पागल हैं, मूर्ख नहीं
आलोक पुराणिक वरिष्ठ लेखक तथा व्यंग्यकार हैं। आलोक जी ने यह लेख ख़ासतौर मूर्ख दिवस के मौक़े पर "मस्ती की बस्ती" के लिए लिखा है।क़िस्सा यूँ है कि देश के पहले प्रधानमन्त्री जवाहरलाल नेहरु एक बार आगरा से होकर गुज़र रहे थे। आगरा के विख्यात मानसिक चिकित्सालय (जिसे तब पागलखाना कहा जाता था) के सामने नेहरुजी की कार ख़राब हो गयी। ख़राब यूँ हुई कि कार का एक पहिया ही निकल गया। पहिये के चारों पेंच निकल गये थे। रात एक बजे का वक़्त। नेहरुजी को दिल्ली पहुँचना ज़रुरी थी। उस वक़्त कोई मिस्त्री उपलब्ध नहीं। तब ही मानसिक चिकित्सालय के कुछ रोगियों ने नेहरुजी की समस्या देखी और दिमाग लड़ाया और सोल्यूशन बताया कि आप बचे हुए तीनों पहियों से एक-एक पेंच खोल लीजिये और चौथे पहिये को तीन पेंचों पर फ़िट कर दीजिये। चारों पहिये तीन-तीन पेंचों पर चलेंगे, दिल्ली जाकर मामला पूरा चौकस करवा लीजिये। आइडिया धांसू था। कार चल निकली। कार में बैठते हुए नेहरुजी ने कहा - कमाल है आप लोग तो बहुत अक़्लमंद हैं, लोग तो आपको पागल कहते हैं। उनमें से एक ने कहा - देखिये जी संभल कर बात कीजिये, हम पागल हैं, मूर्ख नहीं हैं।
इंडिया में अपनी चाइस से मूर्ख बनें, तो बनें पर नेचुरल मूर्ख, या प्रकृति निर्मित मूर्ख तलाशना मुश्किल है। पहले इस ख़ाकसार का मानना था कि दो ही तरह के लोग होते हैं, एक जो मूर्ख होते हैं, पर दिखते नहीं हैं। दूसरे, जो मूर्ख दिखते हैं, पर होते नहीं है। भारत में दूसरी कैटेगिरी के ज़्यादा पाये जाते हैं। इस से जुड़ा दूसरा क़िस्सा यूँ है कि एक चौराहे पर एक मदारी तमाशा दिखाता था कि देखो मूर्खता का लाइव शो, वो एक समझदार से बंदे के आगे एक तरफ़ पाँच का नोट रखता था और दूसरी तरफ़ पाँच सौ का नोट। वह हमेशा पाँच का नोट ही उठाता था। पब्लिक हँसती थी। एक दिन एक समझदार ने उससे पूछा कि तू कभी पाँच सौ नोट का क्यों नहीं उठाता। पाँच का नोट उठाऊ बोला - भईया सिर्फ़ एक ही बार पाँच सौ नोट उठाने का मौक़ा मिलेगा। फिर पाँच के नोट से हमेशा के लिए जाऊँगा।
भारत में नेचुरल मूर्ख मुश्किल से मिलते है, ये नियामत ऊपर वाले ने अमेरिका और इंगलैंड को ही बख़्शी है। हम सिर्फ़ बुश और ब्लेयर की बात नहीं कर रहे हैं।
मूर्ख दिखना पर मूर्ख न होना तो दरअसल एक क्वालिटी है। लालूजी ने बरसों इसी क्वालिटी से मौज काटी है। मीडिया उन्हें बरसों यही समझता रहा। बाद में पता लगा कि दरअसल जो वह लालूजी को समझ रहे थे, वह तो खुद मीडिया है।
मूर्खों का ख़ासा महत्व है सामाजिक जीवन में। ये जो कई उपदेशक टाइप, लेक्चरातुर बंदे घूमते हैं, इन्हे बौद्धिक कब्ज़ हो जाये, अगर लेक्चरों के ज़रिये इनका बोझ हलका न हो। अपने आसपास देखिये सीनियर समझावकों के चेहरे पर कैसी विकट आभा आ जाती है, जब वे किसी को कुछ समझा रहे होते हैं। अपने बुरे दिनों में मैंने भी ऐसे समझावकों की आभा में योगदान किया है। खाने-पीने का जब संकट चल रहा था, तब मैं ऐसे एक सीनियर समझावक के पास सुबह-सुबह चला जाता था। चेहरे पर विकट मूर्खता के भाव। विकट मूर्खता के भाव कई क़िस्म के अवयवों से बनते हैं। आँखों में परम जिज्ञासा का भाव, किंचित मूर्खोचित मुस्कान, वाह-वाह वाह-वाह क्या कहा है, जैसे जुमलों का धारावाहिक सिलसिला। चेहरे पर ऐसा भाव लाना पड़ता है कि समझावक समझे कि हाँ ये ओरिजनल मूर्ख है। मूर्ख तमाम समझावकों को सार्थकता प्रदान करता है। कई समझावकों को जीवन निरर्थक लगता है, अगर कोई ज्ञान लेने वाला न मिले, तो। तो साहब मेरे समझावक मुझे नैतिकता सत्य पर बहुत प्रवचन देते थे, साथ में दो कप चाय और बहुत दिव्य किस्म के बिस्कुट। प्रवचन मैं वहीं छोड़ आता था। बाद में मेरे दिन अच्छे आ गये, तो वह उदास हो गये, मूर्खों की घटती जनसंख्या से समझावक और अक़्लमंद बहुत परेशान होते हैं।
वैसे मूर्खता के बहूत मज़े हैं। काँलेज के दिनों में राजनीतिक दिशा जब मैं तलाश रहा था, तब राजनीतिक विचाराधारा पर फ़ोकस करने के बजाय मैं देखा करता था कि सुंदर कन्याओं की धारा किस तरफ़ बह रही है। जिस पार्टी में सुंदर बालाएँ होती थीं, मैं फ़ौरन निपट मूर्खोचित भाव से उनसे ज्ञान लेने के चक्कर में रहता था। उन दिनों एक हफ़्ते के हेर-फेर में मैं वामपंथी से दक्षिणपंथी तक हो जाया करता था। एक बार तो मैं निकारागुआ की एक पार्टी का भारतीय सदस्य तक बन गया, क्योंकि उसकी लोकल शाखा जो सुंदरी चला रही थी, वह मूर्खों को समझाने के लिए अतिरिक्त कक्षाएँ लिया करती थी। कालांतर में सारी सुंदरियों का विवाह हो गया। किसी भी किस्म की राजनीति से मेरा मोहभंग हो गया। अक़्लमंदी से सुंदरियों का साहचर्य पाना बहुत मुश्किल रहा है। पर मूर्खता के लाभांश के बतौर कई सुंदरियों ने मुझे समझाने में कई घंटे लगाये हैं। यह लाभांश सिर्फ़ मूर्खों को मिलता है।
बताइए कालिदास मूर्ख नहीं होते, तो क्या विद्योत्तमा से पार पा सकते थे। नहीं ना।
सुंदरियों को सैट करने का रास्ता, मूर्खता की पगडंडी से ही जाता है। अक़्लमंदी के राजमार्ग पर चलकर सुंदरियाँ नहीं मिलतीं। कालिदास की कहानी हमें बार-बार यही बताती है।
इसलिए मूर्ख दिखने में महारथ हासिल कर लेनी चाहिए। एक अप्रैल का यही संदेश है। एक संदेश और समझ लेना चाहिए कि पागल होकर भी कभी मूर्ख नहीं होना चाहिए।
- आलोक पुराणिक
लेबल: alok puranik, Hindi, satire, व्यंग्य, हिन्दी


6 टिप्पणियाँ:
आलोक जी सबसे पहले तो आपका पुनः स्वागत है चिट्ठाजगत में।
साथ ही मैं बताना चाहूँगा कि मैं आपके प्रपंचतंत्र वाले लेखों का बहुत फैन रहा हूँ। अखबार में रेगुलर पढ़ता था। फिर याद नहीं वो बंद हो गए या मैंने अखबार बदल दिया। उसके बाद पिछले साल ब्लॉगजगत आया तो एकदिन आपका भूतपूर्व ब्लॉग दिखा बहुत प्रसन्न हुआ कि आप ब्लॉग पर वही सीरीज लिख रहे हैं। उन्हें बहुत चाव से पढ़ा लेकिन जानकार निराशा हुई कि आपने लिखना छोड़ दिया था।
आपसे अनुरोध है कि प्रपंचतंत्र सीरीज फिर से चालू करें। चाहे हफ्ते पंद्रह दिन में एक बार लिखें लेकिन लिखें। बाकी उस सीरीज के पुराने लेख तो आपके पास पढ़े ही होंगे।
आपको मूर्ख-दिवस की शुभकामनाएं और हाँ आपका संदेश ग्रहण कर लिया है। :)
बहुत सुन्दर है/हैँ । किनकी तरह ? जो आपकी कब्कीयत दूर न कर सकीं और आप पत्रकार हो गए ?
बताइए कालिदास मूर्ख नहीं होते, तो क्या विद्योत्तमा से पार पा सकते थे। नहीं ना।
हम काहे ना कालिदास हुए ;)
मूर्ख दिखना पर मूर्ख न होना तो दरअसल एक क्वालिटी है। लालूजी ने बरसों इसी क्वालिटी से मौज काटी है। मीडिया उन्हें बरसों यही समझता रहा। बाद में पता लगा कि दरअसल जो वह लालूजी को समझ रहे थे, वह तो खुद मीडिया है।
इस बात के लिये आपको १० में से २० अंक
मजा आ गया ऐसे ही लिखते रहिये
कभी समय निकाल कर मुर्ख दिखने के लडकी पटाने के अलावा अन्य फायदों पर भी प्रकाश डालिए।
बढ़िया ! चिट्ठा जगत में आपके मौजूदगी को एक सुखद आश्चर्य ही कह सकता हूं मैं। अब तक कागज़ पर छपे शब्दों के माध्यम से आपको जाना था। अब यहां इंटरनेट पर भी आपको पढ़ा जा सकता है यह सचमुच खुशी की बात है।
alokji apaki bat se kayal hoo.
kab pharane ko milega murkh hone ke 1001 phayede.
atul shah
anpara
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