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प्रसंगवश/श्रद्धांजलि : एक बेचैन आत्मा का खामोश प्रस्थान

शायद अठारह साल पहले की बात हो या बीस की, हरिनारायण जी तब ‘हंस’ में थे और मैं भी. शुरू-शुरू के उत्साही दिन थे. रोज रोज की डाक में किसी नयी रचना, किसी नये रचनाकार के आविष्कार की संभावना उत्तेजित किए रखती थी. तभी कभी एक दिन हरिनारायण जी ने फुलस्फैप कागजों का एक मोटा दस्ता-हर पन्ना रँगा हुआ, दिया था और अपनी सहज स्वाभाविक हिचकिचाहट के साथ कहा था कि अगर मेरे पास थोड़ा समय हो, पढ़ने में कोई दिक्कत न हो तो क्या मैं उसे पढ़कर देखूँगी और अपनी राय दूँगी? हरिनारायण जी की यह खासियत है, सहज स्वाभाविक हिचकिचाहट के साथ वे लगभग अनधिकार चेष्टा के भाव से अनुरोध करते हैं लेकिन वह अनुरोध अपने आप एक साधिकार हैसियत अख्तियार कर लेता है.

जहाँ तक लिखावट का सवाल था, देखने से लगा कि दिक्कत तो थी. हरिनारायण जी ने खुद कुछ तो पढ़ा था लेकिन शायद बाकी बहुत कुछ के आगे हथियार डाल चुके थे. बचपन में हस्तलेख का बारबार अभ्यास कराते हुए माँ या अध्यापिका जिस प्रकार के लेख के लिए बच्चों को बताया करती हैं कि मानो चीँटे को स्याही में डुबोकर कागज पर छोड़ दिया हो, यह लिखावट उसी का नमूना थी. लेकिन मैंने पढ़ा. न मात्रा, न वर्तनी, न अक्षरों की सही बनावट, मुश्किल से एक एक अक्षर का अनुमान लगाते हुए, शब्दों को एक दूसरे से अलग करते हुए, वाक्यों को पंक्तियों में जरूरत के हिसाब से संयोजित देखते हुए, बहुत समय और श्रम लगाकर, बहुत दिक्कत से ही, लेकिन अप्रत्याशित के विस्मय से बार बार स्तब्ध होते हुए पढ़ा.

पृष्ठ पर अपनी मर्जी से टहलते, स्याही में डूबे चींटे जैसी लिखावट वाले उस मोटे फुलस्कैप दस्ते में से ‘हंस’ का अगला नया रचनाकार आविष्कृत हुआ  रामलखन यादव. आगे चलकर इसी रामलखन ने खुद को कवि ऋतुकुमार कहा. उस लिखावट में एक बेहद समृ (संवेदनकोश और उतना ही संवेदनशील शब्दकोश) उसे देखते हुए चमत्कार पर विश्वास करना संभव था.

जिन कविताओं को पढ़ते हुए मैं स्तब्ध हुई थी उन्हें लिखते समय वह शायद सत्राह अठारह साल का रहा होगा, कुल दूसरी कक्षा तक पढ़ा था, पालिका बाजार में किसी कुर्ते पाजामे की दुकान में पानी पिलाने और कपड़ों के डिब्बे निकालने और जमाने का काम करता था, और दो सौ रुपये महीने की कुल आय में से पैसा बचाकर किताबें और पत्रिकाएँ वह केवल खरीदकर पढ़ता था और हर दूसरे तीसरे महीने सौ डेढ़ सौ रुपया इस मद मे खर्चा करता था. इसी सिलसिले में उसका ‘अक्षर’ में आना जाना, राजेन्द्र जी और हरिनारायण जी से मिलना संभव हुआ था. बहुत प्रकट अभावग्रस्त जीवन - घिसे पफटे कपड़े, अधपेट खाए शरीर के बावजूद किताबों से इतना प्यार और केवल खरीदकर पढ़ने की जिद ने उसे पूरे दफ्रतर के विस्मय, प्यार और सम्मान का पात्रा बना दिया था.

कविता लिखने की प्रेरणा उसे हरिनारायण जी ने दी थी.

कविताएँ उसने कैसे लिखीं, के जवाब में उसने कहा, पता नहीं. वह सिर्फ अपनी कोठरी में चौकी पर मोमबत्ती जलाकर बैठता था और जो मन में आए लिखता चला जाता था. सचमुच उसे देखते हुए चमत्कार पर विश्वास करना संभव था. उसके लिए भी यह एक अनूठे आत्माविष्कार का क्षण था.

‘हंस’ में प्रथम प्रकाशन के बाद उसकी कविताओं के छपने और सराहे जाने का सिलसिला शुरू हुआ लेकिन ‘हंस’ के साथ एक विशेष व्यक्तिगत लम्बा रिश्ता शुरू हुआ. ‘हंस’ का मतलब राजेन्द्र जी, हरिनारायण जी और कुछ हद तक मैं भी. कुछ समय तक अक्षर का कार्यालय उसका घर भी रहा और ‘हंस’ का दफ्तर उसका परिवार भी.

वह प्रबल राग-विराग का व्यक्ति था और अपने आवेग के सामने पूरी तरह से निष्कवच. बहुत कोमल और संवेदनशील, बहुत अक्खड़ और झगड़ालू, गहरा दोस्त और गहरा दुश्मन. कठिन संकल्प जो उसके शुभ-चिन्तकों को अक्सर तर्कातीत जिद की हदों को छूता जान पड़ता था लेकिन नेक नियत सलाहें कभी उसे उसके भोले, निश्छल, तर्कातीत निर्णयों से डिगा नहीं पाईं. दोस्ती, प्रेम, विवाह  उसके जीवन में सामान्य तरीके से कुछ भी नहीं हुआ. जो भी परत खोलो, वहीं एक कहानी मिलेगी. पिछले अठारह बीस वर्षो के सम्बन्धें में उसने बार बार हम लोगों को अपने गैरदुनियादार निर्णयों से, भारी प्रतिकूलताओं के बावजूद उन निर्णयों पर टिके रहने की क्षमताओं से, तीव्र आवेग को सघन विवेक में ढाल लेने की ताकत से विस्मित किया था.

अपने तत्काल आस-पास के साथ एक गहरा सरोकार और हर बात के लिए एक मजबूत राय, उस राय को व्यक्त करके झगड़ा मोल लेने की निडरता, हर वक्त वह किसी न किसी बात को लेकर गहरे असन्तोष से भरा, बहसतलब, असहमत ही मिलता था, और जैसा कहा, ये बहसें अपने तत्काल आस-पास की स्थितियों और लोगों से होती थीं, सचमुच के नामों और सवालों से, सहकर्मियों से लेकर बॉस और संपादकों तक, जो उसके निष्कवच व्यक्तित्व को न केवल असन्तोष बल्कि असुरक्षा में भी डाले रखती थीं. उस हद की हिम्मत को लोग बेवकूफी कहते हैं. असुरक्षा उसकी जीवनविधि थी.

उसके भाई वीरेन्द्र का फोन बिल्कुल अप्रत्याशित था. राम लखन अस्पताल में है, पिछले पन्द्रह दिनों से, हालत बहुत खराब है, और कोई उम्मीद बाकी नहीं है. सिर में दर्द होता था, बेहद. असहनीय दर्द जिसे लेकर वह अस्पताल में दाखिल हुआ था, मस्तिष्क में सूजन-निदान था, उस हद तक पहुँचने के बाद जब असहाय इन्तजार के सिवा और कुछ नहीं किया जा सकता था.
हमने सोचा आपको मालूम होगा, वीरेन्द्र ने कहा था. पिछले तकरीबन छह महीनों में वह पाँच सात दस दिनों के अन्तराल पर कई बार मिलता रहा था. अस्पताल जाने के ठीक दो तीन दिन पहले भी तो वह मिला था. अठारह बीस वर्ष लम्बे परिचय में पहली बार पिछले आठ महीनों में वह अपनी कविताओं की किताब छपाने के लिए थोड़ा उत्सुक दिखाई दे रहा था, वरना अपने लिखे को लेकर वह अक्सर इतनी निर्मम अनिच्छा से संचालित होता था कि ताज्जुब हो. उसके काव्यसंग्रह के प्रकाशन के लिए जहाँ जहाँ, जिस जिस से भी कहा था, वहाँ से कोई भी अन्तिम उत्तर मिलने के पहले ही वह न लौटने के लिए अस्पताल पहुँच गया था.

और आज राम लखन नहीं है. छपने के लिए दी गई ये उसकी अन्तिम कविताएँ हैं, लेकिन इन्हें भी देते समय उसने कहा यही था, बहुत सख्ती से जाँचिएगा, वरना मत छापिएगा



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