मानस दर्शन की एक व्याख्या के अनुसार बाल स्मृतियाँ हमारे अवचेतन के भंडार में संचित रहती हैं और यदा-कदा हमारे सपनों में आन प्रकट होती हैं. उनके केन्द्र में रही घटनाएँ बेशक परिधि पर चली जाएँ किन्तु उन घटनाओं से उपजे मनोभाव एवं मनोविकार तथा आवेश एवं संवेग जीवन-पर्यन्त हमारे साथ लिपटे रहते हैं.
जभी आज 2009 में भी सन् 1948 के मेरे पिता के बँगले का वह कुआँ समय-समय पर मेरे सपनों में तो मुझे दिखाई देता ही है, जिसमें माँ को फेंका गया था : अपनी बगल में बैठे सिक्वेफ फेंक रहे अपने पिता के ठहाके की भयावहता भी आज मेरे साथ है जब वे माँ के साथ श्मशान घाट जा रही लारी की खिड़की में से आस-पास जमा हुए भिखारियों को देखकर हँसे थे, `देखो शोहदे कैसे इन सिक्कों पर टूट रहे हैं.´
उस समय मेरी उम्र कुल जमा सात साल की थी और मेरी स्मृति की संकेतिकी माँ की मृत्यु की पृष्ठभूमि खींचने में अपर्याप्त है. कुछ प्रत्यक्ष और कुछ ऐतिहासिक तथ्य मेरे पास हैं जरूर, फिर भी थोड़े ब्योरे तो मुझे गढ़ने ही होंगे कुछ अन्तराल तो भरने ही पड़ेंगे. और यहाँ मेरी कल्पना घपला कर सकती है. मेरी समझ पलटा खा सकती है.
1902 में जन्मे मेरे पिता अमृतसर के एक नामी वकील थे, जिनकी सफलता वंशागत न होकर स्वनिर्मित थी. मेरे दादा वहाँ की करमों-डयोढ़ी के एक साधरण कपड़ा व्यापारी थे परन्तु मेरे पिता की न्याय-विधि की असाधरण प्रयुक्ति, विश्लेषण-क्षमता एवं अधिवक्ता द्रुतगति से उन्हें
धनाढ्य बना गयी थी.
हाँ, तेईस वर्ष की अपनी अल्पायु में तपेदिक के हाथों वे अपनी माँ और पहली पत्नी खो चुके थे. अपनी दूसरी पत्नी वे लाये चौदह साल बाद सन् 1939 में. जब अमृतसर की रेस-कोर्स रोड पर उनका भव्य बँगला तैयार हुआ, उस समय सत्तरह-वर्षीया मेरी माँ लाहौर के सर गंगा राम हाई स्कूल से मैट्रिक कर रही थीं और लाहौर निवासी मेरे नाना अपने दामाद के मित्र भी थे और उनकी तरह वकील भी. लेकिन कम सफल. माँ को बड़बड़ाने की आदत भी अपने विवाह के तीसरे चौथे वर्ष से ही शुरू हो गयी थी. सच पूछें तो मेरा पूरा बचपन उनकी बड़बड़ाहटें सुनते ही बीता था.
`मैं अखबार क्यों नहीं पढूँ, पढूँगी. जरूर पढूँगी. रोज पढूँगी...´
`मैं रेडियो क्यों नहीं सुनूँ . मैं तो रेडियो सुनूँगी. जरूर सुनूँगी...´
`मैं अपने लाहौर चिट्ठी क्यों नहीं लिखूँ. लिखूँगी. जरूर लिखूँगी. जब मन चाहेगा जभी लिखूँगी...´
यहाँ यह बताता चलूँ माँ मेरे नाना-नानी और अपने दोनों भाइयों से बहुत जुड़ी हुई थीं और सप्ताह में वहाँ चार-पाँच चिट्ठी भेजने में माँ को यदि कमाल हासिल था तो मेरे नाना और दोनों मामा लोग भी उनकी हर चिट्ठी का उत्तर तत्काल भेजने में पीछे नहीं रहते थे. और इसीलिए सन् 1947 की जुलाई के बाद से जब उनकी कोई भी चिट्ठी या खबर माँ को नहीं मिली थी तो उनकी बड़बड़ाहटें तेज और उग्र होती चली गयी थीं. फोन मेरे ननिहाल में था नहीं. ऐसे में उन्माद को छूती हुई उनकी मनोस्थिति गड़बडाई रहती. साथ में रेडियो और अखबार के लिए उनकी ललक ने भी असंयमित प्रबलता धरण कर ली थी. एक मनोग्रस्ति की सीमा तक. दिन में अब वे दस बार अखबार पलटतीं. बीस बार रेडियो सुनतीं.
जभी उस 1948 की 30 जनवरी को महात्मा गाँधी की हत्या की खबर उन्हें मेरे पिता से पहले मालूम हो गयी थी. बीबीसी से. और उसे सुनते ही वे बीच का आँगन लाँघकर मेरे पिता के दफ्तर में जा घुसीं. नंगे सिर, नंगे पैर.शोर शोर से बड़बड़ाती हुई, कहता था, अहिंसा मेरा कवच है. अहिंसा मेरा हथियार है. फिर गोली खाते समय अपना हथियार उसने कहाँ निकाला. कहाँ दिखाया ? और निकालता भी, दिखाता भी, तो क्या हत्यारा अपने हाथ रोक लेता ?
जीजी माँ को उस विक्षिप्त अवस्था में देखकर मेरे पिता चिल्लाये. उन दिनों स्त्रियों का सिर ढकना अनिवार्य रहा करता. और सिर पर दुपट्टा ओढे़ बिना सलवार कमीश पहनने वाली पर नग्नता अपनाने का आरोप भी लगाया जाता. ढके पैर प्रतिष्ठा के प्रतीक माने जाते. बुआ तत्काल वहाँ आ पहुँचीं. 1935 में हुई मेरे दादा की मृत्यु के बाद मेरे पिता के परिवार में अब वही बची थीं. वे बाल विधवा थीं और मेरे पिता से दस वर्ष बड़ीं. भाई के प्रति उनका प्रेम तथा समर्पण भक्ति की सीमा छूता था. मेरे पिता भी उन पर असीम श्रद्धा रखते थे. अपनी गोपनीय से गोपनीय बात भी उन्हें सौंप दिया करते. गृह-व्यवस्था भी बुआ के अधिकार में रहा करती. माँ के नहीं. बल्कि माँ पर वे मेरे पिता से भी ज्यादा शासन करतीं. उन्हें स्वयं तो घर से बाहर कहीं निकलना नहीं होता, माँ को भी वे रोक देतीं. यहाँ तक कि माँ का लाहौर जाना भी उन्हें स्वीकार न रहा करता. कहतीं, `तुम्हें कुछ देने-दिलाने का उन लोगों को इतना शौक चर्राया है तो वे इधर आकर दे दिलाएँ.´ ऊपर से मेरे पिता जोड़ देते, `अपनी जान आफत में जिसे डालनी हो वही घर से बाहर कदम निकाले.´ कभी विश्व में छिड़े दूसरे महायुद्ध से उत्पन्न हुई भीषिका का तो कभी `भारत छोड़ो आन्दोलन´ की राजनैतिक उथल-पुथल का तो कभी आस-पास की गलियों एवं सड़कों, रेलगाड़ियों एवं लारियों की लूट-पाट और मार-काट का बखान करने लगते. सभी जानते हैं कि 1940 के दशक के पंजाब के वे साल कितने वीभत्स एवं दुर्भाग्यपूर्ण थे.
पगली को भगाओ यहाँ से, मेरे पिता ने बुआ से कहा.
किन्तु बुआ के आगे बढ़ने से पहले माँ बाहर दौड़ पड़ीं. उसी अवस्था में.
पोर्टिको की मोटर गाड़ी हाथ से पीटी और कम्पाउंड की तरफ बढ़ लीं. उनके पीछे मेरे पिता दौड़े. बुआ दौड़ी. मैं दौड़ा. हमें दौड़ते देखकर माँ हँसी और कम्पाउंड की घास के बीचों बीच बने फव्वारे के नीचे जा खड़ी हुई. बुआ ने अपने कदम पोर्टिको ही में रोक लिये और मुझे अपनी बाहों में जकड़ लिया, वह तो बावली है. ठंड से नहीं डरती. हम तो होशमन्द हैं. हम तो ठंड से डरते हैं. बीमारी से डरते हैं.
अमृतसर में जनवरी की ठंड तीखी होती है, चोखी होती है. ईश्वर से नहीं डरते लेकिन ठंड से डरते हैं. बीमारी से डरते है. माँ फव्वारे के पानी से खेलने लगी. सुअरी, पानी का इतना शौक चर्राया है तो पीछे कुएँ में क्यों नहीं जा डुबकी लगा लेती? बुआ ने अपने हाथ नचाये. बेपर्दा औरत है गुस्से में मेरे पिता ने अपने दांतों तले होंठ दबाये, बेहया, बेअदब, ढीठ, अपनी जिद की पक्की...
शुरू ही से `खतरा है´ `खतरा है´ माँ बड़बड़ाने लगीं. सड़कों पर छुरों, भालों, तलवारों का `खतरा´, गोलियों में फेंके जा रहे तेजाब का `खतरा´, रेल गाड़ी में `खतरा´, लारी में `खतरा´... तो क्या झूठ कहता हूँ, मेरे पिता आपे से बाहर हो लिए, रोज अखबार पढ़ती है. दिन भर रेडियो में कान लगाये बैठती है. वहाँ चिट्ठी भेजती है, यहाँ चिट्ठी लिखती है...
माँ अब भी हर सप्ताह दो-तीन पत्र अपने पिता और दोनों भाइयों और माँ के नाम जरूर लिखा करतीं, जिन्हें दफ्तर ले जाकर मेरे पिता फाड़ दिया करते, `भारत सरकार या रिफ्रयूजी कैम्पों की मार्फत भी कोई चिट्ठी पहुँचाता है क्या ? तो क्या करूँ ? माँ की नाक बहने लगी, आँखें बहने लगीं, किसी ने मेरे जन का पता किया ? पुछवाया कहीं से, लाहौर के किशननगर वालों पर क्या बीती ? मैं रोने लगा, मां, तुम बीमार हो जाओगी. पानी के नीचे मत रहो...
कोई है.... मेरे पिता अन्दर की तरफ मुँह करके चिल्लाये अशरफी लाल... मुन्शी जी.... ड्राइवर... पन्ना लाल... अशरफी लाल हमारा घरेलू नौकर था और पन्ना लाल मेरे पिता के दफ्तर का चपरासी जो `मुन्शी´ के साथ दफ्रतर की डाक देखा करता था.
जी बाबूजी, चारों पोर्टिको में लपक आये. मनोविनोद और कुतूहल अपने अपने चेहरों पर चिपकाये. तुम्हारी भाभी का दिमाग फिर से फिर गया है, मेरे पिता ने चिन्तित मुद्रा में कहा, उसे फव्वारे से बाहर निकालना होगा नहीं तो ठंड खा जाएगी. निमोनिया पकड़ लेगी...
जी, बाबूजी, चारों मुस्कराये और कम्पाउंड की ओर चल दिये. जभी माँ के उन्माद को ब्रेक लग गयी. शायद उनका शील-संकोच उन पर हावी हो गया था. बिना अगला पल गँवाये उन्होंने अपनी बाहों को आड़े-तिरछे किया और अपनी छाती और अपने चेहरे को उनकी ओट में ले गयीं. फिर कम्पाउंड के किनारे बिछी फूलों की क्यारियाँ उन्होंने फांदीं और घर के पिछले भाग में खुलने वाले दरवाजे की दिशा में दौड पड़ीं.
तुम लोग जाओ अब, मेरे पिता ने अन्दर से आये समूह को आदेश दिया.
जी, बाबूजी, आशान्वित तमाशा निरस्त होते देखकर समूह के समस्त चेहरे बुझ लिये. बुआ की बाहें छुड़ाकर मैं माँ के लिये गये रास्ते की ओर दौड़ पड़ा. बुआ और मेरे पिता भी उधर ही बढ़ आये. उसे ठीक से समझाना होगा, मेरे पिता बोले. मैंने अपने कदम धीमे कर दिये.
अब उसका इलाज करना पड़ेगा, बुआ ने कहा, अब वह हमारे समझाने की अवस्था से बाहर हो गयी है...
पागलखाने भेजकर ?
हाँ, पर वह ठीक होने वाली नहीं, बुआ ने अपना स्वर नीचा कर लिया. जब भी वे माँ के विरोध में कुछ कहा करतीं अपनी आवाज जरूर धीमी कर लेतीं. और मायका भी उसका ला-पता है...फिर मेरे पिता ने भी अपनी आवाज नीची कर ली. मैं अचानक रुक गया. उसे पूछने वाला अब कोई नहीं. हमीं को कुछ करना होगा. यहीं घर पर बुआ फुसफुसायीं?
बुआ ने अपनी बगल में मुझे पाकर मेरे पिता को अपने कान नीचे लाने का संकेत दिया. वे ले गये. बुआ ने उनमें कुछ कहा. क्या...या..या..या ..... मेरे पिता की हँसी छूट गयी. बुआ ने उनकी हँसी का पीछा किया. अपना सिर उठाकर मैंने दोनों की ओर देखा. उनकी हँसी का कारण भाँपने. दोनों सामने दिखाई दे रहे कुएँ पर टकटकी बाँधे थे.
वह कुआँ हमारी पिछली चौहद्दी दीवार के साथ सटे बगीचे में खुदा था.
बँगले के निर्मित क्षेत्र के पिछले भाग के प्रांगण के पार. यह निर्मित क्षेत्र दो भागों में बँटा था. इस पिछले भाग के प्रांगण में हमारी रसोई थी, हमारा हैन्डपम्प था, हमारे दो गुसलखाने थे, और उसके आगे हम लोग के चार कमरे. जिनमें से एक को बुआ ने अपना मिन्दर बना रखा था. इन कमरों के बाद `बीच का आँगन´ पड़ता था. और आँगन के आगे के तीन बडे़ कमरे पिता के अनन्य प्रयोग के लिए निर्धरित थे. तीनों थे ही उनके नाम के, `बाबूजी की बैठक´, `बाबूजी का दफ्रतर´, `बाबूजी का वेटिंग रूम´. इनमें घर के सदस्यों का जाना लगभग वर्जित था. अपने मुविक्कलों या मुन्शी-चपरासी के लिए जब भी मेरे पिता को कुछ मँगवाना होता तो वे इस `बीच के आँगन´ में आकर अशरपफी लाल को कहते-पुकारते. पीछे के अपने कमरे में बैठी बुआ तत्काल रसोई की ओर लपक लेतीं और भाई की माँग को देखने संभालने लगतीं. हाँ, इधर इन पिछले दो-एक वर्षों से अशरफी लाल को कम ही पुकारा जाता था.
मेरे पिता मन्दी के दौर से गुजर रहे थे और उनका दफ्रतर अब कई बार पूरा-पूरा दिन खाली पड़ा रहता था. माँ अपने कमरे में थीं. सिटकिनी चढ़ाये.
छींकती हुई. बड़बड़ाती हुई, सांस खींचो तो आफत, साँस छोड़ो तो आफत. बाहर प्राण और शील जोखिम में तो अन्दर चित्त और चैन.... अभी तुम दफ्तर लौट लो, बुआ ने मेरे पिता से कहा, फिर मिल-बैठकर कोई रास्ता निकालते हैं...
पाँचवीं-छठी सुबह हम सभी बगीचे में बैठे थे जब हमारे गेट की घंटी खड़की. पिछले दो-एक साल से मेरे पिता ने अपने बँगले के बाहर एक बन्दूकधरी गार्ड तैनात करवा रखा था. सभी आगन्तुकों से वह पूरी पूछ-ताछ करता और सन्तुष्ट होने पर गेट की घंटी खड़का दिया करता.
इतनी सुबह कौन आया होगा ? मेरे पिता अपनी रॉकिंग-चेयर से उठ खड़े हुए और अशरफी लाल के साथ गेट की तरफ निकल लिये. उनका दफ्तर साढ़े नौ पर खोला जाता था, दस बजे तक अशरफी लाल उसकी सफाई और डस्टिंग खत्म करता था. जब तक दफ्तर के लोग वहाँ आ पहुँचते थे. मेरे पिता का प्रसाधन सुबह सात बजे से नौ बजे तक रुक-रुककर चला करता. इस बीच गर्मियों में जहाँ वह अधिकांश समय सामने वाले लान में गुजारते, सर्दियों में सूरज उगने पर अपनी यह रौकिंग चेयर बगीचे में डलवाते और अपनी सुबह की अखबार वहीं बाँचते. उनकी कुर्सी की बगल में बुआ भी अपना तख्त लगवा लेतीं और माँ को बुलावा भेजतीं.
`यह सेब मेरे साथ छील तो मुरब्बे के लिए...´ `गोभी और शलजम की फांक तैयार करनी हैं अचार डालेंगे...´ `काली ये गाजरें काट तो, कांजी के लिए...´
यों भी अचार और मुरब्बे के जिन मर्तबानों को धूप दिखानी होती, उन्हें इधर पहुँचाने और वापिस ले जाने का जिम्मा भी माँ ही का रहा करता. चौदह-पन्द्रह साल के अशरफी लाल के हाथ से उनके छूट जाने का डर दिखाकर. वे मर्तबान थे भी ऊँचे और वजनी. माँ के हाथ मजबूत थे और बाँहें बलवती. सच पूछें तो पूरे परिवार में एक वही थीं जो खड़ी खड़ी मुझे अपनी छाती से चिपका सकती थीं. बुआ का कद माँ से काफी छोटा था और शरीर दुगना भारी. ऐसे में मुझे उठाते ही उनका दम फूलने लगता. उधर मेरे पिता का कद बेशक बुआ से ऊँचा था, लगभग माँ ही के बराबर मझोला था किन्तु उनकी देह की संरचना माँ की तुलना में तनु थी, छरहरी थी. शायद इसलिए उन पिछले तीन-चार साल से अपने लाड़ की हिलोर में वह मुझे पहले की तरह अपने कन्धें पर नहीं बिठाते, बल्कि अपने घुटने और पैर चिपकाकर लेट जाते, मेरी ठुड्डी अपने घुटनों पर टिकाते और मेरे पैर अपने पैरों पर रखते और मुझे झूला झुलाने लगते. मेरी बाहों को अपने हाथों में थामकर.
गेट से वे लौटे तो उनके पीछे चल रहे अशरफी लाल के साथ एक अजनबी भी था. ऊँचे कद का. लम्बाई-चौड़ाई में खूब हट्टा कट्टा मगर फटीचर हालत में. रूखे बाल, चार-पाँच दिन पुरानी दाढ़ी, फटी कमीज, मैला पजामा, जीर्ण चप्पल. उम्र यही कोई पैंतीस और चालीस के बीच. जीजी, मेरे पिता ने अपनी दोलन-कुर्सी ग्रहण की, यह मदन माली है. सुबह आठ बजे से एक घंटे के लिए हमारे बागीचे में काम करेगा. उधर लाहौर के शहादरे में बने कालीन के एक कारखाने में बुनाई-मजदूर था. लाहौर से आया है.... माँ उतावली हो उठी, किशन नगर जानता है ..मेरे पिता श्री गिरधरी लाल को..... मालूम है वे कहाँ हैं.............बीबी जी, मदन माली बोला, कोई नहीं जानता कौन बचा ... कौन तबाह हुआ .... समझिए लाहौर का पुराना नाम `अंधेरों का शहर´ फिर से दीख गया...
तुम कब आये. कैसे आये. अपनी साइकल से. दिन में छुप जाता, रात में निकल लेता...अपने घर के लोग के साथ ? नहीं, बीबी जी. मेरी दो बहनें थीं, घरवाली थी, तीन बेटियाँ थीं. सभी कुएँ में कूद गयीं... अपनी लाज की मर्यादा की खातिर...अब उसे अपना काम शुरू करने दो, मेरे पिता ने माँ को चुप करा दिया. माँ का अजनबियों से बात करना उन्हें असह्य था. बाकी बात कल कर लेना, परसों कर लेना. रोज ही तो इसे इधर आना है...
क्यों नहीं बात करूँ ? बड़बड़ाने लगीं, मैं तो त करूँगी. अपने लाहौर की बात करनी है मुझे... जरर करूँगी...मदन माली, तुम अपना काम देखो. यह औरत पगलैट है...
जी, बाबूजी, मदन माली कुएँ की बगल वाली अंगूर और लौकी की बेलों की तरफ चल दिया. उस समय तो माँ रूठकर अन्दर चली गयीं, लेकिन आगामी दिनों में मेरे पिता की आँख बचाकर वे मदन माली के पास पहुँच ही जातीं. मुझे साथ लिये. दोनों लाहौर की खूब बात करते. लाहौरी पंजाबी में, जिसकी पंजाबी में उर्दू मिली रहती है.
वह अपने शहादरे में बने जहाँगीर के मकबरे की बात करता, हशूरी बाग बारादरी के रोशनाई गेट की बात करता, शहर के अन्दर बने लाहौर सेन्ट्रल रेलवे स्टेशन की बात करता, शाही गुशरगाह की बात करता जो अकबरी गेट से लाहौर किले तक जाती. किले की बात चलती तो माँ लाहौर के पुराने नाम, लौह-वार का मतलब बताने लगतीं. लाहौर शहर की नींव 4000 साल पहले हमारे श्री रामचन्द्र भगवान के सुपुत्रा, लव, ने जब रखी और यह किला बनवाया तो वह लौह-वार कहलाया, याने लव का किला. फिर मुझे देखकर बतातीं. जैसे अंगरेजी भाषा में किसी भी शब्द के अंत में वाउइल के बाद आये अक्षर `आर´ को `अ´ उच्चारित करते हैं, `मदर´ को `मदअ´ बोलते हुए लगभग उसी प्रकार पंजाबी भाषा में अक्षर `र´ को `औ´ बोल देते हैं `जसवन्त´ को `जसौन्त´ और `लव´ को `लौ´. फिर कहतीं, लव ने उस किले में एक मंदिर भी बनवाया था, जो अब खाली था. इस पर मदन माली औरंगजेब को याद करता जिसने किले की बगल में बादशाही मस्जिद बनवायी, आलमगिरी गेट बनवाया.
माँ को अपना सर गंगा राम स्वूफल याद आता, भाइयों का सेन्ट्रल मॉडल स्वूफल याद आता, नाना की यूनिवर्सिटी याद आती जो माल रोड के छोर पर बनी थी, लक्ष्मी चौक, चौक यतीमखाना, टालिंगटन मार्विफट, मांटगुमरी हाल, गवर्नमेंट कालेज, नैशनल कॉलेज ऑफ आर्टस, क्लाक टावर, जीúपीúओú और वाएúएमúसीúएú की इमारतें याद आतीं. नाना के लाहौर हाई कोर्ट और उसके पार बने गुलाबी गिरजाघर की माँ खूब बात करतीं जिसमें छह घंटियाँ थीं जो पूरे इलाके में गूँजा करतीं.
बीच बीच में मदन माली अपने हाथ आकाश की ओर उठाता और वारिस शाह की द्विपदी सुनाता : `खादा पीता वाए दा, बाकी एहमद शाए दा,´ यह अहमद शाह दुर्रानी नादिर शाह का उत्तरवर्ती अफगान आक्रमणकारी था जिसने मुगल साम्राज्य के बचे हुए टुकड़ों पर धावा बोला था और पंजाब और काश्मीर क्षेत्रों को समाहित कर उन पर शासन किया था.
उस दिन मदन माली ने अपनी कारीगरी की बात छेड़ रखी थी कैसे वह इकहरी भरनी वाले तुर्वफमान और काफ स्टाइल, दोहरे बान वाले मुगल टाइप या फिर लोकप्रिय मडैलियन, गोलाकार चित्रा और नक्काशी अपने गलीचों में उतारने में निपुण था और माँ तरंग में आकर अपने दहेज में मिली मोठड़े की एक दरी अन्दर से निकालकर उसे दिखा रही थीं जब मेरे पिता वहाँ चले आये.
उनके हाथ में एक लिफाफा था.यह क्या हो रहा है ? उन्होंने दरी देखते ही पूछा. कुछ नहीं, बाबूजी, मदन माली हाथ जोड़कर खड़ा हो गया, बीजी हमें अपनी दरी दिखा रही थीं. इसे छोड़ो, यह बताओ, बागीचे में तुमने पपीता बो दिया क्या ? बीज तो मुझे अभी मिले नहीं थे बाबूजी...
यह लो, लिफाफा उन्होंने उसके हाथ में थमा दिया, इन्हें आज ही बोना है...
कहाँ लगवाएँ ? मेरे पिता ने माँ से पूछा. जीजी बेहतर बता पाएँगी, माँ अपनी दरी समेटने लगीं. वे कहाँ हैं ? बुआ वहाँ नहीं थीं. अन्दर रसोई में अशरफी लाल के साथ ठंडाई तैयार कर रही हैं...जा, मेरे पिता ने मुझे वहाँ से उठा दिया, जीजी को बुला ला... मैं प्रांगण के दरवाजे से रसोई में आ पहुँचा. बुआ महीन कपड़े के एक टुकड़े में पिसे बादाम और मसाले दूध में छान रही थीं. कपड़े का एक सिरा अशरफी लाल अपने दोनों हाथों से थामे था. बुआ बायें हाथ से कपड़े का दूसरा सिरा पकड़े थीं और दाहिने हाथ से उसमें दूध घोल रही थीं. कपडे़ का गाढ़ा हो रहा दूध् नीचे रखे कटोरदान में जमा किया जा रहा था.
मेरे पिता का संदेश सुनकर बुआ ने अपना दायाँ हाथ रोक लिया और मुझसे बोलीं, इधर मेरी जगह पर बैठ तो. बस यह सिरा ही तो पकड़ना है. इसे सम्भालकर पकड़े रखना. मैं अभी आती हूँ... जीजी, बाकी हम बना दें. अशरफी लाल ने पूछा.
ठीक है, बुआ ने कहा. मगर कपड़े में दूध घोलते समय चम्मच इस्तेमाल करना, अपना हाथ नहीं...
जी, जीजी...मेरे हाथ में अपना हाथ खाली कर बुआ बाहर चली गयीं.
अशरफी लाल ने एक नया गिलास दूध पिसी सामग्री वाले कपडे़ में उड़ेला और उसमें अपना हाथ छोड़ने ही वाला था कि मैंने उसे रोक दिया, बुआ ने अभी क्या बोला था. इसे हाथ नहीं लगाना...
जानते हैं, अशरफी लाल उद्दंड हो आया, सब जानते हैं. इन हाथों से हम आटा सानें, मंजूर है. चटनी पीसें, मंजूर है, पूड़ी-परोंठा सेंके, मंजूर है. मगर दूध या बादाम हम छू लें, यह मंजूर नहीं. भला मंजूर क्यों नहीं ? कहीं हाथ धोते समय हम इसे चख लिये तो स्वाद न जान जाएँगे ? स्वाद जान जाएँगे तो चस्का न पाल लेंगे...
तुम बहुत बोलते हो, मैंने अपनी झेंप मिटाते हुए कहा. अशरफी लाल हँसने लगा, बोलता नहीं बहुत, मगर जानता बहुत हूँ. क्या जानते हो ? जिस मदन को आप मालिक लोग लाहौर के शहादरे के कारखाने का मजदूर मानते हो वह वहाँ की जेल से छूटा एक अपराधी है. यह बुनाई का काम उसने वहाँ जेल में सीखा किसी कारखाने में नहीं...
अशरफी लाल, जभी मेरे पिता की आवाज प्रांगण में गूंजी, भागकर गेट से गार्ड को बुला ला, तुम्हारी भाभी ने कुएँ में छलांग लगा ली है...
जी, बाबूजी, अशरफी लाल ने अपने हिस्से का कपड़ा कटोरदान के ऊपर टिकाया और बाहर भाग लिया. मेरे हाथों की पकड़ में रखा सिरा उसी पल मुझसे छूट गया. मैं कुएँ की ओर लपका. वहाँ उसकी मुंडेर पर मेरे पिता और बुआ मदन माली के साथ खड़े थे. तख्त से माँ की मोठड़े की दरी नदारद थी.
मुझे ऊपर लो, मुंडेर मुझसे ऊँची थी और मैं बुआ के कंधे पर सवार होकर माँ को देखना चाहता था, पुकारना चाहता था. मैं तुझे कहाँ उठा पाऊँगी. ये कहते हुए बुआ ने मेरी बाँह थाम ली. उनकी बाँह छुड़ाकर मैं मदन माली के पास जा पहुँचा, आप उठा लो. उसने ऊपर उठी मेरी बाहों की ओर अपने हाथ बढ़ाए ही थे कि मेरे पिता ने उसे रोक दिया, रुक जाओ. वे बुआ से बोले, जीजी, आप काके को अन्दर ले जाइये...
मैं माँ के साथ अन्दर जाऊँगा, मैं रोने लगा. उसे हम वहीं ला रहे हैं... बुआ मुझे घसीटती हुई अन्दर ले आयीं. मदन माली उस दिन के बाद हमारे बंगले पर कभी नहीं आया. मगर मुझे अपने सोते में और कभी-कभी तो जागते में भी वह आज भी दिखाई दे जाता है. माँ को मोठड़े की उस दरी में लपेटकर कुएँ में फेंकते हुए जो कुएँ से माँ की लाश निकालते समय वहाँ पायी गयी थी.
29 फरवरी, 1948 की सुबह.