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मंगलवार, 17 अप्रैल, 2007

विकास मिश्रा का व्यंग्य: खतरे में चड्ढी

विकास मिश्रा पेशे से पत्रकार हैं। समाचारों के बीच खाते-पीते, उठते-बैठते हैं लेकिन इन समाचारों के बीच ही जन्मी विसंगतियों को अपनी नज़र से देखते हैं। इनसे व्यंग्य पैदा होता है-लिहाजा वो व्यंग्यकार है। मीडिया के क्षेत्र में कई घाटों का पानी पीने के बाद विकास मिश्रा इन दिनों आजतक में बतौर प्रोड्यूसर कार्यरत हैं।

ये चेतावनी उनके लिए नहीं है, जिन्हें तन ढंकने के लिए चड्ढी तक के लाले हैं। लेकिन अगर आपके पास चड्ढी है और उसके ऊपर भी पहनने के लिए कुछ है तो खबरदार। आपकी चड्ढी खतरे में है। बार-बार लगातार टीवी पर आपको चेतावनी दी जा रही है। जिन्होंने नहीं देखा है, उन्हें हम बता रहे हैं।

सबसे पहले हम उन्हें होशियार करना चाहते हैं जिन्हें स्वीमिंग पूल में नहाने का शौक है। नहाइए जमकर नहाइए। कोई रोक टोक नहीं है, लेकिन ध्यान रहे। चड्ढी के ऊपर तौलिया मत पहनिएगा। स्वीमिंग पूल के पास भटकता कुत्ता कुछ अनहोनी कर सकता है। किसी तन्वंगी का कुत्ता आपका तौलिया लेकर भाग सकता है। टीवी पर जनहित में जारी एक विज्ञापन में चड्ढी बनाने वाली कंपनी ने इशारों ही इशारों में आपको होशियार करने की कोशिश की है। विज्ञापन में तो सिर्फ ये दिखाया गया है कि कुत्ता सिर्फ और सिर्फ तौलिया लेकर भाग जाता है, लेकिन ध्यान रहे कुत्तों को ऐसी तौलियों से कोई खास प्यार नहीं होता। चड्ढी कंपनी आपको ये बताना चाहती है कि कुत्ता और भी डैमेज कर सकता था। क्योंकि कुत्ते चाहते हैं कि आदमी सिर्फ चड्ढी में ही रहे। कुत्तों को ये बात बरदाश्त नहीं होती कि वो तो नंगे घूमें और आप का मन सिर्फ चड्ढी से न भरे और ऊपर से तौलिया भी लपेटें। बड़ी नाइंसाफी है। विज्ञापन में सिर्फ चड्ढी में बचे गबरू जवान को एक लड़की जहां तहां बहुत ध्यान से मुस्कुराकर देखती है। मैसेज ये है कि आज की लड़कियों को खुलापन पसंद है। वो खुद खुली रहने को बेताब हैं और आपको आमंत्रित करती हैं। किसी फिल्मी कवि ने कहा भी है-हमसे सनम क्या परदा।

वैसे चड्ढी के ऊपर का तौलिया छूटकर गिरने के लिए ही होता है। ये बात समझाई है चड्ढी बनाने वाली दूसरी कंपनी ने। दरवाजे पर दस्तक हो और आप चड्ढी के ऊपर तौलिया लपेटे हों तो ध्यान रहे, दरवाजा खुलते ही आपका तौलिया भी खुलेगा। और खुदा न खास्ता कहीं दरवाजे पर धोबन हुई तो झट मांग बैठेगी आपके कपड़े। अब वो कपड़ा वो होगा, जो आपके तन पर बचा है या वो जो छूटकर गिरा है या फिर वो जो अंदर रखा है और गंदा है, ये तो आप खुद समझें। ना समझ में आए तो लाल बुझक्कड़ से पूछ सकते हैं।

और अब खतरे की चड्ढी की कहानी नम्बर तीन। टीवी पर आपने देख रखा है। पूरा मतलब आप यहां समझिए। एक चड्ढी है जो गंदी है। हालांकि पूरी तरह से गंदी लगती नहीं लेकिन आप समझने के लिए मान लीजिए कि चड्ढी गंदी है। इतनी गंदी कि घर का पानी कम पड़ जायेगा धोने के लिए। अब ऐसी मुई चड्ढी तो किसी ताल या पोखरे में ही धुल पाएगी। तो पतिदेव के तौलिए के नीचे से सरक कर ये चड्ढी पहुंच चुकी है बीवी के हाथों में। बीवी जा पहुंची है पोखरे पर। वो पोखरा जहां सिर्फ महिलाएं हैं। बीवी चड्ढी को फैलाती है तो सखियों के दिल में कुछ कुछ होता है। लेकिन अभी कुछ कसर है। बीवी बगल से मुगदर उठाती है और उसे दे मारती है चड्ढी पर।...शुक्र है कि चड्ढी सिर्फ चड्ढी है, उसके भीतर कोई नहीं है। लेकिन मुदगर की चोट पहुंचती है सखियों के दिल पर। करमजलियां सोचती हैं हाय क्या किस्मत पाई है इस मुई ने। चोट खाई चड्ढी पानी में डूबकर आंसू बहाती बाहर निकलती है और चड्ढी धोने वाली के चेहरे का दर्प बताता है कि ये खुशी के आंसू हैं। कहने का मतलब ये कि चड्ढी में सुख है। अगर ये विज्ञापन बिग बी करते तो क्या नहीं कहते कि-चड्ढी में बहुत दम है, क्योंकि कपड़ा इसमें कम है।

-विकास मिश्र
(लेखक ने "मस्ती की बस्ती" के लिए यह व्यंग्य अतिथि लेखक के रुप में लिखा है)

4 टिप्पणियाँ:

Atul ने कहा...

nice post , You must be a champ , how long it takes to type this in Hindi .

17 अप्रैल, 2007 1:39 अपराह्न  
अभय तिवारी ने कहा...

वाह मिश्राजी .. बढ़िया लिखा..

17 अप्रैल, 2007 3:25 अपराह्न  
Sanjeeva Tiwari ने कहा...

पहले बनियान फिर चड्ढी पुरुषों का हर वस्त्रा खतरे में है , Thanks Mishir Ji

17 अप्रैल, 2007 5:34 अपराह्न  
Shrish ने कहा...

:) अब तो पुरुषों की चड्ढी भी खतरे में है। उसके विज्ञापन में भी लड़कियाँ उसे पहने दिखती हैं।

19 अप्रैल, 2007 5:48 पूर्वाह्न  

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