प्रसिद्ध अलोचक वाल्टर बेन्जामिन ने लिखा है कि संस्कृति का इतिहास बर्बरता का भी इतिहास होता है. किसी भी सभ्यता की कहानी बर्बरता का इतिवृत्त इसलिए होती है कि समाज और संस्कृति की संरचना में वर्चस्व का आख्यान भी छिपा होता है. अतिशय सहज दिखाई पड़ने वाले समाज में भी सत्ता सम्बन्धें का जाल फैला होता है. सामाजिक उथल-पुथल के दौर में ये सम्बन्ध स्पष्टतर होते हैं और संघर्षों के रूप में दृष्टिगोचर होते हैं. कभी-कभी ये हमारे चारों तरफ इस प्रकार अस्तित्वमान होते हैं कि इन्हें देख पाना भी सम्भव नहीं होता. यदि किसी लँगड़ी उपमा का इस्तेमाल करना हो तो वे हमारे चारों तरफ अणुओं और परमाणुओं के समान गतिमान होते हैं जिनकी अन्तर्क्रियाएँ हमें दिखालाई नहीं पड़तीं मगर वे ‘होती’ हैं. हमारे जीवन के सामान्य व्यवहारों और उनसे जुड़ी नैतिकताओं और सहजमान्य और अक्सर सर्वमान्य मूल्यों में ये सम्बन्ध गुंथे-बिंधे होते हैं।
साहित्य जगत की सफल रचनाओं की यह विशेषता रही है कि वे समय-समय के इस अदृश्य को दृश्य कराती हैं, जैसे कोई चश्मा हो जिसे लगाने पर हम विद्युत तरंगों को देख सकते हों. आजकल आलोचकों के बीच आधुनिक उपन्यासकारों की आलोचना की एक प्रवृत्ति आम है जिसके पीछे कुछ सही, कुछ गलत कारण हैं. मगर हम इस सच से इन्कार नहीं कर सकते कि इन्हीं आधुनिक उपन्यासकारों ने ऐसे बहुत से सामाजिक-सांस्कृतिक पक्षों को उद्घाटित किया है जिन्हें हम अपने सामान्य विवेक के आधार पर नहीं समझ पाते. इसे आधुनिक और समकालीन उपन्यासों की विशेषता के रूप में देखा जा सकता है. इन उपन्यासों की परम्परा में ही हम हरी चरन प्रकाश के उपन्यास ‘एक गंधर्व का दुःस्वप्न’ को भी रख सकते हैं जो भारतीय समाज में अन्तःनहित शक्ति सम्बन्धों की लम्बी और अदृष्ट कहानी कहता है. यह कहानी महात्मा गाँधी की हत्या से प्रारम्भ होकर बाबरी मस्जिद के हिन्दुत्ववादियों के द्वारा विध्वंस तक पहुँचती है. यह आख्यान भारत की आजादी के बाद की पहली बड़ी त्रासदी से लेकर हमारे समय की साम्प्रदायिकता के काले कारनामे तक फैला है जो दूसरे शब्दों में स्वतंत्रा भारत का लगभग पूरा इतिहास ही है.
हरीचरन प्रकाश का यह उपन्यास इतिहास से जुड़ा होते हुए भी पारम्परिक अर्थों में इतिहासगाथा नहीं है. इतिहास और इतिहास से जुड़ी घटनाएँ पूरे उपन्यास में बिखरी हुई हैं मगर वे उपन्यास का मुख्य कथ्य नहीं हैं यह वास्तव में भारत के हिन्दी क्षेत्रा के एक छोटे से शहर फैज़ाबाद की एक छोटी सी जगह टीकापाली नाम काल्पनिक पर जगह वास्तविक में रहने वाले एक सामान्य से व्यक्ति भवनाथ शुक्ल की कहानी है जिसके जीवन में देखें तो कुछ ऐसा नहीं घटता जो किसी रूढ़ अर्थ में ऐतिहासिक महत्च का हो. उसके जीवन की किसी घटना को इतिहासकार तो इतिहासकार, कोई खबरनवीस भी अपने अखबार में जगह देना पसन्द नहीं करेगा. कुल मिलाकर वह एक नायक नहीं अनायक है और एक गन्धर्व का दुःस्वप्न इस अनायक का ही इतिवृत्त है.
इस इतिवृत्त में अनायक के चारों ओर उमड़ने-घुमड़ने वाला समाज और समय भी है. विडम्बना यह है कि अनायक के जीवन और उसके चारों तरफ के समय और समाज की अपनी विडम्बनाएँ हैं.
उपन्यास के प्रारम्भ में ही उपन्यासकार ने यह बताने का प्रयास किया है कि वस्तुतः भवनाथ शुक्ल के जीवन की काल्पनिक दास्तान है. अक्सर उपन्यासकार यह कहते-लिखते आये हैं कि उपन्यास में सब कुछ कल्पित है और किसी के जीवन से उसका मिल जाना महज संयोग माना जाना चाहिए. कभी-कभी ऐसा कहने पर उपन्यास की काल्पनिकता सन्देह के घेरे में आ जाती है. उपन्यास को झूठा सिद्ध करने के लेखकीय प्रयास के बीच हम समझते हैं कि वास्तव में यह आख्यान वास्तविकता को ही प्रस्तुत करने का प्रयास है. उपन्यास के पफारमेट में कुछ भी काल्पनिक या गढ़ा हुआ नहीं लगता. छद्म नामों के पीछे वास्तविक पात्रों को खोजा जा सकता है, और फिर ऐतिहसिक घटनाओं के यथातथ्य वर्णन भी इसी दिशा में पाठकों को उन्मुख करते हैं. वह इस झूठ को पहले अध्याय से समझ जाता है कि जिसे असत्य कहा जा रहा है उसके पीछे सच्चाई की गहरी पृष्ठभूमि है.
भवनाथ शुक्ल और स्वतंत्रा भारत दोनों की अपनी-अपनी विडम्बनाएँ हैं. भारत का इतिहास उपन्यास का एक अभिन्न अंग है जिसमें महात्मा गाँधी जी की हत्या, पहला भारत-पाक युद्ध, लालबहादुर शास्त्री की मृत्यु, जे.पी. आन्दोलन, इमरजेन्सी, उस दौर की गिरफ्तारियाँ और जबरिया नसबंदी, जमींदारी उन्मूलन, दूसरी आशादी, इन्दिरा गाँधी की सत्ता में वापसी, उनकी हत्या, सिक्खों पर हमले, ताला खोलो आन्दोलन, साम्प्रदायिक रथयात्रा, राजीव गाँधी की हत्या, बाबरी विध्वंस तक की घटनाएँ चित्रित हैं. इन सभी घटनाओं के पीछे जो एक ही बात लेखक चित्रित करना चाहता है वह है वर्चस्व और उसके विभिन्न रूप. उदाहरण के लिए सिक्खों पर हमले में हिन्दू और मुस्लिम दोनों शामिल हैं और लूटपाट मचाते हैं तो हिन्दुत्व के दबाव में सारे मूल्य ही तिरोहित हो जाते हैं और एक गहरा अन्ध्कार छा जाता है. इमरजेन्सी में इसी प्रकार सत्ता का पुलिसिया बलप्रयोग दिखाई देता है. ठीक इसी प्रकार भवनाथ का जीवन भी विडम्बनाओं से भरा है और वहाँ भी वर्चस्वी प्रवृत्तियाँ हैं जो उसे दबाये रखती हैं. लेकिन साथ ही साथ राजनीति से थोड़ा दूर लगते समाज में भी दबंगई के कई रूप दिखलायी देते हैं. इस सन्दर्भ में कुछ उदाहरण देखने योग्य हैं.
उपन्यास में कमली पगली और इकबाल बाबू पोस्टमास्टर का प्रसंग समाज में वर्चस्व के प्रश्न को प्रभावशाली तरीके से सामने लाता है. कमली नाम की एक पगली न जाने कहाँ से टीकापाली में आकर इकबाल बाबू के घर में रहने लगती है क्योंकि उनकी बहू को परोक्षत: काम करने वाली मिल जाती है, और वह भी बेगार में. प्रारम्भ में रिटायर्ड इकबाल बाबू इसका विरोध करते हैं कि अनावयश्क जिम्मेदारी उठाने से क्या पफायदा. परन्तु बाद में पुत्रा और पुत्रावधू की इच्छा के सामने झुक जाते हैं. अन्त में वह उस पगली की ओर ऐसा आकृष्ट होते हैं कि शारीरिक सम्बन्ध बना बैठते हैं जो गहरे मानसिक लगाव में बदल जाता है. मगर समाज की टीका टिप्पणी उपन्यास में उस वर्चस्व को रेखांकित करती है जो केवल पारम्परिक विवहित सम्बन्धें को ही स्वीकृति देता है. समाज किस प्रकार से रोक-टोक करता है और उसकी परोक्ष सेंसरशिप किस प्रकार कार्यरत रहती है, कमली और इकबाल बाबू का प्रसंग इसका जीवन्त उदाहरण बनता है. सामान्य निन्दा करते हुए भी लोग नयी प्रकार की रचनाएँ करते हैं ये रचनाएँ सिर्फ एक दिशा में जाती हैं- वह है वर्चस्व और सेंसरशिप.
वर्चस्व सिर्फ राजनीतिक सत्ता का नहीं होता, समाज और संस्कृति के क्षेत्रा में वर्चस्व के रूप बड़े पेचीदे होते हैं. हरी चरन प्रकाश के इस उपन्यास की एक खासियत यह है कि वे इन वर्चस्व के सूक्ष्म तारों को अपने सर्जनात्मक वीक्षण से पकड़ लेते हैं और उपन्यास की कथावस्तु में उसे समय-समय की द्वन्द्वात्मकता में प्रस्तुत करते हैं. उदाहरण के लिए भवनाथ शुक्ल की युवावस्था का प्रेम प्रसंग है जो बुरी तरह से असफल होता है. पहले तो उपन्यास के नायक भवनाथ के जीवन में फ्रायड का प्रवेश ही हिंसात्मक ढंग से होता है. उपन्यास के अनायक को स्त्री पुरुष के अन्तर का ज्ञान ही माँ बहन की गालियों से होता है. इस प्रकार सेक्स की चेतना के पीछे सामाजिक स्तर पर हिंसा और दबंगई ही विराजती है, उसमें भी अधिकांश हिस्सा स्त्री अर्थात माँ और बहन के प्रति कारगर होता है.
भवनाथ और सुचरिता का प्रेम प्रसंग उपन्यास में कई अर्थो में महत्वपूर्ण है. एक तो इसलिए कि इस प्रेम प्रसंग के उपरांत ही उपन्यास के नायक अथवा अनायक को, साथ ही साथ पाठकों को भी, इस बात का अहसास होता है कि भवनाथ के चरित्रा में वीरता या दबंगई का कोई लक्षण नहीं है. इसी के चलते जब उसके साथी प्रेम-प्रसंग के सिलसिले में उसे घिर्राकार मारने को उद्धत होते हैं तो वह कह उठता है कि सुचरिता तो उसकी बहन लगती है. पिता की मार खाते हुए वह उन्हें यह नहीं बता पाता कि उसका प्रेम वास्तविक है और उससे वासना छू तक नहीं गयी है. उपन्यास में प्रारम्भिक लेखकीय सपफाई के बाद भी गन्धर्व शब्द का वास्तविक अर्थ इसी प्रसंग के आसपास ही खुलता है.
भवनाथ की नैसर्गिक कामेच्छा तरह-तरह से उद्दीप्त होती है मगर उसकी इस इच्छा का दमन करने के लिए लोग तरह-तरह से तत्पर दिखाई देते हैं. उसका विवाह गीता नाम की ऐसी स्त्री से होता है जिसके सामने वह कभी ठीक से खड़ा नहीं हो पाता. भवनाथ राजनीति से यथासंभव दूर है. यह कहना उचित होगा कि उसके बस की राजनीति है भी नहीं. मगर वह राजनीति से अप्रभावित नहीं रह पाता. वह जब मास्टर बन जाता है तो दूसरी आजादी के दौर में एक छात्रा ही उसे झापड़ मार देता है. उसे अपने वैवाहिक जीवन में सन्तान भी नहीं मिल पाती. संगीत साधना में लीन है तो भी भूमिका दोयम दर्जे की ही है.
गन्धर्व का शास्त्रीय अर्थ, जैसा कि उपन्यास में वर्णित है, ऐसी जाति से है जो मनुष्यों और देवताओं के बीच की होती हैं. गन्धर्व जाति के लोग नाच-गान और कलाओं में रुचि लेते हैं तो दूसरी तरफ उसका अर्थ कायर हिजड़े से भी है जो पुरुषत्वहीन होते हैं. भवनाथ को संगीत में रुचि है. वह इसराज जैसे लुप्तवाद्य को सीखता है. वह लुप्तवाद्य बजाने वाला लुप्तप्राय गन्धर्व है. वह प्रेम की कला में भी निपुण है. मगर वह पारम्परिक शास्त्रीय नायकों की तरह वीर अथवा योद्धा नहीं है, बल्कि उल्टे वह उपन्यास भर में भयभीत ही मिलता है. इस प्रकार वह शास्त्रीय धीरोदात्त नायक न होकर एक अनायक है जिसमें किसी भी परम्परिक नायक के कोई साहसिक गुण नहीं. हमारे समय में गन्धर्व का दूसरा अर्थ ही प्रचलित सा हो गया है, अर्थात हिजड़ा या नपुंसक, और इस उपन्यास के सन्दर्भ में वह अर्थ ही अधिक समीचीन हो जाता है. लेकिन उपन्यासकार ने अपने मुख्यपात्रा के माध्यम से बिल्कुल ही नया अर्थ दिया है, ऐसा पात्रा जो सम्पन्न नहीं, कला में रुचि रखता है, जिसके पास सर्जनात्मक विवेक है.
एक महत्वपूर्ण प्रश्न जो जेहन में उठता है वह यह कि भवनाथ जैसे पात्रों का संगीत प्रेम किस अर्थ का? प्रसिद्ध फ़्रांसीसी दार्शनिक ज्यां पाल सार्त्र ने एक जगह लिखा है कि शास्त्रीय संगीत जैसे कला रूपों में हम प्रतिबद्धता का सवाल नहीं उठा सकते. इसका कारण यह है कि शास्त्रीय संगीत में अमूमन विचार नहीं रहते. मगर हरी चरन प्रकाश का यह उपन्यास इस तरह स्पष्ट करता है कि सामाजिक भूमिका के अभाव में शास्त्रीय संगीत भी सत्ता की पिपिहरी बन जाता है. लुप्तप्राय वाद्य इसराज के ज्ञाता भवनाथ को इमरजेंसी के दौर में सत्ता के कार्यक्रमों को ही प्रस्तुत करने में अपनी कला दिखानी पड़ती है. उपन्यास में कहीं भी भवनाथ का प्रतिरोध नहीं दिखाई देता, अगर वह कहीं है तो बस उसकी अपनी कल्पना में जहाँ वह गुंडों की पिटाई भी कर सकता है. कहें तो कुछ भी कर सकता है क्योंकि वह उसकी स्वनियंत्रित दुनिया है.
उपन्यास अपनी शैली में बहुत कुछ नया इसलिए नहीं कहा जा सकता क्योंकि इसमें कहानी को सरलरेखीय तरीके से कहा गया है. मगर नैरेशन में जिस प्रकार के विचलन हैं, वे उपन्यास की तकनीक में महत्वपूर्ण हस्तक्षेप हैं. उपन्यास अपनी सीधी गति में भी व्यक्ति से इतिहास और इतिहास से व्यक्ति कि बीच शिपफ्ट करता रहता है. इस विचलन में ही उपन्यासकार तमाम ऐसे पात्रों को सृजित करता है जिसके माध्यम से हम पूरे समय को और उसमें समान्य व्यक्तियों की स्थिति पर महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ पाते हैं उदाहरण के लिए वह नाऊ जिसकी दुकान अंग्रेजी विरोध के नाम पर नष्ट कर दी जाती है और जहाँ से भवनाथ आधे कटे बाल लेकर घर पहुँचता है. शायरे आजम नूर फैजाबादी जिनकी त्रासदी यह है कि वे भारत के प्रति देशभक्ति भाव से बहुत कुछ लिखते हैं. मगर उन्हें रहना पाकिस्तान में पड़ता है जहाँ उनकी शायरी परवान नहीं चढ़ पाती. या वे मुसलमान जिन्हें कब्रगाह में जगह नहीं मिल पाती क्योंकि वहाँ राम का जन्म स्थान बन जाता है. ये सारी बातें उपन्यास की संरचना के ताने-बाने में बुनी हुई हैं.
इसी प्रयास में हरी चरन प्रकाश बहुत सारे पात्रों को रचते चलते हैं जिनके द्वारा हम एक समूचे समय को महसूस करने की स्थिति में होते हैं. लालता बाबू, लल्ला तिवारी, राघवदास, रामपदारथदास, शिवनाथ, काजी मुख्तार, गाँधी प्रसाद वर्मा ऐसे चरित्रा हैं जो इतिहास के गलियारों से छिटककर उपन्यास में उतर आये हैं. इन पात्रों की सृष्टि अकसर ऐसी वर्णनात्मक शैली में की गयी है कि अधिक समय या शब्द इस्तेमाल नहीं होते. उपन्यासकार यह जानता है कि क्या बताना जरूरी है और क्या नहीं. यही समझ वास्तव में एक अच्छे और बुरे उपन्यासकार में फर्क पैदा करती है. एक बुरा उपन्यासकार वह सबकुछ लिख डालता है जो गैरजरूरी होता है. मगर एक अच्छा उपन्यासकार जानता है कि किसी घटना में क्या लिखने योग्य है और क्या छोड़ने योग्य. बहुत सी ऐतिहासिक घटनाओं को लेखक एक या दो पंक्तियों में ही निपटा देता है. वैसे ध्यान देने पर यह तथ्य सामने आयेगा कि इस उपन्यास के लेखन में अच्छा खासा शोध्कार्य किया गया है. उपन्यास की किस्सागोई में गप्पियाने वाला भाव है जिसे एक आनन्ददायक पाठ समझने की भूल की जा सकती है क्योंकि उपन्यास वस्तुतः एक लम्बे दुःस्वप्न का वृत्तांत है जिसे स्वतंत्र भारत का विडम्बनापूर्ण प्रजातांत्रिक इतिहास कहा जा सकता है. सलमान रुश्दी के उपन्यास मिडनाइट्स चिल्ड्रन के प्रकाशन के बाद पूरी दुनिया में इतिहास के सम्भावित सर्जनात्मक रूपों की ओर उपन्यासकरों का ध्यान गया है. इस उपन्यास में इतिहास से कोई बहुत छेड़छाड़ तो नहीं है, मगर इतिहास को नयी अवस्थिति से देखने का प्रयास तो है ही.
इतिहास और उसमें अंड़से हुए एक पात्रा की इस आनन्ददायक लगने वाली कहानी में उपन्यासकार का अपना एक पक्ष जरूर है. वह उतना निरपेक्ष नहीं जितना उपन्यास के सामान्य पाठ में लगता है. वह वास्तव में अपने गन्धर्व के पक्ष में खड़ा होता है. उपन्यासकार के भीतर भी अपने पात्रा की तरह एक यु)क और कथाजनक अन्धेरी दुनिया है. हरी चरन प्रकाश का उपन्यास एक गन्धर्व का दुःस्वप्न जाहिराना तौर पर महापुरुषों का इतिहास नहीं अपितु उस सामान्यजन का इतिहास है जो हाशिये पर रहा है और उपन्यास के गन्धर्व की तरह सुन्दर पर कमजोर रहा है. इस प्रकार इतिहास के मुख्य पात्रा हाशिये पर चले गये हैं और इतिहास के गौण सामान्य पात्रा केन्द्र में उतर आये हैं. वास्तव में गन्धर्व की त्रासदी स्वातन्त्रयोत्तर भारत में शांतिप्रिय और ईमानदार लोगों की त्रासदी है जो लगातार दबंगई का शिकार होते रहे हैं. यह उपन्यास यह भी दर्शाता है कि सार्थक प्रतिरोध के अभाव में पूरा इतिहास ही एक दुःस्वप्न में बदल जाता है. ईमानदारी से लेकर कला और संगीत तक महज कायरता बनकर रह जाते हैं. हिन्दी उपन्यास में सर्जनात्मक इतिहास की यह अवस्थिति हरी चरन प्रकाश के इस उपन्यास में पहली बार उभरती दिखती है.