‘वसुधा’ यानी ‘प्रगतिशील वसुधा’ का फ़िल्म विशेषांक (प्रधान संपादक: कमला प्रसाद, संपादक: स्वयं प्रकाश, राजेंद्र शर्मा, अतिथि संपादक: प्रहलाद अग्रवाल) निश्चय ही एक फिल्म अध्ययन की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है. जैसा कि प्रधान संपादक कमला प्रसाद ने अपने संपादकीय में लिखा है इसमें लगभग छह सौ हिन्दी फ़िल्मों का सार संक्षेप है और 1931 से लेकर 2009 तक की अस्सी महत्त्वपूर्ण फ़िल्मों पर विश्लेषणात्मक लेख. अतिथि संपादक प्रहलाद अग्रवाल अपने आप में हिंदी फ़िल्मों के जीवंत कोश हैं और पिछले दिनों एक बैठक में हिन्दी फ़िल्मों की इतनी जानकारी देखकर मैं दंग रह गया था. अपने वक्तव्य में उन्होंने एक मार्के की बात कही है कि हिंदी सिनेमा सिर्फ हिंदी भाषाभाषी लोगों की ही नहीं बल्कि पंजाबी, बंगला, गुजराती, मराठी से लेकर दक्षिण भारतीय भाषाभाषी समुदाय का सिनेमा है. एक तरह से यह भारतीय प्रयास है.
इसमें शक नहीं कि सिनेमा एक मनोरंजन का माध्यम है पर इसी का दूसरा पहलू यह भी है इसमें व्यक्ति, समाज और इतिहास की आकांक्षाओं और स्वप्नों का विलय भी होता है. इसलिए सिनेमा के अध्ययन की कई दिशाएँ हो सकती हैं- कलात्मक, समाजशास्त्रीय, मनोवैज्ञानिक, सांस्कृतिक आदि आदि. सिनेमा मूलतः कला-माध्यम है लेकिन एकल कला- माध्यम नहीं है. वह सामूहिक कला माध्यम है. इसलिए उसके आकलन या अध्ययन की भी कई दिशाएँ हो सकती हैं. यानी एक फ़िल्म का आकलन कई दिशाओं और दृष्टियों से होना चाहिए. हर फ़िल्म कई बातें कहती हैं. इसलिए फ़िल्म आलोचक की कठिनाई भी बढ़ जाती है.
बहरहाल, बात ‘वसुधा’ के इस अंक, जो दरअसल इक्यासीवां अंक है, की हो रही थी. इसमें अलग-अलग लेखों में अलग-अलग नजरिया है. कुछ में जानकारियां हैं तो कुछ में विश्लेषण है. जानकारियां देने वाला एक महत्त्वपूर्ण लेख है कीर्ति श्रीवास्तव का ‘निर्माण से सफलता तक की कहानी’ जो ‘शोले’ फिल्म की निर्माण- प्रक्रिया के बारे में जानकारियां देती हैं. जैसे यह कि फ़िल्म में जय (अमिताभ बच्चन) द्वारा बसंती (हेमा मालिनी) की मौसी (लीला मिश्रा) को वीरू (धर्मेन्द्र) के बारे में दी गई जानकारी, जिसमें शादी का प्रस्ताव था, दरअसल वास्तविक घटना से उठाया गया था. सलीम-जावेद ने शोले की पटकथा लिखी थी. इस दौरान जावेद अख्तर खुद हनी ईरानी को दिल दे बैठे थे. जावेद की तरफ से सलीम हनी ईरानी के मामा से बात करने गये थे और उनके बीच कुछ इस प्रकार से बात हुई-
मामा- लड़का कैसा है?
सलीम- हम पार्टनर हैं और जिसके साथ काम करता हूँ, इसकी तारीफ तो करूंगा ही, लेकिन दारू पीता है.
मामा- क्या! दारू पीता है
सलीम- आजकल बहुत नहीं पीता है. बस एक-दो पेग, वो भी जब जुआ खेलता है. और उसमें कोई खराबी नहीं है. लेकिन दारू पीने के बाद लालबत्ती इलाके में भी जाता है.
ये पूरा संवाद फ़िल्म में या बस ‘खानदान का पता चलते ही आपको खबर कर देंगे’ वाली बात अलग से जोड़ी गई.
शोले के बनने में लगभग दो साल लगे. इसके कुछेक दृश्य को शूट करने में कई दिन लगे. जैसे ये दोस्ती हम नहीं छोड़ेंगे के फ़िल्मांकन में 21 दिन का समय लगा. इसी तरह होली का गीत ‘होली के दिन दिल मिल जाते हैं’ के फ़िल्मांकन में भी 20 दिन लगे. ऐसी कई दिलचस्प जानकारियाँ इस लेख में हैं.
इसी तरह ‘रोटी’ पर लिखे शरद दत्त के लेख में भी कई अहम जानकारियाँ हैं. जैसे यह फिल्म मुख्य रूप से संगीतकार अनिल विश्वास की कल्पना की उपज थी. जब फिल्म के निर्देशक महबूब खाँ बीमार होकर एक अस्पताल में पड़े थे तो अनिल विश्वास ने रोटी पर फिल्म बनाने का सुझाव दिया जिसे महबूब खाँ ने स्वीकार कर लिया. फिर उसके बाद इस आइडिया पर अनिल विश्वास ने विस्तार से काम भी किया. यह दीगर बात है फिल्मी टाइटिल में अनिल विश्वास का नाम सिर्फ संगीत निर्देशक के रूप में गया. वैसे खुद महबूब खाँ का जीवन भी कई तरह के उतार चढ़ाव से भरा था और इसका विशद ब्यौरा इस आलेख में है.
लीलाधर मंडलोई ने ‘शतरंज के खिलाड़ी’ पर अपने विश्लेषणात्मक लेख में इस फ़िल्म के बारे में जितनी समीक्षाएँ हुई उनका ब्यौरा दिया है और खुद भी इसके कलात्मक पक्षों का विश्लेषण किया है. उन्हीं के लेख से पता चलता है कि आलोचक राजवंश खन्ना ने ‘शतरंज के खिलाड़ी’ पर समीक्षा लिखते हुए यह आरोप लगाया था कि सत्यजीत राय ने वाजिद अली शाह को एक प्रभावहीन विलासी बादशाह के रूप में चित्रित किया है. राय ने राजवंश खन्ना पर यह आरोप लगाया था कि ‘राजवंश’ फ़िल्म के विश्लेषण के योग्य नहीं हैं. पंक्तियों के बीच छिपे अर्थ को पढ़ना तो दूर की बात है.’
‘शतरंज के खिलाड़ी’ जब आई थी तो इस पर अच्छा खासा विवाद उठा था. इस सबके बारे में इस लेख में विस्तार से बताया गया है. लेकिन आज भी ‘शतरंज के खिलाड़ी पर नये ढंग से बात होगी और साथ ही साथ प्रेमचन्द की कहानी पर. सवाल सिर्फ़ यह नहीं है कि राय ने प्रेमचन्द की कहानी के प्रति अपनी निष्ठा दिखाई या नहीं. सवाल यह है और आज के माहौल में यह ज्यादा प्रासंगिक है उपनिवेशवाद के बारे में राय का नजरिया क्या था. और प्रेमचन्द का भी. बेशक प्रेमचन्द उपनिवेशवाद विरोधी थे लेकिन इतिहास इसका गवाह है कि ब्रितानी उपनिवेशवाद ने अपने लंबे शासन के दौरान कई ऐसी बातें हमारे बौद्धिक समाज में बिठा दीं कि हम उनसे आज तक मुक्त नहीं हो पाये. इनमें से एक वाजिद अली शाह के बारे में हमारे बौद्धिक जगत का नजरिया है.
अमूमन बौद्धिक समाज में यह धरणा है कि वाजिद अली शाह विलासी था और उसके शासन काल में लखनऊ पतनशील सांस्कृतिक दौर में पहुँच गया. प्रेमचन्द भी यही राय रखते थे और सत्यजीत राय भी. हकीकत तो यह कि वाजिद अली शाह हिंदुस्तान का एक बेजोड़ सांस्कृतिक व्यक्तित्व था और उसके कार्यकाल के दौरान लखनऊ का सांस्कृतिक विकास हुआ.
पर प्रेमचन्द से लेकर सत्यजीत राय तक और आज के बुद्धिजीवी भी इस बात को समझ नहीं पाए कि अंग्रेजों ने वाजिदअली शाह की एक नकारात्मक छवि बनायी जिसे हम में से कई भी लगभग जस का तस मानते और स्वीकार करते हैं. हम इस बात को क्यों भूल जाते हैं, और सत्यजीत राय भी क्यों भूल गये कि अंग्रेजों ने 1801 से ही लखनऊ और अवध अपने अधीन करने के लिए तरह-तरह के तिकड़म करने शुरू कर दिये थे और इसी कारण वाजिद अली शाह तक आते आते लखनऊ के नवाब की सारी स्वायत्तता खत्म कर दी थी. सत्यजीत राय बड़े फिल्मकार थे पर उनका इतिहास का नजरिया उपनिवेशवाद से प्रभावित था. इसलिए ‘शतरंज के खिलाड़ी’ महान फिल्म नहीं बन पायी. राय इतिहास के खिलाफ खड़े होकर फिल्म बना रहे थे.
‘वसुधा’ के इस अंक में राज कुमार केसवानी, विश्वनाथ त्रिपाठी, बुद्धिनाथ मिश्र, विजय शर्मा, रमाकान्त श्रीवास्तव, जवरीमल्ल पारख, महेश कटारे, ओमा शर्मा, विनोद दास, शालिनी माथुर सहित कई सुधी समीक्षकों के लेख हैं. निश्चय ही यह अंक फिल्म अध्ययन की बहुत बड़ी जरूरत को पूरा करता है.
एक कवि की कहानी
हिन्दी के युवा कवि राम लखन यादव का पिछले पन्द्रह अगस्त को निधन हो गया. यादव के सिर में एक गम्भीर बीमारी हो गई थी.
मेरे सामने राम लखन यादव का वह चेहरा आज भी मौजूद है जिसे मैंने सोलह-सत्राह साल पहले पहली बार ‘जनसत्ता’ में देखा था. हुआ यह था कि एक दिन मेरे मित्रा पुरुषोत्तम अग्रवाल ने फोन किया और कहा एक कविता छपी है. कविता अच्छी थी. मैंने पूछा किसकी है. उन्होंने कहा कि यह कविता एक सिक्योरिटी गार्ड का काम करने वाले की है जिसने ढंग से पढ़ाई भी नहीं की है. फिर उन्होंने बताया कि यह पंडित जी (यानी हरिनारायण जी, जो उस समय ‘हंस’ में थे और आजकल ‘कथादेश’ के सम्पादक हैं, की खोज है. मैंने पुरुषोत्तम जी से कहा कि आप कवि को मेरे पास भेज दीजिये, कुछ कविताओं के साथ. दूसरे दिन राम लखन आया. मैंने देखा सत्राह-अठारह साल का एक लड़का चेहरे पर कुछ डर, कुछ संकोच, कुछ शर्मीलापन. मैंने राम लखन से कविताएँ लीं. फिर बातचीत की. उससे पता लगा कि वह पटेल नगर में सिक्योरिटी गार्ड का काम करता है और कविता लिखन-पढ़ने का शौक रखता है. अमूमन शुरुआती दौर में लोगों का रुझान गीत-गजल की तरफ रहता है. पर राम लखन की शुरू से ही आधुनिक कविता में रुचि थी. वह भी कविता की किताबें खदीदकर पढ़कर पढ़ने की. इसी सिलसिले में उसकी मुलाकात हरिनारायण जी से हुई थी. वह ‘हंस’ के दफ्तर में किताबें खरीदने गया था.
बहरहाल उस दिन मैंने राम लखन की कविताएँ रख लीं. ‘रविवारी जनसत्ता’ के सम्पादक मंगलेश डबराल उस दिन दफ्तर नहीं आये थे.दूसरे दिन आने पर मैंने उसकी कविताएँ दीं. उन्होंने जो कहा वह कुछ कुछ इस तरह का था कि कविताएँ तो अच्छी हैं, हालाँकि थोड़ी अनगढ़ता है. अनगढ़ता थी ही. फिर उन्होंने पूछा किसकी हैं ? मैंने बताया. उसके बाद उसी हफ्ते वे कविताएँ ‘रविवारी जनसत्ता’ में छपीं.
यह विडंबना ही थी कवि की छवि बन जाने के बाद भी राम लखन लम्बे समय तक सिक्योरिटी गार्ड का ही काम करता रहा. हालाँकि राजेन्द्र यादव, मंगलेश डबराल, विश्वनाथ त्रिपाठी, पुरुषोत्तम अग्रवाल सहित कई साहित्यिक हस्तियाँ उसकी प्रशंसक हो चुकी थीं. ‘जनसत्ता’ में अपनी कविता के प्रकाशन ने राम लखन को एक स्तर पर प्रतिष्ठा तो दी पर राम लखन का जीने का संघर्ष जारी था. खैर उसी समय वरिष्ठ लेखक विजय मोहन सिंह हिन्दी अकादमी के सचिव थे. उनको भी राम लखन की कविताएँ पसन्द आयी थीं. उन्होंने राम लखन को बुलाया. राम लखन के पास शैक्षणिक योग्यता इतनी नहीं थी कि उसे क्लर्क की नौकरी भी दी जा सके. बहरहाल, उसे विजय मोहन जी ने चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी की नौकरी दे दी. राम लखन की जिंदगी में उसके बाद थोड़ा आत्मविश्वास आया.
बाद में सुना कि एक अखबार में खबर पढ़कर राम लखन ने एक परित्यक्ता को सहारा दिया और उससे शादी भी की. यह उसके जीवन का दूसरा अध्याय है जिसके बारे में मेरी जानकारी कम है पर उसके व्यक्तित्व में अकुलाहट थी, बेचैनी थी. शायद इसी कारण वह कवि बनना चाहता था. था भी. उस असमय मौत की वजह उसकी कविता पूर्ण प्रस्पुफटित होने से रह गयी.
राम लखन हरदोई का रहने वाला था. वहाँ से एक बार वह लड्डू भी लाया था जो बड़े स्वादिष्ट थे. उसके लाये लड्डू का स्वाद और उसकी कविता की ध्वनि मेरे जेहन में हमेशा रहेगी. शायद कइयों के जेहन में भी.
ई 102, जनसत्ता अपार्टमेंट्स, सेक्टर-9, गाजियाबाद