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शनिवार, 7 अप्रैल, 2007

व्यंग्य- दिखा दी न, फिर से 'उंगली'

बिहारी बाबू के रुप में प्रियरंजन व्यंग्यकार के तौर पर अपनी पहचान बना चुके हैं। उनके व्यंग्य का अभी तक अलग अंदाज़ रहा है-लेकिन इस बार आप प्रियरंजन का दूसरा अंदाज देखेंगे। " मस्ती की बस्ती" के विशेष आग्रह पर लिखे गए इस व्यंग्य में प्रियरंजन ने गुरु ग्रेग पर टिप्पणी की है।

लीजिए, ग्रेग चैपल ने फिर से दिखा दी उंगली। आप कोच की क़ुर्सी छीनकर उसको उंगली दिखाते, उससे पहले ही उसने आपको फिर से एक बार उंगली दिखा दी। अब क्या कीजिएगा, उंगली भी हर कोई थोड़े दिखा सकता है, ये तो हम हैं कि हर कोई हमें उंगली दिखाकर चला जाता है और हम हैं कि अपनेको धन्य समझते रहते हैं। आख़िर उन्होंने इस लायक भी तो हमें ही समझा, वे कहाँ इंग्लैण्ड या ऑस्ट्रेलिया गए!

वैसे, मुझे लगता है कि चैपल की यह उंगली हमें नहीं, हमारी मानसिकता को दिखाई गई है। यह उंगली हमारी उस मानसिकता को दिखाई गई है, जो अभी भी विदेशों को स्वर्ग और गोरों को सर्वज्ञ मानती है। हमें अपने देश में कोई क़ाबिल दिखता ही नहीं -- हर कोई घोंचू है और ज़िन्दगी भर काम के बदले घास खोदता है। हमें अपने बच्चों पर भरोसा नहीं लेकिन मास्टर पर पूरा भरोसा होता है, जैसे वह भगवान हो। पता नहीं हम इस बात में क्यों विश्वास करते हैं कि मारकर, पीटकर, गाली देकर, कान मरोड़कर, नंगा कर, मुर्गा बनाकर, संटी-सेवाकर... मास्टर हमारे गदहे बच्चे को आदमी बना ही देगा, जबकि हमें पता है कि ऐसा होता नहीं है।

वैसे, अब तो विश्व-कप के कूचे से बेगाने निकलने के बाद मुझे ऐसा लगता है कि यह भी चैपल की 'उंगली दिखाने' वाली कार्रवाई ही है। अब आप ही बताइए न, पहले तो 'किलरइंस्टिंक्ट' वाले गांगुली की उसने सारी इंस्टिंक्ट ग़ायब कर दी और फिर बल्लेबाज़ी क्रम में इतनी उधम मचाई कि बल्लेबाज़ यह भूल गए कि बैटिंग ऑर्डर जैसी किसी चीज़ की क्रिकेट के मैदान में कोई अहमियत भी होतीहै। उंगली दिखा-दिखा कर उसने बॉलरों को बैट्समैन बनाने की कोशिश की और बैट्समैन को बॉलर! इसी घनचक्करी में टीम कहीं की नहीं रही। कहाँ तो बीसीसीआई अपने गदहे खिलाड़ियों को इस गुरु ग्रेग से आदमी बनाना चाह रही थी और कहाँ इस गुरु ने 'उंगली दिखा-दिखा कर' टीम को बांग्लादेश से भी गदहा बना दिया।

मुझे तो कभी-कभार लगता है कि चैपल द्वारा भारतीय क्रिकेट की यह दुर्गति कहीं पश्चिमी देशों की चाल न हो। मुझे इसकी पुख़्ता वजह भी नज़र आती है। अब देखिए न, पश्चिम में बनने वाली तमाम दवाओं के परीक्षण के लिए जैसे एशिया-अफ़्रीका के लोगों को गिनीपिग के रूप में इस्तेमाल किया जाता है, क्या पता चैपल भी वैसे ही क्रिकेट की अपनी किसी थ्योरी की जाँच के लिए भारतीय क्रिकेट टीम का 'इस्तेमाल' कर रहे हों और उसकी 'उंगली' उसी का हिस्सा हो।

तो मेरी मानिए और मेरी तरह अपने 'भगवान' सदृश खिलाड़ियों को विलेन बनाना छोड़ दीजिए। बेहतर तो होगा कि हम सरकार से यह मांग करें कि वह विश्वकप में भारतीय टीम की इस दुर्गति की सीबीआई से जाँच करवाए और अगर सीबीआई फ़ेल हो जाए, तो एफ़बीआई की मदद ली जाए। यक़ीन मानिए, जाँच में इस दुर्गति के लिए सिर्फ़ और सिर्फ़ चैपल की उंगली ही ज़िम्मेदार नज़र आएगी!
(प्रियरंजन जी ने यह व्यंग्य अतिथि लेखक के रुप में लिखा है)

3 टिप्पणियाँ:

Shuaib ने कहा...

अच्छा व्यंग्य है

7 अप्रैल, 2007 11:12 पूर्वाह्न  
उडन तश्तरी ने कहा...

ह्म्म्म्म, बड़ा गहरा प्रश्न खड़ा कर दिये हो बिहारी बाबू. भेजते हैं अब जाँच दल.

7 अप्रैल, 2007 9:56 अपराह्न  
मोहिन्दर कुमार ने कहा...

जाँच लायक विषय है, मैँ समीर जी से सहमत हूं.. एक समीति बिठानी पडेगी

8 अप्रैल, 2007 6:48 अपराह्न  

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