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साक्षात्कार : सती प्रथा हमारी परंपरा

देश के वरिष्ठ पत्राकार और ‘जनसत्ता’ के पूर्व संपादक प्रभाष जोशी क्रिकेट के प्रति अपने प्रेम को व्यक्त करने के लिए उस पर लिखते हैं. उनकी राय में भारतीय क्रिकेटर स्वाभाविक रूप से वह कौशल अर्जित करते हैं, जिसकी जरूरत क्रिकेट में होती है, कुछ वैसे ही जैसे ब्राह्मणों ने ब्रह्म से, वायवीय दुनिया से अपने संपर्क के पारंपरिक कौशल के कारण सिलिकॉन वैली में अपना झंडा गाड़ा. प्रभाष जी का मानना है कि भारत में सती प्रथा समेत तमाम मुद्दों को अपनी परंपरा में देखने की जरूरत है. यहां पेश है, उनसे हाल ही में की गई बातचीत के कुछ अंश.

कौशल वाली कौम

भारतीय क्रिकेट टीम के कई सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी मुसलमान हैं. यानी वर्ल्डकप में भारत का झंडा लेकर जाता हुआ अजहरुद्दीन और एक मैच में आपको याद हो तो पठान भाइयों ने अपन को जिताया था. दोनों आमने सामने थे. लार्ड्स का मैच जिसे सबसे बड़ा मैच मानते हैं, उसको जिताने वाला कौन था? मोहम्मद कैफ.

मुसलमानों ने भारतीय क्रिकेट का अहित किया हो, ऐसा आपको कहीं नहीं मिलेगा. बल्कि वो ज्यादा अच्छे खिलाड़ी हुए. इसका कारण है. अपने यहां मुसलमान कौन हुए? मुसलमान वो हुए, जो हाथ से काम करने वाले लोग थे. जुलाहे, लोहार, कुम्हार जो-जो भी हाथ से काम करने वाले लोग थे और जिनको आपके समाज में इज्जत की नजर से नहीं देखा जाता था, वो लोग मुसलमान हुए. वे स्वाभाविक रूप से हाथ को, उंगलियों को हैंडल करने वाले लोग थे. उनकी स्किल हमसे और आप से बेहतर है क्योंकि वो हाथ से ही काम करने वाले लोग थे. हम दिमाग से काम करने वाले लोग हैं.

हाथ में दक्ष होने के कारण अजहरुद्दीन की कलाई बेहतर चलती थी या मुश्ताक अली स्पिन करने में आपको कलाई और उंगलियां, इनका ही सबसे अच्छा इस्तेमाल करना आना चाहिए. तो वो जो हाथ से काम करने वाले लोग हैं, उनका स्किल, उनका हुनर, उनका कौशल जो है, वो दिमाग से काम करने वाले से ज्यादा बेहतर होता है, ट्रेनिंग के कारण.

जैसे सिलिकॉन वैली अमेरिका में नहीं होता, अगर दक्षिण भारत में आरक्षण नहीं लगा होता. दक्षिण के आरक्षण के कारण जितने भी ब्राह्मण लोग थे, ऊंची जातियों के, वो अमरीका गये और आज सिलिकॉन वेली की हर आईटी कंपनी का या तो प्रेसिडेंट इंडियन है या चेयरमेन इंडियन है या वाइस चेयरमेन इंडियन है या सेक्रेटरी इंडियन है. क्यों ? क्योंकि ब्राह्मण अपनी ट्रेनिंग से अव्यक्त चीजों को हैंडल करना बेहतर जानता है. क्योंकि वह ब्रह्म से संवाद कर रहा है. तो जो वायवीय चीजें होती हैं, जो स्थूल, सामने शारीरिक रूप में नहीं खड़ी हैं, जो अमूर्तन में काम करते हैं, जो आकाश में काम करते हैं. यानी चीजों को इमेजिन करके काम करते हैं. सामने जो उपस्थित है, वो नहीं करते. ब्राह्मणों की बचपन से ट्रेनिंग वही है, इसलिए वो अव्यक्त चीजों को, अभौतिक चीजों को, अयथार्थ चीजों को यथार्थ करने की कुव्वत रखते हैं, कौशल रखते हैं. इसलिए आईटी वहां इतना सफल हुआ. आईटी में वो इतने सफल हुए.

अपने समाज में अलग-अलग कौशल के अलग-अलग लोग हैं. अपन ने ये माना कि राजकाज में राजपूत अच्छा राज चलाते हैं. क्यों माना हमने ? एक तो वो परंपरा से राज चलाते आ रहे हैं, दूसरा चीजों के लिए समझौते करना, सबको खुश रखना, इसकी जो समझदारी है, कौशल जो होती है, वो आपको राज चलाते-चलाते आती है. आप अगर अपने परिवार के मुखिया हैं तो आप जानते हैं कि आपके परिवार के लोगों को किस तरह से हैंडल किया जाये.

ब्राह्मणों का वर्चस्व

मान लीजिए कि सचिन तेंदुलकर और विनोद कांबली खेल रहे हैं. अगर सचिन आउट हो जाये तो कोई यह नहीं मानेगा कि कांबली मैच को ले जायेगा. क्योकि कांबली का खेल, कांबली का चरित्रा, कांबली का एटीट्यूड चीजों को बनाकर रखने और लेकर जाने का नहीं है. वो कुछ करके दिखा देने का है. जिताने के लिए आपको ऐसा आदमी चाहिए, जो लंगर डालकर खड़ा हो जाये और आखिर तक उसको ले जा सके यानी धरण शक्ति वाला.

अब धरण शक्ति उन लोगों में होती है, जो शुरू से जो धरण करने की प्रवृत्ति के कारण आगे बढ़ते हैं. अब आप देखो अपने समाज में, अपनी राजनीति में. अपने यहां सबसे अच्छे राजनेता कौन है? आप देखोगे जवाहरलाल नेहरू ब्राह्मण, इंदिरा गांधी ब्राह्मण, अटल बिहारी वाजपेयी ब्राह्मण, नरसिंह राव ब्राह्मण, राजीव गांधी ब्राह्मण. क्यों ? क्योंकि सब चीजों को संभालकर चलाना है इसलिए ये समझौता वो समझौता वो सब कर सकते हैं. बेचारे अटल बिहारी बाजपेयी ने तो इतने समझौते किये कि उनके घुटनों को ऑपरेशन हुआ तो मैंने लिखा कि इतनी बार झुके हैं कि उनके घुटने खत्म हो गये, इसलिए ऑपेरशन करना पड़ा.

ये मैं जातिवादिता के नाते नहीं कह रहा हूँ. एक समाज में स्किल का लेवल होता है, कौशल का एक लेवल होता है, जो वो काम करते-करते प्राप्त करता है. उस कौशल का आप अपने क्षेत्रा में कैसा इस्तमाल करते हैं, उस पर निर्भर करता है.

इंदिरा गांधी बचपन में गूंगी गुड़ियाओं की सेना बनाकर लड़ा करती थीं. जब वह प्रधनमंत्री बनीं तो उन्होंने अपने आसपास गूंगे लोगों की पफौज खड़ी की. ऐसे लोग, जो उसके खिलाफ बोल नहीं सकते थे. या जो अपनी खुद की कैपासिटी में कुछ कर नहीं सकते हैं. वही एक सर्वोच्च नेता रहीं. बचपन के जो खिलौने होते हैं, वो बाद में हमारे औजार बनते हैं. जिससे हम चीजों को हैंडल करना सीखते हैं.

क्रिकेट में भी आप देखेंगे, सभी क्रिकेटरों का एनाॅलिसिस करके देखेंगे तो आप पाएंगे कि सबसे ज्यादा सस्टेन करने वाले, सबसे ज्यादा टिके रहने वाले कौन खिलाड़ी हैं ? सुनील गावस्कर सारस्वत ब्राह्मण, सचिन तेंदुलकर सारस्वत ब्राह्मण.

ये जो टिके रहने की परंपरा है, वो जाति से नहीं आयी. ये आपका लगातार उस काम को करते रहने के कारण है. इस कौशल का जिस भी क्षेत्रा में बेहतर इस्तेमाल हो सके वहां आप सफल हो सकते हैं. अगर आज दुनिया के सर्वश्रेष्ठ 11 खिलाड़ियों में से 5 हिन्दुस्तानी निकालेंगे तो उसका कारण यह है कि हमारे यहां वो कौशल विकसित है.

भारतीय बेट्समैन श्रेष्ठ

मैं सभी विश्वकप में देखने जाता हूँ, भारतीयों से अच्छी बल्लेबाजी कोई नहीं करता. सचिन तेंदुलकर को आगे-पीछे जाके बल्ला नहीं करना पड़ता है, जब वो गेंद को मारता है तो उसका पांव अपने आप गेंद के सामने होता है. यह कौशल है, जो अचानक नहीं आयी है. वो जो 130 मील प्रति घंटा की रफ्तार से आने वाली सर्विस को जब रिटर्न करते हैं टेनिस कोर्ट पर, तो सोच-समझ कर थोड़ी करते हैं. किसको बैकहैंड मारूंगा, किसको स्लाईस करूंगा, यह पहले से थोड़ी तय करते हैं. आपकी जो रिफ्लेक्सेस हैं, वो इतनी ट्यून्ड होते हैं कि जैसी गेंद आ रही है, आप उसे वैसा खेलते हैं. ये जो ट्रेंड करना है, यह आपके रिफ्लेक्सेस तो आपकी ट्रेनिंग से प्राप्त होती है. जिन लोगों को सदियों से जिस प्रकार के काम को करने की ट्रेनिंग मिली है, वे उस काम को अच्छा करते हैं.

क्रिकेट चूंकि अपने यहां अब समाज के मध्य वर्ग का खेल हो गया है तो आप देखेंगे कि कौशल का स्तर और दूसरी जगहों के स्तर से बहुत ऊँचा है. आस्ट्रेलियन गेंद को मारता है तो ऐसा लगता है कि हथौड़ा मार रहा है लेकिन जब हिन्दुस्तानी मारता है तो ऐसा लगता है एक तरह की कला से उसने उसको मारा है. दुनिया के सबसे अच्छे बैट्समैन आपके पास हैं, इसलिए क्योंकि वो कला आपकी है.

‘जब आप सिलिकॉन वैली, क्रिकेट, कौशल और अंततः ब्राह्मणवाद  की बात करते हैं तो इसका एक पाठ यह बनता है कि आप कहीं न कहीं ब्राह्मण होने की श्रेष्ठता को स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं.’

नहीं-नहीं, मैं ब्राह्मणवाद की बात ही नहीं कर रहा हूँ. मैं ब्राह्मण के उस कौशल की बात कर रहा हूँ. वो सिलिकान वैली में, आईटी में जाकर सफल हुए, यहां सफल नहीं होते थे. क्योंकि आईटी में आपको जो अमूर्त है, उसको मूर्त करने की कला आनी चाहिए. क्योंकि ब्राह्मण का काम वही है. वो उससे पैदा हुआ है. मैं परंपरा से विभिन्न जातियों के काम के दौरान विकसित हुई कुशलता की बात कर रहा हूँ. आप इसे ब्राह्मण जाति या ब्राह्मणवाद से मत जोड़िए.

सती हमारी परंपरा

‘मुझको आपका एक बहुचर्चित लेख याद आता है सती प्रथा वाला’

मैं यह मानता हूँ कि सती प्रथा के प्रति जो कानूनी रवैया है, वो अंग्रेजों का चलाया हुआ है. अपने यहां सती पति की चिता पर जल के मरने को कभी नहीं माना गया. सबसे बड़ी सती कौन है आपके यहां ? सीता. सीता आदमी के लिए मरी नहीं. दूसरी सबसे बड़ी कौन है आपके यहां ? पार्वती. वो खुद जल गई लेकिन पति का जो गौरव है, सम्मान है वो बनाने के लिए. उसके लिए. सावित्री, सावित्री सबसे बड़ी सती मानी जाती है. सावित्राी वो है, जिसने अपने पति को जिंदा किया, मृत पति को जिंदा किया.

सती अपनी परंपरा में सत्व से जुड़ी हुई चीज है. मेरा सत्व, मेरा निजत्व जो है, उसका मैं एसर्ट करूं. अब वो अगर पतित होकर बंगाल में जवान लड़कियों की क्योंकि आदमी कम होते थे, लड़कियां ज्यादा होती थीं, इसलिए ब्याह देने की परंपरा हुई. इसलिए कि वो रहेगी तो बंटवारा होगा संपत्ति में. इसलिए वह घर में रहे. जाट लोग तो चादर डाल देते हैं, घर से जाने नहीं देते. अपने यहां कुछ जगहों पर उसको सती कर देते हैं.

आप अपने देश की एक प्रथा को, अपने देश की पंरपरा में देखेंगे या अंग्रेजों की नजर से देखेंगे, मेरा झगड़ा यह है. मेरा मूल झगड़ा ये है.
(रविवार डॉट कॉम से साभार)


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