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लघुकथा : समय

अस्पताल के वातानुवूफलित कमरे के पलंग पर पड़े-पड़े समय काटने के लिए वह सामने टेबल पर रखी घड़ी को एकटक देख रहा था. यह वही घड़ी है जो समय बताती है. घड़ी वही रहती है, किन्तु समय बदल जाता है. कल इसी पलंग पर यह समय किसी और का था, किन्तु आज यह मेरा है. कल उसकी बहुत बड़ी सर्जरी होने वाली है. पत्नी पास ही सोफे पर बैठी झपकी ले रही थी. नीचे बेटे-बहू बड़ी बेचैनी से चहलकदमी कर रहे थे. विसिटिंग टाइम में शायद बेटियाँ और दामाद भी आएँ. किन्तु फिर भी उसके भीतर कुछ कचोट रहा था, कहीं कुछ खोखलापन था जिसके अंधेरे से वह बाहर नहीं निकल पा रहा था.

तभी टेबल पर रखी उस घड़ी में एक धुंधली-सी आकृति उभरी. उसे वह आकृति कुछ जानी-पहचानी लगी. वह आकृति उससे बातें करने लगी.
बेटा कैसे हो ? सब कुशल तो है न ? काम अच्छा चल रहा है क्या ? कहीं कोई परेशानी तो नहीं. बिटिया की और कितने साल की पढ़ाई बाकी रही ? उसके विवाह की चिंता है या नहीं ? कभी-कभी इधर आते रहा करो बेटा. तुमसे कुछ देर बातें करने से तुम्हारे बूढ़े माँ-बाप की बोझिल जिन्दगी में शायद अपनेपन के ये कुछ पल सुकून दे सकें वर्ना तो अब सब कुछ बहुत सूना-सूना सा है- सब खत्म होने वाला है. युवावस्था में अपना और बच्चों का सुनहरा भविष्य जुटाने की भागदौड़ में माँ-बाप के लिए फुर्सत के पल न थे उसके पास.

तभी आहिस्ते से दरवाजा खुला और उसकी तंद्रा टूटी. उसके बेटे-बहू पलंग के नजदीक खड़े थे और उससे सवाल पर सवाल किए जा रहे थे. बहू पूछ रही थी, कैसी तबियत है पापा ? डाक्टर आया था क्या ? नर्स ने दवाइयाँ दी या नहीं ? अब अगली सुई कितने बजे लगेगी ? सर्जरी के लिए कल सुबह थियेटर में ठीक सात बजे ले जाएँगे या फिर वही ग्यारह-बारह बजाकर परेशान कर देंगे. बारह बजे तो मुन्ना को स्कूल से लेने का समय हो जाएगा.

इन प्रश्नों के स्वर बड़े धीमे रूप से उसके कानों में पड़ रहे थे. और घड़ी की वह जानी-पहचानी आकृति अब बिल्कुल साफ हो गई थी- उसके होठों ने फुसफुसाया, पिताजी ! घड़ी वही थी, बस समय बदल गया था. कल वह पिताजी का समय था किन्तु आज अपनत्व के पल तलाशता यह उसका अपना समय है.

86, एम.सी. रोड, चेन्नै-21



1958
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