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इंटरनेट का मोहल्ला : संस्कृति के दर्पण में ये जो शक्लें हैं मुस्काती

बड़ी दुविधा है. प्रभाष जी हिंदी पत्रकारिता के मौजूदा शीर्ष हैं. और जैसी कि हमारी हिंदी में परंपरा है - शीर्ष और शलाका शख्सियतों के लिए पर्याप्त आदर के अलावा कुछ भी अपने पास रखना लगभग अनैतिक है. गुर्बत की हिंदी में अवसरों की कुंजी इन्हीं प्रभाषों-नामवरों आदि के चरणों में होती है लिहाजा असहमति के लाल कपड़े से आप इनकी सांड तंद्रा को भंग नहीं कर सकते. क्या कहें, जब हमने ग्लोबलाइजेशन पर प्रभाष जी को भाषण देते हुए कबीर को कोट करते देखा है गगन मंडल में गौ बियानी, भू पर दही जमायो कबीर ब्राह्मणवाद-कठमुल्लावाद के आलोचक थे. क्या कहें, जब हमने आज से आठ-दस बरस पहले सूचना के अधिकार के लिए चल रहे आंदोलन में अरुणा राय के बगल में बैठे देखा हो? या क्या कहें, जब झारखंड में एक आदिवासी महिला आंदोलनकारी पर हुए लाठीचार्ज के विरोध में हुए धरने में प्रभाष जी को शामिल होते और नारा लगाते देखा हो? बड़ी दुविधा है.

लेकिन ये हिंदी की उस परंपरा की दुविधा है, जो छापे की दुनिया में छायी रहती है. कुछ वीर बालक वहां भी आते हैं, लेकिन सेट होते ही अरुण कमल की उस कविता से कहीं और शिफ्ट हो जाते हैं कि ‘क्या है अपना इस दुनिया में सब कुछ लिया उधर, सारा लोहा उन लोगों का अपनी केवल धार’. इंटरनेट में आती नयी आलोचना-पीढ़ी के लिए छापे की दुनिया की मूर्तियों का ज़्यादा मोल नहीं है. यही वजह है कि जब रविवार डॉट कॉम को इंटरव्यू देते हुए प्रभाष जोशी ने ब्राह्मणों को श्रेष्ठ बताते हुए अमेरिका की सिलिकॉन वैली को ब्राह्मणों की रचना बताया और गावस्कर-तेंदुलकर को सारस्वत ब्राह्मण होने की वजह से श्रेष्ठ क्रिकेटर बताया, तो न्यायप्रिय लोग लगभग टूट पड़े. यहां कुछ प्रतिक्रियाएं उद्धृत कर रहा हूँ -

‘बहुत गर्व होता है प्रभाष जोशी को यह कहते हुए कि सिलिकॉन वैली या अमेरिका में भारत अगर जगमगा रहा है तो वह सिर्फ ब्राह्मण प्रकाश से. यह प्रकाश कितनों की रोशनी छीनकर अपनी रोशनी बिखेर रहा है प्रभाषजी, क्या यह बताएंगे आप? एक ज़रा आरक्षण की कहीं चर्चा नहीं चली कि लोग मिट्टी तेल या पेट्रोल खुद पर छिड़ककर आग लगाने लगते हैं. यानी मर जाएंगे, लेकिन शूद्रों को रोशनी में नहाते हुए नहीं देखेंगे.’

प्रेमरंजन, जनतंत्र डॉट कॉम पर

‘प्रभाष जोशी हिंदी-हिंदू पत्रकारिता के इयान बोथा हैं. उन्होंने निचली जातियों के हज़ारों मंडेलाओं को, प्रतिभाओं को, बेरोज़गारी और भुखमरी के क़ैदखानों में 28 साल से नहीं, 38 साल से डाल रखा है. वो होंगे ब्राह्मणों-ठाकुरों के महानायक, हमारे लिए वे बोथा-फ्यूहरर से कम डरावने नहीं.

पंचरवाला, मोहल्ला लाइव डॉट कॉम पर

असहमति के ऐसे सैकड़ों स्वर इंटरनेट पर दर्ज हुए, लेकिन प्रभाष जी ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी. पत्रकार आलोक तोमर ने उनकी चुप्पी को इस रूप में प्रचारित किया कि प्रभाष जी अभिव्यक्ति के इस मीडियम को असरहीन बताते हैं और मानते हैं कि इसकी रीच भारत की दो प्रतिशत आबादी तक भी नहीं है. गंभीर और वैचारिक असहमतियों को खारिज़ करने का यह अंदाज़ उसी ब्राह्मणवाद का रूपक है, जिसकी माया में फंसकर सदियों से दमन और उत्पीड़न का खेल खेला जा रहा है.

ताज्जुब होता है कि प्रभाष जी ने न सिर्फ ब्राह्मणवाद को अपने इंटरव्यू में सलाम किया है, बल्कि सती प्रथा को अंग्रेज़ों के चश्मे से न देखने की सलाह भी दी है. यानी 20 बरस पहले का इतिहास उन्होंने फिर दोहराया है, जब जनसत्ता में देवराला कांड के समर्थन में संपादकीय लिखा गया था. इस बार उनकी टिप्पणी पर ‘नयी सती’ नाम से किसी महिला ने टिप्पणी की, ‘यही प्रभाष जोशी हैं, जिन्होंने एनडीटीवी इंडिया के हमलोग कार्यक्रम में प्रीति जैन, मधुर भंडारकर प्रसंग के यह कहने पर कि मेरा शरीर है, मैं चाहे जैसे कपड़े पहनूं... तो प्रभाष जी ने जवाब दिया था कि तो फिर मुझे भी छूट है कि मैं आपके साथ जो चाहे करूं.’ आशय ये कि स्त्रियों के पक्ष की परंपरा भला प्रभाष जी को क्यों सुहाएगी?

मेरे लिए हैरानी की एक और बात है कि जब प्रभाष जी ब्राह्मण को लेकर मंत्रमुग्ध हों, ठीक उसी समय साहित्य में दलितों, स्त्रियों और अल्पसंख्यकों की हिमायती मानी जाने वाली पत्रिका हंस के अतिथि संपादक ने भी ब्राह्मण-वंदना की है. सितंबर 2009 के अंक में अजय नावरिया ने अपने संपादकीय में लिखा है, ‘यूं मैं भारत में प्रत्येक जाति का आदर करता हूं और उनके प्रति सदभावना रखता हूं, यह एक लोकतांत्रिक भावना है, पर अगर मैं ब्राह्मण जाति का प्रशंसक हूं तो बेशक इस अर्थ में कि वह गुणग्राहक और नये विचार को तुरंत ‘लोक’ लेने वाली जाति है. वह सिर्फ बुद्धिमान ही नहीं बल्कि वीर जाति भी है. ऐसा कहते हुए मेरे कथन का आशय यह बिल्कुल नहीं है कि भारत की शेष जातियां बुद्धिमान या वीर नहीं हैं, बेशक वे हैं, पर अधिकांशतः यह देखा गया है कि वे जातियाँ या तो वीर हैं या बुद्धिमान’.

प्रभाष जोशी और अजय नावरिया के इस टिप्पणी-संयोग पर क्या कहा जाए? बस वीरेन डंगवाल की एक कविता ही कोट कर सकते हैं...

काफी बुरा समय है साथी
गरज रहे हैं घन घमंड के नभ की
 फटती है छाती
अंधकार की सत्ता चिल-बिल
 चिल-बिल मानव-जीवन
जिस पर बिजली रह-रह अपना चाबुक
 चमकाती
संस्कृति के दर्पण में ये जो शक्लें हैं
 मुस्काती
इनकी असल समझना साथी
अपनी समझ बदलना साथी!

यूजीएफ 1, सी-56, शालीमार गार्डन, गाजियाबाद



1920
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