मैं बच्चा जरूर था, लेकिन बदबख्त व नालायक नहीं था. मैंने न आँसू जमा किये और न दिल के टुकड़े और न ही मुझे कभी उनके साथ खेलने में दिलचस्पी रही जैसा कि दूसरे तमाम लड़के किया करते थे. इसके बरअक्स मैं शुरू ही से बड़ा रख-रखाव वाला और संजीदा किस्म का लड़का था, दूसरों से अलग-थलग और अपनी ही धुन में मगन रहने वाला.
इसके बावजूद जलावतनी के वक्त मैं भी दूसरे लड़कों के साथ था, हालाँकि मैं उनकी तरह मुजरिम नहीं था. उस वक्त जब मैं छोटा ही था और अभी-अभी होश सम्भाला था कि एक किताब मेरे पढ़ने में आयी. वो किताब चींटियों के देश के बारे में थी. उसे मेरे पिता ने माँ के आग्रह पर ख़ासतौर पर मेरे लिए कहीं से हासिल किया था.
वो किताब मुझे जरा भी पसंद न आयी. अब मेरे लिए यह फैसला करना मुश्किल था कि मैं उसका क्या करूं, क्योंकि नापसन्दीदा चीजों के बारे में हमेशा ही से मैं इसी तरह की उलझन से दो-चार होता हूँ, जबकि अपनी पसन्द की चीजों के मुताल्लिक़ मुझे ऐसी किसी उलझन का सामना नहीं करना पड़ता.
वो किताब मेरे पास थी. दो मौसम गर्मी और वसन्त इसी तरह गुजर गये, यहाँ तक कि सर्दी भी आ पहुँची. इसी मौसम की एक रात मैंने अपनी माँ को अंगीठी सुलगाते हुए देखा. मैं दौड़ा-दौड़ा गया और किताब लाकर अंगीठी में डाल दी. मैं दिल ही दिल में खुश हो रहा था कि मैंने आग सुलगाने में अपनी माँ की मदद की है. अचानक मेरी माँ की कड़कदार आवाज सुनायी दी. वो मुझे सख्त-सुस्त कर रही थी. माँ की आवाज सुनकर अब्बा भी दूसरे कमरे से दौड़े-दौड़े आये और मुआमला जानने के लिए पूछने लगे. माँ ने सारा माजरा कह सुनाया. वो मुझ पर बरसने लगे, तुझे इसके अलावा और कोई किताब नहीं मिली थी ? यह सबसे अच्छी किताब थी. इसकी अहमियत हर जगह और हर जमाने में क़ायम रही है. हम तेरे लिए जो किताबें लाते हैं, सही बात यह है कि तू उनका हक़दार ही नहीं है.
वो मेरे कमरे में गये. मेरी तमाम किताबों को इकट्ठा किया और उन सबको भी आग में झोंक दिया. आग के शोले भड़क उठे. आग ने अपने दाँत सर्दी के चेहरे में गाड़ दिये. मैं बहुत खुश हुआ, क्योंकि सर्दी मुझे बिलकुल भी पसन्द नहीं.
दोनों बिलकुल ख़ामोश खड़े आग को देखते रहे यहाँ तक कि वो राख के ढेर में तब्दील हो गयी. और फिर मुझसे कहने लगे, तुझे किताबें कुछ भी फ़ायदा नहीं पहुँचा सकतीं. तू जो कुछ भी सीख सकेगा, सिर्फ जिंदगी के अनुभवों ही से सीख सकेगा.
उन्होंने मेरी शिक्षा-दीक्षा का जो मुनासिब रास्ता तलाश किया था, उसमें एक घटना ने उनकी मदद की. हुआ यूँ कि अगले ही दिन अब्बा के एक दोस्त का इंतिक़ाल हो गया. उन्होंने माँ से कहा, इसको जरा साफ-सुथरे कपड़े पहना दो, मुझे अपने एक दोस्त के यहाँ शोक प्रकट करने के लिए जाना है. मैं चाहता हूँ कि इसको भी साथ लेता जाऊँ.
अब्बा ने मेरा हाथ पकड़ा और मैयत वाले घर की तरफ़ चल दिये.
हम घर में दाखिल हुए. यहाँ बहुत सारे लोग जमा थे. हम भी ख़ामोशी के साथ रुआँसे और बुझे-बुझे चेहरों के सामने बैठ गये. घर में रोशनी बहुत कम थी और लोग ग़म में डूबे हुए अपने मुँह लटकाये बैठे थे, इसलिए उनके चेहरे साफ दिखाई नहीं दे रहे थे.
मैं यह नहीं मालूम कर पा रहा था कि इनमें मुर्दा कौन है ? जिससे मुझे जिंदगी की हकीकत जानना है और जिस ख़ास मकसद के तहत अब्बा मुझे यहाँ लेकर आये हैं, इसलिए मैं लोगों के चेहरों को झाँक-झाँककर देखने लगा कि मैयत का पता लगा सवूफँ. मगर मैं अपनी कोशिश में नाकाम रहा. मैयत कहाँ है ? मैंने अब्बा से सरगोशी से पूछा. जनाज़े की मौजूदगी में तमीज से रहो. उन्होंने डांटते हुए कहा. मैं ख़ामोश हो गया. फिर भी मैयत को तलाश करने की अपनी-सी कोशिश जारी रखी.
मैं इसी उधेड़बुन में लगा हुआ था कि क़रीब से किसी के खंखारने की आवाज आई जैसे वो कुछ कहने की कोशिश में अपना गला साफ़ कर रहा हो. और फिर उसने निहायत संजीदगी और विचारपूर्ण अन्दाज में कहना शुरू किया, हमेशा रहने वाली ज़ात अल्लाह की ज़ात है और यह दुनिया तो बस, एक गुज़रगाह है. जो इन्सान को उसके आख़िरी ठिकाने तक छोड़ती है. इस दुनिया में हमारी जिम्मेदारी यह है कि हम इस गुजरगाह से बड़ी खूबी से गुजर जाएँ. अगर हम अल्लाह की मख़्लूक़ से सीखने और सबक़ हासिल करने की कोशिश करें, तो दुनिया व आख़िरात का सौभाग्य अपने दामन में समेट सकते हैं. अल्लाह की सबसे छोटी मख़्लूक़ चिंऊंटी है. अगर हम इसी से सीखने की कोशिश करें, तो हमें बहुत कुछ हासिल हो सकता है. चींटियाँ अपनी बस्ती में किस तरह ज़िन्दगी गुजारती हैं और किस तरह खुशी व मजबूत इरादों के साथ अपनी जिन्दगी को बनाती हैं, इनकी जिन्दगी में हम सबके लिए सबक़ का बहुत कुछ सामान मौजूद है.
मुझसे रहा न गया. मैं अपने अब्बा के पहलू से उठा और मकान के दरमियान में खड़ा होकर बुलन्द आवाज में बोलना शुरू किया, हमें चिंऊंटियों से कुछ भी सीखने की जरूरत नहीं. वो बुराइयों का पुलिन्दा होती हैं उनमें कुछ भी भलाई नहीं होती. उसकी सरगर्मियाँ बेमानी होती हैं. मुझे चींटी बिलकुल भी पसन्द नहीं. वो गर्मियों के पूरे मौसम में अपने क़द से बड़े आकार के दाने उठाये फिरती हैं और उन्हें जमा करती रहती हैं ताकि सर्दियों में आराम से बैठकर खा सके. यह कैसी आरामतलबी और सुस्ती है. मैं झींगुर को इससे बेहतर समझता हूँ जो गर्मियों में गाता रहता है और सर्दियों में भूखा रहकर सब्र व सुकून से बैठा रहता है.
पहले तो लोगों को बड़ी हैरानी हुई. वो सोचने लगे कि एक छोटे-से बच्चे की ऐसी जुर्रत ? मगर जब मैंने आगे कहना शुरू किया, तुम चींटियों से क्यों सीखना चाहते हो, शायद इसलिए कि तुम भी इसी जैसे हो. चींटियों की सिर्फ़ यह ख़ासियत है कि वो बड़े पैमाने पर जख़ीरा करना चाहती है ताकि उसको खा-खाकर बड़े पैमाने पर चींटियाँ मर सकें. तो, लोग नारॉज हो गये और गुस्से के कड़वे घूँट पीकर रह गये. मेरे अब्बा अपनी जगह से उठे और मेरा हाथ पकड़कर खींचा. वो कह रहे थे, अल्लाह तेरा भला करे. तूने हमारी नाक कटवा दी. वो मुझे बाहर खींच लाये और मैयत को देखने की मेरी आरजू सीने में ही दम तोड़ गयी.
घर पहुँचकर उन्होंने माँ को सारी कहानी सुनायी और मेरे सुधार व तबीयत के सिलसिले में तक़रीबन मायूस हो गये. वो कह रहे थे कि मैं जिन्दगी के अनुभवों से भी कुछ हासिल नहीं कर सकता और यह कि आज के बाद फिर कभी किसी जनाजे में शिरकत के लिए मुझे अपने साथ नहीं ले जाएंगे.
मैंने एक अहम किताब जलाकर बहुत बड़ा जुर्म किया था और मैयत वाले घर अपने वालिद की रुस्वाई भी की थी. मुझे उसकी सजा यह मिली कि मैं किताबों से महरूम कर दिया गया और जिन्दगी के अनुभवों से जिन्दगी की हकीक़तों को जानने से भी. अब मैं मौत के बारे में न किताबों से कुछ जान सकता था और न ही समाज से कुछ सीख सकता था, इसलिए मौत के बारे में मेरी जानकारी अधूरी रह गयी.
एक दिन जब मैं किताबों से महरूमी और शोक के अवसरों में शामिल होने की पाबंदी के बारे में ग़ौर करता रहा था, तो मुझे ख़्याल आया कि मैं इस तरह ज्यादा दिनों तक नहीं रह सकता हूँ.
मैं बिस्तर पर पड़ा हुआ जी बहलाने और शिन्दगी जीने का कोई दूसरा रास्ता तलाशने की फ़िक्र में डूबा हुआ था कि माँ-बाप की कानाफूसी सुनायी दी. माँ कह रही थी, जिम्मेदारी आप ही की है. आप ही उसको जिन्दगी का पहला सबक़ सिखाने के लिए मैयत वाले घर ले गये. ग़लत! बिलकुल ग़लत!! मौत तो जिंदगी की इन्तिहा है न कि इब्तिदा. तो फिर आप जिन्दगी का सबक़ सिखाने की शुरुआत मौत से कैसे कर सकते हैं ?
मैं भी क्या कर सकता हूँ ? मेरे दोस्त अहबाब तो सिर्फ़ मरते हैं, अलबत्ता तुम्हारी सहेलियाँ बच्चे पैदा करती हैं. तुम्ही इसको अपने साथ ले जाया करो ताकि वो जिन्दगी की शुरुआत को समझ सके. वालिद ने जवाब में कहा.
सुबह होते ही माँ ने मुझे खुशरंग कपड़े पहनाये, बाल सँवारे और निहायत नर्मी के साथ कहा, बेटा! आज तुम मेरे साथ चलना, आज मेरी एक सहेली एक प्यारे-से बच्चे को जन्म देने वाली है. हम उसके लिए बरकत की दुआ करेंगे और तुम्हारा जी भी खुश हो जाएगा.
मैं खुशी-खुशी उनके साथ हो लिया. मैंने सोचा कि बच्चे की पैदाइश और पैदाइश के बारे में बातचीत मुझे अच्छी लगेगी और उससे मेरे दिल को सुकून मिलेगा.
हम घर में दाख़िल हुए और दूसरी औरतों के साथ बैठकर इन्तशार करने लगे. एक औरत प्रसव पीड़ा से कराह रही थी और दूसरी औरतें उसको घेरे हुए थीं और डर व ख़ौफ के आलम में टिकटिकी बाँधे देख रही थीं. कुछ देर में बच्चा पैदा हुआ. उसका जिस्म बल खाया हुआ और सर लटका हुआ था. अचानक वो जोर जोर से रोने लगा. वहाँ पर मौजूद दूसरी तमाम औरतें खुश हो रही थीं और घर वालों को बधाई दे रही थीं.
यह क्यों रो रहा है ? मैंने माँ के कान में सरगोशी की. यह इस तरह अपने पैदा होने और दुनिया में आने का ऐलान कर रहा है.
रोकर ? मैंने दिल में कहा और उसी वक्त से बच्चों के लिए मेरे दिल में नफ़रत बैठ गयी.
माँ समझाने लगी, यह इसलिए रो रहा है कि वो पेट की आरामदेह शिन्दगी से निकलकर तकलीफ़देह शिन्दगी में आया है. यह सुनकर मुझे उस माँ से भी नफ़रत हो गयी जिसने उसे पैदा किया था.
तू भी तो पैदाइश के वक्त इसी तरह रो रहा था, माँ की यह बात सुनकर मुझे अपने आप से भी नफ़रत हो गई. मैं बच्चे के बारे में सोचना छोड़कर औरतों के चेहरों को घूरने लगा.
जब बच्चे को दूध पिला दिया गया और वो सो गया तो औरतें आपस में गपशप करने लग गयीं. मैं ख़ामोशी के साथ उनकी बातें सुनता रहा. उनमें से एक ने कहा, हाय ये बदबख्त जिन्दगी जिसे हम सख़्त मेहनत और तकलीफ़ के साथ गुशारते हैं, फिर गर्भ का बोझ उठाना पड़ता है और फिर प्रसव पीड़ा सर पड़ जाती है. एक औरत को हँसी आ गयी और कहने लगी, अगर हम चींटियों की बस्ती में रह रही होतीं तो हमारी शिन्दगी किस कदर आसान होती.
चींटियों का नाम सुन, मुझे फिर ताव आ गया. मैं अपनी माँ की गोद से कूदकर बीच मकान में आ खड़ा हुआ और जोर जोर से बोलने लगा, तुम चींटियों की तरह क्यों बनना चाहती हो ? तुम उन्हीं की तरह हो, काम में जुती रहती हो, मर्द तुम्हारे पास आते हैं, बैठते हैं और चले जाते हैं. चींटी तो बेवकूफ़ हैं. उसकी एकमात्र ख़ासियत यह है कि वे अंडे देती हैं.
सब औरतें मुझे घूरने लगीं. मेरी माँ ने मेरा हाथ पकड़कर खींचा, तूने यहाँ भी हमें जलील कर दिया. और मुझे घर से बाहर ले आयीं.
घर आकर वालिद साहब को सारा क़िस्सा कह सुनाया. वो अफ़सोस में पड़ गये, इसका क्या किया जाये ? लगता है कि यह जिन्दगी से भी कुछ नहीं सीख सकता, न पैदाइश से कुछ सीख सकता है और न मौत से.
मेरे बारे में आपको फ़िक्र करने और ग़म खाने की शरूरत नहीं है. मैं अपने आप को खुद सम्भाल लूंगा. यह कहकर मैं घर से निकल खड़ा हुआ और शहर के क़रीबी मैदान में पहुँच गया.
यहाँ मैंने अजीबो-ग़रीब मन्जर देखा. शहर के बड़े लोगों ने उन तमाम बच्चों को मैदान में जमा कर रखा था जो पत्थर के आँसू और दिल के टुकड़ों से खेला करते थे. उनके हाथ-पैर एक बारीक रेशमी डोरी से एक-दूसरे के साथ बाँध दिये गये थे. मैं उनके दरमियान जाकर खड़ा हो गया. एक उम्रदराज शख़्स आगे बढ़ा और क़रीब के बच्चे के साथ मेरे हाथ-पैर भी बाँध दिये. थोड़ी देर बाद एक बूढ़े आदमी की आवाज उभरी, इन्हें कहाँ भेजा जाये ? चींटियों की बस्ती!! शायद ये वहीं शिन्दगी से कुछ सबक़ हासिल कर सकें. बड़े आदमी की तरफ़ से जवाब मिला.
मुझ पर ख़ौफ तारी हो गया. मैंने खुद को छुड़ाने की नाकाम-सी कोशिश की, मेरे दिल में घर वापस लौट जाने की ख़्वाहिश जागी. मगर मैं कुछ भी न कर सका और खुद को हालात के हवाले कर दिया. मैं सोचने लगा कि काश. मैं चींटियों वाली किताब न जलाता तो आज अपने माँ-बाप के दरमियान एक नेकबख़्त बच्चे की तरह खुश-खुश मौजूद होता. डोरी के हल्के से झटके ने मुझे इन ख्यालात से बाहर निकाल दिया और मैं भी दूसरे बच्चों के साथ हरकत करने लगा.
हम एक रात और एक दिन लगातार सफ़र करते रहे और अगले दिन दोपहर के बाद चींटियों की बस्ती पहुँच गए. जो आदमी हमारी निगरानी पर तैनात था, उन्होंने तस्दीक की कि यही चींटियों का मुल्क है. मुझे यह जानकर बिलकुल भी हैरत नहीं हुई कि चींटियों की इस बस्ती में हमने जितनी चींटियाँ भी देखीं, शक्लो-सूरत में तक़रीबन हमारी ही तरह थीं. बिलकुल हमारी तरह कंधें पर रखे हुए सर और उनकी जड़ों में लटके हुए हाथ. और पैर जिनको वो बारी-बारी आगे-पीछे बिना किसी अन्तराल के रख रही थीं. अलबत्ता वो हमारे शहर के लोगों के मुक़ाबले में श्यादा खूबसूरत थीं. उनके चेहरे खुशी और उमंग से दमक रहे थे. उनके चेहरे कहीं से कहीं तक हमारे लोगों के चेहरों की तरह बुझे-बुझे और मनहूस नहीं थे.
हम सब उनके सामने से गुजर गये और उन्होंने हमारी तरफ़ मुड़कर भी नहीं देखा. चींटियों का शहर निहायत खूबसूरत था. मैंने इससे पहले ऐसा शहर कभी न देखा था. सही बात तो यह है कि मैंने अपने शहर के अलावा और कोई शहर देखा ही नहीं था. मुझे अपने शहर और चींटियों के शहर में कुछ ख़ास फ़र्क नजर न आया.
एक लम्हे के लिए मैंने सोचा, चींटियाँ हमारी तरह कैसे हो सकती हैं. मैं इनके बारे में अब तक यही सोचता रहा था कि वे काले, भूरे या सफेद रंग के मामूली कीड़े हैं जो जमीन पर रेंगते फिरते हैं अैर अपने क़द से भारी दाने उठाये अपने बिलों की तरफ़ रवां-दवां रहते हैं.
मैंने सोचा ... कभी ऐसा होता है कि चींटियों की तरह बनने की हमारी शदीद ख़्वाहिश हमें चींटियों जैसा बना देती है और कभी ऐसा भी होता है कि हमारी तरह बनने की चींटियों की शदीद आरजू उनको हमारी तरह बना देती है. मुझे इन पर बड़ा ताज्जुब हुआ जो दूसरों की तरह बन गए हैं. इस वक्त मेरे अन्दर एक बार फिर से एहसास जागा कि काश! मैं चींटियों की दुनिया के बारे में किताब न जलाता, कम अश कम उनकी दुनिया के तमाम राजों से पर्दा उठने तक ऐसा न करता.
पहली रात हमने अपनी उस ख़्वाबगाह में गुशारी जो ख़ास हमारे लिए तैयार की गयी थी. अगले रोज हमें कई सारी टुकड़ियों में बाँटा गया और चींटियों के मुख़्तलिफ़ ख़ानदानों में भेज दिया गया ताकि हम जिंदगी से कुछ सबक़ हासिल कर सकें. मैं जरा अलग क़िस्म का लड़का था इसलिए मुझे दूसरे अलग मुक़ाम पर भेजा गया. मेरी जलावतनी के कारण दूसरों से क़तई मुख़्तलिफ़ थे, क्योंकि मैं न कभी आँसुओं से खेला और न ही दिल के टुकड़े जमा किये थे.
हरचंद के मेरे लिए यह जरूरी था कि मैं किताब जला देने वाली बात को चींटियों से छुपाता. लेकिन एक रात, जब मुझ पर जुनून का दौरा पड़ा, एक छोटी चींटी के सामने अपना जुर्म क़बूल कर लिया. मैं अपनी इस हरकत पर शर्मिन्दा था और अपनी मुँहफट तबियत पर नादिम भी. मैं तक़रीबन रुआँसा हो गया. मगर ये क्या ? मैंने देखा कि नन्ही चींटी बेतहाशा हँसे जा रही है. उसने अपनी हँसी पर क़ाबू पाते हुए कहा, तुमने अच्छा ही किया. यह एक बेकार किताब है जो हमारी जिन्दगी को सही ढंग से नहीं बताती और न ही इसकी हमारे लिए अहमियत है.
तब मेरी जान में जान आयी. उसने मेरा हाथ पकड़कर एक तरफ़ खींचा और कहा, चलो मैं तुम्हें अपने राज्य की सैर कराती हूँ. मैंने नोट किया कि उनका पूरा राज्य एक शहर की तरह है. शहर एक मुहल्ले की मानिन्द. मुहल्ला एक घर की तरह. और घर सारा का सारा एक कमरा है जो चींटियों से ठसाठस भरा हुआ है. और अब मुझे काफी सारी ज़िन्दगी इसी कमरे में गुज़ारनी है.
इस कमरे में जो चींटियों की कुल कायनात थी, कोई दरवाजा नहीं था. न कोई अंदर आ सकता था और न कोई बाहर जा सकता था. यहाँ तक कि खिड़की भी नहीं थी, न कोई बाहर देख सकता था और न कोई अंदर झाँक सकता था. चींटियों के आकार को देखते हुए इस कमरे की छत कुछ ऊँची ही थी और चूँकि चींटियाँ कभी नजर उठाकर देखती ही नहीं, इसलिए उन्हें छत के होने या न होने का गुमान ही नहीं होता था.
उसकी जमीन कुशादा और समतल थी. उसमें उतार-चढ़ाव भी नहीं था और न ही उसमें चोटियाँ और वादियाँ थीं. उसकी कुछ मुक़र्रर हदें भी न थीं. ऐसा लगता था जैसे कि यहाँ जमीन की सतह भी नहीं है.
अब तो इसके आसार व निशान भी मिटने लगे थे. सख़्त और ऊँची दीवारों के अलावा उसका वजूद ही मिटता हुआ महसूस होता था. दीवारों के दरमियान की दूरियाँ इतनी ज्यादा थीं कि आँखों को दिखायी न देती थीं. ऐसा गुमान गुजरता था कि उसकी दीवारें हैं ही नहीं.
जब मैं इस अजीबो-ग़रीब राज्य के बारे में सोच-सोच कर परेशान होने लगा, तो मैं अपनी दोस्त चींटी से उसके राज्य के क्षेत्रफल के बारे में पूछ बैठा.
अरे! तुम यह क्या लेकर बैठ गए, दूरदराज़ की हदों के बारे में क्यों सोचते हो ? तुम हमारी अन्दर की दुनिया के बारे में क्यों नहीं सोचते ? हमने अपना पूरा राज्य कई छोटे-छोटे देशों में बाँट रखा है और उनमें से हर देश की हद हर चींटी की अपनी जिल्द होती है. वो खुशगवार अन्दाज़ में मुस्करा रही थी. चींटियाँ तो एक-दूसरे के पीछे इस तरह चलती हैं जैसे वे सब की सब एक ही जिल्द में क़ैद हों, मैंने चींटी की बात पर इजाफ़ा करते हुए कहा. बाद में मुझे अपने इस तरह अचानक बोल पड़ने पर शर्मिन्दगी हुई. यह मेरी अजीब-सी आदत बन गयी है कि मैं पहले कोई काम कर डालता हूँ और फिर परेशान होता हूँ. लेकिन मेरी दोस्त चींटी ने इस पर कुछ रद्देअमल शाहिर नहीं किया. वो ख़ामोश बैठी रही. उसने बच्चों की पत्रिका उठायी और उसे खोलकर पढ़ने लगी. मैं उसकी आवाज हल्की होने के बावजूद सुन सकता था.
हर जानदार जितना ज्यादा छोटा होता है, उसका दिल इतना ही ज्यादा धड़कता है. अगर मक्खी का दिल एक मिनट में हजार बार धड़कता है, तो एक बड़ी मछली का दिल एक मिनट में सिर्फ़ पाँच बार धड़कता है. जबकि एक हकीर कीड़े के पाँच दिल होते होंगे.
यहाँ मैं उसकी बात काटकर बोला, फिर तो डायनासोर का दिल बहुत बड़ा होने की वजह से कभी धड़का ही नहीं होगा या जिन्दगी में एक ही बार धड़का होगा और शायद इसीलिए वो हमेशा के लिए दुनिया से ख़त्म हो गया.
मैं ख़ामोश हो गया, क्योंकि अब उसने पत्रिका एक तरफ़ रख दी थी और मुझे तीखी नजरों से घूर रही थी. मैंने दिल ही दिल में सवाल किया. और खुद चींटी का दिल एक मिनट में कितनी बार धड़कता है ? वो तो मक्खी से भी छोटी होती है. और इसी के साथ मुझे चींटियों पर बड़ा तरस आया, क्योंकि उनका दिल बहुत शोर-शोर से भी धड़कता होगा और दूसरों से कई गुणा ज्यादा भी. अगले दिन मैं और मेरी मासूम दोस्त चींटियों के देश की सैर कर रहे थे कि अचानक वो रुक गयी और मुझसे पूछने लगी, क्या तुम हमारी बस्ती के बड़े शख़्स से मिलना पसन्द करोगे ?
चींटियों की बस्ती में यह पहली महसूस हकीकत थी जिसने मुझे तक़रीबन चौंका दिया था कि यहाँ भी छोटे और बड़े का फ़र्क मौजूद है.
मैंने जल्दी में कहा, नहीं! मैं बड़ों को पसन्द नहीं करता, मैं उनसे नफ़रत करता हूँ.
और फिर मैंने अपनी पूरी आपबीती सुनायी कि किस तरह मेरे वालिद मुझे यत वाले घर लेकर गये थे ताकि मैं उस मुर्दे से जिन्दगी के बारे में कुछ जान सकूं जिसे अपनी मौत के बारे में कुछ पता नहीं होता. और किस तरह मेरी माँ मुझे पैदाइश वाले घर लेकर गयी ताकि में उस नवजात से जिन्दगी की हकीक़त मालूम कर सकूं जो खुद दुनिया में आते वक्त जिन्दगी की मुश्किलों से घबराकर रोता है.
मैं बड़ों को पसन्द नहीं करता, मैं अपनी जिद पर क़ायम था.
उसने मुझे तीखी नजरों से देखा और मैं एक बार फिर अपने कहे पर शर्मिन्दा हुआ. लेकिन जब से मैंने उसके दिल की तेज और शदीद धड़कनों के बारे में सोचना शुरू किया था, मुझे उससे एक तरह का अपनापन-सा हो चला था इसलिए मैंने अपनी जिद छोड़ दी और उसके साथ हो लिया. और सबसे बड़ी चींटी के पास पहुँच गया. पहले तो वो मुझे अजीबो-ग़रीब नजरों से देखती रही, फिर उसने कहा, सुनो बेटा! मगर मैंने कुछ भी नहीं सुना, क्योंकि मैं उसके चेहरे पर नजरें गाड़े हुए था और उसके लिसलिसे और परिचित चेहरे की पहचान पर ग़ौर कर रहा था.
जब उसने देखा कि मैं उसकी तरफ़ से से बेपरवाह हूँ तो उसने तक़रीबन डांटते हुए कहा, सुनो! मैंने उसकी तरफ़ ध्यान दिया. यह पता लगाने के लिए कि मैं उसकी बातों का क्या असर लेता हूँ, वो मेरे चेहरे के उतार-चढ़ाव का ग़ौर से मुआयना करती रही.
उसने कहना शुरू किया, हांलाँकि तुमने दिल के टुकड़े जमा नहीं किये और न तुम कभी उनसे खेलने में मशगूल रहे फिर भी तुमने खुद का जलावतन किये जाने वाले बच्चों के साथ बाँध लिया और इस तरह तुम हक़ीक़ी जिन्दगी के मैदान में उतर गये. और चूँकि हकीक़त मुसीबतों से भरी होती है, इसलिए हमें आजाद जिन्दगी गुजारने के मौके नहीं मिलते.
हकीकत तो धोखा है, फ़रेब है. हकीकत तो मृग मरीचिका की तरह है और यही वो चीज है जो मुसीबतों और दुखों से भरी हुई जिन्दगी से मुख़्तलिफ़ कोई चीज होती है. अलबत्ता खयाल एक ऐसी चीज है जिसे झूठ नहीं कहा जा सकता. सिर्फ़ वही एक सच्चाई है, क्योंकि झूठ का ज्ञान किसी दूसरी चीज के साथ तुलना के जरिये ही मुमकिन होता है और खयाल की तुलना किसी दूसरी चॉज के साथ की ही नहीं जा सकती. लिहाजा खयाल ही एक ऐसी चीज है जो अपने बूते पर कायम रहती है और अपनी जात में पूरी तरह मुकम्मल भी है. बस, एक बार तुमने जुर्रत की और अपनी हदों से निकल गये. जब तुमने चींटियों से सम्बन्ध्ति किताब को महज इसलिए जला डाला ताकि तुम आग भड़का सको और किसी तरह सर्दी से निजात पा सको. फिर उसके बाद तुम पर बुजदिली छा गयी और तुम ऐसा ही कुछ और करने की जुर्रत न कर सके. इसके बाद तुम्हारी मिसाल उस कर्जदार की-सी हो गयी जो सारी जिन्दगी उसकी अदायगी करता रहता है.
मैं उसको निरन्तर ताके जा रहा था जिस क़दर मेरी घबराहट में इजाफ़ा होता जा रहा था, उसी क़दर उसकी अनमोल बातों से प्रभावित होता जा रहा था. यहाँ तक कि उसने कहा, तुम्हारी मुश्किल यह है कि तुम हकीकत में उतर गये हो, जिसका नतीजा यह निकला कि तुम खुद से ग़ाफ़िल हो गये. तुम्हारे माँ-बाप ने तुम्हारी तालीम व तबियत में सख़्त ठोकर खायी है. और जब तुम उनके पास लौटकर जाओगे तो उन्हें अपनी ग़लतियों का बखूबी एहसास हो जाएगा.
वापस लौटकर जाने के खयाल ने मुझ पर कँपकँपी तारी कर दी, लेकिन मैं अपने आप में इतनी हिम्मत नहीं जुटा पाया कि मैं चींटियों की सरदार से तकरार कर सकता शायद इसलिए कि मेरी चींटी दोस्त मेरी अन्दरूनी कैफ़ियत से किसी क़िस्म का असर लिये बगैर मेरे घबराये हुए चेहरे पर अपनी नजरें गाड़े हुए थी.
मैं अपनी सोचों की गहराइयों से उस वक्त वापस लौटा जब उसने कहा, अब तुम जा सकते हो ... जाओ! और जलावतन किये जाने वाले बच्चों में शामिल हो जाओ, जो अपने वतन वापस जा रहे हैं. उनको वापस उनके वतन लौटाने की सारी तैयारियाँ मुकम्मल कर ली गयी हैं. बस, तुम्हारा ही इन्तजार है. अभी तुम्हारा बचपना है और इस उम्र में न तो अपने माँ-बाप के साथ रहकर कुछ फ़ायदा उठा सकते हो और न ही हमारे साथ रहने से तुम्हें कुछ नफ़ा पहुँच सकता है. यही नहीं, बल्कि तुम्हारा बक़िया बचपन भी तुम्हें कोई फ़ायदा नहीं पहुँचा सकेगा. फिर भी तुमने खुशी से इन बच्चों के साथ रहना क़बूल किया है, इसलिए तुम इन्हीं के साथ रहो.
मैंने बड़ी बेचैनी के आलम में पहलू बदला और उससे पूछना चाहा कि तुम्हारी जितनी हिकमत व दानाई की बातों की समझ पैदा होने के लिए कितनी उम्र दरकार होती है. मगर उसी वक्त मेरी दोस्त चींटी ने तेज नजरों से मुझे देखा और फिर मेरे कान में आहिस्ता से कहा, क्या तुम अभी तक यह नहीं जान सके कि यह मुर्दा है. अगर यह जिन्दा होती तो इस तरह बेसुरी बातें न करती.
उसकी बात से मेरे जिस्म में करंट-सा दौड़ गया ... प्रतिक्रिया के तौर पर मैंने कहा, जिन्दगी उम्र की क़ातिल है, वो इसको काटती रहती है. उम्र को अगर कोई चीज काफी रखती और उसे महफूज करती है तो वो सिर्फ़ मौत है. चलो, यहाँ से चलें.
और हम वहाँ से चले आये.
इसके बाद मेरी दोस्त मुझे एक विशाल मैदान में ले गयी, जहाँ हमारी ख़ातिर बड़े पैमाने पर विदाई का आयोजन किया गया था. और हम दोनों एक दूसरे से जुदा हो गये. मैं उसको अलविदा भी न कह सका, क्योंकि ठीक उसी वक्त हम दोनों ने अपने लम्बे साथ के बावजूद यह महसूस किया कि हमारे दिलों के धड़कने का अन्दाज एक दूसरे से बिलकुल जुदा है. मेरे पहलू में तो एक आदमशाद बच्चे का दिल है, जो बहुत कम धड़कता है और बहुत सुस्त भी है.
मैं उससे जुदा हुआ और अपने शहर के बच्चों में शामिल हो गया जो अपने मुल्क वापस जाने के लिए एक बहुत बड़े समूह की शक्ल में तैयार थे. चींटियों की दुनिया की एक जमात भी वहाँ मौजूद थी.
विदाई आयोजन में की जाने वाली मुख़्तसर-सी तक़रीर सुनने के बाद हम लोगों ने लाइन लगायी और चींटियों की बस्ती अपने पीछे छोड़कर अपने मुल्क की तरफ़ चल दिये. चींटियों की बस्ती में दाख़िल होते वक्त जो घबराहट और कैफ़ियत महसूस करता रहा था उसके बिलकुल बरअक्स अब मैं साफ़ तौर पर यह महसूस कर रहा था कि हमारे शहर और चींटियों के शहर के दरमियान दरअस्ल कोई दूरी है ही नहीं. इनके दरमियान न कोई रास्ता है और न किसी तरह की हदबन्दी. मैंने महसूस किया कि यह तो वही मैदान है जहाँ हमारा स्वागत किया गया था. फ़र्क सिर्फ़ इतना है कि हम एक बार इसको अलविदाई मौके के लिए ख़ास समझ लेते हैं, तो हमें वहाँ से अलविदा कहा जाता है और दूसरी बार हम इसे स्वागत के इस्तेमाल में लाते हैं, तो वहाँ हमारा स्वागत किया जाता है.
पिछले सफ़र के बरअक्स इस बार हमारे हाथ-पैर खुले रखे गये थे. हमें जो चीज आपस में व्यवस्थित व एक रखे हुई थी, वो प्रेम व स्नेह की डोर थी और अपने वतन लौटने की उत्सुकता हमें खुशी-खुशी वतन की तरफ़ लिये जा रही थी. जहाँ हमारे स्वागत के लिए इसी तरह के एक बड़े जलसे का बन्दोबस्त किया गया था.
जैसे-जैसे हम अपने शहर और अपने परिवार वालों के क़रीब होते गये, हमारे दिलों की धड़कनों में इसी शिद्दत से इशाफ़ा होता गया, यहाँ तक कि हम अपनी पीठों पर लदे हुए भारी बोझ को भी भूल गये. हालाँकि हम में से हर कोई अपने आकार से ज्यादा बड़े और अपने वजन से ज्यादा भारी गेहूँ के दाने अपनी पीठ पर लादे हुए थे. जिन्हें हम चींटियों के देश से अपने वतन ला रहे थे.
पूरा शहर हमारे स्वागत के लिए आया हुआ था. उनके दरमियान मैंने अपने माँ-बाप को भी देखा. मेरी खुशी की इन्तिहा न रही. अगर मेरे ऊपर भारी बोझ न होता तो मैं अपने हाथों को लहराकर उन्हें आगाह करता और अगर मैं चींटियों के साथ लम्बी दोस्ती की वजह से अपनी शबान भूल न गया होता, तो मैं उन्हें पुकारने की कोशिश करता.
वे हमें उचक-उचककर देख रहे थे फिर भी मुझे नहीं लगता कि उन्होंने मुझे पहचान लिया हो, क्योंकि हम सब एक जैसे ही दिखायी दे रहे थे. हम में से किसी की अपनी अलग से शनाख़्त काफी न बची थी.
शायद यही वह बात थी जिसने शहर के लोगों को मुग़ालते में डाल दिया था. हमें नहीं लगा कि उनमें से किसी ने भी हमारे ताल्लुक़ से कोई ख़ास असर शाहिर किया हो. हम उनके पास पहुँच चुके थे और वे हमारे सामने हैरान व परेशान खड़े थे.
हम मैदान के दरमियान तक पहुँच गये. हमें बड़ी हैरानी हो रही थी. जब हमने उनके जिस्म और चेहरे बुशरे का जायजा लिया, तो मालूम हुआ कि वे बिलकुल हू-ब-हू वैसे ही हैं जैसे हमारी जलावतनी के वक्त थे. कुछ भी तो नहीं बदला था. लगता था कि उन पर जमाना सिरे से गुजरा ही नहीं है और वो वक्त के उसी लम्हे में खड़े हैं. जबकि हमारा हाल यह था कि हम पर बुढ़ापा तारी हो चुका था, क्योंकि चींटियों के मुल्क में हमारे ऊपर काफी सख़्तियाँ गुजरी थीं. इसलिए हमारा जिस्म दोहरा हो गया था, यहाँ तक कि हमारे हाथ-पाँव एक-दूसरे के आमने-सामने आ गये थे और अब हम अपने चारों हाथ-पाँव के सहारे आगे बढ़ते थे. और इसी वजह से हम अपनी सीधी पीठों पर जो अब शरा-सा उभार लिये हुए जमीन की सतह पर आ चुकी थी, अपने वुजूद से भारी वजन लादने के क़ाबिल हो सके थे.
जब हमने अपने मुँह उठाकर उन लोगों को देखने की कोशिश की जबकि ऐसा करना हमारी छोटी-सी सख़्त गर्दनों के लिए दुश्वार था तो हमें मालूम हुआ कि वे हमें अजीबो-ग़रीब नजरों से घूर रहे हैं.
हमें उनकी आँखों में अपने वास्ते जरा भी उत्सुकता और खुशी दिखायी नहीं दी. हम उनसे बेपरवा होकर अपनी पीठों से बोझ उतारने में मशगूल हो गये. फिर हमने उसको मैदान के दरमियान में इकट्ठा किया. फिर उनसे सलाम व कलाम करने के लिए उनकी तरफ़ बढ़े. मगर वे घबराहट के आलम में पीछे की तरफ़ लौटने लगे और हमारे व अपने दरमियान कुछ फ़ासला बनाकर रुक गये. फिर उनमें से किसी ने पुकारकर कहा, फ्तुमने चींटियों की सोहबत किस तरह बरदाश्त कर ली. वो तो बड़ा बदसूरत और तकलीफ़देह कीड़ा है. अगर हम उन्हें बरदाश्त करते रहें और उन्हें कुछ भी करने के लिए आशाद छोड़ दें, तो वे हमारे खूबसूरत शहर को तबाह व बरबाद कर डालें जिसकी हम एक लम्बे जमाने से निगहदाश्त करते आ रहे हैं.
| जमाल अबू हमदान
जमाल अबू हमदान 1944 में सीरिया में पैदा हुए. अम्मान (जार्डन) में परवरिश पायी. अम्मान के अलावा काहिरा और बेरूत में तालीम हासिल की. लॉ करने के बाद जार्डन के उड्डयन विभाग में कानूनी सलाहकार हुए. बाद में स्वतन्त्र लेखन करने लगे. जमाल के कई कथा-संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं. इनकी कहानियों में यथार्थ और फैंटेसी का अजीब अजीब सम्मिश्रण देखने को मिलता है. |
जैसे ही उसने अपनी बात पूरी की, तमाम लोगों ने तेज धार हथियार निकाल लिये जो हमने इससे पहले अपने शहर में कभी नहीं देखे थे और उनसे हमारी गर्दनें काटने लगे.
जिनके पास हथियार नहीं थे तो जो चीज भी उनके हाथ लगी, वे उसी को लेकर हम पर टूट पड़े और हमें पैरों तले रौंदने लगे. यहाँ तक कि हमारा पूरी तरह सफ़ाया कर दिया. जब मैं अपनी जिन्दगी की आख़िरी साँसें ले रहा था, उस वक्त मैंने अपने माँ-बाप को देखा और उनको धिक्कारा. मगर उन्होंने इसकी कुछ भी परवाह नहीं की, बल्कि उन्होंने मुझे पहचाना भी नहीं.
मैंने बीच मैदान में जमा ग़ल्ले के ढेर की तरफ़ देखा. मैंने महसूस किया कि मैदान ख़ाली किया जा चुका है. लोग आपस में छीना झपटी कर रहे थे और ग़ल्ला उठा-उठाकर भाग रहे हैं.
मुझे नहीं मालूम कि अपनी जिन्दगी के इन आख़िरी पलों में मुझे क्यों वो किताब याद आ गयी जो चींटियों की दुनिया के बारे में थी. मुझे उसके जलाने पर बेहद अफ़सोस हुआ, यहाँ तक कि मुझे लगा कि यह मेरे लिए जानलेवा सदमा बन जाएगा.
मगर ऐन उसी वक्त मैंने सुना कि हमारे शहर के लोग निहायत सुरीली आवाज में गा रहे हैं और गेहूँ के दाने उठाये लिये जा रहे हैं ताकि वे उन बड़े-बड़े गोदामों में जमा कर सकें, जिनकी तैयारी में उन्होंने गर्मियों का पूरा मौसम लगा दिया था. मैंने यह भी महसूस किया कि वे हमारी जलावतनी के पूरी जमाने में झींगुर का गाना सीखने का अभ्यास करते रहे थे. तभी तो वे आज इतना अच्छा गा रहे थे.
मैं उनके गाने पर अपने कान लगाये हुए था और वे गेहूँ के दाने उठाये हुए मस्ती में गाते चले जा रहे थे. इससे मेरी रूह को सुकून-सा मिल गया और मैं अपने जी में कुछ देर के लिए खुश हो गया.
(मुहम्मद इल्यास नदवी के उर्दू अनुवाद से)
प्रस्तुति: हसन जमाल, पन्ना निवास, लोहारपुरा, जोधपुर-2