राकेश कायस्थ का व्यंग्य : राष्ट्रीय चुंबन नीति
वरिष्ठ पत्रकार राकेश कायस्थ के नज़रिए और बोलने के अंदाज़ में ही व्यंग्य है - लिहाज़ा उनका व्यंग्य लिखने का अपना अलग अंदाज़ है। अमर उजाला से लेकर दैनिक ट्रिब्यून तक कई राष्ट्रीय समाचार पत्रों में उनके १५० से ज़्यादा व्यंग्य प्रकाशित हो चुके हैं। व्यंग्य की किताब जल्द बाज़ार में आने को है।किस ग्रह योग का प्रभाव है यह कहना मुश्किल है, लेकिन अधर अचानक अधीर हो उठे। राजनीतिक कार्यक्रमों और सांस्कृतिक जलसो से लेकर पांच सितारा पार्टियों तक हर जगह से ख़बर आने लगी.. अरे फिर चूम लिया। .. दिन दहाड़े। आंखे फाड़-फाड़कर टीवी देखता हिंदी पट्टी का आठ साल बच्चा भी स्मूच और लिप लॉक की परिभाषा समझने और याद करने लगा।
लबो की गुस्ताखी, अधरो की आकुलता और होठो की हठधर्मिता ने उन लोगो को परेशान कर दिया जो सार्वजनिक जीवन में तो पारदर्शिता के हिमायती है, लेकिन उन्हे ये लगता है कि कुछ ख़ास किस्म के `लेन-देन' बिना गवाहों के भी हो सकते हैं। मुंबई से लेकर मुजफ्फरनगर और पटना से पालनपुर तक, जगह-जगह उन लोगों के पुतले फूंके जाने लगे जिन्होने भारतीय संस्कृति का अपमान किया है। `बोल की लब आज़ाद है', लेकिन याद रख लबो की आज़ादी सिर्फ बोलने के लिए है। चिलचिलाती गर्मी में चुंबन विरोधी नारा लगाते-लगाते होठो पर पपड़ियां पड़ गईं लेकिन हौसले कम नहीं हुए। जो हाय शिल्पा करते थे वो हाय-हाय शिल्पा करने लगे। चुंबन पर बुक्का फाड़ विलाप की धांसू तस्वीरें हर जगह छपी और नारे लगाते हुए कई लोगों के फोटू भी टीवी पर पहली बार आये। कुछ लोगों ने तो यहां तक कह डाला कि नशाबंदी के बाद इतना सार्थक सामाजिक आंदोलन इस देश में पहली बार हुआ है।
आंदोलनकारी सड़कों पर गला फाड़ते रहे, तो वातानुकूलित कमरों में भी राष्ट्रीय चुंबन चिंतन अपने तरीके से जारी रहा। एड्स एवेयरनेस कार्यक्रम में रिचर्ड गेर ने शिल्पा के साथ जो कुछ किया वह क्या था-- चुंबन, बल का अतिकार, शरारत या फिर ये बताने कोशिश- कि क्या-क्या करने पर एड्स नहीं होता है। इन सवालों पर बहस जारी है। अगर कोई टीवी चैनल इन सवालों पर एसएमस पोल कराये तो एक लाख से ज्यादा जवाब आने की गारंटी है। चुंबन के बढ़ते वाकयों ने इससे जुड़े चिंतन का दायरा भी फैला दिया है। अलग-अलग कोण से दिखाई जानेवाली तस्वीरों ने विश्लेषण के नये आधार तैयार किये। गेर ने शिल्पा को जकड़ा या शिल्पा ने खुद को ढीला छोड़ दिया? गेर का शिल्पा को ताबड़तोड़ चूमना एक स्वभाविक घटना थी या उसमें पश्चिमी साम्राज्यवादी मानसिकता के सांकेतिक अर्थ ढूंढे जा सकते हैं। शिल्पा का समर्पण भारतीय मेहमाननवाजी का नमूना था या फिर हॉलीवुड का टिकट पाने का ज़रिया? ऐसे लोगो की तादाद कम नहीं जिन्होने चुंबन के तस्वीरों को सैकड़ों बार देखा और हर बार ये पाया कि ऐसे दृश्य कतई देखे जाने योग्य नहीं हैं। यह बेहद दृश्य उत्तेजक और अश्लील हैं, अगर ज्यादा लंबे समय तक इसे देखा गया, तो शीघ्र ही उनका ही नहीं पूरे समाज का पतन हो जाएगा। मामला अदालत तक पहुंच गया।
सार्वजनिक चुंबन पर राष्ट्रीय चिंतन का सिलसिला पहले से ही चला आ रहा है। करीना और शाहिद के लिप-लॉक के एमएमएस प्रसाद की तरह घर-घर बंटे तो कुछ उम्रदराज सुधी संपादकों तक ने इसका संज्ञान लिया। तस्वीरें देखीं, विचार किया और संपादकीय लिखा। मीका-राखी एपिसोड में जो कुछ हुआ, टीवी चैनलों ने उसका फैसला दर्शकों के विवेक पर छोड़ दिया। इस बात का भरपूर ख्याल रखा गया कि दर्शक तथ्यों के ठीक से समझकर विचार कर सकें, लिहाज़ा तीस सेकेंड का क्लिप घंटों चलाया गया और अब भी चलाया जाता है। एक महिला मुख्यमंत्री और एक मशहूर महिला उद्योगपति ने एक-दूसरे का चुंबन लिया तो एक राज्य की सरकार हिल गई। विपक्ष ने शोर मचाया और आलाकमान तक को मामले पर गौर करना पड़ा। मामला जैसे-तैसे ठंडा पड़ा, लेकिन शिल्पा-गेर प्रकरण ने इसे फिर जिंदा कर दिया। पार्टी के नेताओं ने सफाई दी- गेर तो ग़ैर है, यहां मामला विदेशी है। शिल्पा ने जो कुछ किया उसके तार सीधे-सीधे अमेरिका, वर्ल्ड बैंक और आईएमएफ से जुड़ते हैं। लेकिन हमारा चुंबन पूरी तरह स्वदेशी है।
राष्ट्रीय चुंबन चिंतन आगे बढ़ा तो कुछ लोगों ने सवाल उठाया कि इस मुद्दे पर भी आम-सहमित बनाई जाना चाहिए। यानी विदेश नीति और अर्थ नीति की तरह एक राष्ट्रीय चुंबन नीति भी होनी चाहिए। एक स्पष्ट आचार संहिता हो और एक मॉनीटरिंग कमेटी भी। मामले लगातार बढ़ रहे हैं, इसलिए निगरानी के लिए अलग से एक मंत्रालय भी बनाया जा सकता है। विपक्ष के कुछ सदस्यों के तेवर तीखे हैं, उन्होने साफ कह दिया है- अगर आगे एक भी सार्वजनिक चुम्मा हुआ, तो सरकार से श्वेत पत्र जारी करने को कहेंगे।
राकेश कायस्थ
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7 टिप्पणियाँ:
बहुत अच्छा व्यंग्य है।
बेहतरीन लेखन, बेहतरीन भाषा. कमाल का शिल्प. और लिखिए, और छापिए. हाँ, सरकार का श्वेतपत्र चुंबनों से लाल न हो जाए.
अनामदास
बहुस सही, इस काम के लिए परमानेंटली एक राष्ट्रीय चुंबन आयोग बना दिया जाना चाहिए।
मजेदार लिखा ह।
बड़िया है।
हमारा पूरा सहयोग है हमे १५% का आरक्षण मिलना चहिये नही तो हम पक्का पंगे करेगे
अब हम शान से ये राष्ट्रभक्ति गीत गुनगुना सकते हैं-
जहां गाल गाल पर होठों पर चुंबन करते हैं बसेरा।
वो भारत देश है मेरा।
-विकास मिश्र
मल्लिका सहरावत के फ्रेंड फिलोसोफर और मिसगाइड कौन हैं। यह अब समझ में आ गया।
वाह, वाह, राकेशजी हम तो आप कुछ और समझते थे,आप तो कुछ और निकले। वाह-वाह वाह।
आलोक पुराणिक
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