गया। यह ख़बर विस्तार से यहाँ पढ़ें।
दुर्भाग्य की बात यह नहीं है कि इसका श्रेय किसी ग़ैरहिन्दुस्तानी को मिला, बल्कि यह है कि ये बात भी लन्दन में शोध के दौरान सामने आई। क्या हम भारतीय इतने जड़ हो चुके हैं कि अपनी उपलब्धियों को भी इस तरह भुला देते हैं, मानो कोई भारी भूल कर दी हो। फिर अपने इतिहास से इतने अनभिज्ञ रहने की कोशिश करते हैं, जैसे हमारे इतिहास में कुछ अच्छा हो ही नहीं सकता। अजंता-एलोरा, एलीफ़ेण्टा, सिन्धुघाटी की सभ्यता आदि ज़्यादातर खोजें पश्चिमीं विद्वानों द्वारा की गई हैं और दुःख है कि शायद ही भारतीयों ने अपनी थाती को खंगालने की कभी कोशिश तक की हो। क्या यह मानसिकता कभी बदल भी पाएगी?
मीट करने के इस बेहतरीन मौसम में, जबकि हर किसी के मीट करने का मीटर बढ़ता जा रहा है, हमारा ज़ीरो पर अटका हुआ था। सो मुरैना के ब्लॉगर श्री भुवनेश शर्मा से कल मुलाक़ात करने का मौक़ा हाथ लगा, तो उसे हमने झट से दबोच लिया। तो टेलीफ़ून पर भुवनेश भाई से पहले ही मीटियाने का वक़्त मुकर्रर किया और उन्हें आगरा में अपने ग़रीबख़ाने पर आमंत्रित कर लिया। हमें पूरी उम्मीद थी कि भुवनेश भाई डिजिटल कैमरा लेकर मीटियाने आएंगे, ताकि बाद में भेंटवार्ता का ज़ोरदार सचित्र विवरण अपने ब्लॉग पर चिपकाया जा सके। लेकिन वे भी हमारी तरह निकले, यानी कि ग़रीब टाइप। अब आप पूछेंगे कि ग़रीब कैसे? हम दोनों के पास तो कम्प्यूटर वगैरह है। लेकिन चिट्ठाकारों की जमात में जिसके पास डिजिटल कैमरा नहीं, हमारे हिसाब से वह ग़रीब है। जिस तरह कार वालों की जमात में मारुति ८०० वाला ग़रीब समझा जाता है। वैसे भी जब तक भेंटवार्ता के विवरण के साथ बढ़िया-सा फ़ोटू न चमचमाए, तब तक भेंटवार्ता करने का न कोई फ़ायदा है और न ही कोई सबूत।
ख़ैर, दोनों ग़रीब ब्लॉगर्स ने निहायत ही दुःखी मन से बातचीत शुरू की। जैसा कि होना लाज़मी था, हिन्दी ब्लॉग जगत के मुख़्तलिफ़ पहलुओं पर हम दोनों काफ़ी देर तक बतियाते रहे। बहुतेरे ब्लॉगर्स का भी ज़िक्र आता-जाता रहा, लेकिन दुर्भाग्यवश निन्दा-सुख से हमें पूरी तरह वंचित रहना पड़ा। ज़रूरत से ज़्यादा भले टाइप के लोगों से बातचीत करने का यही नुक़सान है। बात आगे बढ़ती रही और साथ में खाने-पीने का काम भी चलता रहा। न... न... “पीने” से कुछ और मतलब मत निकालिए, महज़ तुक के लिए जोड़ दिया है। काफ़ी देत यूँ ही चर्चा चलती रही, फिर उसका रुख़ बदलकर देश-समाज वगैरह-वगैरह की समस्याओं की तरफ़ चला गया। इस तरह की बात करके लगता है कि अपन की अक़ल में भी बुद्धि है... तो अपन ने अपनी अक़ल का पूरा इस्तेमाल करते हुए बातचीत का कंवर्सेशन जारी रखा।
लेकिन जैसे ही दुनिया की सारी समस्याएँ सुलझने की कगार पर पहुँच गई थीं, तभी भुवनेश भाई को याद आया कि उनकी ट्रेन का वक़्त भी होने वाल है। निकलना ज़रूरी था, इसलिए उन समस्याओं को अधसुलझा छोड़कर उन्हें लेकर मैं रेलवे स्टेशन की ओर चल दिया। कमाल की बात यह कि टिकिट-विकिट भी जल्दी मिल गई और कमाल-पर-कमाल यह कि सात मिनट बाद ट्रेन भी बिल्कुल ठीक समय पर आ गई। भारतीय रेल के इस कारनामे से हम दोनों को शॉक तो काफ़ी लगा, लेकिन किसी तरह अपने को सम्हालते हुए मैंने भुवनेश भाई को विदा किया। और इस तरह दो ग़रीब चिट्ठाकारों की भेंटवार्ता बिना फ़ोटू लिए ही “इति सम्पन्नम्” हो गई।
क्या आपकी नाक हमेशा अगर एक बार बहना शुरू हो जाए, तो थमने का नाम नहीं लेती? छींक पर छींक आती रहती हैं? आँखों से आँसू बहने लगते है और गले में खराश पैदा हो जाती है? अगर इन सवालों का जवाब “हाँ” है, तो आप राइनाइटिस ऍलर्जी के शिकार हैं। दुर्भाग्यवश ऍलोपेथी में इसकी रोकथाम के उपाय तो हैं, लेकिन जड़ से सही करने का कोई इलाज नहीं है।
हालाँकि इस व्याधि में आयुर्वेदिक उपचार बहुत कारगर है। आयुर्वेद का प्रयोग कर इस बीमारी से पूरी तरह निजात पा सकते हैं। इसके लिए कुछ ख़ास बातें ध्यान में रखनी होंगी –
“अणु तैल” की दो-दो बूंदों से दिन में दो बार नस्य-क्रिया करें।
“ब्राह्म रसायन” का सेवन करें।
रात को देर तक न जागें और सुबह जल्दी उठें।
कफ-वर्धक पदार्थों के सेवन से दूर रहें।
Ayurvedic Treatment of Rhinitis Allergy
Symptoms: Are you agitated with your runny nose? Do you sneeze unstoppably? Are you suffering from itchy throat and eyes? If your answers of these questions are affirmative, you might be suffering from rhinitis allergy. Allopathic treatment can only suppress the symptoms. There’s no cure for this disease using Allopathic treatment.
Although ayurvedic treatment can be very useful in it. Simply by following Ayurvedic medication, one can be cured utterly. You should remember some points:
Do the Nasya Kriya with two drops of Anu Tailam.
Take Brahma Rasayan daily.
Don’t stay awake late in the night and get up early in the morning.
तिब्बत के प्रमुख लामा को बुद्ध का अवतार माना जाता है। हर मुख्य लामा अपनी मृत्यु से पूर्व उन संकेतों की घोषणा करता है, जिनके आधार पर तिब्बत में उसे फिर से पैदा होने पर खोजा जाता है। यह परम्परा सदियों से चली आ रही है। चीनी सरकार ने हाल में यह बयान जारी किया है – “बिना सरकारी अनुमति के तथाकथित जीवित बुद्ध यानी दलाई लामा का पुनर्जन्म असंवैधानिक और ग़ैरक़ानूनी है।” यह आदेश १ सितम्बर २००७ से प्रभावी होगा।
यानी कि अब बेचारे दलाई लामा को तिब्बत में फिर से पैदा होने के लिए चीनी सरकार की अनुमति लेनी होगी और चीन की वामपंथी सरकार, जो धर्म में यक़ीन नहीं रखती, यह तय करेगी कि दलाई लामा को कब और कहाँ जन्म लेना होगा। दरअसल चीन की सरकार बुद्ध को फिर से पैदा नहीं होने देना चाहती है और इस परम्परा को हमेशा के लिए ख़त्म करना चाहती है, ताकि तिब्बत पर पकड़ को मज़बूत किया जा सके। देखते हैं लोकतांत्रिक भारत में रह रहे बुद्ध चीन की साम्यवादी सरकार का कैसे मुक़ाबला करते हैं?
ये बाज़ार भी बड़ी अजीब चीज़ है, हर जगह हर काम में यह होता है। मानो बाज़ार न हुआ ब्रह्म हो गया – बाज़ारवास्यमिदं सर्वं नेह नानास्ति किंचन् – सब कुछ बाज़ार ही है और बाज़ार के अलावा कुछ नहीं है। हाल में रिलायन्स के खुदरा बाज़ार में क़दम रखने से हड़कम्प मच गया, ठेले वालों ने धरने-प्रदर्शन किए, अख़बार-के-अख़बार पट गए। तब हमें इन अख़बारों से पता चला कि खुदरा बाज़ार हज़ारों करोड़ रुपये का है, इसलिए रिलायंस और वालमार्ट जैसी कम्पनियाँ इसमें कूदना चाहती हैं।
यह सब पढ़कर बड़ी समस्या पैदा हो गई है। हम भविष्यदृष्टा टाइप लोग हैं, सो भविष्य को देख रहे हैं – कल को रिलायंस मोची के काम में भी सेंध लगा सकता है। पता चला कि जूते सीना और पॉलिश करना पचास हज़ार करोड़ रुपये का बाज़ार है। रिलायंस ने जूतों के लिए चमचमाते हुए आउटलेट खोल दिए हैं, जो हर गली के नुक्कड़ पर देखे जा सकते हैं। अब मोची विरोध-प्रदर्शन कर रहे हैं। लेकिन कम्पटीशन भी तगड़ा है। वालमार्ट और टाटा भी इस बाज़ार में अपनी हिस्सेदारी चाहते हैं। सो गली के इस कोने पर वालमार्ट का मोची-आउटलेट है, उस कोने पर रिलायंस का और बीच में टाटा का। जूते पॉलिश कराने के बाद कम्प्यूटराइज़ बिल दिया जाता है, जिसका पेमेंट क्रेडिट कार्ड से भी किया जा सकता है।
कम्पनियों की नज़र ताले-चाबी सही करने के पाँच हज़ार करोड़ के बाज़ार पर है। पहले ताले-चाबी वाले टेर लगाते हुए साइकिल पर गली-गली घूमा करते थे। अब उनकी जगह रिलायंस की एक पॉश वैन घूमती है। चाबी खोने पर लोग “tala” <अपना पता> 666 पर एसएमएस करके इस वैन को तुरंत अपने घर बुला सकते हैं। सही होने पर क्रेडिट कार्ड से पेमेण्ट कर सकते हैं। जो छः महीने में सबसे ज़्यादा ताले सही कराएगा, उसे एक रिलायंस इंडिया मोबाइल मुफ़्त में मिलेगा, वो भी लाइफ़ टाइम वाला। हाँ, एक नई दिक़्क़त ज़रूर खड़ी हो गई है। अब चोरों में भी इन ताला-तोड़ गाड़ियों की बहुत मांग है। सो इस बढ़ती डिमांड के लिए रात में चलने वाली ख़ास ताला-तोड़ वैन का इंतज़ाम किया गया है।
सिगरेट-गुटके का बाज़ार “हज़ार करोड़” में नहीं समाता है, यह “लाख करोड़” का है। लोग दिनों-दिन इनका कंसम्पशन बढ़ाते जा रहे हैं। हर चौराहे पर रिलायंस की एटीएम जैसी मशीनें लगी हुई हैं। लोगों के पास कार्ड हैं। कार्ड घुसेड़ा और गुटके-सिगरेट का ब्राण्ड चुना, मशीन से गड़गड़ की आवाज़ के साथ गुटका-सिगरेट बाहर। न... न... यह केवल अभिजात्य पूंजीवादी व्यवस्था नहीं है। ग़रीब और सर्वहारा के लिए भी है। यहाँ से रामआसरे बीड़ी, पान वगैरह भी ले सकता है। जाति-व्यवस्था तोड़ने के लिए ऐसा प्रयोग पहले सिख गुरुओं ने किया था लंगर के रूप में, जहाँ किसी भी जाति का आदमी खाना खा सकता था। और अब ऐसा प्रयोग किया है रिलायंस ने, जहाँ एक ही जगह से हर जाति का आदमी गुटका-सिगरेट पा सकता है।
ख़ैर, अब क्या-क्या बताएँ? रिलायंस का नाई, रिलायंस का धोबी, रिलायंस की महरी – ये भविष्य चमचमाता रिलायंसी है।
हाल में “वर्ल्ड इज़ फ़्लैट” पढ़ी। बढ़िया किताब है। कम-से-कम हिन्दुस्तानी तो इसे पढ़कर ख़ुश हो ही सकते हैं। इसके शुरू के अध्यायों में भारत को आउटसोर्स की जाने वाली सेवाओं का ख़ासा उल्लेख है। हम लोग भी आजकल आउटसोर्सिंग पर काफ़ी मुग्ध हैं। लेकिन अगर देखा जाए तो यह एक दोयम दर्जे का काम है। अगर तुलना करनी हो तो मैं आउटसोर्सिंग के काम में लगे भारतीयों की तुलना मज़दूरों से करूंगा। “तेजस्वी मन” (Ignited Minds) में राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने ज्ञान-आधारित समाज के तौर पर भारत को विकसित करने की बात कही है। और हम उस दिशा में कुछ-कुछ बढ़ भी रहे हैं। लेकिन विडम्बना यह है कि इस सूचना-केन्द्रित समाज में हम सूचना-मज़दूर भर बनकर रह गए हैं। जोकि पश्चिम (ख़ास तौर पर अमेरिका) के लिए मज़दूरी कर रहे हैं। हमारी बड़ी कम्पनियों को ही लीजिए, जैसे कि इंफ़ोसिस। इंफ़ोसिस का काम भी दूसरों के लिए उत्पादों को तैयार करना भर है, न कि खुद के लिए उत्पाद बनाना।
यानी कि मेहनत तो पूरी हमारी ही है लेकिन फ़ायदा तो उनका ज़्यादा है, जिनका उत्पाद है। भारत को अब आउटसोर्सिंग से आगे सोचने की ज़रूरत है। अब हमें ऐसे प्रोडक्ट तैयार करने की ज़रूरत है, जो अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में अपनी पहचान बना सकें। और मेरे ख़्याल से ऐसा होना ज़्यादा मुश्किल नहीं है, क्योंकि आईटी के क्षेत्र में “ब्राण्ड इण्डिया” एक जाना-पहचाना और भरोसेमन्द नाम है। दिक़्क़त केवल इतनी है कि मार्केटिंग में हम कमज़ोर हैं। दूसरों के लिए हम चीज़ें (विशेषतः सॉफ़्टवेयर) बना सकते हैं, लेकिन खुद ब्रांड के तौर पर उनको विश्व-बाज़ार में मार्केट न कर पाना हमारी कमज़ोरी है। और आज की दुनिया में सारा खेल मार्केटिंग का ही है। पता नहीं यह भी समस्या है या नहीं, क्योंकि शायद ही अभी तक किसी भारतीय आईटी कम्पनी ने अपने नाम से कोई बड़ा उत्पाद बाज़ार में उतारा हो। शायद हमें यह भय अधिक है कि हम विफल हो जाएंगे। लेकिन दुनिया में ब्रांड इंडिया का सिक्का चलने के बाद हमें चुनौतियों को स्वीकारना शुरू करना चाहिए और आउटसोर्सिंग से संतुष्ट होने की बजाय बड़ी अमेरिकी कम्पनियों से प्रतिस्पर्धा के लिए कटिबद्ध हो जाना चाहिए।
क्या हो अगर सूरज धरती के चारों ओर चक्कर लगाए, दो पिण्ड आपस में एक-दूसरे को आकर्षित करने की बजाय दूर धकेलें, प्रकाश की रफ़्तार कुछ ज़्यादा या कम हो जाए, परमाणु के नाभिक में इलेक्ट्रॉन भी शामिल हो वगैरह वगैरह? आपको भले ये सब ऊलजलूल कल्पना मालूम हो, लेकिन हाल में यह विचार मुझे आंइस्टीन द्वारा प्रतिपादित सापेक्षिकता के सिद्धांत (Theory of Relativity by Elbert Einstein) को पढ़ते वक़्त आया। हुआ ऐसा कि इसे पढ़ने के बाद ख़्याल आया कि सूरज के सापेक्ष पृथ्वी उसके चारों ओर घूमती है, वहीं पृथ्वी के सापेक्ष तो सूरज ही पृथ्वी के चारों ओर घूमता है।
फिर यह विचार कौंधा कि गुरुत्वाकर्षण आदि विज्ञान के जितने भी नियम हैं, वो बार-बार घटित होने वाली घटनाओं पर ही आधारित हैं। यानी कि पेड़ से टूटकर सेब हर बार धरती पर ही गिरा – इसे हमने गुरुत्वाकर्षण का नियम बना दिया। इसके पीछे कोई तर्क, कोई लॉजिक नहीं है कि ऐसा होना-ही-होना है। विज्ञान इस बारे में कुछ नहीं कहता कि क्यों दो पिण्ड एक-दूसरे को खींचते हैं, क्यों असमान चार्ज आकर्षित होते हैं, क्यों प्रकाश की चाल उतनी ही है जितनी कि है। ऐसे में यह ज़रूरी नहीं है कि इतने बड़े ब्रह्माण्ड में हर जगह ऐसा ही होता हो। हो सकता है सुदूर ब्रह्माण्ड में कहीं पर प्रकाश धीमा चलता हो, हो सकता है कि वहाँ गुरुत्वाकर्षण की बजाय गुरुत्व-प्रतिकर्षण हो यानी पेड़ से टूटकर सेब ऊपर चला जाता हो, परमाणु के आख़िरी कोश में दस इलेक्ट्रॉन होते हों आदि आदि। तो वहाँ कुछ और ही विज्ञान होगा और कुछ और ही उसके नियम होंगे। आपको क्या लगता है? क्या ऐसा हो सकता है? साथ में मुझे कबीर का ऐसा ही विचित्र छन्द याद आता है जो विज्ञान के उलट बात करता है, न जाने क्या सोचकर कबीर ने लिखा होगा -
अम्बर बरसे धरती भीजे, ये जाने सब कोय। धरती बरसे अम्बर भीजे, बूझे बिरला कोय॥
हाल में यूनेस्को ने ऋग्वेद संहिता की १८०० से १५०० ईसा पूर्व की ३० प्राचीन पाण्डुलिपियों को सांस्कृतिक धरोहरों की सूची में शामिल किया है। यह ख़बर आप विस्तार से यहाँ पर पढ़ सकते हैं। मेरे ख़्याल ये प्राचीन पाण्डुलिपियाँ ब्राह्मी लिपि में हैं। समय के साथ ब्राह्मी लिपि ही देवनागरी में तब्दील हो गई। वैदिक संस्कृत में ऐसे कई अक्षर और ध्वनियाँ हैं, जो आम तौर पर देवनागरी वर्णमाला में देखने में नहीं आती हैं। उदाहरण के लिए एक वैदिक ऋचा मूल रूप में देखिए –
यहाँ अक्षरों के ऊपर-नीचे बनाई गई रेखाओं (और इसी तरह अप्रचलित बहुत-से दूसरे अक्षरों) का प्रयोग वैदिक संस्कृत में आम है। मैं यह जानना चाहता हूँ कि वैदिक संस्कृत से जुड़े ऐसे सभी अक्षरों और ध्वनिसूचक चिह्नों को कैसे टाइप किया जा सकता है? इसके लिए क्या कोई औज़ार नेट पर उपलब्ध है? या फिर इन्हें टाइप करने का कोई और तरीक़ा है? यह ऋचा मैंने इस साइट की मदद से टाइप की है। यहाँ केवल कुछ ध्वनिसूचक चिह्न ही दिए गए हैं।
मुफ़्त में भेजें चिट्ठी, तस्वीरें और ग्रीटिंग कार्ड्स
इस ज़बरदस्त मुफ़्त की जुगाड़ के बारे में हमें भाई रजनीश मंगला से पता चला था। “मुफ़्त का माल किसे बुरा लगता है” की तर्ज पर यह ऑनलाइन सेवा हमें भी भा गई। इस सेवा के ज़रिए आप भारत समेत यूएसए, कनाडा, ब्रिटेन, चीन, हॉङ्गकॉङ्ग, मकाऊ (न जाने कहाँ है), सिंगापुर और फ़्रांस वगैरह कई देशों में मुफ़्त में चिट्ठी-पत्री, फ़ोटो और ग्रीटिंग्स भेज सकते हैं। ज़्यादा जानकारी के लिए देखिए इस सेवा की वेबसाइट –
मैं इसका इस्तेमाल करके कई बार तस्वीरें मंगा चुका हूँ। दिक़्क़त बस इतनी है कि ये एक हफ़्ते में केवल चार तस्वीरें ही एक पते पर भेजते हैं। हालाँकि इनकी वेबवाइट पर लिखा है कि ये प्रेषित सामग्री के साथ विज्ञापन भी भेज सकते हैं, लेकिन इन्होंने आजतक मेरे साथ तो ऐसा नहीं किया है। बाक़ी रिस्क आपका। तो आप भी लाभ लीजिए इस सेवा का।
पिछले कुछ दिनों से मैं भारतीकृष्णतीर्थ महाराज कृत “वैदिक गणित” नाम की किताब पढ़ रहा हूँ। इसमें दी गई विधियाँ काफ़ी बढ़िया हैं और तेज़ी से गणना करने में बहुत सहायक हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या भारतीकृष्णतीर्थ महाराज की यह गणित वाक़ई वैदिक गणित है। स्वामी जी का कहना है कि यह गणित कुछ सूत्रों पर स्थापित है और ये सूत्र अथर्ववेद संहिता के परिशिष्ट में उन्होनें पाए थे। हालाँकि वे खुद इस परिशिष्ट को जनता के सामने कभी नहीं रख सके। जहाँ तक सूत्रों की बात है, ये सूत्र साफ़ तौर पर वैदिक संस्कृत में नहीं हैं। बानगी देखिए – “यावदूनं तावदूनीकृत्य वर्गं च योजयेत्” और “ऊर्ध्वतिर्यगभ्याम्” आदि। इसके अलावा इन सूत्रों का जिक्र किसी भी अन्य प्राचीन किताब में नहीं है। जान पड़ता है कि गणित की इस पद्धति का विकास खुद भारतीकृष्णतीर्थ महाराज ने किया है।
इसके उलट आजकल जो गणित प्रचलित है, वह पूरी तरह वैदिक है। यानी कि उसका विकास काफ़ी हद तक वैदिक परम्परा में हुआ है। उदाहरण के लिए दशभू पद्धति का उल्लेख वैदिक संहिताओं में मिलता है, पाइथागोरस प्रमेय सहित बहुतेरी दूसरी प्रमेयों को सूत्र ग्रंथों में पढ़ा जा सकता है। मैंने कहीं पढ़ा है कि कैलकुलस का विकास भी भारत में हुआ है, हालाँकि मुझे नहीं मालूम यह किस ग्रंथ में निबद्ध है। तो मेरे ख़्याल से वर्तमान में प्रचलित गणित “वैदिक गणित” अधिक है, बजाय “वैदिक गणित” के नाम से प्रचलित गणित के। हालाँकि इससे स्वामी जी की “वैदिक गणित” का महत्व कम नहीं होता है, क्योंकि यह अपने आप में बेहतरीन है। लेकिन ऐसे में “वैदिक गणित” को “वैदिक” कहना कितना सही है, जबकि इसका मूल वैदिक नहीं जान पड़ता है और यह कुछ दिनों पहले ही स्वामी भारतीकृष्णतीर्थ जी द्वारा विकसित की गई है? इस बारे में आप लोगों की क्या राय है?
हिन्दी ब्लॉग जगत में सालगिरह टाइप चीज़ें मनाने की ख़ासी परम्परा है, तो मैंने सोचा कि अपन भी इस परंपरा को निभाते हैं। हिन्दीं में आपको पकाते हुए यानि ब्लॉगिंग करते हुए आज तीन साल पूरे हो गए हैं। अपने तब के ब्लॉग पर पहली पोस्ट 31 मई 2004 को ही लिखी थी। पहली पोस्ट पर विजय जी, शैल जी और विनय जी की टिप्पणियाँ आते ही दिल "बरखा में मोर" सा नाचने लगा था। हाँ, उससे पहले डायनमिक फ़ॉण्ट वगैरह झमेले कर के देख चुका था, लेकिन वो सब कुछ ख़ास काम के नहीं लगे। फिर धीरे-धीरे यहाँ एक परिवार मिल गया। जिनसे जुड़ाव की शुरुआती वजह तो हिन्दी ब्लॉगिंग थी, लेकिन बाद में दिल का दिल से रिश्ता जुड़ गया..... भले ही ये सब थोड़ी फ़िल्मी डायलॉगबाज़ी लग रही है, लेकिन मैं यह मानकर कि आप झेलने में सक्षम हैं, जारी रखता हूँ।
हाँ, तो मैं कह रहा था कि जब मैंने हिन्दी में ब्लॉग बनाया तो मुझे लगा कि कोई बड़ा क्रांतिकारी काम मेरे हाथों से हो गया है, कि मैंने हिन्दी का पहला ब्लॉग बना लिया है। लेकिन विनय जी और आलोक जी जैसे तोप टाइप लोग पहले-से मौजूद मिले तो यह ख़ुशफ़हमी फ़ौरन छू हो गई। जहाँ तक मुझे याद पड़ता है, उस वक़्त तक़रीबन आठ ब्लॉग रहे होंगे हिन्दी में। दु:ख की बात है उनमें से बहुतों ने अब लिखना बंद कर दिया है। लेकिन ख़ुशी यह है कि बहुतेरे किसी स्पेशल चक्की का आटा खाकर अभी भी मैदान में डटे हैं। तो जो लोग डटे हुए हैं उनसे गुज़ारिश है कि चक्की के नाम या अगर पैक्ड आटा इस्तेमाल कर रहे हों तो आटे के ब्राण्ड का खुलासा करें, ताकि दूसरे लोग भी उसे हजम करके यहाँ वर्चुअल पन्नों को सालों-साल तलक काला कर सकें और हिन्दी ब्लॉगिंग को आगे ले जा सकें। आज आप लोगों का काफ़ी वक़्त ज़ाया किया, अपने चिट्ठे की अगली सालगिरह से पहले फिर मिलने का संकल्प लेते हुए विदाई लेता हूँ। नमस्कार।
आजकल के हिन्दी धारावाहिक बड़े ही अद्भुत हैं। इन्हें देखकर मैं आश्चर्यचकित रह जाता हूँ। पहली बात तो यह कि इनका नाम ही देखने लायक होता है। मैंने देखने लायक कहा, न कि पढ़ने लायक; क्योंकि इनके नामों की वर्तनी ही इतनी निराली होती है कि उसे पढ़ना अपने आप में काफ़ी मुश्किल काम है। e की जगह a का, a की जगह e का और जगह-जगह पर ii (दो बार आई) का इस्तेमाल तो एक आम-सी बात है। फिर इन धारावाहिकों के नाम के पहले अक्षर में 'क' की वही अहमियत है; जो वेदों में ओंकार की, नाज़ियों में स्वस्तिक की और मर्सिडीज़ कार में आगे लगे सितारे की होती है।
ख़ैर ये तो कुछ भी नहीं है जनाब ! इनकी कहानी तो देखने वालों का भेजा घुमा देती है। आपकी सारी पूर्वनिर्धारित धारणाएँ ध्वस्त हो जाती हैं। जैसे कि इन धारावाहिकों में दिखाए जाने वाले विभिन्न किरदारों को बार-बार 'संस्कारी' कहा जाता है। लीजिए, खा गए न गच्चा। अरे ये वो संस्कारी नहीं हैं, जो आप समझ रहे हैं। इनकी परिभाषा ज़रा हट कर है। अब आप पूछेंगे भला कैसे हटकर है? इनके अनुसार संस्कारी होने से मतलब उस इंसान से है; जिसके विवाहेतर सम्बन्ध हों, जो दूसरों की बातें बाहर से दरवाज़े पर कान लगाकर सुनने का चिर अभ्यासी हो, जो दूसरे को नीचा दिखाने का कोई भी मौक़ा न गंवाता हो और षड्यन्त्र करने में माहिर हो।
इन धारावाहिकों के सम्वाद बड़े ही उबाऊ होते हैं, लेकिन दर्शक फिर भी पूरी तल्लीनता से कान लगाकर इन्हें सुनते हैं। हालाँकि शुरु में सम्वाद-लेखक का नाम भी लिखा आता है, लेकिन मैं नहीं मानता कि ये सम्वाद किसी इंसान ने लिखे हैं। मुझे पूरा यक़ीन है कि ये सम्वाद कम्प्यूटरीकृत होते हैं। मेरे हिसाब से सम्वाद लिखने का काम कोई सॉफ़्टवेयर करता है, जो अपने सीमित डेटाबेस के 'संस्कार', 'सिंदूर', 'आदर्श', 'परम्परा', 'परिवार' और 'आदर' वगैरह शब्दों को randomly लगाकर नए-नए वाक्यों को गढ़ता रहता है। जैसे कि 'बुज़ुर्गों का आदर करना हमारे परिवार की परम्परा है' वगैरह वगैरह।
ये सभी 'क' अक्षर से शुरू धारावाहिक वक़्त बर्बाद करने के लिए बेहतरीन ज़रिया हैं। यदि आप खाली बैठे हैं और समय काटे नहीं कट रहा (भगवान करे ऐसा आपके साथ कभी न हो, क्योंकि ऐसा तो सिर्फ़ नौकरी छूटने के बाद ही होता है), तो अपना टीवी खोलें और ऐसा ही कोई धारावाहिक ज़रूर देखें। फिर मुझे बताएँ कि इन धारावाहिकों के बारे में मेरे विचार कितने सही हैं।
आदि काल से मनुष्य एक ऐसी शक्ति का प्रयोग करता रहा है, जो उसके विकास के लिए ज़िम्मेदार है। और यह शक्ति है 'विचार' की। यहाँ मैं विचार शब्द का इस्तेमाल कल्पना और सोचने से ज़्यादा प्रेक्षण के अर्थ में कर रहा हूँ, अवलोकन के अर्थ में कर रहा हूँ। मनुष्य ने जो भी प्रगति की है, वह प्रकृति के अवलोकन द्वारा ही की है। जहाँ विज्ञान की प्रगति बाह्य प्रकृति के अवलोकन का परिणाम हैं, वहीं अध्यात्म की प्रगति अंत:प्रकृति के सतत अवलोकन से हुई है।
लेकिन आज हालात बदल चुके हैं, जिसका ज़िम्मेदार इंसान का तकनीक को इस्तेमान करने का तरीक़ा है। कोई भी समस्या यह मौक़ा देती है कि उसका सामना किया जाए, उसे समझा जाए और उस पर विचार किया जाए। जिस तरह कसरत शरीर के लिए आवश्यक है, ठीक उसी तरह यह विचार, यह अवलोकन की क्रिया दिमाग़ के लिए ज़रूरी है। आज कोई भी समस्या सामने आने पर व्यक्ति उसका हल तुरंत इंटरनेट पर खोजने की कोशिश करता है, बजाय कि उस समस्या के सामने प्रेक्षक भाव से खड़े होने के, बजाय उस पर विचार करने के। और यह ज़हर की तरह घातक प्रवृत्ति धीरे-धीरे दिमाग़ को कुन्द कर रही है, ज़ंग लगा रही है।
ऐसी ही एक कहानी मैंने सुनी है कि संता सिंह के पास एक तलवार थी। तलवार पुरखों की थी और उस तलवार के बारे में कहा जाता था कि वह इतनी घातक है कि वह तलवार जिसके पास हो, उसके सामने पूरी सेना भी नहीं टिक सकती। संता सिंह उसे हमेशा अपने पास रखता था। उसका पड़ोसी बंता सिंह उस तलवार को पाना चाहता था। एक सुबह इसी बात को लेकर दोनों की आपस में कहा-सुनी हो गई। बंता ग़ुस्से में भर उठा और एक डण्डा उठाकर संता को मारने दौड़ा, संता - जिसके पास वह तलवार थी - हाथ में तलवार लिए बंता से बचने के लिए भागने लगा। बहुत दौड़ने के बाद बंता ने उसे पकड़ लिआ और डंडे से जमकर उसकी धुनाई की, साथ ही तलवार भी छीन ली। घर लौटने पर संता सिंह की पत्नी ने पूछा कि उसके पास तलवार थी तो फिर वो पिटा क्यों? इस पर संता बोला - "बहुत वक़्त से तलवारबाज़ी न करने की वजह से मैं तलवार चलाना भूल चुका हूँ, इसलिए लड़ते मैं तलवार डंडे की तरह इस्तेमाल कर रहा था। लेकिन बंता को तलवारबाज़ी आती है, इसलिए वह डण्डा भी तलवार की तरह चला रहा था। यही वजह है कि मैं पिट गया।" इंटरनेट भी हमारी विचार-शक्ति पर ऐसा ही दुष्प्रभाव डाल रहा है। हम तुरंत हल पाने के चक्कर में सोचने की क्षमता खोते जा रहे हैं।
किसी चीज़ का उपयोग अगर सही जगह पर किया जाए तो वह फ़ायदेमन्द होती है। सूचना के लेन-देन के लिए इंटरनेट महत्वपूर्ण है इसलिए सूचना के तल पर इसका इस्तेमाल वांछित है। लेकिन विचार के तल पर यह बहुत ख़तरनाक है। क्योंकि यह दिमाग़ को पराश्रित बनाता है। इंसान में यह प्रवृत्ति पुरानी है कि उसे पका-पकाया हल मिला जाए, लेकिन इंटरनेट से पहले यह आसान न था। इसलिए उसे अनमने तौर पर ही सही, लेकिन खुद ही विचार करना पड़ता था।
दुनिया की जितनी भी समस्याएँ हैं उसकी जड़ में एक ही चीज़ है - मनुष्य की दिक़्क़तों का 'रेडी मेड' हल पाने की इच्छा। मज़हब के नाम पर दुनिया भर में हुए इतने रक्तपात का क्या कारण है? यही कि लोगों ने जीवन समस्या का रेडी मेड हल खोजा और उससे जौंक की तरह चिपक गए। कुछ मुहम्मद के बताए हल से, कोई ईसा के हल से, दूसरे प्राचीन ऋषियों के बताए हल से चिपके रहे। और जड़ समाधानों से चिपका व्यक्ति मृत हो जाता है क्योंकि उसके विचार भी मृत हैं, वह उधार के विचारों से चिपका हुआ है। पहले यह हालात केवल आम ज़िन्दगी और धर्म के क्षेत्र में ही थे, विज्ञान इससे अछूता था। लेकिन इंटरनेट की विज्ञान में गहरी पैठ है और यह उसमें भी जड़त्व पैदा कर रहा है। अगर किसी प्रोग्रामर से पूछा जाए तो तुरंत पता चल जाएगा कि किसी समस्या के आने पर वह उस समस्या से विचार-शक्ति के साथ जूझता है या फिर उसे गूगल पर खोजता है? और धीरे-धीरे इंटरनेट का ऐसा इस्तेमाल तकनीक के क्षेत्र में भी पूरी तरह सड़ान्ध पैदा कर देगा, आज नहीं तो कल यह तय है। इसकी शुरुआत तो हो ही चुकी है। क्योंकि तकनीक से जुड़े लोग इस उधार के समाधान से पैदा हुए जड़त्व से बंध रहे हैं। हर इंसान उस समष्टि की इकाई है और अगर व्यष्टि के स्तर पर यह क्रमिक जरावस्था फैल रही है, तो समष्टि का भी उससे अछूता रह पाना मुमकिन नहीं है।
युवा और वृद्ध में क्या अंतर है? बस इतना ही कि युवा स्वतंत्र चिंतन में समर्थ है, उससे भयाक्रांत नहीं है। और यह स्वतंत्र विचारणा ही कुछ नया सीखने की क्षमता है। यही वजह है कि वृद्ध नया सीखने में अक्षम होने के कारण दिनों-दिन जड़ता की ओर खिसक रहा है - हर रोज़ मर रहा है - क्योंकि उसमें मौलिक सोच का साहस नहीं है, अपने पैरों पर खड़े होकर - अपने बल पर अज्ञात को खोजने की पिपासा नहीं है। इंटरनेट तरुणों की तरुणाई तोड़ रहा है, अज्ञात में निर्भीक होकर छलांग लगाने की क्षमता को तोड़ रहा है। उन्हें पराश्रित बना रहा है रेडी मेड समाधान दे कर।
मैं यह नहीं कहता कि इंटरनेट व्यर्थ है। यह सूचना के तल पर परम-उपयोगी है, लेकिन आगे बढ़ने के लिए चिंतन के तल पर इसे छोड़ना ज़रूरी है। इसलिए यह समझने की ज़रूरत है कि इसे कहाँ उपयोग करना है और कब नहीं। इस पर विचार करने की ज़रूरत है।
लाठी लेकर भालू आया चम चम चम ढोल बजाता मेंढक आया ढम ढम ढम मेंढक ने ली मीठी तान और गधे ने गाया गान
बहुत दिनों से इस कविता को खोज रहा था। आज मिली है। शायद कक्षा एक में यह कविता पढ़ी थी। अगर आपको इस कालजयी कविता के कवि, इस भारतीय मोज़ार्ट का नाम पता हो तो कृपया बताएँ। नहीं भी पता तो कम-से-कम कविता का आनन्द ले ही सकते हैं। :)
दोस्तों, हिन्दीब्लॉग्स.कॉम एक बार फिर हाज़िर है नए रूप-रंग के साथ। आख़िरकार इसने पुराने नीले रंग से पीछा छुड़ाने में क़ामयाबी पा ली है। हमारे पास इसके रूप और पठनीयता को लेकर क़ई सुझाव थे जिनमें से कुछ को मूर्त रूप देने का प्रयास किया गया है, जैसे कि इसके ख़ाके को तीन कॉलम की जगह दो कॉलम का कर दिया गया है, ताकि ब्लॉग पोस्ट्स के लिए ज़्यादा जगह मिल सके। मुख्यत: ये मनीष भाई के क़ीमती सुझावों का क्रियान्वयन है। फिर देर किस बात की, आप भी देखिए और सुझाव दीजिए - HindiBlogs.com.
एक और सप्ताहान्त के साथ हिन्दीब्लॉग्स डॉट कॉम में कुछ अन्य सुधार किये हैं। सबसे मुख्य परिवर्तन है होमपेज पर 60 प्रविष्टियां। इसके अलावा भी छोटे छोटे कई परिवर्तन किए हैं। कृपया देखें और अपने सुझाव दें।
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आज सुबह-सुबह मैंने अख़बार खोला (अर्र... ग़लत मत समझा करो, आज ही नहीं रोज़ ही खोलता हूँ यार और पढ़ता भी हूँ) तो पाया कि बांग्लादेश दौरे के लिए रवि शास्त्री को भारतीय क्रिकेट टीम का कोच और प्रबन्धक बना दिया गया है। "रवि शास्त्री" - यह नाम सुनते ही क्या याद आता है? याद आता है एक महा खुटर-खुटर बल्लेबाज़ जो शायद ही कभी रन बनाता हो। जिसके क्रीज़ पर आते ही जनता हूटिंग शुरु कर देती हो, हल्ला मचाने लगती हो। जिसे देखते ही लोग अपना टीवी बन्द कर देते हों। और जो फिर भी 'ऑलराउण्डर' कहलाता हो।
यह ख़बर सुनकर मुझे बड़ा धक्का लगा। इतना धक्का लगा कि हाथ से चाय का प्याला गिरते-गिरते बचा। बीसीसीआई वालों की बुद्धि पर बहुत ग़ुस्सा आया। लगा कि इससे बढ़िया तो अपना चैपल ही था, कम-से-कम उंगली तो करता रहता था। लेकिन ये जनाब तो उस लायक़ भी नहीं हैं। ख़ैर, फिर लगा कि हो सकता है मैं रवि शास्त्री को कुछ ज़्यादा ही अण्डर एस्टीमेट कर रहा हूँ।
उधर चैपल है कि कोच की क़ुर्सी जाने के बाद भी बयानबाज़ी की आदत है कि जाने का नाम ही नहीं ले रही है। चैपल ने फिर एक बार टीम के कई खिलाड़ियों पर (अगर उन्हें 'खिलाड़ी' कहा जा सहे तो...) कटाक्ष किए हैं और अपने चहेते सुरेश रैना की तारीफ़ की है। मैं कई लोगों से मिलना चाहता हूँ, जैसे - कैमरून डिआज़, ऐश्वर्या राय, सानिया मिर्ज़ा वगैरह वगैरह। इसी सूची में चैपल के 'रैना' का नाम भी है। शक़्ल से आप लोग वैसे ही समझदार लगते हैं, इसलिए बाक़ियों से क्यों मिलना चाहता हूँ यह तो नहीं बताऊँगा। हाँ, रैना से मिलने की ख़ास वजह है। रैना से मिलकर ये जानना चाहता हूँ कि चैपल के वशीकरण के लिए उसने कौन-से तांत्रिक टोटके का इस्तेमाल किया है। एक बार ऐसा तंत्र-मंत्र हाथ लग जाए ताकि अपनी लिस्ट के बाक़ी लोगों पर मैं भी उसे आज़मा कर देख सकूँ। :-)
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पिएँ खूब सारा पानी: हर रोज़ कम-से-कम आठ ग्लास पानी पिएँ। पानी आपको जोड़ों की परेशानियों से दूर रखता है, आपके शरीर की अन्दरूनी गन्दगी को साफ़ करता है और साथ ही आपकी त्वचा में ग़ज़ब की चमक लाता है। तो स्किनकेयर उत्पादों को उठाकर फैंक दीजिए और इस बेहतरीन फ़ॉर्मूले को इस्तेमाल करके देखिए।
दिन की शुरुआत करें नाश्ते से: रात भर की नींद के बाद एक बढ़िया नाश्ता आपके "खाली हो चुके टैंक" को ऊर्जा से भर देता है। इसलिए रोज़ाना सुबह-सुबह नाश्ता करें और दिन भर ऊर्जा से लबरेज़ रहें। हाँ, इतना ज़रूर याद रखें कि आपका नाश्ता प्रोटीन युक्त हो और उसमें वसा कम हो।
करें योग भगाएँ रोग: मैं हर दिन योग करता हूँ और मेरे ख़्याल से सभी को नियमित तौर पर योग करना चाहिए। योग में सभी तरह की शारीरिक और मानसिक समस्याओं को ठीक करने की ताक़त है। आसन शरीर को लचीला बनाते हैं और रोगों को दूर करते हैं। वैज्ञानिक शोध के मुताबिक़ योग के ज़रिए वज़न भी कम किया जा सकता है! लेकिन याद रखें, योग का मतलब सिर्फ़ तरह-तरह के आसन करना ही नहीं है। योग से पूरा फ़ायदा उठाने के लिए प्राणायाम और ध्यान करना भी ज़रूरी है।
न खाएँ ठूँस-ठूँस कर: अरे, कहीं आप भी तो उन लोगों में शुमार नहीं हैं जो अपने पेट को 'जंक फ़ूड' से ठूँस-ठूँस कर भर लेते हैं। अगर ऐसा है तो फ़ौरन इस आदत को छोड़ दीजिए। यह ख़राब आदत आपके ऊर्जा-स्तर को कम कर देती है। साथ ही आपकी तोंद आपकी ख़ूबसूरती में दाग़ लगा देती है। तली हुई मसालेदार चीज़ें खाने की बजाय फल, सब्ज़ियाँ और अनाज खाएँ। ये चीज़ें आपको ऊर्जा के लिए कार्बोहाइड्रेट देंगी और साथ ही वाइटामिन, खनिज और रुक्षांश (फ़ाइबर) जैसे दूसरे अहम पोषक-तत्व भी।
व्यायाम का करिश्मा: यक़ीन मानिए, कसरत करना वाक़ई मज़ेदार है। कसरत करने से आप ज़्यादा ख़ूबसूरत और मोहक लगेंगे। आपको दूसरे लड़के/लड़कियाँ सेक्सी कह कर पुकारेंगे। क्या व्यायाम शुरु करने के लिए इतना सब काफ़ी नहीं है? 'वॉर्म अप' से वर्जिश की शुरुआत करें ताकि आपकी मांसपेशियाँ भली-भाँति 'स्ट्रेच' हो जाएँ। फिर लगभग दस मिनट तक जॉगिंग वगैरह कोई ऐरोबिक क्रिया करें। इसके बाद कम-से-कम आधे घण्टे तक कसरत करें। फिर गहरी साँसे भरें और थोड़ी स्ट्रेचिंग करते हुए कसरत ख़त्म करें।
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