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Wednesday, November 07, 2007

प्रेम और समाधि पर भारी रसायन विज्ञान

Love, supesrconsciousness & Chemistryआज सुबह नेशनल जियोग्राफ़िक चैनल पर एक कार्यक्रम आ रहा था – नेकिड साइंस। इसमें मानवीय प्रेम का वैज्ञानिक तौर पर विश्लेषण किया गया था। विश्लेषण से पता चला कि प्रेम कोई हाईफ़ाई फ़ण्डा नहीं है, बल्कि महज़ दिमाग़ में होने वाला केमिकल लोचा है। यानी कि परीक्षणों से पता चला कि जब कोई इंसान प्रेम में होता है, तो उसके दिमाग़ के एक ख़ास हिस्से में कुछ रासायनिक क्रियाएँ होती हैं। ये रासायनिक क्रिया काफ़ी कुछ वैसी ही होती है, जैसी कोकीन खाने से मस्तिष्क में क्रिया होती हैं और दोनों के लक्षण समान होते हैं। लो कल्लो बात! विज्ञान ने तो दो मिनट में प्रेम की ऐसी-तैसी कर दी। कवियों के हज़ारों साल के किए-धरे पर पानी फेर दिया।

लेकिन बस इतना ही होता तो ठीक था। दोपहर में निठल्ली सर्फ़िंग के दौरान एक वेबसाइट देखी। जिनकी यह वेबसाइट है, उन महाशय का कहना है कि समाधि-वमाधि कोई परादैवीय घटना नहीं है। ध्यान करने से दिमाग़ में रासायनिक परिवर्तन होने लगते हैं। जिन लोगों की खोपड़ी में ये रासायनिक परिवर्तन ज़्यादा हो जाते हैं, वे ऐनलाइटेण्ड कहलाते हैं। उन्हें कुछ अजीब तरह की अनुभूति होने लगती है। वैसी अनुभूति टेम्परेरी तौर पर एलएसडी नामक ड्रग लेकर भी पायी जा सकती है। साथ ही उन महाशय का यह भी कहना है कि हिन्दुस्तानी खोपड़ी की संरचना इस कैमिकल लोचे के लिए ज़्यादा अनुकूल है। इसीलिए हिन्दुस्तानी ख़ासे आराम से एनलाइटेंड हो जाते हैं। वहीं पश्चिमी लोग ज़िन्दगी भर भले ध्यान करते रहें, उनकी खोपड़ी की डिज़ाइन उनका साथ नहीं देती है।

अब क्या कहें? रसायन विज्ञान की जय हो। स्कूल में फ़िज़िकल कैमिस्ट्री तो ठीक लगती थी, लेकिन ऑर्गेनिक-इनॉर्गेनिक झिलाय नहीं झिलती थीं। पर हमें तब क्या मालूम था कि ये प्यार-व्यार, समाधि-वमाधि रसायन विज्ञान की एक कला के बराबर भी नहीं है। वरना तभी मन लगाकर पढ़ाई करते और परखनली से अपने सिर में कुछ अच्छे-अच्छे रसायन उढ़ेल लेते।

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Monday, June 25, 2007

एक अजीब ख़्याल

mysterious universeक्या हो अगर सूरज धरती के चारों ओर चक्कर लगाए, दो पिण्ड आपस में एक-दूसरे को आकर्षित करने की बजाय दूर धकेलें, प्रकाश की रफ़्तार कुछ ज़्यादा या कम हो जाए, परमाणु के नाभिक में इलेक्ट्रॉन भी शामिल हो वगैरह वगैरह? आपको भले ये सब ऊलजलूल कल्पना मालूम हो, लेकिन हाल में यह विचार मुझे आंइस्टीन द्वारा प्रतिपादित सापेक्षिकता के सिद्धांत (Theory of Relativity by Elbert Einstein) को पढ़ते वक़्त आया। हुआ ऐसा कि इसे पढ़ने के बाद ख़्याल आया कि सूरज के सापेक्ष पृथ्वी उसके चारों ओर घूमती है, वहीं पृथ्वी के सापेक्ष तो सूरज ही पृथ्वी के चारों ओर घूमता है।

फिर यह विचार कौंधा कि गुरुत्वाकर्षण आदि विज्ञान के जितने भी नियम हैं, वो बार-बार घटित होने वाली घटनाओं पर ही आधारित हैं। यानी कि पेड़ से टूटकर सेब हर बार धरती पर ही गिरा – इसे हमने गुरुत्वाकर्षण का नियम बना दिया। इसके पीछे कोई तर्क, कोई लॉजिक नहीं है कि ऐसा होना-ही-होना है। विज्ञान इस बारे में कुछ नहीं कहता कि क्यों दो पिण्ड एक-दूसरे को खींचते हैं, क्यों असमान चार्ज आकर्षित होते हैं, क्यों प्रकाश की चाल उतनी ही है जितनी कि है। ऐसे में यह ज़रूरी नहीं है कि इतने बड़े ब्रह्माण्ड में हर जगह ऐसा ही होता हो। हो सकता है सुदूर ब्रह्माण्ड में कहीं पर प्रकाश धीमा चलता हो, हो सकता है कि वहाँ गुरुत्वाकर्षण की बजाय गुरुत्व-प्रतिकर्षण हो यानी पेड़ से टूटकर सेब ऊपर चला जाता हो, परमाणु के आख़िरी कोश में दस इलेक्ट्रॉन होते हों आदि आदि। तो वहाँ कुछ और ही विज्ञान होगा और कुछ और ही उसके नियम होंगे। आपको क्या लगता है? क्या ऐसा हो सकता है? साथ में मुझे कबीर का ऐसा ही विचित्र छन्द याद आता है जो विज्ञान के उलट बात करता है, न जाने क्या सोचकर कबीर ने लिखा होगा -

अम्बर बरसे धरती भीजे, ये जाने सब कोय।
धरती बरसे अम्बर भीजे, बूझे बिरला कोय॥

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