महानगर में जिन्दगी गुजारते चले जाने के खामियाजे का पहला अहसास आपको तभी हिट करता है जब आप किसी छोटे शहर या कस्बे में पहुँच जाते हैं. मुझे गुवाहाटी एक कस्बा लग रहा था हालाँकि सभी तरह के आधुनिक महानगरीय भग्नावशेष वहाँ प्रचुरता में बिखरे पड़े थे... फ्लाइओवर्स, मल्टीप्लैक्स, बड़ी कम्पनियों के शोरूम इत्यादि. लेकिन इस सब के बावजूद कस्बे की हवा अपनी तरह से चुगली किये जा रही थी... इमारतें उतनी बहुमंजिला या गगनचुम्बी नहीं थीं, सड़कों पर चलते वाहनों में टेम्पोनुमा स्थानीय वाहनों की तादाद ज्यादा थी, बाजार में घूमते लोगों की वेशभूषा में खास तरह की चटखी मिलेगी और सौ बातों की एक बात यह कि लोगों की चाल-ढाल में गौरतलब आवारगी या आरामतलबी दिखेगी जो व्यस्तता नाम की महानगरीय महामारी के विपरीत छोर पर अवस्थित होती है.
असम और पूरे उत्तर-पूर्वीय इलाके के बारे में हम उत्तर-भारतीयों को इतनी कम जानकारी होती है कि शर्म आने लगती है. भूगोल की इतनी जानकारी कि इधर के मानचित्रों में ऊपर अरुणाचल प्रदेश के बाद क्रमवार नीचे आने वाले राज्य कौन से हैं, बहुत लोगों के सिर के ऊपर से चली जाएगी. जिस व्यक्ति को इन राज्यों की राजधानियों के नाम बिना किसी घाल-मेल के पता हों, वह तो सचमुच का पढ़ा-लिखा हो सकता है. जानकार होने की इन्तहा यही होगी कि आपको एक-दो राज्यों के लोकनृत्य या मुख्यमंत्रियों के नाम भी पता हों. `आवश्यकता ही आविष्कार की जननी है´ से हमारा ज्ञान इतना प्रभावित रहता है कि इतने विशाल और संस्कृति-सम्पन्न इलाके के बारे में कुछ भी जाने बगैर हमारा काम बखूबी चल जाता है. दिल्ली के स्कूल-कॉलिजों या अखिल भारतीय सेवाओं में अनुसूचित जातियों के
लिए आरक्षित मणिपुरी-मिजोरमी लड़के-लड़कियों का जैनटिक नाम `चिंकी´ ही होता है. लेकिन असम में इसकी पहचान का पर्याय यहाँ पनप रहे उग्रवादी संगठन `उल्फा´ (यूनाइटेड लिबरेशन प्रंफट ऑपफ असमद्ध की गतिविधियां (अपहरण, फिरौती, मारकाट रही हैं. इसी की तर्ज पर बोडो उग्रवादियों का नाम आता है. कोई आश्चर्य नहीं कि यहाँ आने की सूचना मैंने जब मुम्बई में रह रहे चन्द मित्रों को दी तो उन्होंने मित्रतावश अनायास ही उल्फा-बोडो के प्रकोप से बचने की हिदायत जारी कर दी क्योंकि यह हिदायत जरूरी थी.
संयोग से यह असम समेत पूरे देश में संसदीय चुनावों का समय था और मुझे असम के ऐसे दूरस्थ अनसुने इलाकों में जाने का मौका मिला जहाँ चयन से कोई दुबारा तो नहीं जाना चाहेगा. अपनी तरह से बड़े अजीबो-गरीब भूगोल में फैले ये दो कस्बे दरअसल बांग्लादेश और मेघालय से जुड़े हैं. इतने अलग और दूरस्थ क्षेत्र को जानने की जिज्ञासा और चुनौती अपनी तरह से एक साथ करवटें लेने लगी. पहली नजर में ही जानकारियाँ बहुत हस्बेमामूल होते हुए भी दिलचस्प लगीं. मसलन, यह अपनी तरह का अकेला ऐसा इलाका होगा जो अपने मुख्यालय से जमीन के रास्ते जुड़ा हुआ नहीं है. ब्रह्मपुत्रा नदी के रास्ते से आप जिला मुख्यालय तक अवश्य पहुँच सकते हैं मगर सड़क के रास्ते से तो आपको मेघालय होकर ही निकलना पड़ेगा यह भारत का सबसे ज्यादा मुस्लिम आबादी का इलाका होगा (94»द्ध...अखिल भारतीय स्तर पर `अल्पसंख्यक´ कहलायी जाने वाली आबादी यहाँ `बहुसंख्यक´ है, और देश का यह ऐसा इलाका है जहाँ सबसे अधिक नदी-द्वीप हैं यानी सौ से ऊपर गाँव नदी की गोद में साँस लेते हैं. इन तीनों कारकों का यहाँ की व्यवस्था, अर्थव्यवस्था और संस्कृति पर निश्चित प्रभाव पड़ते हैं जिनकी तह में जाना दिलचस्प और चौंकाने वाला होता है. अलावा इसके, यह इलाका ब्रह्मपुत्रा, मेघालय और बांग्लादेश की सीमा से लगा बसा है जो यहाँ की जीवन पद्धति से गहरा सम्पृक्त रखते हैं.
बॉर्डर और बिजनेस
मैंने अभी तक दो देशों के बीच की सीमा रेखा नहीं देखी थी. यूरोप के कई देशों की तरह जिन देशों के बीच सीमा को लेकर कोई विवाद नहीं होता है या आर्थिक स्थितियाँ ऐसी होती हैं कि कोई आपसी चिन्ता जन्म नहीं लेती है, उनकी सीमा रेखा के बारे में सोचा जा सकता है...कि वह कोई मामूली शिनाख्ती पट्टी या चिह्न बना रहता होगा. मगर पाकिस्तान और चीन की तरह बांग्लादेश भी भारत के लिए सीमा सम्बंधी कई विवाद और चुनौतियाँ पेश करता है. भारत-बांग्लादेश के बीच एक बेहद वृहदाकार जटिल सीमा है...असम, मेघालय, प बंगाल, मणिपुर और त्रिपुरा जैसे पाँच राज्यों से जुड़ी हुई. बांग्लादेश के इन सीमावर्ती इलाकों में गरीबी-बेरोजगारी का इतना बुरा हाल है कि सैकड़ों किलोमीटर की कंटीली बाड़ और पहरे के बावजूद वहाँ के लाखों लोग नाजायश तरीके से सीमा पार करके भारत के तमाम इलाकों-प्रदेशों में समा जाने को आतुर रहते हैं, असम जैसे सीमावर्ती राज्य में तो और भी ज्यादा क्योंकि भाषाई संस्कृति यहाँ ज्यादा करीब पड़ती है. मुम्बई तक में जब-तब उनकी उपस्थिति कराह उठती है. येन-केन अपनी दो जून रोटी (भात और सलामती की तलाश में भटकते ये लाखों कमनसीब इस इलाके के संसाधनों पर इतना और ऐसा दबाव पैदा करते हैं कि एक ही धर्म का होना बेमानी हो उठता है. इससे मजदूर जरूर कम दामों पर मिल जाते हैं मगर रिहाइश (स्लम की समस्या विकराल होने लगती है. बहुत जल्द नागरिकता का मामला उठने लगता है जिसके जटिल राजनैतिक आयाम होते हैं.
कुछ देर ब्रह्मपुत्रा के किनारे बाँध् सरीखी सड़क, जिसे बीएसएफ रोड यानी सीमा सुरक्षा बल रोड के नाम से जाना जाता है, पर चलकर हम उस साफ-सुथरी सड़क पर आ गये जो आमजन के लिए वर्जित रहती है. सड़क उठान लिये हुए है और उसके दूसरी तरफ ऐसी घनी और कंटीली बाड़ लगी है कि कोई देखकर दहल जाये. ढाई से तीन मीटर चौड़े और पाँच-सात फीट जमीन से उठे हुए कंक्रीट के बेस पर दो मीटर के फासले पर ऐसे दाँतेदार समानांतर खम्बों की कतार है कि लगता है किसी मगरमच्छ का जबड़ा बिछा दिया गया है. हर खम्बा अंग्रेजी के `वाइ´ अक्षर की तरह ऊपरी छोर से दो-मुँहा और सिरे तक दाँतेदार. नुकीले दाँतों के ऊपर से एक और काँटेदार तार गुजरती है. आयरन एंगल के एक खम्बे से दूसरे की दूरी एक मीटर से भी कम होगी. खम्बे का काँटेदार सिरा अन्दर और बाहर दोनों तरफ खुला होता है ताकि उस पर चढ़कर दूसरी तरफ जाने का खयाल भी न आये. किसी तरह कोई उसे कूदकर `इध्र´ आ गया तो उसके `स्वागत´ के लिए कंटीले तारों के तीन-तीन फीट व्यास के एक-दूसरे से सटे दो जालीदार सिलिंडर पसरे हैं. समानान्तर चलते इन सिलिंडरों के ऊपर उन्हीं के आकार और उसी तरह कटखने दिखते सिलिंडरों की सवारी चलती है. तारों, खम्बों और दाँतों का सबकुछ इतना सघन, पुख्ता और डरावना है कि लगता है यह इन्तजाम किसी बनैले जानवर से बचाने के लिए किया गया होगा. किसी नरभक्षी-बाघ से भी कोई यूँ नहीं बचाता होगा. इस `सीमा´ के उस पार नजर डालने पर खुद से यह भावुकता भरा सवाल किये बगैर नहीं रह सका कि क्या कोई समझा सकता है कि दोनों तरफ के मिट्टी, पानी, जीव-जन्तु और मनुष्यों में क्या अलग है जो इस कदर दागदार बाड़ से विभाजित कर दिये जाने को अभिशप्त हैं. संयोग से यहाँ तो दोनों तरफ ही धर्म (इस्लाम और जाति (गरीब लोग रहते हैं फिर भी... बाड़ के दूसरी तरफ की पहले सौ मीटर की जमीन भारत की है जिस पर बाकायदा खेती की जाती है. जगह-जगह बने निकास द्वारों पर रखे रजिस्टरों में नाम दर्ज कराकर उधर जाने की छूट रहती है, शाम तक लौट आना होता है जिसके लिए दूसरी एंट्री करके, हिसाबी खातों की तरह इन्सानों का हिसाब बिठा लिया जाता है. उसके बाद के सौ मीटर का क्षेत्र नो मेन्स लैंड कहलाएगा. उसके बाद बांग्लादेश.
बाड़ के अपनी तरफ वाले इलाके में खूब अच्छी फसल होती है जिसका प्रमुख कारण यह बाड़ ही है जिसके कंक्रीट का आधार जमीन से 5-7 फीट ऊपर उठा होने के कारण एक किस्म के बाँध का भी काम करता है. ब्रह्मपुत्रा अपने पानी को जब उस परदेशी जमीन में छोड़ देती है तो इस बाड़-बाँध के कारण उस जल-राशि को वापस लौटने की छूट नहीं मिल पाती है. तीस-चालीस किलोमीटर तक इस पर काम हो चुका है और पता नहीं कितने सैकड़ों किलोमीटर और होना बकाया है. इस तरह की बाड़ के दो वर्ग मीटर में जितना मालो-सामान (लोहा, सीमेंट, बजरी, इत्यादि खपता है उसके खर्च में एक छोटा मकान तैयार हो जाएगा. लेकिन `राष्ट्रीयता´ के मसलों पर इस तरह `रिड्यूस´ होकर बात करना वर्जित है. बाड़ से सटी सड़क पर रफ्तार से चलती गाड़ी में बैठकर ही मैंने देखा कि हर आध किलोमीटर के फासले पर एक तदर्थ किस्म के आसरों की श्रृंखला है. हर एक में एक जवान तैनात. कुछ जगह वे जवान वहाँ से निकलकर पाँच-सात किलो भार वाली बन्दूकें थामे वक्तकाटू ढंग से टहल रहे थे. हमारे वाहन को देख उनकी सन्देह करती निगाहें बहुत जल्द ही एक ठस्स एकरसता टूटने के अव्यक्त उल्लास से दमक उठतीं. शायद ये प्रहरी वहाँ हर दम, शिफ्टवार तैनात रहते हों. दिन-रात. सर्दी-गर्मी. एकदम निर्जन, सुनसान इलाके में अगले तबादले या मुँहबाये खड़ी बेकारी से निजात पाते युवकों की जमात. देश की सुरक्षा करने के मुगालते या जिम्मेदारी तले बोरियत की बोरी उठाये न जाने कितने निर्विचार युवक. सूचना थी कि जंगली जानवरों का तो नहीं मगर साँप-बिच्छुओं का इलाके में खूब प्रकोप रहता है. देश की खातिर कितने ही जवान साँपों के काटने पर `शहीद´ कहलाये जाते होंगे क्योंकि वे सीमा पर मारे जाते हैं. बेतरतीब वनस्पति और नीची जमीन के कारण जगह-जगह उभर आयीं पोखरों से पूरे इलाके में मच्छरों ने दिमागी मलेरिया का प्रकोप अलग फैला रखा है. यह सब भी शहादत के पहलू हैं. आगे एक ऐसा स्थान भी आया जहाँ बड़ा दरवाजा था. यह बांग्लादेश जाने का आधिकारिक रास्ता है. जिन्हें वीशा-पासपोर्ट मिल जाता है वे इस रास्ते का इस्तेमाल कर सकते हैं. जिन्हें वीशा का रास्ता टेढ़ा या गैर-जरूरी लगता है उन्हें सैकड़ों मील लम्बी सीमा पर किधर से भी चले जाना सहूलियत दे जाता है. दो रोज पहले के इतवारी `असम ट्रिब्यून´ का एक फीचर लेख अचानक कौंध आया.
भारत के अधिकांश भाग में गौमाँस नहीं खाया जाता है. बंगाली-असमी समाज माँसाहारी है लेकिन ब्रह्मपुत्रा की कृपा से खाने में मछली का चलन ज्यादा है. भारत-बांग्लादेश सीमा पर बीएसएपफ की दस्त रहती है मगर पिछले कई बरसों से गाय (गाय-गोरूद्ध और बैलों (बुलंक-गोरूद्ध का कारोबार खूब फल-फूल रहा है. भारत में कोई गाय या बैल दो-तीन हजार रुपये में मिल जाता है लेकिन बांग्लादेश की सीमा पार करते ही उसका दाम पचास हजार तक पहुँच जाता है. जिस देश की आर्थिक स्थिति भारत से भी गयी-बीती हो, जहाँ बिजली-पानी तो छोड़िये खाने योग्य नमक तक की किल्लत हो, वह एक गाय की इतनी कीमत दे सकता है यह बात अपनी बुनियाद में ही अर्थ-वित्त के प्राथमिक उसूलों के खिलाफ खड़ी लगती है. मगर जीवन की वास्तविकताएँ अर्थ-वित्त के उसूलों की कब मोहताज रही हैं थोड़ा खंगालने पर ज्ञात होता है कि गौमाँस के निर्यात पर बांग्लादेश में बढ़िया उद्योग है. डॉलर-पाउन्ड को रुपयों में बदली करें तो प्रति गाय पचास हजार रुपयों से ज्यादा का माँस ही मिल जाता है. अलावा इसके कई बहुराष्ट्रीय-औषधीय कम्पनियाँ गाय की खाल, सींग और हडि्डयों के व्यावसायिक इस्तेमाल से भी मोटी कमाई करती हैं. एक मुनाफेदार मंजिल किस तरह व्यवस्था के तमाम अवरोधों को पार करा देती है और निजी स्वार्थ-लाभ किस तरह तमाम दुश्वारियों को अपना रास्ता बना लेते हैं, यह जानने समझने के लिए इस इलाके से की जाने वाली गायों की तस्करी एक उम्दा मिसाल (केस स्टडी की तरह देखी जा सकती है...डेढ़-दो हजार किलोमीटर की दूरी और चार-पाँच राज्यों की चुंगियों और ट्रैफिक की अड़चनों को पार करने में दूसरी चीजों को हफ्ता-पन्द्रह दिन लग जाएँगे मगर बांग्लादेश भेजी जाने वाली गायों में इतना लुब्रिकेशन लगा होता है कि तमाम तरह के रास्तों और एजेंटों की मार्फत बने `ग्रीन चैनलों´ से होकर वे अपने मुकाम तक पह्रुचा दी जाती हैं. इस मुहिम में अन्तिम अड़चन सीमा पर चौकसी करते बीएसएफ के जवान होते हैं लेकिन इन्सान तो आखिर वे भी होते हैं...वैकल्पिक अर्थोपार्जन के अभाव में जान जोखिम में डालकर लगातार कष्ट झेलकर की जाने वाली मामूली नौकरी के लाचार गुलाम. हर अवैध धंधे की मशीन को चलाने के लिए जिन पुर्जों की आवश्यकता होती है, यह जवान, और सम्भवत: उनके आका भी, उसका हिस्सा बना दिये जाते हैं. ईवान क्लीमा ने अपनी एक कहानी में दर्ज भी किया है कि बढ़ती व्यवस्थागत बाधाएँ कभी तस्करों को हौसलापस्त नहीं करती हैं...उनका बढ़ता शिकंजा तस्करों को और चौकन्ना एवं कल्पनाशील जरूर बना देता है. एक अनुमान के मुताबिक नदी या सीमा के रास्ते से तकरीबन एक लाख गायों को तस्करी के जरिये बांग्लादेश पहुँचा दिया जाता है. कभी-कभार असम पुलिस या बीएसएफ किसी की धर-पकड़ भी कर लेती है, कागजों पर अपनी उपस्थिति दिखाने भर के लिए...जैसे मुम्बई के होटलों में यदा-कदा वेश्यावृत्ति के खिलाफ छापे मारने का उपक्रम होता है.
इस धंधे को बन्द करना मुश्किल है। बीएसएफ के एक वरिष्ठ अधिकारी ने एक बातचीत में स्वीकारोक्ति की. जिस खेल में दोनों पक्षों के हितों में संलग्नता समा चुकी हो उसे कानूनन रोकना नामुमकिन है. मैंने तो अपने जवानों को भावनात्मक स्तर भी खूब ललकारा है...कि (हरामजादों गाय हमारी माता है जिसे बॉर्डर पार करते ही काट दिया जाएगा...तुम अपनी माँ को ऐसे कैसे कटने दे सकते हो... उन्होंने आगे बताया. कमांडर साहब आपकी बातें और सीख अपनी जगह दुरुस्त मगर हमारी जिन्दगी तो हमारी ही है. इलाके के गाय-बैलधारी किसानों को विशेषत: इस अभियान में शामिल किया जाता है ताकि आन पड़ने पर तस्करी के माल को वे `अपना´ दिखाते हुए साधिकार उसे चरता-फिरता दिखा सकें (उन्हें कौन सी बैलेंस शीट रखनी होती है और मौका मिलते ही बॉर्डर पास करा सकें. इतने लम्बे सफर और कई तरह के एजेंटों के शामिल होने से तस्करित माल की रेवेन्यु में कई तरह की टूट-फूट और लीकेज होती है इसलिए अन्तत: हाथ लगी आमदनी में इस तरह का बट्टा-खर्च शामिल करके ही कीमत निर्धारण होता है. लेकिन यह जाहिर है कि आपसी मुनाके के सौदे किसी चीज को न छोटा-बड़ा समझते हैं और न ही वे कानून-नैतिकता सम्मत बाध्यताओं से कुम्हलाते हैं.
सब-इंसपैक्टर तरुण दास हाजिर हो!
जब मैं उस थाने में पहुँचा तो थानाध्यक्ष तरुण दास कहीं निकले हुए थे. तीन चार रोज पहले ही पुलिस चौकी पर तैनात एक होमगार्ड को किसी आतंकी ने ग्रेनेड फेंककर मार दिया था. कस्बे के भीड़ भरे इलाके में इस तरह की हरकत खूनी को पकड़ने में दिक्कतें पेश करती हैं. मोटरसाइकिल या दूसरे वाहन पर कोई सवार हो तो वाहन के नम्बर-रंग-बनावट के हुलिये से धरपकड़ की जा सकती है मगर ऐसे ही कोई नामालूम अचानक जेब से निकालकर कुछ फेंक दे तो क्या किया जा सकता है पुलिस उपकप्तान ने बताया कि असम या दूसरे सीमावर्ती राज्यों में आतंकी हरकतें अक्सर सीधे-सीधे नहीं हो रही हैं. ये लोग किसी जरूरतमंद मासूम को थोड़े पैसे का लालच देकर अपनी योजना क्रियान्वित करवाते हैं. यानी आतंक की `आउटसोर्सिंग´ होती है. जो व्यक्ति ग्रेनेड या बम फेंकता है उसकी किसी व्यक्ति या व्यवस्था से कोई शिकायत नाराजगी नहीं होती है और न उसे उन लोगों से कोई वास्ता होता है जो उसका इस्तेमाल कर रहे होते हैं. उसकी मजबूरी बस यही होती है कि उसे पेट भरने के लिए धन की दरकार होती है और जो तमाम मेहनत और कोशिशों के बावजूद उसे मुहैया नहीं होता है. बिना किसी नीयत या इरादे से किसी का खून करने वाले अपराधी को पकड़ना वैसे भी मुश्किल होता है. थाने के नजदीक रहने वाले एक अधेड़ ने बताया कि इक्कीस वर्घीय उस होमगार्ड की विधवा का रोना-बिलखना देखा नहीं जा रहा था...दो महीने पहले ही उसने अपने पहले शिशु को जन्म दिया था. होमगार्ड वालों के मुआवजे का वैसे भी कोई ठिकाना नहीं. तरुणदास ने ग्रेनेड हमले में हुई प्रगति से अवगत कराया...कौन-सा ग्रुप इसके पीछे है, खूनी का मोबाइल नम्बर, आकाओं का कॉल रिकॉर्ड... उनके बीच एक बातचीत भी सुन ली गयी है. पाँच-छह लोगों को डिटेन किया गया है. असली गुनाहगार (मास्टर माइंड्स शीघ्र ही पकड़ लिये जा सकते हैं बशर्ते वे भारत में ही हों, क्योंकि बांग्लादेश के साथ खुली सीमा (पोरस बॉर्डर या बीएसएफ जवानों को कुछ खिला-पिलाकर सीमा के उस तरफ जा दुबकने की सहूलियत इस तरह की विध्वंसात्मक हरकतों पर अंकुश लगाने में मुश्किलें पेश करती हैं.
तरुण के शरीर से निकले दिन भर के पसीने के भभूकों ने ऐसी अफरा- तफरी छेड़ रखी थी कि उनकी गुमचोट की अनदेखी करना मुश्किल हो रहा था. जिस कमरे में हम बैठे थे उसमें हमारे बीच वाली मेज दो गुणा तीन फीट आकार की रही होगी. तकरीबन तीस-चालीस साल पुराना कोई टेलिफोन नहीं. शाम का झुटपुटा इस दरम्यान कूच कर गया था और अंधेरा घिर आया था. मगर रोशनी के नाम पर जो बल्ब लटक रहा था उसकी फिलामेंट, लोड कम होने के कारण हीटर की तरह केसरिया रंग चमका रहा था. एक महिला कांस्टेबल बिना पूछे ही चाय-नाश्ता रख गयी. हर जगह की अपनी इस आव-भगत का तरीका मुझे दिलचस्प लगता है. हर कप के साथ रखी स्टील की कटोरीनुमा प्लेट में दो बिस्किट और एक बर्फी का टुकड़ा तरुण ने मुझे पहले बर्फी खाने का आग्रह किया क्योंकि यह स्थानीय रूप से पैदा किये काजुओं से बनी थी.
दरअसल यह ग्रेनेड हमला मुझ पर टारगेटिड था, होमगार्ड तो बेचारा यूँ ही शहीद हो गया.. चाय की चुस्की के साथ मुद्दे की बात पर आते हुए तरुण यूँ बोले मानो किसी अन्य, एकदम तीसरे व्यक्ति के बारे में बात की जा रही हो. वारदात, आतंक और गंदगोल (हुडदंग, डिस्टर्बेंस या शांति-भंग के लिए प्रयुक्त किया जाने वाला असमिया लफ्ज से रोज-रोज दो-चार होते हुए क्या पुलिसिये अपनी जान और जोखिम की जानिब इतने अनमने हो जाते हैं किसी संक्रामक बीमारी की तरह अतीत के अपने अभियानों पर आसक्त होने-रहने वाले अधिकारियों की आदत के विपरीत, तरुण ने पूछे जाने पर भी उन सब सफल-असफल अभियानों की बात हँसकर टाल दी जिनके तहत पुलिसिया नौकरी के दौरान उन्होंने `उल्फा´ `बोडो´ या दूसरे स्थानीय `गंदगोलियों´ से भिड़न्त की थी. सहज खिसकती आत्मीय बातचीत के दौरान मैं एक चीज, शायद वातावरणीय संस्कारवश, नोटिस किये बगैर नहीं रह सका. करीब 94 प्रतिशत मुस्लिम आबादी वाले इलाके में तरुण को अपने गैर-मुस्लिम होने का अहसास या डर नहीं था. खुराफातियों और दंगाइयों-आतंकियों से पेशेगत दुश्मनी में धर्म या धार्मिकता कहीं नजर नहीं आ रही थी. मैं मन ही मन तरुण के घर परिवार के बारे में सोचने लगा. एक निरीह और मासूम होमगार्ड की शहादत तो मुँहबाये खड़ी ही थी. तरुण दास जैसों को आये दिन टपका दिया जाता है जो इस मीडिया युग में खबर-योग्य घटना नहीं होती हैं.
एसपी साहब ने जिला मुख्यालय में इन्तजामात सम्बंधी बैठक रखी थी...वहाँ नहीं गया होता तो आपके साथ बैठकर चाय नहीं हो पाती कहते हुए उसने पहली बार कुछ आत्मदया मिश्रित हँसी बिखेरी.
मैं सोचने लगा कि ऐसे जाँबाज प्रहरियों को राज्य जितनी भी सुविधा और सहूलियत नवाजे, कम होगी क्योंकि राज्य-संस्था की विश्वसनीयता को स्थापित-बरकरार रखने में मोर्चे पर डटे तरुण दास जैसे नामालूमे की दैनंदिनी पहल और श्रम मेंहदी में छिपी लाली की तरह पोशीदा रहती है. शिकायत के तौर पर नहीं मगर बातचीत के जरिये जो पता चला वह लगभग हौलनाक था. तरुण को नौकरी करते हुए उन्नीस वर्ष हो गए हैं और उन्हें अभी अपनी पहली पदोन्नति का इन्तजार है. यानी सन् 1990 का सबइंस्पैक्टर आज भी उसी पायदान पर खड़ा है. इस बीच विवाह हुआ, बच्चे हो गये जो आज इतने बड़े हो गए हैं कि भविष्य की खातिर इस छोटे कस्बे में पढ़ने की बजाय सौ मील के फासले पर बड़े कस्बे में रहकर पढ़ रहे हैं. यानी बारह हजार की नौकरी में दो घर चलाने होते हैं मैंने सहानुभुति में आश्चर्य व्यक्त किया तो असहमति में मुस्कराकर बोले, गांव में माँ-पिताजी भी हैं...थोड़ा-बहुत वहाँ भी सम्भालना पड़ता है...
हमारी बातें कहाँ से शुरू हुई थीं और अचानक किस तरफ मुड़ने लगीं.