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सोमवार, 2 अप्रैल, 2007

श्री विष्णु नागर का व्यंग्य : राजनीतिक संन्यासी

Vishnu Nagarविष्णु नागर पेश से पत्रकार हैं - लेकिन व्यंग्यकार के रुप में भी उनकी अच्छी ख़ासी पहचान हैं। उनके पाँच व्यंग्य संग्रह आ चुके हैं। पेश है उनका 'राजनीतिक संन्यासियों' की क़लई खोलता व्यंग्य :


संन्यासी आपने भी बहुत देखे होंगे और हमने भी। संन्यासी हैं भी बहुत हमारे देश में और होंगे तो दिखेंगे भी। जायेंगे कहाँ? कोई बीवी के ताने-तिश्नों का मारा है और संन्यासी बन चुका है, किसी को बच्चों ने घर से भगा दिया है और वह संन्यासी बन गया है। कोई बेरोजगारी का मारा है और उसने संन्यास में जीवन जीने का रास्ता पा लिया है। किसी ने हत्या या बलात्कार किया है और वह संन्यासी के वेश में पुलिस से बचता फिर रहा है। किसी को फटाफट करोड़पति बनना है तो कौन बनेगा करोड़पति कार्यक्रम में कामयाबी न मिलने के बाद संन्यासी बन गया है, किसी की किसी साधु या बाबा की संपत्ति पर निगाह है तो वह संन्यासी बन गया है। किसी को लगता है कि संन्यास मुत और तर माल खाने की स्थायी और अविचल व्यवस्था है, इसलिए वह संन्यासी बन गया है। किसी को राजनीति करने के लिए संन्यासी बनने से ज्यादा फायदेमंद कुछ नहीं लगता। कोई-कोई ऐसा भी शायद होता ही होगा, जिसकी वाकई भगवान से लौ लग गई गई होती होगी। ऐसी गल्ती भी इनसान ही कर सकता है। आशय यह है कि जितने संन्यासी हैं उतने ही संन्यासी बनने के कारण भी हैं।

लेकिन तमाम नेताओं की इस धमकी के बावजूद कि फलां भ्रष्टाचार या फलां बलात्कार या फलां डकैती या फलां रंगदारी का आरोप सिध्द होने पर मैं राजनीति से हमेशा के लिए संन्यास ले लूंगा, किसी राजनीतिक संन्यासी को आपने आज तक कभी देखा है? मेरा विश्वास है कि नहीं देखा होगा क्योंकि मैंने भी आज तक नहीं देखा है।

सच्चाई यह है कि जो राजनीति में एक बार चला आता है, वह राजनीति से संन्यास लेने की गलती कभी नहीं करता, कभी कर ही नहीं सकता, भले ही राजनीति उससे संन्यास ले ले। वह राजनीति का गृहस्थाश्रम धर्म निभाते-निभाते ही अंतिम सांस लेना पसंद करता है। वह राजनीति के सेंट्रल हाल में बैठकर अपनी बारी की हमेशा प्रतीक्षा करता रहता है। वह इस आशा में सेंट्रल हाल नहीं छोड़ता कि कभी तो कोई ऐसा कमीशन बनाया जायेगा, जिसका अध्यक्ष उसे बनाया जायेगा। कभी तो किसी संस्थान का अध्यक्ष पद खाली होगा, जहाँ उसे कैबिनेट मिनिस्टर का नहीं तो कम से कम राज्य मंत्रि का दर्जा देकर जरूर बैठाया जायेगा। उसे कहीं का राजदूत, कहीं का राज्यपाल या नहीं तो उपराज्यपाल तो अवश्य ही बनाया जायेगा। यहाँ तक कि जो भूतपूर्व प्रधानमंत्रि हैं और अपनी भूतपूर्वता में भी अभूतपूर्व हो चुके हैं, जो अपनी बारी अच्छी या बुरी तरह खेल चुके हैं, उन्हें भी उम्मीद रहती है कि उनके अधूरे कामों को पूरा करने का अवसर यह देश, यह समाज और नहीं तो सोनिया गाँधी अवश्य देंगी। वे नहीं देंगी तो ईश्वर देगा और ईश्वर भी नहीं देगा तो जन्म कुंडली देगी क्योंकि उसमें ऐसा लिखा हुआ है। देश का शायद ही कोई नेता ऐसा होगा जो अपनी अंतिम सांस तक देश की सेवा करने को तत्पर न हो, वह भी क्या करे, राजनीति में ऐसी परंपरा हमेशा से रही है। क्या गाँधी, नेहरू और इंदिरा गाँधी या राजीव गाँधी ने ऐसा नहीं किया था? तो किस आधार पर वह देशसेवा से मुँह मोड़ लें? वैसे शायद हमारे धर्मग्रंथों में कहीं कहा गया होगा कि एक सच्चे राजनीतिक को कभी संन्यास नहीं लेना चाहिए।

बहरहाल सच तो यह भी है कि राजनीतिक संन्यास लेना भी चाहे तो कैसे ले बेचारा गरीब? राजनीति में पचास साल की उम्र से पहले तो आदमी को बच्चा ही समझा जाता है और कहा भी जाता है, भले ही राहुल गाँधी से उनके मुँह पर यह कहने का साहस किसी काँग्रेसी का न होता हो। पचास की उम्र में उसे युवा मानना शुरू होता है और पैंसठ की उम्र तक वह युवा ही बना रहता है। फिर वरिष्ठ होना आरंभ होता है और वरिष्ठ होते-होते उसे पाँच साल और लग जाते हैं। जब तक वास्तव में वरिष्ठता के नाते उसे कुछ मिलता है या मिलने की संभावना बनती दीखती है कि तभी उधर से बुलावा आना शुरू हो जाता है कि भाईसाहब या बहनजी- आप जो भी हों-चलिये,बहुत जी लिये। आपकी उम्र के 90 प्रतिशत लोग उधर जा चुके हैं, फिर आप इधर क्या कर रहे हैं? इसलिए राजनीतिक नेता तो मजबूर है संन्यास न लेने को। अब ठीक है कि कभी-कभी मुँह से निकल जाता है कि भ्रष्टाचार या बलात्कार या ऐसा ही कोई एक भी आरोप सिध्द हो गया तो मैं इस्तीफा ही नहीं दूँगा वरन राजनीति से संन्यास भी ले लूँगा लेकिन यह किसी भी समझदार आदमी को समझना चाहिए कि यह वक्त की नजाकत देखकर कहा गया महज एक वाक्य है, एक अखबारी वक्तव्य है, नेकनीयती का प्रमाणपत्र है और राजनीति में ऐसा कौन है जिसे अपने लघु या सुदीर्घ राजनीतिक जीवन में ऐसा वाक्य कभी नहीं कहा या ऐसा वक्तव्य नहीं दिया?

- विष्णु नागर

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2 टिप्पणियाँ:

बेनाम ने कहा...

बेहतरीन व्यंग्य। आगे भी आपके व्यंग्यों का इंतज़ार रहेगा।

2 अप्रैल, 2007 11:33 अपराह्न  
Shrish ने कहा...

बहुत खूब, एकदम सटीक व्यंग्य। नेताओं का बस चले वो कब्र में भी राजनीति करें। यह बात कि आज तक एक भी नेता ने संन्यास नहीं लिया काबिलेगौर है। बस यमराज ही इन नेताओं से छुटकारा दिला पाते हैं।

3 अप्रैल, 2007 4:24 पूर्वाह्न  

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