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Tuesday, August 14, 2007

दो बार अवतरित होते-होते रह गए बुद्ध

J Krishnamurtiआज ज्ञानदत्तजी ने कहा कि अगर बुद्ध पैदा होना चाहेंगे तो कोई नहीं रोक सकता, बस ज़रूरत है तो सही परिस्थितियों की। भगवान बुद्ध ने वचन दिया था कि वे मैत्रेय के रूप में फिर आएंगे। शायद यही कारण है कि पिछली सदी में दो बार यह घोषित किया जा चुका है कि बुद्ध आ गए हैं। सृजन शिल्पी जी यह पहले ही अपनी पोस्ट ‘जब बुद्ध ढ़ाई हज़ार साल बाद फिर लौटे’ में बतला चुके हैं कि १९८८ में किस तरह ओशो ने यह घोषणा की थी मैत्रेय बुद्ध की आत्मा उनमें प्रविष्ट हो गई है। हालाँकि कुछ ही दिनों बाद ओशो ने कहा कि मैत्रेय उनके शरीर को छोड़ चुके हैं, क्योंकि परिस्थितियाँ अभी अनुकूल नहीं हैं।

इससे पहले भी थोयोसॉफ़िकल सोसायटी द्वारा बड़े पैमाने पर मैत्रेय बुद्ध की आत्मा के आगमन की तैयारी की गई थी। इसके लिए थियोसॉफ़िस्ट्स द्वारा बचपन से ही जे कृष्णमूर्ति को मैत्रेय की आत्मा के वहन के लिए ख़ास तौर पर तैयार किया गया था। मैत्रेय बुद्ध के आगमन के लिए एक संगठन भी खड़ा किया गया – ऑर्डर ऑफ़ द स्टार। जिसका प्रमुख जे कृष्णमूर्ति को घोषित किया गया था। इस संगठन के लगभग सत्तर हज़ार सदस्य थे, जो कृष्णमूर्ति को बुद्ध का अवतार समझते थे। लेकिन जे कृष्णमूर्ति वाक़ई बुद्ध की तरह ही क्रांतिकारी विचारों के निकले और सन् १९२९ में एक प्रसिद्ध व्याख्यान के ज़रिए उन्होंने ‘ऑर्डर ऑफ़ द स्टार’ को भंग कर दिया। कृष्णमूर्ति ने अपने व्याख्यान में कहा –

“सत्य एक मार्गविहीन मंज़िल है और कोई भी सत्य तक किसी भी मज़हब या सम्प्रदाय के माध्यम से नहीं पहुँच सकता है। यह मेरा दृष्टिकोण है और मैं इससे पूर्णतः सहमत हूँ। सत्य; जोकि निःसीम, बिनाशर्त, पथविहीन है, संगठित नहीं किया जा सकता है और न ही ऐसा कोई संगठन खड़ा किया जा सकता है जो लोगों को सत्य की तरफ़ ले जाने का दावा कर सके। ...” पूरा भाषण यहाँ पढ़ा जा सकता है।

जिद्दू कृष्णमूर्ति द्वारा मैत्रेय होने की बात नकारे जाने पर उनसे सब कुछ ले लिया गया, जो भी ‘ऑर्डर ऑफ़ द स्टार’ के सदस्यों और थियोसॉफ़िस्ट्स द्वारा उन्हें दिया गया था। हालाँकि इसके बाद भी कृष्णमूर्ति ने अपनी शिक्षाएँ देना जारी रखा और पूरी दुनिया में, ख़ास तौर पर भारत, अमेरिका और ब्रिटेन में अपने स्वतंत्र विचारों से लोगों को परिचित कराते रहे।

पढ़िए:
१. जे कृष्णमूर्ति की प्रसिद्ध किताब ‘द फ़र्स्ट एण्ड द लास्ट फ़्रीडम’
२. जे कृष्णमूर्ति का सम्पूर्ण साहित्य

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