बस, ट्रेन और तरह-तरह के प्राणी
हाल में मेरी परीक्षाएँ ख़त्म हुई हैं और मैं काफ़ी घूम-फिर रहा हूँ। अब सौभाग्य या दुर्भाग्य से मैं कोई करोड़पति तो हूँ नहीं, इसलिए अक़्सर बस और ट्रेन के जनरल कम्पार्टमेण्ट में यात्रा करता हूँ। इनमें यात्रा करने का एक अलग ही मज़ा है, जो आपको हवाई-जहाज़ में यात्रा करके नहीं मिल सकता है।
अगर आप कभी ट्रेन के जनरल डिब्बे में सफ़र करें तो पाएँगे कि वहाँ लोग कभी ख़ामोश नहीं बैठे होते हैं। हमेशा धर्म, अध्यात्म, अर्थशास्त्र जैसे किसी-न-किसी गूढ़ विषय पर चर्चा चल रही होती है। एक-से-एक धुर विद्वान टाइप के लोग यहाँ मिलते हैं। लेकिन अगर आपमें सुनने की कुव्वत नहीं है तो कभी इन चर्चाओं में टांग नहीं अड़ानी चाहिए। कुछ दिनों पहले मैं दिल्ली से आगरा जा रहा था तो इसी तरह की एक चर्चा में फँस गया। चर्चा का विषय था अर्थशास्त्र और आम से दिखने वाले लोग 'गहन विवेचनाएँ' कर रहे थे। तभी ग़लती से एक बच्चे ने 'अंकल चिप्स' का पैकेट ख़रीद लिया, फिर तो कई 'आम इंसानों की खाल में उद्भट विद्वान' लोग उस पर टूट पड़े।
पान की पीक सीट के नीचे थूकते हुए एक चश्माधारी सज्जन बोले, "यह देखिए तो ज़रा... देश का पैसा बाहर जा रहा है।"
यह सुनते ही वह बच्चा और मैं दोनों घबरा गए। मैं इसलिए घबराया कि अब ये लोग बहुत झिलाएंगे और बच्चा इसलिए कि पैसे तो उसने चाय-चिप्स वाले को दिए, बाहर कैसे चले गए?
इतने में बीड़ी सुलगाते हुए दूसरे सज्जन ने कहा, "यहाँ 'मांग की लोच' बढ़ाने के लिए बच्चों का दिमाग़ विकृत किया जा रहा है। सब उदारीकरण का दोष है।"
फिर एक बोला, "लेकिन थोड़े वक़्त में इसके लाभ 'ऊपर' से रिसकर 'नीचे' आम आदमी तक पहुँचेंगे और उदारीकरण से आख़िरकार फ़ायदा ही होगा।"
इस तरह एक अंतहीन चर्चा शुरू हो गई। मैं और वह बच्चा, दोनों ही सो गए। शायद बच्चा भी टीवी की तेज़ आवाज़ में सोने का अभ्यस्त होगा।
इन 'विद्वानों' के अलावा भी कई ख़ास प्रजातियों के प्राणी बसों-ट्रेनों में पाए जाते हैं। ऐसी ही एक प्रजाति है 'बाबू' लोगों की। इन्हें पहचानने का तरीक़ा यह है कि इनके बालों में इतना तेल लगा होता है कि अगर निचोड़ कर घर ले जाया जाए तो दो-तीन रोज़ का खाना बन सकता है, ये हमेशा सफ़ारी सूट धारण करते हैं और एक ख़ास तरह का चमड़े का झोला अपने पास रखते हैं, अस्सी के दशक का काला चश्मा पहनते हैं जैसा 'बंटी और बबली' में अमिताभ बच्चन पहनता था, हर दिन अप-डाउन करते हैं और हमेशा समूह में रहते हैं। कुल मिलाकर कह सकते हैं कि कोका कोला के 'छोटा कोक पाँच रुपये' वाले विज्ञापन में आमिर ख़ान की जैसी शक्ल-सूरत थी, इनकी भी कमोबेश वैसी ही होती है। ये लोग बहुत ही ख़तरनाक होते हैं। ये लोग भारी तादाद में चढ़ते हैं और चार लोगों की सीट पर छ: से लेकर आठ लोग तक बैठते हैं, जिसमें आपकी हालत सेण्ड्विच के बीच उस आलू जैसी हो जाती है जो कसमसाने के सिवा और कुछ नहीं कर सकता है। फिर ट्रेन चलते ही ये लोग ताश की गड्डी निकालकर खेलने लगते हैं। और यह खेल महज़ टाइमपास के लिए नहीं खेलते, बल्कि बहुत गंभीरता से खेलते हैं और एक काग़ज़ पर प्वाइंट वगैरह भी नोट करते रह्ते हैं। बीच में दबे-पिसे आप बैठे-बैठे खीझ तो सकते हैं पर इनसे कुछ कह नहीं सकते, क्योंकि इनकी तादाद काफ़ी ज़्यादा होती है। कुछ कह कर फ़ायदा भी नहीं होता, क्योंकि ये आपकी सुनते भी नहीं हैं।
फिर आपको यात्रा के दौरान बहुत से 'सफ़रिया रंगबाज़' भी मिलेंगे। कम-से-कम मुझे तो बस-ट्रेन में हर बार दो-एक तो मिलते ही हैं। हाँलाकि दिखने में ये लोग पिद्दी होते हैं, लेकिन सफ़र के दौरान रंगबाज़ी करने से बाज़ नहीं आते हैं। आप जैसे ही खिड़की के पास वाली सीट पर बैठने वाले होंगे, एक लहराता हुआ रुमाल (जिससे नाक पोंछी गई हो) न जाने कहीं से सीट पर आ गिरेगा। इस रुमाल को कोई आम रुमाल समझकर लाइटली नहीं लेना चाहिए, दरअसल यह किसी सफ़रिया रंगबाज़ के आने की पूर्व-सूचना होता है। सो आपको रुमाल देखते ही सावधान हो जाना चाहिए और अपनी सीट के लिए जूतम-पैजार करने की तैयारी कर लेनी चाहिए। दरअसल इस रूमाल की अद्भुत शक्ति यह है कि यह जिस जगह पर भी गिरेगा, वह जगह सफ़रिया रंगबाज़ की हो जाती है। बस और ट्रेन में तो चलो ठीक भी है, लेकिन किसी दिन ऐसा न हो कि ये लोग ताजमहल, लालक़िला या राष्ट्रपति भवन पर रुमाल डालकर उन्हें भी कब्ज़ा लें।
'सफ़रिया रंगबाज़' का महिला संस्करण भी कभी-कभी देखने को मिलता है। ये अपने छोटे-छोटे बच्चों से रुमाल का काम लेती हैं। अरे यार, हाथ-मुँह पोंछने के लिए नहीं बल्कि सीट कब्ज़ाने के लिए। अगर आप भी मेरी ही तरह ख़ुद पर 'सज्जन' होने की चिप्पी चिपकाए घूमते हैं, तो 'सफ़रिया रंगबाज़' के इस महिला संस्करण से अपनी सीट मुक्त कराना "मुश्किल ही नहीं नामुमकिन भी है।" क्योंकि महिलाओं और बच्चों से लड़ाई-झगड़ा भी नहीं किया जा सकता है।
जैसे-जैसे आप ऊँचे दर्ज़े की ओर जाते हैं, ऐसे लोग और इसीलिए मज़े भी कम होते जाते हैं। हवाईजहाज़ में मैंने जब भी सफ़र किया है (बताना ज़रूरी है कि मैंने भी हवाईजहाज़ में सफ़र किया है :-) तो यही पाया कि आपका सहयात्री पूरी कोशिश करेगा कि आपसे कम-से-कम 'इंटरेक्शन' हो। इसलिए हवाईजहाज़ और ट्रेन के फ़र्स्ट क्लास में वो आनन्द नहीं हैं, जो बस और रेल के जनरल कम्पार्टमेण्ट में हैं। क्या कहते हैं आप?
अगर आप कभी ट्रेन के जनरल डिब्बे में सफ़र करें तो पाएँगे कि वहाँ लोग कभी ख़ामोश नहीं बैठे होते हैं। हमेशा धर्म, अध्यात्म, अर्थशास्त्र जैसे किसी-न-किसी गूढ़ विषय पर चर्चा चल रही होती है। एक-से-एक धुर विद्वान टाइप के लोग यहाँ मिलते हैं। लेकिन अगर आपमें सुनने की कुव्वत नहीं है तो कभी इन चर्चाओं में टांग नहीं अड़ानी चाहिए। कुछ दिनों पहले मैं दिल्ली से आगरा जा रहा था तो इसी तरह की एक चर्चा में फँस गया। चर्चा का विषय था अर्थशास्त्र और आम से दिखने वाले लोग 'गहन विवेचनाएँ' कर रहे थे। तभी ग़लती से एक बच्चे ने 'अंकल चिप्स' का पैकेट ख़रीद लिया, फिर तो कई 'आम इंसानों की खाल में उद्भट विद्वान' लोग उस पर टूट पड़े।
पान की पीक सीट के नीचे थूकते हुए एक चश्माधारी सज्जन बोले, "यह देखिए तो ज़रा... देश का पैसा बाहर जा रहा है।"
यह सुनते ही वह बच्चा और मैं दोनों घबरा गए। मैं इसलिए घबराया कि अब ये लोग बहुत झिलाएंगे और बच्चा इसलिए कि पैसे तो उसने चाय-चिप्स वाले को दिए, बाहर कैसे चले गए?
इतने में बीड़ी सुलगाते हुए दूसरे सज्जन ने कहा, "यहाँ 'मांग की लोच' बढ़ाने के लिए बच्चों का दिमाग़ विकृत किया जा रहा है। सब उदारीकरण का दोष है।"
फिर एक बोला, "लेकिन थोड़े वक़्त में इसके लाभ 'ऊपर' से रिसकर 'नीचे' आम आदमी तक पहुँचेंगे और उदारीकरण से आख़िरकार फ़ायदा ही होगा।"
इस तरह एक अंतहीन चर्चा शुरू हो गई। मैं और वह बच्चा, दोनों ही सो गए। शायद बच्चा भी टीवी की तेज़ आवाज़ में सोने का अभ्यस्त होगा।
इन 'विद्वानों' के अलावा भी कई ख़ास प्रजातियों के प्राणी बसों-ट्रेनों में पाए जाते हैं। ऐसी ही एक प्रजाति है 'बाबू' लोगों की। इन्हें पहचानने का तरीक़ा यह है कि इनके बालों में इतना तेल लगा होता है कि अगर निचोड़ कर घर ले जाया जाए तो दो-तीन रोज़ का खाना बन सकता है, ये हमेशा सफ़ारी सूट धारण करते हैं और एक ख़ास तरह का चमड़े का झोला अपने पास रखते हैं, अस्सी के दशक का काला चश्मा पहनते हैं जैसा 'बंटी और बबली' में अमिताभ बच्चन पहनता था, हर दिन अप-डाउन करते हैं और हमेशा समूह में रहते हैं। कुल मिलाकर कह सकते हैं कि कोका कोला के 'छोटा कोक पाँच रुपये' वाले विज्ञापन में आमिर ख़ान की जैसी शक्ल-सूरत थी, इनकी भी कमोबेश वैसी ही होती है। ये लोग बहुत ही ख़तरनाक होते हैं। ये लोग भारी तादाद में चढ़ते हैं और चार लोगों की सीट पर छ: से लेकर आठ लोग तक बैठते हैं, जिसमें आपकी हालत सेण्ड्विच के बीच उस आलू जैसी हो जाती है जो कसमसाने के सिवा और कुछ नहीं कर सकता है। फिर ट्रेन चलते ही ये लोग ताश की गड्डी निकालकर खेलने लगते हैं। और यह खेल महज़ टाइमपास के लिए नहीं खेलते, बल्कि बहुत गंभीरता से खेलते हैं और एक काग़ज़ पर प्वाइंट वगैरह भी नोट करते रह्ते हैं। बीच में दबे-पिसे आप बैठे-बैठे खीझ तो सकते हैं पर इनसे कुछ कह नहीं सकते, क्योंकि इनकी तादाद काफ़ी ज़्यादा होती है। कुछ कह कर फ़ायदा भी नहीं होता, क्योंकि ये आपकी सुनते भी नहीं हैं।
फिर आपको यात्रा के दौरान बहुत से 'सफ़रिया रंगबाज़' भी मिलेंगे। कम-से-कम मुझे तो बस-ट्रेन में हर बार दो-एक तो मिलते ही हैं। हाँलाकि दिखने में ये लोग पिद्दी होते हैं, लेकिन सफ़र के दौरान रंगबाज़ी करने से बाज़ नहीं आते हैं। आप जैसे ही खिड़की के पास वाली सीट पर बैठने वाले होंगे, एक लहराता हुआ रुमाल (जिससे नाक पोंछी गई हो) न जाने कहीं से सीट पर आ गिरेगा। इस रुमाल को कोई आम रुमाल समझकर लाइटली नहीं लेना चाहिए, दरअसल यह किसी सफ़रिया रंगबाज़ के आने की पूर्व-सूचना होता है। सो आपको रुमाल देखते ही सावधान हो जाना चाहिए और अपनी सीट के लिए जूतम-पैजार करने की तैयारी कर लेनी चाहिए। दरअसल इस रूमाल की अद्भुत शक्ति यह है कि यह जिस जगह पर भी गिरेगा, वह जगह सफ़रिया रंगबाज़ की हो जाती है। बस और ट्रेन में तो चलो ठीक भी है, लेकिन किसी दिन ऐसा न हो कि ये लोग ताजमहल, लालक़िला या राष्ट्रपति भवन पर रुमाल डालकर उन्हें भी कब्ज़ा लें।
'सफ़रिया रंगबाज़' का महिला संस्करण भी कभी-कभी देखने को मिलता है। ये अपने छोटे-छोटे बच्चों से रुमाल का काम लेती हैं। अरे यार, हाथ-मुँह पोंछने के लिए नहीं बल्कि सीट कब्ज़ाने के लिए। अगर आप भी मेरी ही तरह ख़ुद पर 'सज्जन' होने की चिप्पी चिपकाए घूमते हैं, तो 'सफ़रिया रंगबाज़' के इस महिला संस्करण से अपनी सीट मुक्त कराना "मुश्किल ही नहीं नामुमकिन भी है।" क्योंकि महिलाओं और बच्चों से लड़ाई-झगड़ा भी नहीं किया जा सकता है।
जैसे-जैसे आप ऊँचे दर्ज़े की ओर जाते हैं, ऐसे लोग और इसीलिए मज़े भी कम होते जाते हैं। हवाईजहाज़ में मैंने जब भी सफ़र किया है (बताना ज़रूरी है कि मैंने भी हवाईजहाज़ में सफ़र किया है :-) तो यही पाया कि आपका सहयात्री पूरी कोशिश करेगा कि आपसे कम-से-कम 'इंटरेक्शन' हो। इसलिए हवाईजहाज़ और ट्रेन के फ़र्स्ट क्लास में वो आनन्द नहीं हैं, जो बस और रेल के जनरल कम्पार्टमेण्ट में हैं। क्या कहते हैं आप?
Labels: timepass
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