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विस्मृत कथा : ...लो, अपने कामरेड भगतीचरण से मिलो

लाहौर के निकट रावी नदी के किनारे जखीरे (जंगलद्ध में एक बम विस्पफोट में हुई क्रांतिकारी भगवतीचरण बोहरा की शहादत अनेक प्रश्नों के साथ बार बार मेरा पीछा करती रही है...

28 मई 1930 का वह दिन जब भगवती भाई अपने सहयोगी क्रांतिकारी विश्वनाथ वैशम्पायन और सुखदेव राज के साथ उन बमों का परीक्षण करने निकले जिनका भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त को जेल से छुड़ाने के लिए होने वाले `एक्शन´ में इस्तेमाल किया जाना था. क्रांतिकारी लाहौर में डेरा डाले हुए थे और उन्हें भरोसा था कि वे भगत सिंह और दत्त को जबरदस्ती जेल से छुड़ा लेंगे. दल के सेनापति चन्द्रशेखर आशाद की अगुआई में यह क्रांतिकारी कार्यवाही सुनिश्चित की गई थी. दुर्गा भाभी और सुशीला दीदी भी इसके लिए वहाँ पहुँच चुकी थीं तथा मास्टर छैलबिहारी लाल, यशपाल, मदनगोपाल, वैशम्पायन और सुखदेव राज भी. इस अभियान के लिए बमों को क्रांतिकारियों ने स्वयं तैयार किया था. इन्ही में से एक बम को परीक्षण के लिए फेंकते समय जखीरे में भगवतीचरण के हाथ में ही विस्पफोट हो गया जिससे वे गम्भीर रूप से घायल होकर गिर पड़े. सुखदेव राज का पैर भी जख्मी हो गया था. मृत्यु से जूझते हुए भगवती भाई उसी रात देश के लिए बलिदान हो गए. अपने अंतिम क्षणों में उन्होंने कहा था -

आजाद जी से मिल पाता.

काश, यह मृत्यु दो दिन बाद होती.

दुख है कि भगतसिंह को छुड़ाने में भाग न ले सका.

भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त दिल्ली की केन्द्रीय असेम्बली (अब संसद) में 8 अप्रैल 1929 को ट्रेड डिस्प्यूट बिल और पब्लिक सेफ्टी बिल को पारित किये जाने के विरोध में बम का ध्माका करके अपने दल की नीतियों तथा उद्देश्यों को उजागर करने वाले लाल रंग के छपे हुए घोषणा-पत्रा फेंककर अपनी गिरफ्तारी दे चुके थे. इस मुकदमे के बाद ही वे लाहौर लाये गए थे जहाँ उन पर सांडर्स हत्या की कार्यवाही चल रही थी. उन्हें लाहौर जेल से अदालत तक पुलिस की गाड़ी से ले जाया जाता था. क्रांतिकारियों ने उन्हें ऐसे ही किसी अवसर पर हमला करके छुड़ाने की योजना बनाई थी.

भगवतीचरण दुर्गा देवी के पति थे और वे दोनों ही क्रांतिकारी दल के सक्रिय और समर्पित कार्यकर्ता थे. दुर्गा भाभी के नाम से देश के स्वाधीनता संघर्ष में विख्यात इस महिला की वीरगाथा किसी से छिपी नहीं है. सांडर्स वध के पश्चात भगतसिंह को छद्म वेश में सुरक्षित कलकत्ता पहुँचाने का कठिन और जोखिम भरा कार्य भाभी ने ही सम्पन्न किया था. तब वे `साहब´ (भगतसिंह) के साथ `मेम साहब´ बनकर रेल के कूपे में गई थीं. उनका तीन साल का बेटा शची उनकी गोद में था. पर इन परिस्थतियों में भी भाभी डरी नहीं, न पीछे हटीं. हैट लगाये भगतसिंह के साथ जब वे उनकी पत्नी के रूप में कलकत्ता रेलवे स्टेशन पर उतरीं तब भगवती भाई ने रोमांचित होकर कहा था, तुम्हें आज समझा.

इन्हीं भाभी ने कितने ही क्रांतिकारियों को अपने घर पर आश्रय और मदद दी. भाभी के क्रांतिकारी जीवन की एक और साहसिक गाथा बाद में बम्बई के लेमिंग्टन रोड पर क्रांतिकारी पृथ्वीसिंह आजाद के साथ गवर्नर पर गोलियाँ चलानी थी. त्याग और बलिदान की इस जीवन्त प्रतिमूर्ति ने क्रांतिकारी संग्राम के पश्चात लखनऊ को अपनी कर्मभूमि बनाया और वहाँ लखनऊ मांटेसरी इन्टर कॉलेज की स्थापना की जिसके परिसर में बने उनके आवासीय कमरों में अब उनके सपनों का `शहीद स्मारक एवं स्वतन्त्रता संग्राम शोध केन्द्र´ बन गया है.

इसी विद्यालय के प्रांगण में बैठकर भाभी ने एक दिन मुझसे कहा था,  ये जो शहीदों की बलिदान अ र्धशताब्दी (वर्ष 1979-81 जिसमें यतीन्द्रनाथ दास, भगवतीचरण, चन्द्रशेखर आशाद, भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव के बलिदान के पचास साल पूरे हुए थे) मेरे जीवन में आ गई, यह बहुत दुखदायी रही. फिर तुरन्त ही वे संभलकर बोलीं, उनकी मृत्यु तो बहुत अच्छी हुई वैसी किसे नसीब होगी. यह कहकर वे अपने क्रांतिकारी दिनों की स्मृतियों में कहीं गहरी खो गई थीं.

सन् 1930 में जब भगवती भाई शहीद हुए तो भाभी ने अपनी डबडबायी आँखों को चुपचाप पोंछ डाला था. उस दिन भैया (चन्द्रशेखर आजाद) ने उन्हें धैर्य बँधते हुए कहा था, भाभी, तुमने देश के लिए अपना सर्वस्व दे दिया है. तुम्हारे प्रति हम अपने कर्तव्य को कभी नहीं भूलेंगे.
आजाद का स्वर सुनकर भाभी के होठों पर दृढ़ संकल्प की एक रेखा खिंच गई थी. वे उठ बैठीं. और बोलीं, पति नहीं रहे, लेकिन दल का काम चलेगा, रुकेगा नहीं. मैं करूंगी. और भाभी दूने वेग से क्रांति की राह पर चल पड़ीं. वे बढ़ती गयीं जिस रास्ते पर जाना था उन्हें. मार्ग में दो पल बैठकर कभी सुस्ताया नहीं. छाँव देखकर कहीं ठहरी नहीं. चलती रहीं. भगत सिंह और दत्त को जेल से छुड़ाने के लिए आजाद और उनके साथी चले तो भाभी ने आशाद से आग्रह किया, संघर्ष में मुझे भी चलने दीजिये. यह हक सर्वप्रथम मेरा है.

आजाद ने इसकी स्वीकृति नहीं दी. योजना कामयाब भी नहीं हो पायी. कहा जाता है कि भगवती भाई की शहादत का समाचार जानकर भगत सिंह ने स्वयं ही इसके लिए मना कर दिया था. भाभी जेल में भगत सिंह से मिलीं. फिर लाहौर से दिल्ली पहुँचीं. गाँधी वहीं थे. यह कराची कांग्रेस से पहले की बात है. भगत सिंह की रिहाई के सवाल को लेकर भाभी गाँधी के पास गयीं. रात थी. कोई साढे़ ग्यारह का वक्त था. बैठक चल रही थी. नेहरू वहीं घूम रहे थे. वे सुशीला दीदी और भाभी को लेकर अन्दर गए. गाँधी ने देखा तो कहा, तुम आ गई हो. अपने को पुलिस में दे दो. मैं छुड़ा लूंगा.

गाँधी ने समझा था कि अपने संकट से मुक्ति पाने आई हैं वे. भाभी तुरन्त बोलीं, मैं इसलिए नहीं आई हूँ. दरअसल, मैं चाहती हूँ कि जहाँ आप अन्य राजनीतिक कैदियों को छुड़ाने की बात कर रहे हैं, वहाँ भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव को छुड़ाने की शर्त भी वाईसराय के सामने रखें.

गाँधी इसके लिए सहमत नहीं थे. भाभी सारी स्थिति समझ गयीं और उन्हें प्रणाम करके वापस चली आयीं. लेमिंग्टन रोड गोली कांड में भाभी को फरार घोषित किया गया. वारन्ट में भाभी का नाम `शारदा बेन´ लिखा था और उनके पुत्रा का `हरीशा´ उनके लाहौर के तीन मकान जब्त हो गए थे. इलाहबाद के भी दो. भगवतीचरण के नाम वारन्ट पर पहले ही सबकुछ कुर्क हो चुका था.
कितना कुछ सहा उन दिनों भाभी ने. बताया मुझे कि राजर्षि पुरुषोत्तमदास टंडन ने उनसे बहुत स्नेहपूर्वक कहा था, बेटी, मेरे यहाँ रहो. भाभी उनके पास 5-6 महीने ठहरीं. फिर चली आईं. अपने को गिरफ्तार कराया. बयान देने के लिए उन पर बहुत जोर डाला गया. लेकिन भाभी झुकने वाली कहाँ थीं. हार मान गए पुलिस वाले. मैं भाभी का चेहरा देखता था तो बार-बार होठों पर आ जाता था भाभी एक अनवरत यात्रा हैं.
कब तक चलेगी भाभी ?

कहती थीं, बस, अब अन्त ही समझो. किसी दिन भी हीरामन उड़ सकता है. मै मर जाऊँ तो कैप्टन राम सिंह (आजाद हिन्द फौज) का बैंड बुलवा लेना. आशिक का जनाजा है जरा धूम से निकले.

मैं भाभी का क्षीण होता शरीर देखने लगता था...

मैंने भाभी से कई बार उनके क्रांतिकारी जीवन के बारे में जानने का प्रयास किया. लेकिन हर बार उनका यही कहना होता था मुझसे भगवतीचरण (पति के सम्बन्ध्) को छोड़कर बाकी सबकुछ पूछ सकते हो. उनकी चर्चा चलने पर मैं कई दिन सामान्य नहीं रह पाती. पर जब बातचीत चलती थी तो भाभी भगवती भाई के अनेक मार्मिक संस्मरण मुझे सुनाती थीं. बताया था, एक दिन चन्द्रशेखर आजाद दिल्ली में भगवतीचरण से मिलने आये थे. सामना होते ही दो असाधरण काया एक दूसरे के हृदय से लिपट गईं. कई क्षण तक दोनों मूक रहे. सिर्फ आँसुओं की चन्द बूँदें उनकी आँखों से ढली थीं. और उसके बाद वे खिलखिलाकर हँस पडे़. उस हँसी में क्या रहस्य था, किसी ने न समझा. पार्टी का काम और संगठन बड़े जोश और जीवट से होने लगा. बड़ी-बड़ी आशाएँ और उमंगें दिलों में हिलोरें लेने लगीं. किन्तु यह सब कितना क्षणिक और अस्थायी था. ठीक एक वर्ष बाद भगत सिंह को जेल से निकालने की योजना में हम सब लोग लाहौर में जाकर इकट्ठे हुए. भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त को छुड़ाने के लिए जो बम बने थे, उनमें एक का परीक्षण करके देखना था. दोपहरी थी. तेज धूप और तपन. रावी तट पर वे (भगवतीचरण, सुखदेव राज और विश्वनाथ वैशम्पायन बढ़ते जा रहे थे. परीक्षण के लिए जब घने जंगल में एक स्थान पर रुके तो सबसे पहले सुखदेव राज ने बम फेंककर देखना चाहा. बम हाथ में लेने पर पता चला कि उसकी पिन ठीक नहीं बैठी है. फिर वैशम्पायन ने स्वयं उसको फेंकने का आग्रह किया लेकिन वह किसी तरह नहीं माने. कहने लगे तुम लोग पीछे हट जाओ, मैं फेंकता हूँ. और जैसे ही अपने दोनों साथियों को पीछे कर उन्होंने बम फेंकना चाहा कि पिन निकलते ही बम फट गया.

एक भयंकर आवाज और चतुर्दिक धुएँ के बादल. वे (भगवतीचरणद्ध क्षत-विक्षत हो वहीं गिर गए. और फिर नहीं उठे. उनका एक हाथ कलाई से कट गया था और दूसरे हाथ की उँगलियाँ ही उड़ गई थीं. पेट में भारी जख्म हो गया था. आँतें बाहर लटक रही थीं. यह विवरण मुझे बच्चन (वैशम्पायन ने बताया था. मरते समय भी उनके होंठों पर मुस्कराहट थी. कोई चिन्ता थी तो यही कि दल का काम रुके नहीं. उनका यही सन्देश था. सुखदेव राज घायल हो चुके थे. वैशम्पायन नीरव अश्रुपात कर रहे थे. उनसे भगवती भाई ने कहा था अपनी भाभी का साथ देना...
और फिर उस रोज शाम को वह दीपक (भगवतीचरण अपने समस्त अरमानों को लिये हुए सदा के लिए बुझ गया. चार बजे शाम को सुखदेव राज लौटे थे. तांगे से उतरते समय लँगड़ाकर चल रहे थे. उनका पैर आगे से जख्मी था. जूता कट गया था. सुखदेव राज को लिटा दिया गया. उजाला होने से पहले ही आशाद, ध्न्वन्तरि आदि रावी तट पर गए. नदी में इतना पानी नहीं था कि शव प्रवाह हो पाए, इसलिए वहीं जंगल में गड्ढा खोदकर शहीद का शव दफना दिया गया. बाद में पुलिस ने वह जगह खोजी और अस्थियाँ बीनकर अदालत भेजीं....
इतना कहकर भाभी चुप हो जातीं और मैं भी कुछ पूछने की हिम्मत नहीं कर पाता. खामोश आँखों से देखता रह जाता उन्हें.
मैंने जब-जब भाभी से भगवती भाई के सम्बन्ध् में गहराई से कुछ जानना चाहा तो वे प्राय: बात को किसी दूसरी ओर मोड़ दिया करती थीं. मैं उन प्रश्नों की छानबीन करना चाहता था जिसके चलते यशपाल ने भगवती भाई के अन्तिम संस्कार की घटना को `सिंहावलोकन´ में सर्वथा काल्पनिक कथा (शव का जल प्रवाह का रूप दे दिया. वैशम्पायन ने अपनी पुस्तक `अमर शहीद चन्द्रशेखर आजाद´ और सुखदेव राज ने `जब ज्योति जगी´ में लिखा है कि भगवती भाई का अन्तिम संस्कार करने के लिए आजाद, ध्न्वन्तरि और मदनगोपाल गए थे, जबकि यशपाल ने अपने संस्मरणों (सिंहावलोकन में लिखा है कि अंतिम संस्कार करने वे स्वयं, भैया और आजाद और बच्चन (वैशम्पायन) गए थे. मास्टर छैलबिहारी लाल ने अपनी संस्मृतियों में जो भी लिखा है वह सब यशपाल के हवाले से दिया है. छैलबिहारी लाल से 1974 में मेरा पत्रा-व्यवहार हुआ था. तब वे नवीन शाहदरा दिल्ली के उर्दनपुरा में रहते थे. मेरे अनुरोध पर उन्होंने आजाद और भगवती भाई के संस्मरण विस्तार से लिखकर भेज दिये थे. वैशम्पायन लिखते हैं कि भगवती भाई के शव को एक गड्ढा खोदकर गाड़ दिया गया जिससे बाद को मुखबिर बने इन्द्रपाल की शिनाख्त पर पुलिस द्वारा अस्थियाँ निकालकर अदालत में पेश की गइ±. ऐसा ही होना सुखदेव राज ने और कॉमरेड रामचन्द्र ने भी अपनी प्रसि( पुस्तक `नौजवान भारत सभा और सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन´ में उल्लखित किया है. कामरेड़ रामचन्द्र ने तो स्पष्ट लिखा है, “ In the meanwhile Indarpal was arrested . He was toutured and mercilessly beaten and agreed to become an approver. He related the story of the death of Bhagwati Charan and took the police to the place where Bhagwati Charan lay in the lap of mother earth. The police dug out the bones, produced them before the court and kept them in a box in the court”

दुर्गा भाभी ने भी अपने एक आलेख में वैशम्पायन के बताये विवरण के आधार पर लिखा है कि भगवती भाई के शव को जमींदोज कर दिया गया. वे बहुत भावुक शब्दों में कहती हैं कि वहीं जंगल में गड्ढा खोदकर शहीद के शव को दफना दिया गया. बाद को पुलिस ने वह जगह खोजी और अस्थियाँ बीनकर अदालत में भेजीं. भाभी के स्मरणों में हमें यह भी मिलता है, ... वे पुलिस के हाथ कभी नहीं आये. हाँ पुलिस के हाथों आया उनका मिट्टी में पड़ा हुआ शरीर.
 
फिर क्या कारण था कि यशपाल ने सिंहावलोकन में शहीद भगवतीचरण के शव को चादर में बाँधकर रावी की धरा में प्रवाहित किया जाना दिखाया. शायद वे इन्द्रपाल के द्वारा शव को गाडे़ जाने की जगह शिनाख्त किये जाने के अपराध को छिपाना चाहते थे और इसलिए उन्होंने उसे कथा रूप देकर सम्पूर्ण घटनाक्रम को बदलकर रख दिया. मैं जानता हूँ कि भगत सिंह के बचे-खुचे साथियों ने भी इस मामले में सघन जाँच-पड़ताल करने या तह में जाने का प्रयास नहीं किया. जयदेव कपूर ने भगवती भाई पर अपने आलेख में शव को जल में प्रवाह किया जाना ही दिखाया है. 1979 के शुरू के दिनों की बात है जब मैंने ऐसे ही अनेक प्रश्नों को लेकर जयदेव दा से विस्तार से बातचीत की. उसके कुछ अरसे बाद ही शहीद यतीन्द्रनाथदास की बलिदान अर्धशताब्दी कार्यक्रम में कलकत्ता जाते हुए वे मुझसे मिलते ही बोले, मैंने `सिंहावलोकन´ को दोबारा पढ़ लिया है. मैं कह सकता हूँ कि यशपाल ने उसे सेल्पफ डिफेन्स में लिखा है.

दूसरी ओर शिव वर्मा ने अपने एक शुरुआती आलेख में भगवतीचरण की शहादत के पश्चात शव को रावी नदी में प्रवाहित किये जाने का उल्लेख किया, जबकि बाद को अपनी मशहूर पुस्तक संस्मृतियाँ के 1983 में प्रकाशित तृतीय संस्करण में अन्तिम आलेख के रूप में भगवतीचरण की शहादत पर वैशम्पायन के संस्मरणों के आधर पर लिखा है,, ध्नवंतरि, आजाद और मदनगोपाल ही पौ फटने के पूर्व ही गेंती और पफावड़ों की व्यवस्था करके रवाना हो गए और सूरज निकलते-निकलते शव को धरती माता की गोद में सुला लौट आये. दाह संस्कार करना खतरे से खाली नहीं था. नदी में इतना पानी भी नहीं था कि शव को प्रवाह कर दिया जाता. अर्थात् शिव दा के दो आलेखों में एक ही घटना का नितान्त भिन्न विवरण हमें देखने को मिलता है.

सुशीला दीदी पर `दीदी सुशीला मोहन´ नाम से स्वर्गीय सत्यदेव विद्यालंकार ने जो पुस्तक लिखी उसके परिशिष्ट में दीदी की राम-कहानी शीर्षक के अंतर्गत उनके द्वारा कही गई क्रांतिकारी जीवन की घटनाओं का ब्योरा है. इसमें उन्होंने रावी के किनारे की बम विस्फोट की घटना का उल्लेख करते हुए लिखा है, अफसोस उन्हें (भगवतीचरण को) बचाया न जा सका. वहीं रावी के तट पर मृत शरीर को दफना दिया गया. वे रावी के पवित्रा तट पर सदा के लिए चिर निद्रा में सो गए.

द्वितीय लाहौर षड्यन्त्र केस में इन्द्रपाल ने मुखबिर होकर पुलिस की इस घटना की जानकारी दी तथा भगवतीचरण के शव को तलाश करने में पुलिस की मदद की. पुलिस ने उनकी अस्थियाँ मिट्टी छानकर एकत्रा कीं और अदालत में पेश कीं. सुखदेव राज ने अपने संस्मरणों में लिखा है, फ्मुझे याद है कि अदालत में एक बॉक्स की ओर संकेत करते हुए एक पुलिस सार्जेंट डेविडसन ने मुझसे कहा था -अपने मित्र भगवतीचरण से मिलिए. बाद में मुझे मालूम हुआ कि उस बक्से में भगवतीवचरण की अस्थियाँ हैं जिन्हें पुलिस ने मुकदमे के सिलसिले में अदालत को भेजा हैं.

इस षड्यन्त्र के एक अभियुक्त गुलाब सिंह ने अपनी पुस्तक `अंडर द शैडो गैलोज´ के अध्याय 5 के पृष्ठ पर 132 पर लिखा है, इन्द्रपाल ने अपने बयान में कहा है कि नये तरह का बम तैयार किया गया और एक शाम भगवतीचरण, सुखदेव राज और वैशम्पायन के साथ उसका परीक्षण करने गए. जैसे पंडित भगवतीचरण उस बम को फेंकने वाले ही थे कि घोड़े के ढीले होने के कारण वह उनके हाथ में ही फट गया. इसी पुस्तक में पृष्ठ 135 पर आगे लिखा है, जंगल के किनारे ही कब्र खोदकर साथियों ने शव को कब्र में दफना दिया. उस समय साथियों की आँखों से अश्रु थम नहीं रहे थे.

आगे चलकर इन्द्रपाल को यह बात स्वीकार करनी पड़ी कि उसकी सहायता से पुलिस ने लाश ढूँढ निकाली. मिट्टी छानकर हडि्डयाँ प्राप्त कर उन्हें मुकदमे में पेश किया गया. इन्द्रपाल को भी यह बात यशपाल ने ही बताई थी कि लाश दफना दी गई है. वैशम्पायन ने आजाद पर लिखी अपनी पुस्तक में इस सारे षड्यन्त्र का भंडापफोड़ किया है. उन्होंने स्पष्ट कहा है, यशपाल ने सम्भवत: यह (भगवतीचरण के शव का जल प्रवाह दिया जाना इसलिए लिखा है कि वह मुखबिर इन्द्रपाल के अपराध को जनता की दृष्टि में हल्का करना चाहता था. जहाँ-जहाँ इन्द्रपाल का उल्लेख `सिंहावलोकन´ में आया है, उसके प्रति सहृदयता प्रकट की गई है. इसमें मुझे आपत्ति नहीं. परन्तु जब घटनाओं का गला घोंटकर यह सहृदयता प्रकट की जाये तो वह इतिहास के साथ गद्दारी होगी, इतिहासकारों को गुमराह करना होगा. इन्द्रपाल के गद्दार होने पर भी यशपाल ने भैया (आजाद के मुख से उसकी तारीफ `सिंहावलोकन´ में करायी जबकि भैया ऐसा कुछ भी नहीं कह सकते थे. इस विषय में एक बात और उल्लेखनीय है कि यशपाल के कथनानुसार उसके दो चेले थे जयगोपाल और इन्द्रपाल. बाद में जो दोनों ही मुखबिर हो गए.

देखने योग्य यह भी है कि यशपाल ने `सिंहावलोकन´ में मुखबिर बने इसी इन्द्रपाल की तस्वीर को आजाद, ध्न्वन्तरि, शिव वर्मा, जयदेव कपूर और डॉú गयाप्रसाद जैसे क्रांतिकारियों के मध्य स्थान दिया है. जाँचा यह भी जाना चाहिए कि यशपाल ने `सिंहावलोकन´ में भगवती भाई के शव को जल प्रवाह किया जाना लिखा है लेकिन पृथक से अपने एक लेख मारे फोपाटकिन : भगवतीचरण में वे इस सम्पूर्ण कथा से पूरी तरह बचकर निकल जाते हैं.

यह सर्वविदित है कि एक बार भगवती भाई पर खुफिया पुलिस का आदमी होने का सन्देह किया गया था. बात बहुत दूर तक गयी और सुखदेव सहित दल के अनेक सदस्य उन्हें लेकर शंकाओं का जाल बुनने लगे. भगवती भाई एक सम्पन्न परिवार के व्यक्ति थे. उनके पिता पंú शिवचरण वोहरा आगरा से लाहौर आकर बस गये थे. लेकिन उनके दादा थे गुजरात के. पिता रेलवे में ऊँचे ओहदे पर थे और अंग्रेज सरकार ने उन्हें `रायबहादुर´ का खिताब दिया था. भगवती भाई का विवाह 13-14 वर्ष की उम्र में ही दुर्गा देवी से हो गया था. वे क्रांतिकारी दल से जुड़े तब शादीशुदा थे. लेकिन पत्नी उन्हें क्रांति पथ पर जाने से रोक नहीं पायीं. बल्कि दुर्गा स्वयं भी उसी रास्ते पर निर्भीकता से चल पड़ीं. गोद में तीन साल के बेटे शची को लेकर क्रांति के रास्ते पर इन दोनों ने जिस तरह लम्बे डग भरे वह एक रोमांचकारी गाथा है. भगवती भाई और दुर्गा भाभी दोनों ही क्रांतिकारियों की पर्याप्त आर्थिक मदद भी करते थे. इससे भी कुछ लोगों को सन्देह हुआ. इसे जिन खास लोगों ने हवा दी उनमें एक नाम जयचन्द्र विद्यालंकार का आता है. जयचन्द्र के छात्रा रहे थे भगवती भाई. अपने इतिहास ग्रन्थ `भारतीय क्रांतितिमार्गी राष्ट्रीय विचारधरा : 1920 के बाद´ मैं जयचन्द्र ने लिखा है कि उनकी बहन जी की एकमात्रा सन्तान विद्या उन दिनों जालन्धर कन्या महाविद्यालय में पढ़ रही थी, जिसका रिश्ता मैनपुरी केस के पुराने अभियुक्त चन्द्रधर जौहरी से तय हुआ था, जिसमें दहेज के रूप में सोने की बँगड़ियाँ दी जानी थीं. काकोरी केस के क्रांति कारियों को छुड़ाने के लिए दुर्गा भाभी ने अपनी सोने की बँगड़ियाँ पफंड के लिए देने का प्रस्ताव किया. जयचन्द्र ने कहा कि दुर्गा की वे सोने की बँगड़ियाँ पैसे देकर विद्या के विवाह के लिए ले ली जाएँ. बात यहाँ तक पहुँची कि यह कहा जाने लगा कि यदि दुर्गा देवी बिना बँगड़ियों के रह सकती हैं तो विद्या का विवाह बिना दहेज के क्यों नहीं हो सकता. मामला उलझ गया और कानों कान यह उड़ी कि जयचन्द्र ने यह अफवाह पैफलायी कि भगवती भाई का सम्बन्ध सी.आई.डी. से है. जयचन्द्र यह जरूर कहते हैं कि उनकी ओर से भगवती भाई पर सन्देह का कारण मात्रा इतना था कि भगवती की ओर से आतंकवादी कार्यों के लिए साथियों को उकसाना और असाधरण रूप से खुलकर खर्च करने से उत्पन्न शंका और उस धन के आगम स्रोतो के कारण ही उन्होंने साथियों को आने वाले सम्भावित खतरे से सावधान किया था. बाद को जयचन्द्र ने इस मामले में खेद व्यक्त करते हुए कहा था, मुझे आज दु:ख और पश्चाताप है कि भगवतीचरण की उस पथ से भटकाने वाली किन्तु विशु (भावना के कारण उसके विरुद्ध उस रूप में प्रचार कर उसकी निष्कपट आत्मा को उतना मानसिक कष्ट पहुँचाया. लेकिन दुर्गा की बँगड़ियों को उसी कीमत पर विद्या के विवाह के लिए खरीदे जाने का उस समय का मेरे प्रस्ताव का मेरे एक क्रांतिकर्मी होने के नाते का कोई सम्बन्ध नहीं था और न उस रूप में मुझे बहन जी की रकम को स्पर्श करने का कोई नैतिक या सामाजिक अधिकार ही था. इतनी बात मैं यहाँ इसलिए कह रहा हूँ कि मेरे खिलाफ इस बात को लेकर कुछ लोग आजकल काफी प्रचार कर रहे हैं.

आजाद के कानों तक भी यह सब पहुँचा. शायद वे भी बहुत समय तक भगवती भाई से नहीं मिले तो इसके पीछे साथियों का उनके विरुद्ध यही प्रचार था. लेकिन भगवती भाई तो खरा सोना थे. आगे चलकर समय ने यह सच कर दिखाया.
सवाल और भी थे, जैसे वायसराय की गाड़ी के नीचे बम विस्पफोट की घटना का कोई श्रेय भगवती भाई को नहीं दिया जाता जबकि वे ही उसके प्रमुख योजनाकार और सम्पादक थे. यह भी कि जिन भगवती भाई को क्रांतिकारी आन्दोलन का मस्तिष्क माना गया और जिन्होंने गाँधी के `कल्ट ऑफ द बम´ का अत्यन्त तर्कपूर्ण उत्तर `फिलासफी ऑफ द बम´ लिखकर प्रस्तुत किया जो भारतीय व्रफांतिकारी संग्राम का ऐतिहासिक दस्तावेज बन गया, उसे सामने रखकर भगवती भाई के व्रफांतिकर्म का मूल्यांकन क्यों नहींं किया जाता.
नौजवान भारत सभा लाहौर का घोषणापत्रा 6.4.1928 को भगवतीचरण बोहरा बी.ए. प्रचार मन्त्री नौजवान भारत सभा द्वारा अरोड़ वंश प्रेस लाहौर से मुद्रित और प्रकाशित हुआ था. एक अन्य दस्तावेज `हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन´ का घोषणापत्र है, जिसे लाहौर कांग्रेस के अवसर पर दुर्गा भाभी तथा अन्य क्रांतिकारी साथियों ने वितरित किया था, वह भी भगवती भाई का ही लिखा हुआ है. यह पर्चा खुफिया पुलिस द्वारा पकड़ लिया गया था और वहाँ से इसकी प्रति उपलब्ध हो पायी. भगवती भाई के बौद्धिक पक्ष को जानने के लिए ये तीन दस्तावेजी सबूत पर्याप्त हैं.

नौजवान भारत सभा की स्थापना लाहौर में 1926 में की गई थी जबकि उक्त घोषणापत्रा 1928 में लिखा गया. इस सभा के संस्थापको में भगत सिंह, सुखदेव, भगवतीचरण आदि युवा थे. यह क्रांतिकारी आन्दोलन का खुला मंच था, जिसमें आम सभाओं, बयानों, पर्चों आदि के माध्यम से व्रफांतिकारियों के उद्देश्यों और विचारों का प्रचार-प्रसार किया जाना तय किया गया था. भगत सिंह इसके प्रथम महामन्त्री थे और भगवती भाई प्रथम प्रचार मन्त्री. ध्न्वन्तरि, एहसान, इलाही, कामरेड रामचन्द्र, यशपाल भी इसके प्रमुख सदस्यों में थे. कहा जाता है कि समाजवाद की ओर झुकाव रखने वाले कांग्रेस के अनेक नौजवान भी खिंचकर इस ओर चले आये थे. सभा मैजिक लैंटर्न द्वारा क्रांतिकारी शहीदों के चित्रों का प्रदर्शन और साथ-साथ कमेन्ट्री के रूप में उस आन्दोलन के संक्षिप्त इतिहास से भी जनता को अवगत कराया जाता था. प्रचार का यह सशक्त माध्यम था जिसके कर्ताधर्ता भगवती भाई थे.

(आलेख का बाक़ी हिस्सा पढ़ने के लिए कृपया यहाँ क्लिक कीजिए)



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खुशनसीब हूं कि अभी भी लोगों का प्यार मिल रहा है : सोनल मानसिंह
सोनल मानसिंह का नाम उन चंद कलाकारों में शुमार है, जिन्हें ट्रेंड सेटर कहा गया है। पद्म विभूषण से सम्मानित यह प्रख्यात नृत्यांगना फुर्सत के लम्हों में अपने बीते दिनों को कैसे याद करती हैं और बदलते दौर में शास्त्रीय संगीत को कहां खड़ा देखती हैं, यह टटोलने की कोशिश की कलिका जैन ने।
 इस जीत ने सिखाया जीने का सलीका
 गीतकारों-संगीतकारों को उनका हक़ मिलना ही चाहिए : जावेद अख्तर
ज्योतिष