हिन्दी चिट्ठाकारी के तीन साल
हिन्दी ब्लॉग जगत में सालगिरह टाइप चीज़ें मनाने की ख़ासी परम्परा है, तो मैंने सोचा कि अपन भी इस परंपरा को निभाते हैं। हिन्दीं में आपको पकाते हुए यानि ब्लॉगिंग करते हुए आज तीन साल पूरे हो गए हैं। अपने तब के ब्लॉग पर पहली पोस्ट 31 मई 2004 को ही लिखी थी। पहली पोस्ट पर विजय जी, शैल जी और विनय जी की टिप्पणियाँ आते ही दिल "बरखा में मोर" सा नाचने लगा था। हाँ, उससे पहले डायनमिक फ़ॉण्ट वगैरह झमेले कर के देख चुका था, लेकिन वो सब कुछ ख़ास काम के नहीं लगे। फिर धीरे-धीरे यहाँ एक परिवार मिल गया। जिनसे जुड़ाव की शुरुआती वजह तो हिन्दी ब्लॉगिंग थी, लेकिन बाद में दिल का दिल से रिश्ता जुड़ गया..... भले ही ये सब थोड़ी फ़िल्मी डायलॉगबाज़ी लग रही है, लेकिन मैं यह मानकर कि आप झेलने में सक्षम हैं, जारी रखता हूँ।हाँ, तो मैं कह रहा था कि जब मैंने हिन्दी में ब्लॉग बनाया तो मुझे लगा कि कोई बड़ा क्रांतिकारी काम मेरे हाथों से हो गया है, कि मैंने हिन्दी का पहला ब्लॉग बना लिया है। लेकिन विनय जी और आलोक जी जैसे तोप टाइप लोग पहले-से मौजूद मिले तो यह ख़ुशफ़हमी फ़ौरन छू हो गई। जहाँ तक मुझे याद पड़ता है, उस वक़्त तक़रीबन आठ ब्लॉग रहे होंगे हिन्दी में। दु:ख की बात है उनमें से बहुतों ने अब लिखना बंद कर दिया है। लेकिन ख़ुशी यह है कि बहुतेरे किसी स्पेशल चक्की का आटा खाकर अभी भी मैदान में डटे हैं। तो जो लोग डटे हुए हैं उनसे गुज़ारिश है कि चक्की के नाम या अगर पैक्ड आटा इस्तेमाल कर रहे हों तो आटे के ब्राण्ड का खुलासा करें, ताकि दूसरे लोग भी उसे हजम करके यहाँ वर्चुअल पन्नों को सालों-साल तलक काला कर सकें और हिन्दी ब्लॉगिंग को आगे ले जा सकें। आज आप लोगों का काफ़ी वक़्त ज़ाया किया, अपने चिट्ठे की अगली सालगिरह से पहले फिर मिलने का संकल्प लेते हुए विदाई लेता हूँ। नमस्कार।
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