राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, एन. एस. डी.द्ध नयी दिल्ली के बहुमुख मंच पर 12 से 19 मई 2009 तक मंचित नाटक रंगधूलि वैसा नहीं है, जैसा बाकायदा होता है. प्रतिष्ठित रंगकर्मी सुश्री त्रिपुरारि शर्मा के निर्देशन में मंचित यह नाटक विलक्षण है.
इस नाटक को विद्यालय के तृतीय वर्ष के छात्रा-छात्राओं ने त्रिपुरारि की परिकल्पना एवं निर्देशन में सामूहिक प्रक्रिया के आधर पर अभिनय करते करते रचा, ‘हमने दोबारा सीखा कि साथ-साथ रचने का अर्थ क्या होता है और अपने को प्रतिदिन विकसित और वयस्क होते पाया.’ इन कलाकारों ने यह भी महसूस किया कि आज वे जिस रंगमंच पर खड़े हैं उसके पीछे कितना विस्तृत और समृद्ध इतिहास है और ये भी कि कला को मिलने वाली इज्जत कलाकार को नहीं मिली. कलाकार अपने जीवन की कहानी को नाटक के पात्रों की कहानी से जोड़ सके.
इस नाटक का आधर कुछ सच्ची घटनाएँ और त्रिपुरारि शर्मा का नौटंकी कलाकारों तथा बेड़िनों पर किया गया कई वर्ष पुराना शोध है. यह नाटक विलक्षण है, कि भारत के जातिवर्ग के दलदल में पंफसे क्षत-विक्षत समाज की सहस्त्रों साल से चली आ रही दारुण दास्तान को कलाकारों ने एक क्षीण-सी कथा रेखा के आधर पर रचा, दर्शकों से कहा कि ये बेड़िनों की कहानी है पर दर्शक यह समझ पाने में समर्थ रहा कि यह समाज की सभी औरतों की कहानी है.
नाटक रंगधूलि रंगकर्म, नृत्य संगीत से जुड़े विरोधभासों की बात उठाते उठाते जीवन में इस प्रकार जुड़ जाता है कि नाटक और जीवन एक हो जाते हैं. कहानी नाटक के पात्रों की नहीं हमारी कहानी बनकर हमारा दिल दहलाती है. ऐसी विलक्षण रचना पर टिप्पणी करना सरल नहीं है.
इस नाटक में बेड़िनें हैं, बेड़िनों के बच्चे हैं, ठाकुर की हवेली है, एक कोने में बम्बई की बीयरबार और बार गर्ल है. एक मचान पर कोठा है, एक स्टेज पर नौटंकी और बीच रंगमंच पर डूबते पात्रा एक कोने से दूसरे कोने तक भटकते टक्कर खाते, हमारे सभ्य सभ्रान्त के विक्टिम.
बेड़िन समाज की स्त्रियाँ भारत की स्तरीकृत जातिव्यवस्था की सबसे निचली पायदान से आती हैं. उनके विवाह करने पर प्रतिबन्ध है. विवाह प्रथा भी यौन दासता ही है, वहाँ भी अपनी मर्जी नहीं है ,पर उसकी सामाजिक स्वीकृति तो है. बेड़िनें विवाह प्रथा के बाहर हैं, अपनी मर्जी से नहीं, पर फिर भी वे पुरुष की यौन दासियाँ हैं. वे कुँवारी ब्रह्मचारिणियाँ, साध्वियाँ, यौनजीवन रहित अध्यात्मिक जीवन जीने वाली मीराबाइयाँ नहीं, कि समाज उन्हें आदर से देखे, और उन्हें कम से कम यही गुमान रहे कि वे लोक नहीं परलोक साध रही हैं. कला के पेशे में भी वे जाति के आधर पर हैं, अपने चुनाव से नहीं.
और बेड़िनों के बच्चेµ फ्नाम माँ का और चेहरा बाप का. बाप अपना नाम नहीं दे सकता, पर बाप का नाम न होने का अर्थ बेटे के लिए क्या है ? बेटा बाप के नाम को तरसता है और माँ अपनी बेटी के लिए चुटकी भर सिन्दूर को. सिन्दूर का प्रतीक नाटक में बार-बार आता है.
बेड़िन पन्द्रह बरस की उम्र से ही रोजी कमाने लगी, उसका भाई ही उसे गेहूँ, गुड़ और नमक के बदले ठाकुर के आगे डाल गया. बेड़िन की बेटी बम्बई में रोजी कमाने गयी, बार में पहुँचकर रोजी बनी, कोई बेड़िन कोठे की बुआ बनीµ कोई नौटंकी कलाकार, सभी स्वतन्त्रा रूप से जीविका कमाते हुए, परतन्त्रा होने को तरसतीं, क्योंकि सम्भ्रान्त परिवार समाज का हिस्सा बनने के लिए एक एक स्त्री को एक एक पुरुष की यौन दासी बनकर रहना जरूरी है, सिन्दूर इसका प्रतीक है, सामाजिक स्वीकृति का, समाज का हिस्सा बनने की चाहत का, न कि औरत के आदमी के प्रति आकर्षण, प्रेम या चाहत का.
सिन्दूर माँ हमेशा ललचाई निगाह से देखती थी, मैं लगा लेती हूँ, किसी को क्या पता किसने लगाया है, क्योंकि अगर माँग में सिन्दूर हो तो सामने वाला अपना लगने लगता है.बेड़िन की बिटिया दर्पण के सामने सिन्दूर गिराती है पूफंक से उड़ाती है. चुटकी भर सिन्दूर और शादी, या पढ़ाई फिर शादी या आजादी से रहना खुल्लम खुल्ला अपनी मर्जी से. लोक नृत्य राई, नौटंकी, मुजरे, कोठे, बीयर बार और वहाँ से फिर कोठे पर पहुँचतीं बहनें और उनके दलाल बने सड़कों पर भटकते उनके निठल्ले भाई एक दूसरे को गरियाते खुद को कोसते, जलील करते.
नाटक में ठाकुर की हवेली है, जिसमें ठाकुर है, जिसका तन है लोहे का, उसे आग चाहिए, उसके भीतर जानवर है. उसके पास पत्नी है, रखैल है, शहर के बाहर रिक्शे पर बैठकर बीड़ी पी सकता है, पफाग गा सकता है, पर खुली जगह में बेड़िन के साथ चाय नहीं पी सकता. उसके पास मर्यादा है.
हवेली में ठकुराइन है. पन्द्रह बरस की छोटी बहन को उसका भाई ठाकुर के घर डाल गया. ठकुराइन मिठाई सजाती है, ठाकुरों के घर पत्नी के अलावा बेड़िन का आना रहना शान की बात है. वह शान बघार रही है. परन्तु पन्द्रह बरस की बच्ची के शरीर का वहशत से अनुसन्धन करते पति और उसकी वहशत का उत्साह से उत्तर देती, पहली बार शरीर के स्पर्श से इस प्रकार परिचित होती नाबालिग बच्ची का उमंग भरा यौनाचार देखकर, माथे पर लाल बिन्दी वाली लाल सिन्दूर से पूरी भरी माँग वाली ब्याहता युवा ठकुराइन बड़ी कठिनाई से रुलाई रोकने की कोशिश करते करते चीख दबा नहीं सकी.
जाति समाज बिरादरी और उससे जुड़ी सम्भ्रान्तता की शेखी बघारना और उस सम्भ्रान्तता को बनाने बचाने वाली व्यवस्था तथा उससे जुड़ी दरिन्दगी, कुरूपता, हिंसा अन्याय और अपमान को असल में झेलना दो अलग-अलग बातें हैं. क्या है तेरे पास इस तन में ? ठकुराइन बेड़िन की बच्ची का स्पर्श करती है. तन, सिर्फ तन ही तो ठकुराइन के स्पर्श में स्नेह देखकर बेड़िन की बच्ची आश्चर्यचकित है.
ये क्या हो रहा है ? ठाकुर साहब देखेंगे तो क्या कहेंगे. कहा था ना ठकुराइन के पास मत जाना. स्त्रियों का पारस्परिक आकर्षण तथा प्रेम न भाई सहन करेगा, न पति न बेड़िन का ग्राहक. वे गाँठें खोल रही थीं, समाज ने खोलने नहीं दीं. तन सिर्फ तन ही तो बेड़िन की बच्ची का उत्तर ठकुराइन के मन में ईष्र्या जगाता है, क्रोध भी. क्रोध से जलती हुई आँखों वाली ठकुराइन से नाबालिग बेड़िन बिफरकर कहती है, मैं अपनी मर्जी से नहीं आयी, मैं भी नहीं आयी, मर्जी से ठकुराइन कुछ कम क्रोध से उत्तर देती है.
मर्जी का ये सवाल नाटक में आगे तक चलता रहा, चुटकी भर सिन्दूर के सवाल की तरह. ये सवाल उस समाज का है जो किसी को भी अपनी मर्जी से जीने ही नहीं देता. बेड़िन पत्नी बनकर यौन दासी बनने को तरस रही है, ठकुराइन कह रही है वह अपनी मर्जी से पत्नी नहीं बनी. लोग अपनी मर्जी से क्या कर पाते हैं, पढ़ाई, सिलाई-कढ़ाई, शादी, नाच-गाना या अकेले रहना अपनी मर्जी से ?
बेड़ियाँ जन्म और जाति की नाटक अन्त तक आते आते भी अँधेरा सा ही है. वे लोग अपनी मर्जी से नहीं जी पायीं. बेड़िन माँ की बिटिया बम्बई पहुँची पर बारबाला बनी. उसका भाई ही पहुँच गया वहाँ. मैं न पहुँचता तो कोई और पहुँच जाता भाई में अपराध बोध नहीं है. वह अपने साथ बम्बई की धूल लाया है, फ्बम्बई जहाँ जात कोई नहीं पूछता. वहाँ केवल बेड़िनें ही बारबालाएँ नहीं बनतीं, पर बेड़िने बम्बई तक में केवल बारबालाएँ बन पाती हैं. जाति से मुक्ति कहाँ ? सिलाई की मशीन भी उन्हें कहीं नहीं पहुँचा पाती.
पहुँचा तो उन्हें दसवीं कक्षा की सेकिन्ड डिवीजन भी नहीं पाती. फ्पढ़ना है मुझे. मैं नहीं नाचूँगी बच्चे लालटेन की रोशनी में पढ़ते हैं. दसवीं में सेकिन्ड डिविजन पास होना कितना बड़ा संघर्ष और कितनी बड़ी उपलब्धि है उनके लिए, परन्तु सभ्रांत समाज में इतनी उपलब्धि से आज क्या हासिल होगा ? सभ्य समाज में अंग्रेजी स्वूफल, डोनेशन और कोचिंग की ड्रिप की सहायता से फलते पूफलते 99 प्रतिशत लाने वाले बच्चों के बीच इनकी क्या गिनती ? उस पर जन्म और जाति से बेड़िन माँओं और बुआओं का दबाव है, जिनके बहीखाते और शब्दकोष में केवल नथ उतराई की कीमत दर्ज है, तीस हजार रुपये. उन्होंने इतना ही देखा है, वे इतना ही सोच सकती हैं.
दसवीं पास बहन को उसका भाई और गली में नकारा फिरते बेड़िनों के बेटे अपनी पसन्द के लड़के के साथ भागने तक नहीं देते. वो दो तीन साल काम करके पैसे कमाने भेज दी गई बम्बई, बार बाला बनने. पढ़ाई वाली बेटी भी सिलाई वाली बेटी की तरह बारबाला ही बनी. बम्बई में जात कोई नहीं पूछता पर बम्बई में भी जात ने पीछा नहीं छोड़ा.
नाटक बार बार जाति का प्रश्न उठाता है. साथ रह पाने की ख्वाहिश का प्रतीक है होली का फाग. मैं होली कैसे खेलूँ साँवरिया जी के संग नाटक में कई बार आया है. सारे पात्रा ये गाते हैं ठाकुर भी, ठकुराइन भी, बेड़िनें भी, उनकी बेटियाँ भी, उनके आवारा बेटे भी और नौटंकी में औरत की भूमिका करने वाला पुरुष कलाकार भी. ठाकुर जिसे मर्यादा कहता है बेड़िन उसे मजबूरी. अपनी-अपनी बेड़ि़यों में बँधे होने के कारण एक साथ मिलकर न रह पाने की मजबूरी की बेड़ियाँ. गीत उम्मीद का है या नाउम्मीदी का, या जद्दोजहद का, कह नहीं सकते. प्रश्न खड़ा है. ये बेड़िन की बेड़ियाँ नहीं पूरे समाज की बेड़ियाँ हैं.
इस देश की 110 करोड़ जनता में से 10 करोड़ लोग यह जानना ही नहीं चाहते कि बाकी 100 करोड़ लोग कैसे जीते हैं. पढ़े लिखे मध्यवर्ग ने ही नैतिकता बनायी, यौन शुचिता के मानदंड बनाये, वही चला रहा है. इन मानदंडां को बनाए रखने का नाटक चलाने का मूल्य कौन चुका रहा है, कौन सी जातियाँ, किस जाति की औरतें और उनकी बिना बाप की औलादें, इसकी फिक्र किसे है ? मानदंड वही मध्यवर्ग बदल सकता है, पर बदलेगा तब, जब वे इधर देखे.
देश में गरीबी के सवाल गरीबी की रेखा को ऊपर नीचे एडजस्ट करके हल किया जा रहा है. जाति पाँति के दलदल में आकंठ ध्ंसे समाज में पैफले भेदभाव और अस्पृश्यता की समस्या को आरक्षण के उपकरण द्वारा चपरासी और बड़े बाबू के सरकारी पदों पर अनुसूचित जाति के लड़कों को भर्ती करके हल किया जा रहा है. अम्बेडकर ने जो रोटी और बेटी का प्रश्न उठाया था उसका क्या हुआ ? बेटियाँ बेचकर रोटी कमाने वाली जातियाँ जिस समाज में रहती हैं उस समाज के बीच खेला गया ये नाटक बेड़िन जाति के रूपक से सारी औरतों का प्रश्न उठाता है. जो औरतें आदमी की आग में हविष बनती हैं अपनी मर्जी से नहीं, जो ब्याहताएँ आदमी का परिवार चलाती हैं, अपनी मर्जी से नहीं, जो बम्बई पहुँचाई जाकर बारबाला बनती हैं ,अपनी मर्जी से नहीं. ये वो समाज है जहाँ औरतें अकेली रहने का निर्णय तक नहीं ले सकतीं, अपनी मर्जी से.
नाटक रंगधूलि उन पुरुषों का प्रश्न भी उठाता है जो नर हैं पर नारी का रूप धरकर नौटंकी करते समय रामलला के जन्म पर रसपगा सोहर गा सकते हैं, जो नाच भी सकते हैं और स्वयं अपने भीतर स्त्री सुलभ नरमी का सन्धन करके उल्लसित भी हो सकते हैं. जो स्त्री रूप में प्रतिष्ठित नौटंकी कलाकार थे, जो नौटंकियों में स्त्रिायों द्वारा स्थानापन्न हुए जो खीझे जो रोये पर कहीं और भी स्थान न पा सके न समाज में न रंगमंच पर. जो अपनी बहनों के दलाल बने, आवारा निठल्ले, गाली बकते, एक दूसरे को शोषित प्रताड़ित करते, बिना कारण पुलिस द्वारा पकड़े जाते हुए. हम कहीं जा भी नहीं सकते, पड़े है यहीं के यहीं.’ वे अपनी बहनों को पढ़ने नहीं देते, बढ़ने नहीं देते, भागने भी नहीं देते, खुद भी सड़ते हैं.
पर जो भाग गये बम्बई ? जो बम्बई इस नाटक में मुक्ति का प्रतीक हैं, जहाँ कोई जात नहीं पूछता. जहाँ कोई भेदभाव नहीं. जहाँ की धूल चन्दन उस गाँव में लाया है जिस गाँव मेंहदिया में अभी सड़क तक नहीं बनी. वे ही क्या बन सके ? गाँव की लड़कियों को शहर की बारगर्ल बनाने वाले दलाल. गाँव का ग्राहक ठाकुर, और शहर का ग्राहक नौकरी पेशा प्रोफेशनल.
हर एक सामाजिक कार्य, हर कहानी, हर उपन्यास, हर नाटक के रूबरू होते समय मेरा मन केवल एक ही प्रश्न करता हैµ इतनी बड़ी व्यवस्था के बीच एक इन्सान की छोटी छोटी निजी ख्वाहिशों का क्या हो. बड़ी व्यवस्था की और इन्सान के निजी स्वप्नों का द्वंद्व मेरे लिए जीवन का प्रमुख प्रश्न है. यह नाटक विलक्षण है, क्योंकि यह नाटक अपने हर प्रकरण, हर दृश्य, हर छवि, हर प्रतीक और हर बिम्ब में इसी प्रश्न का उत्तर ढूँढता है. बम्बई के बीयर बार, उससे भी ऊँचे कोठे, नौटंकी के स्टेज, चैबारे पर होते मुजरे और बीच मंच पर ध्क्वेफ खाते, कभी ईटों के बने चूल्हे पर पकाते खाते, दरबदर होते पात्रों को चारों ओर से घेरकर बैठे दर्शक, शर्मिन्दगी ग्लानि और अपराध बोध से ग्रस्त होते रहते हैं.
हमारी सामाजिक व्यवस्था इन्सान को स्पेस नहीं दे रही. हमारी आर्थिक उन्नति सामाजिक उन्नति से नहीं जुड़ी. बराबरी का प्रश्न न उठाया गया, न हल किया गया. जो जैसा था, वैसा ही रहा. शोषक और शोषित के रिश्ते में बँध. हमारा भारत देश कृषि से, उद्योग और उद्योग से वाणिज्य वाले वैश्वीकृत जगत में जा बैठा, देश वासियों का क्या हुआ ?
विस्थापन एक पूरी कौम का रंगधूलि नाटक विस्थापन और कला तथा कलाकार के प्रति समाज के नजरिये को अपना केन्द्रीय विषय बनाता है. विस्थापन का मतलब हैµ सामाजिक, भौगोलिक, ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, विस्थापन, अपनी जड़ों से बिछुड़ते चले जाना और दूसरी जगह पर पुनस्र्थापित होने की जद्दोजहद. यह नाटक राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के बगीचे में राई नृत्य से प्रारम्भ हुआ, फिर दूसरे बगीचे में स्टेज पर नौटंकी से होता हुआ बहुमुख रंगमंच पर चारों ओर से दर्शकों से घिरे मंच पर. यह शिल्प भौगोलिक विस्थापन दर्शाने के लिए भी उपयुक्त है और एक पूरी सांस्कृतिक यात्रा दर्शाने के लिए भी. एक मंच से दूसरे मंच पर भागते कलाकार और उनके पीछे भागते दर्शक, सभी विस्थापित.
यह एक पूरे कलाकार समाज के विस्थापन का इतिहास है. राई नृत्य स्त्री पुरुष मिलकर करते थे इज्जत से, नौटंकी में पुरुष स्त्री रूप धरकर नाचते थे मंच पर इज्जत से, फिर बेड़िनें मुजरे वालियाँ बनीं ठाकुरों और शहरी बाबुओं को रिझातीं, औद्योगीकरण के समय वे नौटंकी में शामिल हो गईं, लड़के कहीं के न रहे, फिर नौटंकी वाली पहुँची कोठे पर फिर वहाँ से, वैश्वीकरण के युग में यही कलाकार बार गर्ल बनकर बड़े शहरों के अँधेरे कोनों में बनी तेज रोशनी वाली बीयर बार्स में अश्लील नृत्य पेश करने लगीं. और इसके बाद फिर, समाज के शुद्धीकरण अभियान के तहत सम्भ्रान्त समाज की नौकरी में लगी हुई पुलिस की रेड पड़ने पर, ये फिर जा बैठीं कोठे पर, बाल पैफलाये. कभी रखैल के रूप में सामन्तों की व्यक्तिगत यौनदासी बनती और कभी मुजरेवाली या बारगर्ल बनकर सभी के हाथों की कठपुतली बनती दर-दर भटकती पूरी कौम जो कलाकार थी, और उनके कलाकार रहे भाई कभी नाचते कभी दलाली करते और कभी कुछ भी न करते स्वयं को कोसते, भारत के नागरिकों के कला प्रेम को आईना दिखाते हैं.
विस्थापन परिस्थितियों से भी है, भावनाओं से भी, प्रेम के नाजुक बन्ध्नों से भी है. होत सभी को गौनो इक दिन गीत इस विस्थापन का प्रतीक है जो नाटक में बार बार आता रहा. ठकुराइन और बेड़िन के बीच स्नेह का बन्ध्न भाई के टोकने से टूटा, स्त्रियों के मध्य स्नेह और मित्राता का नारीवाद स्वप्न समाज के हाथों टूटा बेड़िन रखैल भी न बन सकी उसका घर छूटा.
विस्थापन उन पुरुषों का भी हुआ जो नारी का रूप धर कर नाजुक हाथों से हावभाव दिखाते नौटंकी करते और रामलला का सोहर गाते. वे हमसे अच्छा नहीं नाच सकतीं ये नौटंकी है मुजरा नहीं पर बदलते समय की यही माँग थी. लड़कियों का मुजरे से विस्थापन और लड़कों का नौटंकी से. ब्रिटिश दृष्टिकोण स्त्रैण पुरुषों को कोई स्पेस नहीं देता. शायद औद्योगीकरण के दौरान नौटंकी में भी स्त्रिायों के आगमन और पुरुषों के प्रस्थान का यह भी कारण रहा हो. पर कलाकारों के मध्य यह वैमनस्य नहीं है. उनमें सखा भाव ही है. डाँट खाकर, खिल्ली उड़वाकर भी मुजरे से विस्थापित होकर नौटंकी में आयी लड़की विस्थापित होते हुए पुरुष कलाकार को करुणा से सहलाती है और उसकी चोली, नकली बाल झुमके और हार उतारकर सहेजती हुई गाती है समय गयो रे. एक पुरुष दुःख उदासी और खेद से विस्थापित हुआ दूसरा धीरज से, परन्तु चाहकर भी नाटक में भूमिका न पा सका, पुरुष वेश भूषा तक में. होत सभी को गौनो इक दिन.
सिलाई मशीन और स्त्री उद्धार विस्थापन का सिलसिला खत्म नहीं होता. बेड़िन अपनी बिटिया के कोठे से उतारकर सिलाई की मशीन देती है. स्त्री द्वारा उद्धार का सबसे पारम्परिक उपाय. घर पर ही बैठे बैठै चार पैसे कमाने का भारतीय समाज और भारत सरकार का अजमाया हुआ फार्मूला. विधवाओं में मशीन बाँटो, वैश्याओं को मशीन बाँटो, कमाएँगी खाएँगी, घर में ही रहेंगी, इज्जत बाजार में नहीं जाएगी. पर क्या हममें से कभी किसी ने किसी औरत को घर पर बैठे सिलाई मशीन चलाकर समृद्ध बनते देखा है ? सिलाई मशीन ही क्यों ? इसलिए क्योंकि वह घर में ही रहेंगी, पराए मर्द की निगाह से बची, बाजार की हवा से बची. पर क्या यह बचना है या वंचना ? हम विध्वा और वैश्या को बचाते हैं या वंचित करते हैं ? या फिर हम विधवा और वैश्या को समाज से बचाते हैं