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बुधवार, 18 अप्रैल, 2007

व्यंग्य : नमन हो प्रदर्शनकारियों...

पीयूष मोहन पांडे अख़बारी पत्रकारिता और ऑनलाइन पत्रकारिता करने के बाद पिछले चार साल से टीवी पत्रकारिता में हाथ आज़मा रहे हैं। उनके 50 से ज़्यादा व्यंग्य दैनिक ट्रिब्यून, दैनिक नवज्योति, स्वतंत्र वार्ता और दैनिक जागरण समेत कई समाचार पत्रों में प्रकाशित हो चुके हैं।

देश के हज़ारों लाखों प्रदर्शनकारियों, तुम्हें लख-लख नमन ! आंखों में (अ)क्रांति का सपना लिए तुम इस मॉर्डन युग में भी प्रदर्शन करने निकल जाते हो। पारा 44-45 डिग्री सेल्सियस हो या 4-5 डिग्री, मौसम तुम्हारे इरादों को जला नहीं पाता। इस देश की कोमल सी इज्जत और फूल सी संस्कृति को हर दो-चार दिन में कोई रौंद डालता है, और आप धीर-वीर इसकी रक्षा के लिए सड़क पर मोर्चा संभाल लेते हो।तुम्हें शत शत नमन....

आप न हों, तो 100 करोड़ की आबादी वाले इस देश की इज्जत रोज़ बेआबरु हो। वर्ल्ड कप में टीम इंडिया हार जाए तो देश की इज्जत जाती है। सचिन,सहवाग या दूसरे खिलाड़ी न खेलें तो देश की इज्जत को पलीता लगता है। जेड गुड़ी शिल्पा पर छींटाकशी कर दे तो पूरे देश का अपमान होता है। रिचर्ड गेयर शिल्पा की पप्पी ले लेता है तो देश की संस्कृति को झप्पी लगती है। अमर सिंह शाहरुख के बारे में कुछ कहते हैं तो आप लोग किंग खान के फैन बनकर अवतरित होते हो और चैपल सचिन के बारे में कुछ बोलता है तो आप सचिन के पंखे बन आग लगा डालते हो। कहीं दिल का मामला हो तो आप, कहीं "विल" का मामला हो तो आप....आप सर्वत्र मौजूद रहते हैं। जम्मू से कन्याकुमारी तक। स्वार्थरहित।

हे प्रदर्शनकारियों, इस युग में जब करोड़ों स्वार्थी लोगों के पास अपने पड़ोसी का दुख-दर्द सुनने के लिए वक्त नहीं है, आप मुहल्ले, शहर और इससे भी आगे बढ़कर राष्ट्र हित में प्रदर्शन करने के लिए वक्त निकाल लेते हो। अपने अमूल्य वक्त में प्रदर्शन के लिए वक्त निकालना कोई छोटी मोटी राष्ट्रसेवा नहीं है। आजकल तो नेता भी यह सेवा नहीं करते-जो उनका धर्म है।

राष्ट्रहित में प्रदर्शनकारियों के अहम योगदान को देखते हुए मेरी सरकार से मांग है कि वो (फालतू) धरना-प्रदर्शन को भी एक अहम रोजगार घोषित करे। इसके अलावा, इसमें संलग्न लाखों युवाओं को मोटा भत्ता मुहैया कराया जाए। वैसे, इससे दो लाभ और होंगे। पहला ये कि बेरोजगारों की संख्या में अचानक काफी कमी आ जाएगी। दूसरा यह कि प्रदर्शन के दौरान लुटने वाली दुकानदारों की शिकायतें भी कम हो जाएंगी।

बहरहाल,मुझे मालूम है कि निकम्मी सरकार इन प्रदर्शनकारियों को उनका हक़ आसानी से नहीं देने वाली। इसलिए, सभी प्रदर्शनकारियों से मेरी अपील है कि वो एक मंच पर जमा हो और दबाव समूह के रुप में अपने हक़ के लिए लड़े। वैसे,लड़ना उनका पसंदीदा काम है और सरकार की ऐसी-तैसी करने में उन्हें कोई दिक्कत नहीं होगी। प्रदर्शनकारी हर बात में पुतले फूंक, हवन-यज्ञ कर, नारेबाजी कर मीडिया का इस्तेमाल करना सीख ही गए है, सो उनके इस आंदोलन में मीडिया भी भरपूर सहयोग करेगा।

लीजिए,रात में प्रदर्शनकारी शांत नहीं है। अभी-अभी खबर आयी है कि प्रदर्शनकारियों ने मुंबई में स्टार न्यूज़ के दफ़्तर में भी हमला बोल दिया है......

-पीयूष मोहन पांडे

2 टिप्पणियाँ:

Mired Mirage ने कहा...

बहुत ही बढ़िया व सही लिखा है आपने ।
घुघूती बासूती

18 अप्रैल, 2007 11:39 पूर्वाह्न  
Shrish ने कहा...

मजेदार!

19 अप्रैल, 2007 5:47 पूर्वाह्न  

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