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2010 Horoscope, Horoscope 2010 Free
 
 
 
 
 
 
कहानी : विपरीत धार

दिनों से ऐसा हो रहा है...रात जब नींद खुलती है तो फिर दुबारा नहीं आती. मन-माथा लीचड़पन में फंसा हुआ ही रहता है. जीरो वाट की बत्ती में सोया परिवार अनाथ बिखरा हुआ दिखाई देता है, ऐसे समय एक अपराध बोध, डरी हुई चेतना अपने अन्दर महसूस होती है. जीना, जीने का सुख अनुभव करना अब अनैतिक लगने लगा है.

बिलकुल पड़ौस का मकान है, इसलिए बात-बात में पाबंदी लग गयी है, बिट्टू के दूध बिखरा देने पर सुमन को अपना गुस्सा घूँट लेना पड़ता है. वह ऊँचे स्वर में रोने को हो आता है तो तुरन्त उसकी, जैसी भी फरमाइश हो, पूरी कर देनी पड़ती है. वे लोग खुलकर हँस नहीं सकते, एक-दूसरे को ऊँची आवाज में बोल-बुला नहीं सकते. टीवी तेज नहीं कर सकते. छत पर नहीं जा सकते.

...किस प्रकार यह सब हो गया ? क्या कोई गर्दिश उसके पीछे पड़ी थी ? कितनी मामूली-सी बात से, कितनी छोटी-सी एक लापवाही से, एक नामालूम क्षण के अन्दर यह सब हो गया. वे लोग इन्दौर से लौट रहे थे, जहाँ वे साले की सगाई में गये हुए थे. लम्बे सफर से थके थे इसलिए घर पहुँचने की जल्दी में बस अड्डे से टैक्सी ले ली थी...जब अपने वाले इलाके में मुड़ने पर टैक्सी वाले ने डॉक्टर और कान्ता के साथ हुए हादसे के बारे में बताया. यह एक भयंकर खबर थी. वे दादा दीनदयाल के बहू और बेटे थे. यह आदमी क्या बोल गया कि ट्रक और मोटर साइकिल की टक्कर में दोनों खत्म हो गये. भयावहता का एक अल्प क्षण वज्रपात की तरह कड़कड़ा गया. लगभग झपटकर चंदोला ने ड्राइवर को कंधें से पकड़ लिया, क्या बक रहा है!! वह एक क्षण जिसमें वह टैक्सी से वूफद, दादा दीनदयाल के लिए दौड़ पड़ने को हो आया था. उस बात के अलावा उस क्षण दिमाग में और कुछ आ ही नहीं सकता था कि वूफदकर दौड़ पड़े और दादा से लिपट जाये ‘यह क्या अघट घट गया, दादा! अरे यह क्या अनर्थ हो गया...मेरे राम!’ वह क्षण ऐसा ही था. यही उसमें स्वाभाविक था, यही अवश्यम्भावी. तभी अचकचाकर ड्राइवर ने पूछ लिया, आपके कोई सगे हैं क्या साहब ? बस! एक झटका लगा था. अरे नहीं! सगे काहे के! मुँह से निकल गया, फ्जानते हैं यूँ ही. इसके साथ ही बिजली की वह कड़कड़ाहट जैसे भूमिसात हो गयी. सब खामोश हो गया.

रुको! रुको! अचानक उसने टैक्सी रुकवा ली. वे यहाँ कहाँ को जा रहे हैं ? इस रास्ते तो दादा की कोठी पड़ने वाली है. यह क्या मुसीबत है! छह-सात घंटे के बस सफर से पहुँच रहे हैं, कैसे बुरी तरह थके हुए हैं. ऐसी हालत में अबके अभी तो नहीं जाया जायेगा वहाँ... ऐसा करें, उसने अपनी पत्नी से कहा, कहीं होटल चलें. मकान बाद में जायेंगे. यह बेववूफफ तो घर पहुँचते ही किचन की खटरपटर शुरू कर देगी और अपने पहुँच गये होने की खबर दुनिया भर को लगा देगी...!

होटल ? पत्नी उसकी सूरत देखने लगी.कितने थके हुए हैं! उसने समझाना चाहा, घर पहुँचते ही खाना बनाने का झंझट तो नहीं हो सकेगा इस वक्त. चलो-चलो, होटल चलें. और टैक्सी बीच रास्ते से लौट गयी.

मकान में वे देर रात पहुँचे. वह भी घूम फिरकर, उल्टे रास्ते. चोरों की तरह वुंफडा खोला और अन्दर होते ही दरवाजा बन्द कर दिया. नींद किसे थी...बस बिट्टू था जो टैक्सी में ही सो चला था. अपना वह खुद चारपाई पर खाली-ठाले जम्हा रहा था. सिगरेट पीना चाहता था, पर खाँसी उठने का डर था. उधर पड़ौस की तरफ सन्नाटा खड़ा था, ट्रैजिक सन्नाटा. क्या इस वक्त वहाँ कोई नहीं है ? सुमन बैठी हुई थी और घुटनों में मुँह डाले सुबक रही थी. कान्ता से उसका गहरा लगाव था. डॉक्टर ही क्या कोई कम प्यारा लड़का था. कितना अपनापन रखता था. दादा-परिवार से कितने घनिष्ठ हो गये थे वे लोग. दादा किस तरह ठेठ अन्दर तक चले आते थे और किचन के सामने बैठ सुमन से गप्पें लड़ाते. बिट्टू की तो पूछो मत. दोनों घर उसके अपने थे. जहाँ चाहे खाना खा ले, सो जाये, रोने लग जाये. हालाँकि रिश्ते की शुरुआत ब्रिज से हुई थी. दादा शहर के ब्रिज एसोसियेशन के चेयरमैन थे या मैनेजर...या सुप्रीमो. पार्टनर लोग उन्हें चाहे जिस ढंग से बोलते रहते थे. दादा भी आपसी हँसी मजाक को एंज्वाय करते. यह ब्रिज कल्चर था. अकसर छुट्टी के रोज जमावड़ा होता. एवेन्यू ? वहीं, ड्राइंग रूम ऑफ द ग्रेट मुगल ! दैट इज, थ्री डीश. दादा-डीन-डयाल.

फिर यह क्या अनर्थ घट गया! चंदोला ने जड़ता तोड़ दी और उठकर पानी पी आया...उस रोज वे लोग इन्दौर के लिए चले थे तो सब खुशहाल था. कान्ता ने तैयारी में सुमन की मदद की थी, भरुआ पूड़ियाँ बना रखी थीं रास्ते के लिए. जल्दी लौटियेगा भाभीजी! वे दोनों उन लोगों को छोड़ने आये थे, तब डॉक्टर बोला था, फ्हाँ बस गये और आये. सुमन ने कहा था, बस जब चलने लगी तो बोली थी, इस लड़की का ध्यान रखना, भइया! इस पर पलटकर डॉक्टर बोला था, इसका ध्यान मैं क्या रखूँगा, यही जो मेरा इतना ध्यान रखती है. खाना भी पेट भर नहीं खाने देती, कहती है मोटे हो जाओगे. वहीं कान्ता ने चुपके से एक घूँसा दे मारा था उसे. ...फिर एकाएक यह क्या अघट घट गया ? अभी-अभी सुमन ने यह भी बताया कि कान्ता महीनों से थी. उसने आँखें मींच लीं. हे ईश्वर!

झम्म से दादा का दर्दनाक बिम्ब कल्पना में आ खड़ा हुआ. यह क्या बीत गयी रे मेरे दादा पर! अकथ्य पीड़ा का एक चश्मा फूट निकला. वह बूढ़ा इस कहर को कैसे झेल रहा होगा... अन्दर की कसावट खुलने लगी थी. लगने लगा था वह बेबस हुआ जा रहा. क्या पता वह चल ही पड़े. घबरा उठा चंदोला. वहीं उसने अपने को डपट दिया: क्यों फालतू पगला रहे हो. कैसे तो सफर की थकान से चूर-चूर हो तुम. ऐसी हालत में उस कदर भीषण ट्रैजेडी को फेस करना. वह भी इस आधी रात में. सो जाओ चुपचाप. सुबह भागी नहीं जा रही.

देर तक वह अपने को रोकता समझाता रहा. कब आँख लग गयी. जब उधर से चीत्कार हुआ. घबराकर नींद टूट गयी. लोग दाह संस्कार से लौट आये थे. कैसे प्राणों को चीरती हुई चीत्कार वह उठती है. सुमन भी बैठ गयी थी. दोनों फिर भीत स्तब्ध, उन चीत्कारों को झेलते रहे बाकी रात. सुबह हो चुकी थी. चाय पीते पीते उसने पेपर देखा. वहाँ वह खबर थी...‘सबकुछ नष्ट हो गया.’ एक पछाड़ लगी. चाय खत्मकर वह लस्त वहीं लेट गया. सिर तक चादर तान ली.

क्यों आज आफिस नहीं है ? उधर से सुमन ने झाँका. वह क्षण भर चुप रहा, फिर कुनमुनाता हुआ बोला, फ्रात ढंग से नींद नहीं आई, बदन ढीला है. और वहीं चुप हो गया. दरअसल वह सो नहीं रहा था, उस संकट की उधेड़बुन में पड़ा था जिसमें वह रात से ही आ गया था. अब आज उसे वहाँ जाना है. मातमपुरसी वाले आने शुरू हो गये हैं वहाँ. मगर वह कैसे जाये ? ये चीत्कारें. काश कि वह भी एक दूरदराजी आदमी होता...जाता, दो शब्द औपचारिकता के बोलकर चुपचाप उठ आता. यहाँ तो दादा उसे देखते ही चीत्कार मारता हुआ झपट पड़ेगा. फिर वह भी अपने को रोक नहीं पायेगा. सोचकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं, जाना तो है. बस थोड़ी ये चीत्कारें हल्की पड़ जायें.

कब जाना है वहाँ ? नाश्ता लाकर हालाँकि बहुत विश्वास के स्वर में सुमन ने पूछा. पर उसे लगा, वह उसे धकेल रही है. अभी कौन जा रहा है. झिड़क गया वह, जाएंगे एक दो दिन में. जाना तो पड़ेगा ही. और चुपचाप नाश्ता करता रहा. देर बाद एक आत्मालाप में बोला, जो होना था हो गया, अब चाहे अभी जाओ चाहे कभी जाओ. और उठ गया.

इस तरह, वहाँ आज जाने का निश्चय रद्द होते ही हुआ यह कि वह सारा भीषण भयावह, जिसने दिमाग खराब कर रखा था, एकबारगी वह पृष्ठभूमि में चला गया. सड़क की तरफ के खिड़की-दरवाजे बन्द कर परदे लगा दिये उसने. कुछ-कुछ बन्द किले की तरह सुरक्षा लगने लगी थी.

खाना खाने के बाद चुटकी भर सौंफ मुँह में डाल वह लेट गया...दादा रहा वैसे बदकिस्मत इन्सान. आराम-आराम सौंफ चबाते हुए उसके सोचने में आयाऋ भले ही अपने को वह पैसेवाला, इज्जतवाला, सबकुछ मानता रहा हो, पर क्या फायदा ? भरी जवानी में रंडवा हो गया. बेटे के लिए माँ-बाप दोनों बनकर जिन्दगी होम कर दी. पढ़ाया-लिखाया, डॉक्टर बनाया. फिर शादी कर जिम्मेदारी से मुक्त हुए ही थे, यह वज्रपात हो गया. इससे बड़ा अनर्थ क्या हो सकता है ? यह मौत से भी बड़ी सजा है. कितने बदकिस्मत निकले तुम, यार दादा दीनदयाल. उच्छ्छास छोड़ते हुए उसने करवट ले ली और आँखें मूंद लीं.

घर की मनहूसियत से एक ही रोज में तौबा बोल गया था वह. इसलिए सुबह हुई नहीं कि सरपट आफिस को निकल लिया. कम से कम वहाँ खुले में साँस लेने को तो मिलेगा. यहाँ तो साला ढंग से बोल भी नहीं सकते. वहाँ दिनभर में कितने ठहाके लग जाते हैं जाने. ओúएसú की मेज पर एटेंडेंस रजिस्टर खुला हुआ था. कल वाला उसका कॉलम अभी तक खाली पड़ा उसे ताक रहा था. कान के पीछे खुजलाता हुआ बोला, सर, कल तो मैं आ ही नहीं सका. अरे छोड़ो यार! दस्तखत लगा दो. ऐसे में कोई कैसे आ सकता है ? सबको पता है. फाइलों में लगे हुए सिन्हा साहब बोल दिये. फिर कलम रख उसकी तरफ मुखातिब हो आये, बहुत बड़ी ट्रैजेडी हुई है चंदोला जी. खासे गमगीन हो आये थे वह, क्या किया जाये, सब ऊपरवाले की मर्जी है. चंदोला भी अफसोस से भर उठा, क्या कहें साहब...

लोग चहकते हुए दस्तख्तों को चले आ रहे थे. वहाँ की गमजदगी देख खामोश हो जाते... भ्राता! बड़े बाबू ने पीछे से आकर चुपके से उसे कंधे से छू लिया, ये हम क्या सुन रहे हैं ? फुसफुसाये वे, दादा का बेटा और बहू, दोनों, ऐं ? ट्रक से ऐं, बालपेन उनके हाथ में ही धरा रह गया. काफी लोग घिर आये थे. भय विस्मय से, खेद से अभिभूत, ट्रक किसका था, ठेकेदार का ? ट्रान्सपोर्ट कम्पनी का ? डम्पर था ? अच्छा ? ...और मोटरसाइकिल कौन-सी थी ? ...ओफ्फो! ... ये एक्सीडेंट हुआ कहाँ पर ? किस समय हुआ ? ...कोई बचानेवाला नहीं था आसपास ? ...ट्रक पकड़ा गया कि नहीं ? ...लोग बेताब थे. खुलासे भी आपस में उनसे निकलते आते थे, बहू ने वहीं पर दम तोड़ दिया ? एट द स्पॉट ? अरे नहीं. और बेटा ? उसने अस्पताल में ? राम-राम! क्या कहीं पिक्चर विक्चर से आ रहे थे ? पार्टी से ? क्या कहा, पार्टी से आ रहे थे ? अच्छा! तब तो टक्कर होनी ही थी. पार्टी से आ रहे थे...

डॉक्टर ड्रिंक नहीं करता था. चंदोला ने एतराज जतला दिया, फ्यह वाहियात बात है. अरे भाई, पार्टी में कौन बच पाता है ? लोग छोड़ते हैं क्या ? इट्स टू मच. चंदोला भभक उठा, प्लीज...! ठीक है यार! चंदोला जब कह रहे हैं तो ठीक ही होगा. क्यों जिद करते हो ? तुम चंदोला से श्यादा जानते हो क्या ? बड़े बाबू सीट की तरफ जाते-जाते सुलह-सफाई कर गये.

मगर लोग थे कि चंदोला को छोड़ नहीं पा रहे थे. उसके गिर्द आ घिरते. पर वह तो कुछ भी नहीं जानता. सिर्फ खामोश सुनता और एकटक देखता रहता है. लेकिन इससे क्या फर्क पड़ता है ? उसकी अहमियत अपनी जगह है. भीड़ में जुड़ आये डिस्पैचर भोलाशंकर से गलती हो गयी, पूछ बैठा, फ्ये साहब चंदोलाजी के कोई आपस के हैं क्या ? उसकी बात पर किसी ने गौर नहीं किया. लोग विह्वल थे, अफसोस में ऊभचूभ. तो मौका निकालकर डिस्पैचर ने फिर वही गलती दोहरा डाली, क्यों हरिबाबू, ये साहब चंदोलाजी के कोई आपस के...

तू चुप कर यार पंडत. हर जगह अनाड़ीपन मत झौंकाकर अपना. हरिबाबू ने उसे झिड़क दिया, आपस का क्या होता है ? खासमखास घर के आदमी हैं. सगे से भी सगे. आपस का क्या होता है ?

यह बात आम होती जा रही थी कि इस घटना का चंदोला से नजदीक का रिश्ता है. इसलिए घटना के प्रति लोगों में एक लगाव पैदा हो चला था. लोग उसके खुलासे फिर-फिर सुनने से भी नहीं थक रहे थे. तीसरे रोज बात यहाँ तक पहुँच गयी कि सीट पर बैठे बड़े बाबू ने कागज-पत्तरों को पिन किया और ट्रे में डालते हुए वहीं से सवाल दाग दिया, भई चंदोला जी! जो गुजर गयी सो गुजर गयी, मगर ये तो बतलाओ कि डोकरे को सम्हाल कौन रहा है अब ?

तीर की तरह अचानक सनसनाता आ पहुँचा सवाल...हलकान हो गया चंदोला. तभी दूसरी टेबल से उसी तरह सनसनाता हुआ उसका जवाब भी छूट निकला, सम्हालेगा कौन ? इतना सगा और है ही कौन ? चंदोला हैं, सो ये ही सम्हाल रहे होंगे.

अरे यार ठीक है. सिटपिटा गया चंदोला, सब चलता है. और सीट छोड़ दी उसने. अब ज्यादा बैठने लायक नहीं रह गया यहाँ...बाथरूम में खड़े उसके सोचने में आया. इसी वक्त पीछे से एक सज्जन वहाँ और आ पहुँचे...ये दीनदयाल जी आपके खास करीबी हैं क्या चंदोला जी ? वे बगल में  खड़े हो गये थे तो एक मावूफल जवाब जीभ की नोक तक आ लगा कि शुक्ला बाबू, इस वक्त मेरे खास करीबी तो आप लग रहे हो. पर लावा गुटक लिया, और सवाल को सवाल से पलटा दिया, सैलरी बिल बन गये क्या, शुक्ला बाबू ?

जहाँ तहाँ लोग टकरा जाते. उसे देखते ही उनकी आँखें चमक उठतीं और वे उसे पकड़ लेते...कहते हैं बहू को प्रेगनेन्सी थी ? वे पूछते. हां... वह कुछ बोले, तब तक उनसे ही उत्तर पहुँच जाता, पांच महीने की. अरे नहीं. वे झटके को सम्हालते न सम्हालते, अगला उत्तर लुढ़क आता, लड़का था. लड़का ? ओह गॉड. लोग घटना की गहराई और विस्तार में डूबने उतराने लगते. तब चंदोला खुद घटना की परत दर परत खुलती जा रही त्रासदी को लेकर जाने किस तर्क से डिमोरैलाइज पड़ने लगता, इतना अधिक कि उसे वहाँ पर ज्यादा टिका रहना मुश्किल हो उठता. तड़प जगती कि छूट निकले. लेकिन यह कहाँ मुमकिन था ? वह वहाँ से हटा नहीं कि पीछे से उसकी कलई खुलनी शुरू हो जाएगी, ऐसा उसे लगता.

अभी अभी आफिस से लौटा था चंदोला, वहाँ दिनभर ‘मल्लों’ से टकरा-टकराकर जिस कदर थका पिटा लौटता है वह कि फिर बैठने की भी ताकत नहीं रह जाती. बमुश्किल चाय पियेगा और चित हो जायेगा. तभी चाय पीते, जैसे कोई चीत्कार सुनाई पड़ा हो, उसे ध्यान आया, आज तो छह रोज हो गये. छह रोज ? तिलमिलाकर उसने सामने टंगे कैलेन्डर में गिन डाला...पैरों तले से जमीन खिसकती लगी. अब क्या हो सकता है...? चाय पीना भूल गया वह. क्या अब भी जाया जा सकता है ? छै रोज बिता देने के बाद भी ? देखते ही दादा लाठी उठा लेगा, फ्कौन है ? कहाँ घुसा आ रहा ? भाग, भाग. न सही लाठी, पर इतना तय है कि बुड्ढा अब सीधे मुँह पेश आने वाला नहीं, आइये चंदोला साहब, आइये विराजिये. अरे भई, चंदोला साहब आये हैं, इन्हें कुर्सी पर बैठाओ. हमारे पड़ौसी हैं चंदोला साहब. सगे भाई का रिश्ता मानते हैं, तभी तो भागते हुए आ रहे हैं. इनकी आवभगत करो भई. बिलकुल जैसे बिलाव चूहे को घेरकर छकाता है. माथे पर से पसीना पोंछ लेता है चंदोला.

इससे तो शुरू के दिन के उस भीषण रूप को ही किसी तरह पेफस किया जा सकता था. कायदे से उस पहली रात ही, जब इन्दौर से लौटे थे तभी हो आना चाहिए था. या फिर अगली सुबह हो आते. चीत्कारों से घबरा गये. अरे चीत्कारें तुम्हें निगल तो नहीं जा रही थीं. दूसरे लोग नहीं जा रहे थी क्या वहाँ ? दिल कड़ा कर लेते कुछ देर को. उसके बाद तो सब आसान हो ही जाना था. जब उनके कूल्हे की हड्डी टूटी थी बाथरूम में, तब महीनों तक कौन करता रहा सारी तीमारदारी ? चड्डी-बनियान पहनाना तक ?
अपनी बेवकूफी से पड़ौस का रिश्ता चैपट कर दिया तुमने, चंदोला. और अब चोर-उचक्कों की तरह जी रहे हो. चक्कर खाकर जाते हो, चक्कर खाकर लौटते हो. सीध रास्ता तो दादा की कोठी ने छेंक लिया. अब हो यह रहा है कि सब्जी न हो तो दाल से काम चलाओ, दाल न हो तो बेसन घोल लो. दूध न हो तो फीकी चाय पियो. मोमबत्ती न हो तो अँधेरे में पड़े रहो.

जिंदगी कठिन हो गयी है. एक चिड़चिड़ापन परिवार के मिजाज में फफूंद की तरह पनप रहा है. लेकिन पहले की बातें गिनती में लाना ठीक नहीं. वह कूल्हा टूटने तक का मामला था. उसमें वहाँ जाने, दुःख में शामिल होने की गुंजाइश ही गुंजाइश थी. तब कान्ता गरम-गरम हलवा ले आती थी और वे मिलकर खाते. कूल्हा मेरा टूटा है, हलवा ये लोग खा रहे हैं. दादा मसखरी करते थे. आज तो ऐसा कुछ भी नहीं है, आज तो वहाँ मसान खड़ा है. क्या बोलकर बुढ़ऊ को दिलासा दोगे ? जाकर रुला जरूर डालो और फिर रोता हुआ छोड़कर उठ आओ...उठा जा सकेगा ?

घर अब नरक की शक्ल ले चुका था और बाहर निकलने में खतरे लगने लगे थे. कब, कहाँ बिल्वुफल पकड़ लिये जाने की तरह किस आदमी से भिड़न्त हो जाये...अब यहीं पर ले लो, इसका खयाल भी किसे था कि इंजीनियर तिवारी की भी दादा दीनदयाल से पहचान हो सकती है...दोनों दो ध्रुवों के प्राणी. बिल्वुफल निरापद मानकर ही वह उसकी तरफ निकल आया था कि कुछ देर गपशप हो जायेगी. थे कुछ पुराने ताल्लुकात, जब शहर में दो छड़े हुआ करते थे और शामें मायके में बैठी नयी-नवेलनों की याद में बहलती नहीं थीं. चाय में मजा नहीं आया, लिहाजा अब दोनों यार ब्लैक कॉफी सिप कर रहे थे. बहुत खुला-खुला लग रहा था चंदोला को यहाँ. वरना कितना घुट चुका है वह.

अन्दर घंटी घनघनाई, देखना भाई. तिवारी ने आवाज दी.
वहीं से है. आकर पत्नी बता गयी.

अरे यार. मग रखकर भैंसे की तरह उठा तिवारी, अब क्या आफत आ गयी



1837
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